Sunday, December 25, 2011

रिसर्च-ए-पियक्कड़ी

एक तो मै बड़ा परेशान हूँ इन रिसर्च करने वालों से, पता नहीं किस किस बात पे रिसर्च किया करते हैं| मैंने अपने एक अपने बड़े काबिल दोस्त से पूंछा…"यार ये रिसर्च क्या होती है बे"…तो उनका जवाब आया.."अबे देखो, दुनिया में बहुत सी चीज़ें जो हैं ना, सब सरची जा चुकी हैं, सरची समझते हो ना बे, मतलब खोजी |  हैं, तो, समझे | और जब लोगो कि जादा भुजाएं फड़फड़ाने लगती हैं और चैन नहीं आता है तो वो फिर से उन्हें सरचियाने लगते हैं, इसी को रि-सर्च बोलते हैं|"

हम थोड़ा नाराज़ हो लिए, हमें तो खुद रिसर्चियाने की आदत बचपन से रही है |  हम बोले “नहीं मालिक! ऐसा नहीं है, अगर दुनिया में रिसर्च ना हो तो काम नहीं चलेगा, देखो जैसे लोग आइंस्टाइन पे रिसर्च कर रहे हैं, कि उनके पास इतना दिमाग कैसे आया, इससे बहुत लाभ होगा|”

जवाब मिला “अबे आइंस्टाइन को तो हम भी सर्च कर रहे हैं, पता नहीं का का लिख के कट लिए, कुछ करना है तो समाज के लिए, देश के लिए करो, रिसर्च-फिसर्च से कुछ नहीं होगा, समझे बे”

बात के बढ़ जाने पर पिटने का डर था, इसलिए हमने उनको प्रणाम किया और बोले “खैर गुरु कोई बात नहीं, बाद में डिसकसियायेंगे इस मुद्दे पे, अभी चलते हैं|”

मालिक ने हमें आशीर्वाद दिया और रास्ते में जाते किसी अपने चेले को, जो साइकिल से कहीं जा रहा था, रुकने का आदेश दिया और बोले “हमें घर तक छोड़ दो"| और वो निकल लिए|

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इसके बाद हमारी रिसर्च करने की इच्छा और बढ़ गयी, मुद्दा ढूँढने निकल पड़े, कि कोई तो मुद्दा मिले |  पर सारे मुद्दे पे तो कोई ना कोई रिसर्च कर रहा है,  कविता से लेकर बढ़ती महंगाई , राजनेता से लेकर अभिनेता, सब पर कोई ना कोई लगा हुआ है|  दुनिया भर के मार्केट डूब रहे हैं, रिसर्च का मार्केट तरक्की पे है| 

फिर अपने काबिल दोस्त की बात याद आयी “कुछ करना है तो समाज के लिए, देश के लिए करो" | बस हम पता करने लगे  कोई उबलता हुआ सामाजिक मुद्दा |  बड़े-बड़े अक्षरों में ज्ञान की कुछ बातें लिखी रहती हैं जगह जगह , हमारी नज़र में एक आ गयी:

“शराब एक समाजिक बुराई है"

मिल गया मुद्दा, सोचा कि शराब पे कौन रिसर्च करेगा | हम कर लेते हैं |  पर बाद में पता चला, इसपे भी रिसर्च हो गयी है | इसी गम में सोचा थोड़ी पी ली जाय, कुछ राहत मिले शायद|  ठीक उसी समय एक आइडिया आया कि क्यूँ ना “पियक्कड़ी" पे रिसर्च की जाय, मामला जम गया और हम लग लिए रिसर्च पे, १५-२० की एक दम दम-निकालू मेहनत के बाद पियक्कड़ी पे हमारा शोध पत्र तैयार हो गया है, छाप रहे हैं उसके कुछ मुख्य-अंश|

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पीना, क्या है पीना?
“पीना" कोई आसान काम नहीं है…बड़ी वैज्ञानिक प्रक्रिया है…पीना कई तरीके का होता है| पीने के कुछ मुख्य प्रकार निम्नलिखित है :
१. पानी पीना
२. खून पीना
३. सिर्फ “पीना"

पानी पीना एक ऐसी बेफजूल की प्रक्रिया है जिसके लफड़े में पड़ के इंसान रात को जाग-जाग कर, काम करने के बीच भाग-भाग कर, पानी के जग, गिलास आदि तक जाता है, पानी पीता है, और वापस आ जाता है|  जीवन की नीरसता को बढाने में इसी पानी पीने का मुख्य योगदान है|  पानी पीने के साथ और भी बड़ी समस्याएं हैं| जैसे : पीने का पानी साफ़ ही होना चाहिए|  आदि आदि|

खून पीना, एक “बौद्धिक" प्रक्रिया है, इसमें खून का कोई आदान-प्रदान नहीं होता, ना आपको “ड्रैकुला" बनने की  ज़रूरत है,  बस जब भी, जहाँ भी मौका मिले, किसी ऑब्जेक्ट को पकड़िये और उसे ज्ञान देने लगिये, चाहे वो सुने ना सुने | थोड़ी देर में वो खुद ही बोल देगा “आगे बढ़ो, काहे खून पी रहे हो"| बस यही वो क्षण होगा जब आप खून पीने में एक्सपर्ट होने की तरफ कदम बढ़ा दोगे |  (जैसे मै इस पोस्ट के साथ आपका खून पी रहा हूँ)

सिर्फ"पीना" ही है जो असली पीना है | इस कैटेगरी में व्हिस्की, वोडका, रम आदि पीना आता है| इन्हें पीने पर ही आदमी पीने वाला या पियक्कड़ कहलाता है|  इसके बारे में और जानकारी नीचे के हिस्सों में है|

पियक्कड़ क्या होता है?
ये शब्द अक्सर सुनने में मिलता है कि फलां आदमी बड़ा पियक्कड़ है, पर इसकी कोई सोलिड डेफिनिशन ढूँढने पे भी नहीं मिलती| पीते बहुत लोग हैं, पर कोई एक विशेष व्यक्ति पियक्कड़ कैसे कहलाता है? इस बात पे बहुत लोगो के विचार लिए| कोई एक भी विचार पूरी तरह से पूरा नहीं निकला| हार के हम अपने उन्ही काबिल दोस्त के पास पहुँच गए, सवाल दागा | जवाब भी गोली की तरह आया|

“देखो, पीना एक सुपर-सेट है, सुपर-सेट पढ़े हो?”

हम बोले हाँ पढ़े हैं| वो आगे बोले “तो हाँ पीना एक सुपर सेट है, और पियक्कड़ होना सब-सेट, समझे, अब तुम पूंछोगे कैसे, तो बात ये है कि जब आदमी पी के निम्न बातों का पालन करे तो समझ लो वो पियक्कड़ है अन्यथा बस पीने वाला :
  • अपने घर से दो गली दूर से ही दरवाजा खोलने की आवाज लगाना|
  • रस्ते पे बैठे कुत्तों को प्यार करना, कि तुम ही मेरे सच्चे दोस्त हो|
  • बार बार चीख चीख के कहना कि मैंने पी नहीं रखी है|
  • पहले तो लड़खड़ाते हुए गिरना नहीं, और गिरना भी तो सीधे नाली में गिरना|

हमने कहा ये तो काफी “आम" आदमी वाली बातें हो गयी, बड़े लोग भी तो पीते हैं, उनमे कोई पियक्कड़ नहीं होता क्या? जवाब मिला “देखो जो पकड़ा जाये वही चोर होता है, बड़े लोग पीते नहीं, शराब को अनुग्रहित करते हैं, और जो पीता नहीं वो पियक्कड़ कैसे हो सकता है| देवदास भी घर छोड़ने के बाद ही पियक्कड़ कहलाया ” हमें अपने सवाल का जवाब मिल गया|

पियक्कड़ होने के मुख्य कारण क्या है?
आदमी पियक्कड़ सिर्फ गम में होता है, खुशी में पीने वाला सिर्फ पीने वाला होता है |  गम के तीन अंग होते हैं:
१. क्या
२. क्यूँ
३. किसका

“क्या" से मतलब ये है कि गम किस टाइप का है, प्यार में धोका, काम का झोंका इसके मुख्य दोषी होते हैं| बात बात पे गम हो जाना आम बात है, पर कोई गम “क्यूँ" बड़ा हो जाता है, जिसके कई कारक हो सकते हैं| कारकों का अध्ययन इस विषय सीमा के बाहर है (जैसे  भाषणों में मुद्दे की बातें गायब होती हैं)| बस यही “क्यूँ" इंसान को पीने पे मजबूर कर देता है|

“किसका" गम, इसमे मुख्यतया दो ही जवाबदेह वस्तुएँ होती हैं…”नौकरी" और “छोकरी" | जिनके बारे में आपलोगों को बताना वैसा ही है जैसे “सूरज" को “दिया" दिखाना| समझदार लोग हो आप|

जब इंसान इन तीनो कारणों के चक्कर में १-१ पेग लगा लेता है तो उसके बाद ३-४ पेग और लग जाते हैं, बस यहीं आकर वो “पियक्कड़" बन जाता है|

ऐसा क्यूँ कहा जाता है कि “कलयुग में दारू मिली सोच समझ के पी”?
ये सब भ्रम पैदा हुआ कुछ ट्रकों और ऑटो के पीछे लिखे एक मशहूर दोहे के वजह से (इसके रचयिता पे भी रिसर्च होनी चाहिए)
सतयुग में अमृत मिला, द्वापर युग में घी| कलयुग में दारू मिली सोच समझ के पी|

मामला “मार्केटिंग" से जुड़ा हुआ है| दरअसल बाकी युगों में “दारू" के सेल्समैन थोड़े कमजोर थे| सतयुग में देवता लोग समुद्र-मंथन के बाद अमृत के पीछे पड़ गए| लड़ाई में बड़े बड़े लोगो को आना पड़ा, दारू दब गयी इस लफड़े में |  द्वापर में तो कृष्ण जी सबकुछ थे, और चूँकि वो खुद गाय प्रेमी थे तो एडबाजी घी की हुई, शराब फिर कहीं कोने में अपना अस्तित्व संभालती रही| कलियुग में बड़े बड़े लोग इसकी मार्केटिंग में कूद पड़े, तो बाकी सब पीछे हो गए|

फिर भी पीना एक सामाजिक बुराई कहलाता है, ऐसा क्यूँ?
ये सब किया धरा है उनलोगों का जो खुद नहीं पीते, अब जब खुद नहीं पीते तो औरों को पीते नहीं देख सकते| और किसी तरह तो  पीने वालों या पियक्कड़ों का विरोध हो नहीं सकता था, इसलिए इसे सामाजिक बुराई बता के इसका विरोध करते हैं|  पीने को समाजविरोधी बोलना ठीक वैसा है जैसे अंगूर ना मिलने पे कहना कि अंगूर खट्टे हैं|

तो पीना बुरा है या भला?
नो कमेन्ट|
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पूरी रिसर्च  स्थान के आभाव (टाइपिंग के आलस) के चलते यहाँ प्रकाशित नहीं की गयी है| जल्द ही देश के अग्रणी विश्वविद्यालयों के वेबसाइट पर निशुल्क पढ़ी जा सकती है | तबतक आप ये  बताओ आपको क्या लगता है , आप पीने वाले हो?, “पियक्कड़" हो या आपके लिए पीना एक सामाजिक बुराई है?
धन्यवाद….
--देवांशु

Saturday, December 17, 2011

आप आ रहे हो ना?

ज़माना जो है वो है फोन टैपिंग का…आजकल बाहर सारे नेताओं-अभिनेत्रियों के फोन जो हैं, टैप हो रहे हैं|  इसी माहौल को देखते हुए एक और टैपिंग हुई,  ये बतकही हुई महेशवा की लडकी रूपा और गाँव के “सो काल्ड उजड्ड" बिरेंदर के बीच, वो भी एस एम् एस पर  |  अरे वही जिनके बारे में पिछली बार बताये रहे हम..

तो हुआ यूं कि बिरेंदर जो है वो गिल्ली डंडा का मैच जिताए दिया  गाँव को,  सारे बाल-गोपाल अपने कंधे पे बैठाय के जुलुस निकाल दिए,  पूरे गाँव में | जुलुस जो है वो खतम हुआ कल्लू के हाते में, मुखिया जी खुद आये बिरेंदर को ५१ रुपये का इनाम देने और साथ में रोज ताजा दूध पहुँचवाने का वादा भी किये|

सारा वाकया, जो कल्लू के हाते में हुआ, महेशवा के घर से दिख रहा था, महेशवा की “दुक्लौती" पर छोटी लड़की, रूपा, फ़िदा हो गयी बिरेंदर पे| बिरेंदर भी “ज़माने" से फ़िदा रहे रूपा पे|

पिछले प्रधानी के चुनाव में महेश , करेंट प्रधान जी के  “स्टार"  प्रचारक रहे |  धाक जमाने के लिए अपना “मोबाइल" नंबर भी बता दिए सबको|  जबसे प्रधान जी चुनाव जीते, महेश लग लिए प्रधान जी की जी-हजूरी में, और फोन आ धमका रूपा के हत्थे…

फिर एक दिन जब सुत्तन की शादी के महिला संगीत में महेश का फोन, रूपा के हाथ में देखा तो बिरेंदर “सन्देश"  भेज दिए… “कैसी हो रूपा…बिरेंदर"

जवाब भी आ गया “हम ठीक हैं, तुम अपनी कहो"

बिरेंदर को तुरंत “बैलेंस" का खयाल आ गया “अरे तुम्हरे फोन में करेंसी तो है?”
 (भाई लोगो आजकल  करेंसी का मतलब मोबाईल का बैलेंस होता है)

इसका भी जवाब “निशा खातिर रहो, ३० रुपये का टाप-अप डलवाए हैं..१५०० एसमेस फ्री हैं"

इसके बाद तो बिरेंदर के पर लग गए..रोज रात एस एम् एस करने लगा…

अब बात उस दिन की जिस दिन टैपिंग हुई…. (इसके बाद जहाँ नाम दिखे समझो वो एस एम् एस कर रहा है)

बिरेंदर :  “कल सनीमा चलोगी???”

रूपा : “कौन सा?”

बिरेंदर : “गजनी”

रूपा : “धत्त, चंडाल लग रहा है अमिरवा, कोई रोमांटिक दिखाओ”

बिरेंदर : “रोमांटिक ही मानो, हम तुमको प्यार से “कल्पना" ही बुलाते हैं”

रूपा : “धत्त, रूपा अच्छा है”

बिरेंदर : अच्छा सुनो , अगर सनीमा नही जा सकती तो कल गेंदामल की दुकान पे मिलो| जलेबी खाओगी?

रूपा : “चुप करो, गेंदा चाचा रोज घर आते जाते रहते हैं”

बिरेंदर: “हम सब इन्तेजाम कर लेंगे, तुम आ जाना….कुछ बात करनी है तुमसे"

(इसके आगे कि कहानी आमने सामने की है,  “नो एस एम् एस” )

बिरेंदर सब सेट कर लिए, गेंदामल की दुकान पे पप्पू काम करता है, बिरेंदर का जिगरी दोस्त, उसको खोपचे में लिया गया…“सुनो पप्पू, कल दुई ठो मेज़ खाली रखना ३ से ४ के पास-पास"

पप्पू : “दो काहे?”

बिरेंदर : “अबे तोहार भाभी आ रही है, अब आमने सामने नहिए ना बैठ सकते हैं"

पप्पू : “ठीक है पर कमीशन लगेगा…पूरे ५ रूपये”

बिरेंदर : “ले लेना साले…एक बार बस मिलने का जुगाड़ कराओ”

अगले दिन ठीक ३ बजे रूपा अपनी तीन सहेलियों निम्मो, सीमा और सुधा के साथ गेंदामल के यहाँ पहुँच गयी| थोड़ी देर में बिरेंदर भी पहुंचा, साइकल की घंटी टनटनाते | और जा के बैठ गया ठीक रूपा के पीछे वाली मेज़ पे| दोनों की पीठ एक दूसरे की ओर थी…खुसफुसा के ही बातें हो रही थीं…

बिरेंदर :  “करीना लग रही हो एक दम!!!”

रूपा :  “तुम भी एक दम शाहरुख!!!!”

फिर दोनों हंस दिए| बिरेंदर ने चिल्ला के कहा “पप्पू , एक पलेट जलेबी लाओ"

पप्पू को कमीशन पहुँच चुका था, प्लेट सीधे रूपा की मेज में पहुँची…

बिरेंदर : “लो जलेबी खाओ”

रूपा ने एक जलेबी खाई, मिठास उसकी आवाज़ में उतर गयी “एक दम ताजी हैं"

बिरेंदर : “एक दम, पप्पू अपना आदमी है, बासी थोड़े देगा….समोसे खाओगी….बहुत नाम है यहाँ के  समोसों का”

रूपा :  “देखो ये बताओ बुलाए काहे हो, अम्मा से झूठ बोल के आये हैं कि सीमा के घर जा रहे हैं, जल्दी जाना होगा”

बिरेंदर : “अरे पहले खा तो लो , भूखे पेट कोई बात होती है भला”

रूपा : “सुबह से दो बारी खाना खा चुके हैं…अब काहे की भूख, जो कहना है जल्दी कहो”

बिरेंदर : “अच्छा ठीक है , अपनी सहेलियों को बोलो दूसरी तरफ देखे पहले”

रूपा : “बोलो, वो नहीं सुन रही, हम घर से मना करके लाये हैं कि केवल आँखे खुली रखना कान नहीं, अब बोलोगे कि हम जाएँ”

बिरेंदर : “अरे बिदकती काहे हो, बोलते हैं ना”

रूपा: “तो बोलो”

बिरेंदर : “अच्छा सुनो , हमें तोहरे पिताजी से बहुत डर लगता है”

रूपा : “हमको भी लगता है, ये बताने के लिए बुलाए थे ?”

बिरेंदर : “अरे नहीं, कल तुम्हारी अम्मा मिली थी सब्जी मंडी में , वो बहुत अच्छी हैं, और तुम्हारी दीदी की शादी में पानी का पंडाल हमहि देखे थे”

रूपा : “हमें पता है, तो ये बता रहे थे?”

बिरेंदर : “नहीं हम ये कह रहे हैं कि पप्पू कह रहा था कि तुम्हरी शादी के खाने और मिठाई का काम उसे मिल जाता तो ठीक रहता…”

पप्पू ने घूर के बिरेंदर कि तरफ देखा |  रेडियो कमेंट्री तो वो भी सुन रहा था|

रूपा : “काहे???”

बिरेंदर : “अब शादी हमारी होगी तो और कोई खाना कैसे बना सकता है…”

रूपा : “धत्त!!!!”

और वो उठ के वहाँ से चली गयी…
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आज गाँव में पंचायत बुलाई गयी है | हुआ यूँ है कि जब रूपा गेंदामल के यहाँ से उठ के गयी ठीक उसी समय पप्पू के घर से उसका आ गया बुलावा|  रूपा के शर्माने में पड़के बिरेंदर ने छंगा, जो पप्पू के साथ ही काम करता था, को समोसा-जलेबी के पैसे दे दिए और चलते बने | ये बात गेंदामल ने देख ली, बात महेशवा तक पहुंची, प्रधान जी से कह के पंचायत बुला ली उसने…

बिरेंदर पहुंचे अपने जिगरी दोस्त पप्पू और बंसी के साथ, दोनों का मोरल सपोर्ट लिए हुए| रूपा के साथ उसकी अम्मा थीं, सहेलियां पीछे भीड़ में थी, महेश एक तरफ पंचों के हुक्का-पानी का इन्तेजाम कर रहे थे..
पंचों ने सारी बात सुनी और अपना फैसला प्रधान जी को बता दिया….प्रधान जी ने बिरेंदर से कड़क के कहा…
“तुम होनहार हो बालक, पर इसका मतलब नहीं कि गाँव का माहौल बिगाड़ो”

बिरेंदर : “लड़ाई करने से माहौल बिगड़त है प्रधान जी, प्यार से नाही”

प्रधान जी : “सनीमा देख के आये हो का??”

बिरेंदर :  “नहीं, खुद से बोल रहे हैं|”

प्रधान जी : “तो रूपा से प्यार करते हो?”

बिरेंदर : “हाँ , हम मानते हैं कि हम रूपा से प्यार करते हैं|”

प्रधान जी रूपा की तरफ घूमे, लाज से वो खुद के अंदर समाई जा रही थी..प्रधान जी की आवाज़ में उतनी ही गुर्राहट थी..“तो तुम भी बिरेंदर को चाहती हो?”

रूपा कुछ नहीं बोली…प्रधान जी फिर बोले “बोलो हाँ या ना"

इस बार रूपा ने दिल कड़ा कर हामी में सर हिला दिया…अचानक से गाँव वालों में बातें शुरू हो गयी…प्रधान जी ने भी थोड़ा समय लिया, पंचों से राय सलाह की.. फिर खुद थोड़ी देर सोच के बोले …

“देखो बिरेंदर!!! काम तो तुमने वो किया है जिसको पूरा गाँव गलत माने,  पर हम जानते हैं कि तुमने जो भी किया है नेक इरादे से किया है,  जब तुम पूरे गाँव के सामने रूपा का हाथ थामने को तैयार हो और रूपा भी इसके लिए तैयार है तो हम फैसला तुम्हारे हक में देते हैं| और गाँव वालों से अपील करते हैं, कि ये हमारे गाँव की  पहली प्रेम कहानी है, सिनेमा देखने से अगर मार-पीट, लड़ाई-झगडा भी सीखे हो तो प्यार करना भी सीखो| नए जोड़े को अपना आशीर्वाद दो | पर देखो बिरेंदर, अगर कभी पता चला कि तुमने रूपा को कोई कष्ट दिया है तो सारे गाँव में मुह काला कर गधे पे बैठा के घुमाएंगे तुम्हे…अगर शरत मंजूर है तो सामने आके हाँ बोलो…

बिरेंदर ने देर ना लगाई…..

प्रधान जी फिर बोले “महेश तुम्हे कोई आपत्ति??”

महेश “माई बाप आप जो निर्णय किये हैं सही किये हैं"

प्रधान जी : “तो जाओ मंदिर से पंडित को बुलाओ आज यहीं पे शादी का महूरत भी निकलवा लेते हैं|”

पलक झपकते बिरेंदर के दोस्त पंडित जी को मंदिर से बिना चप्पल उठा लाये..पंडित जी ने बताया अगले महीने कि १२ तारीख को महूरत शुभ है| प्रधान जी ने शादी की घोषणा कर दी!!!!

पूरे गाँव को बुलाया गया है शादी में |  आपको भी आमंत्रण है | आप आ रहे हो ना ????

Saturday, December 10, 2011

पढाई-लिखाई

        दुनिया में एक तो कन्फ्यूजन वैसे ही कम नहीं था | धरती गोल है या सपाट | एक कोई महानुभाव आये बोले “गोल है”..सबने  मान लिया | फिर आया कन्फ्यूजन कि चलता कौन है..सूरज या पृथ्वी…सब बोले पृथ्वी चलती है (हर किसी को लगता है कि वो चल रहा है बाकी दुनिया जड़ है)  सूरज रुका हुआ है…एक बार दुनिया ने फिर हामी भर दी | फिर एक और आये साइंटिस्ट, बोले कि देखो दोनों चलते हैं…सूरज और पृथ्वी…दुनिया बोली “ना !!! हम ना मानेंगे" …तो वैज्ञानिक बोले “आओ बैठो बांचते हैं तुम्हे ज्ञान | थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी |” जनता बोली समझने से बढ़िया हाँ बोल दो | काम खतम पैसा हजम |

        कुछ लोगो के पास केवल एक ही काम होता है, वो हर चीज़ को रिकार्ड करते रहते हैं,  घटना, सुघटना, दुर्घटना, खेल, खिलाडी,  अनाड़ी, कबाड़ी | जहाँ जिसके बारे में कुछ मिला रिकार्ड कर लिया | ऐसे लोग समाज के दुश्मन होते हैं| कुछ ऐसे ही लोगो की वजह से ऊपर दिए गए सारे कन्फ्यूजन रिकार्ड हो गये….जिसको ये सब समझ में आता है वो सब विज्ञान बोलते हैं और बाकी सब नौटंकी…

       और ऐसे ही समाज के द्रोहियों के लफड़े में पड़कर कुछ लोगो ने “पढाई-लिखाई" जैसी काली करतूत को जनम दिया…सोचो अगर पढ़ना लिखना बुरी बात डिक्लेयर की गयी होती तो? किताबे बेचना कानून के खिलाफ (कानून  की भी कोई किताब नहीं, जिसका जो मन आया वो क़ानून, पर किताब रखना सबके लिए गैर कानूनी) |

       
       पता चला कोई नया सिनेमा आता, हीरो बागी है, माँ-बाप की नहीं सुनता, किताबें पढता है, हिरोइनी भी बागिन (अब बागी का स्त्रीलिंग तो बागिन ही समझ में आया अपनी) , वो लिखती है!!! |  मुंबई की कहानी है, बड़ा शहर है, पढ़ना लिखना खुले आम होता है, दोनों भाग के शादी करते हैं, जीवन सुख से बीतने लगता है, कहानी खतम होती है, पिक्चर का नाम है “जब दोनों लिखे-पढ़े"|


       पहले तो पिक्चर की शूटिंग नहीं हो पाती….गंगा किनारे का सीन है कि हीरो हिरोइनी को छुप के किताब देने आया है |  शुरू ही हुई शूटिंग, कि आ गए कुछ लोग | “गंगा के किनारे इतना अपवित्र काम, पढाई???? ई बरस फिर सूखा पढ़ेगा, कल्मुहे और करमजली , गंगा किनारे किताब, घोर कलजुग"  | दो चार लोग सेट तोड़ देते, कुछ डायरेक्टर को रपटा लेते, कोई प्रोडूसर को पीट देता | एक तरफ कोने में म्यूजिक डायरेक्टर बज रहे हैं| गीतकार के कपड़े फाड़ दिए गए हैं, झोला फाड़ के काफिया मिलाया जा रहा है|
     
       मान लो छुप छुपा के किसी तरह पिक्चर पूरी हो गयी | रिलीज़ से पहले सेंसर बोर्ड आ जाता| देखो वो जहाँ जहाँ किताब दिखी है उसे धुंधला कर दो, जहाँ जहाँ पढाई लिखाई बोला गया हैं वहाँ “टूऊँ” डालो, और ये जो एक सीन है ना जहाँ पुस्तकालय दिखाया है, इसे तो भाई काटना पड़ेगा, नहीं तो पिक्चर पास नहीं होगी | और वो जो एक सीन है जिसमे नदी किनारे हीरो हिरोइनी को किताब देता है , इसकी वजह से पिक्चर एडल्ट घोषित की जाती है|

       पिक्चर रिलीज़ होते ही कोहराम, जगह जगह पिक्चर के प्रिंट जलाये जाते, पिक्चर के पोस्टर जिन गलियों में लगते वहाँ बच्चे  माँ बाप से नज़रें छुपा के जाते….”सोनू अरे ऊ समोसे की दुकान के no padhaiपीछे वाली गली के आखिर में वो जो बंसी की किराने की दुकान के सामने जो पोस्टर लगा है उ देखा? जे मोटी मोटी किताब दिखाई है” “अबे चुप हरामखोर धीरे बोल, पिता जी सुन लिए तो पोस्टर बाद में फटेगा, टांग पहले तोड़ दी जाई”|

      ऐसी फिल्मे छुप छुप के चलती | कल्लू के हाते में रात को सनीमा चलेगा १२ से ३ के बीच में, दीवाली के बहाने निकल लेना, बोलना होलिका दहन करने जा रहे हैं, कोई जान नहीं पायेगा|

     तब कुछ पढाकू लोग वैसे पढते जैसे आज छोटे शहरों के लडके छुप छुप के दारू-सुट्टा पीते हैं| “सुनो रेल की  पटरी के पास वो जो खंडहर है, आज शाम वहाँ १५-२० किताबे लाई जाएँगी,  सब इकठ्ठा हो जाना, २-४ सुना है कविताओं की भी किताबें हैं, सब पढेंगे | और देखो एक झटके में पढ़ना, जादा देर चहलकदमी हुई तो पकडे जाओगे,  और भाई पढ़ते पकड़े गए तो सुनीता-अनीता सब गयी हाथ से, शहर छोड़ना पड़ेगा|”

      तब किताबों के छोटे छोटे हिस्से किये जाते| सब आपस में बाटते और “चियर्स" बोलके जल्दी जल्दी पढते| लौटते वक्त सब अपनी ऑंखें धो लेते “कुछ शब्द आँखों में छप जो जाते हैं"| पकडे जाने का खतरा रहता|
    
      छोटा भाई, बड़े भाई की शिकायत करता पिताजी से “पापा मिंटू दादा किताब पढ़ रहे हैं" पिताजी छोटू को तो दो टाफी देते, मिंटू कूट दिए जाते…
    
      सुबह उठे तो स्कूल की बजाय जंगल चल दिए,  शाम को होमवर्क नहीं है, मस्ती से बैठे, आग जला रहे हैं |  होनहार होने कि कसौटियां बदल जातीं, महेशवा की लड़की कितनी होनहार है, चीते जैसी भागती है, और ऊ बिरेंदर गिल्ली डंडा का हीरो बन गया है, शादी हो जायेगी अब दोनों  की |
     
     वहीँ किसी के घर में तार आता “माँ मैं पढाई करने शहर भाग आया हूँ, परेशान मत होना” | और घर में कोहराम मच जाता…..
-- देवांशु