Friday, June 28, 2013

च से बन्नच और छ से पिच्चकल्ली

“मम्मी ये दादा को कुछ नहीं आता, सब गलत पढ़े बैठा है”
हमारे छोटे भ्राता श्री ने मम्मी को मेरी पढ़ाई के बारे में फीडबैक दे मारा |

छोटे भ्राता श्री
नाम : प्रतीक ( इस्कूल ), बब्बू ( घर ) | महल्ले में ये बचपन से कई नामों से जाने गए | सबसे पहले अपनी चुस्त-मांस रहित काया के लिए “पिद्दी" , फिर “बाबा बंटूनी” | बचपन से जितना इनकी हिन्दी वोकैब तंग थी, उतना ज्यादा लिखने का शौक था इन्हें | सबसे पहले डायरी ही लिखना शुरू किया इन्होने , इसके बारे में बाद में बताते हैं |

पहले अक्षर ज्ञान, तो बात ये रही की हम जाना शुरू कर दिए इस्कूल, ये साहब अभी घर में रहते थे | “हमहू बड़े हुई जाई, गाड़ी बिक्की से इस्कूल जाई” | ये उनके कुछ उदगार थे जिसमे इनके ज्ञान-पिपासु होने का संकेत सबसे पहले हमारे माताश्री और पिताश्री को मिला | इन्हें बोला गया कि दादा पढ़ता है, उसी कि किताब से तब तक पढ़ डालो , फिर जाना इस्कूल | इन्होने शब्द ज्ञान आरम्भ किया |

“च" से “बन्नच"
“छ" से “पिचकल्ली”
“ट" से “मिनाटर”

तो जब हमने इनको कहा कि तुम गलत पढ़ रहे हो तो इनका फीडबैक था शुरुआत में लिखा सेंटेंस , एक तुर्रे के साथ “ मम्मी ये दादा को कुछ नहीं आता, सब गलत पढ़े बैठा है, च से चम्मच कहता है, बन्नच नहीं कहता है”|

इससे कुछ दिनों पहले ही हम इनको सिखाए थे “बब्बू पता है कौन चे इच्कूल में पलते हैं , थल थथी थिथू मंदिल |”

खैर ये सब तो भाषा ज्ञान की शुरुआत थी  | धीरे-धीरे इनका शब्दों का पिटारा बढ़ निकला | जब ये स्कूल जाने लगे तो एक दिन पापा जी ने श्रुतलेख (इमला) लिखवाया | शब्द बोले गए “दुर्योधन" और “चंद्रमा"  | इन्होने लिखे “दउधन” और “चंडमा" | सूते गए |

फिर जब धीरे धीरे इनका ज्ञान और बढ़ा और एक दिन मम्मी टीवी पर कुछ इंग्लिश में लिखा पढ़ रही थी तो इनके मन में एक जिज्ञासा उठी और पूछ बैठे “मम्मी का आपौ पढ़ी-लिखी हो ??” | सूते गए |

पापा कभी-कभी इन्हें घुमाने नहीं ले जाते थे | एक दिन इन्होने अपना दर्द डायरी के हवाले किया :
“दादा रोज हर बार डगदर बाबू के यहाँ जाता है, हमको कभी नही जाने देता है |”
उसी पन्ने में नीचे इंग्लिश टू हिन्दी ट्रांसलेशन भी था |
“सर कमिनसर"
“मैं अचर जी से पुछता हू की मैं अनदर आ सकता हू |” ( यहाँ अचर जी से तात्पर्य आचार्य जी से है )

कुछ दिनों पहले इस डायरी को ढूँढने की कवायद की गयी | डायरी तो मिल गयी, पर ये पन्ना गायब था |

खैर मुद्दा ये नहीं है | मुद्दा ये है कि इनको हमारी दादी जी से कुछ ज्यादा लगाव था | “हमहू बड़े हुई जाई , दादी का बलब लिए  जाई और पान खाय के आई” | यहाँ से इनके “गुलकंड” वाले पान के प्रति असीम लगन का पता भी चला, जनता-जनार्दन को |

फिर एक दिन ये हुआ कि इनसे दादी की रसोई की चाय की पत्ती बिखर गयी | इनको लगा कि ये फिर सूते गए | ये घर से निकल लिए कि माहौल ठंडा हो जाए , फिर वापस आते हैं | काफी देर तक ये नहीं आये वापस तो माताश्री घर के बाहर ढूँढने गयीं | “पच्चासा" उस टाइम का सबसे क्रेज वाला गेम हुआ करता था | मम्मी को लगा कि ये वही खेल रहे होंगे | आवाज़ लगाई गयी | साहब का कोई अता पता नहीं |

महल्ले की एक खासियत है यहाँ हर टाइम कोई ना कोई घूमता टहलता मिल जाता है | गुड्डू उर्फ टोका मास्टर वहीँ घूम रहे थे | बोले “का बात भाभी, कहिका ढूंढ रही हउ” | “बब्बू पता नहीं कहाँ निकल गए हैं , आवाज़ लगा रहे, आ ही नहीं रहे |” शक गया कि दूसरे वाले गुड्डू और मोनू के साथ होंगे  | गुड्डू (दूसरे वाले)  के घर में ताला लगा था , मोनू भी घर पर नहीं थे | इस बीच राजाराम ज्ञान लेकर आ गए “यार गुड्डू  अबहीं एक सार बाबा आवा रहे, भीक मांगे वाला” | इसको सुनते ही मम्मी की हालत खराब |  युद्ध स्तर पर सर्च शुरू हुई | अब तक महल्ले के कुछ १५-२० लोग इकठ्ठा हो चुके थे | हर तरफ “बाबा बंटूनी”, “पिद्दी", “बब्बू" की आवाजें लग रही थीं |  आधा घंटा बीत गया , बब्बू दादा कि कोई खबर नहीं |

मम्मी ने कहा कि “तुम लोग यहाँ ढूंढो,  हम पुलिस में रिपोर्ट लिखा के आते हैं” | बब्बू दादा का एक खूबसूरत सा फोटो भी ढूंढ लिया गया |

इस बीच ढूँढने वालों में "दूसरे वाले गुड्डू" की अम्मा भी शामिल हो गयीं | वो किसी के यहाँ बर्तन धोने जा रहीं थीं , रास्ते में गाय ने धक्का दे दिया था तो कीचड़ में गिर गयीं थीं, अपनी धोती बदलने आयीं थी | वो उसी हालत में बब्बू दादा-सर्च अभियान में लग गयीं | इसी दौरान ये बात भी आयी की जब वो घर से निकल रही थीं तो बब्बू दादा उनसे कुछ बात कर रहे थे | अब तक मम्मी तैयार हो गयी थीं पुलिस स्टेशन रिपोर्ट लिखवाने जाने के लिए | गुड्डू की अम्मा बोली “ भाभी हमहू चलित है तनी धोती बदल लेई” |

और जैसे ही उन्होंने घर का दरवाज़ा खोला | एक आवाज़ उठी “अरे बंटूनी तो हियाँ बैठे” | बब्बू दादा उन्ही के घर में बंद हो गए थे |

सबसे पहले तो बब्बू दादा को मम्मी-दादी ने गले लगाया,  नहलाया-धुलाया ( साहब ज़मीन पर लेटे पाए गए थे ) | फिर सूते गए|  हर कोई बधाई देने आने लगा : “बंटूनी मिली गए" |

बाबा बंटूनी का एक संक्षिप्त साक्षात्कार लिया गया जिसमे उन्होंने चाय की पत्ती फ़ैलाने की बात स्वीकारी | उन्होंने ये भी बताया कि जब सब लोग आवाज़ लगा रहे थे तो वो दरवाज़ों के बीच से सब देख रहे थे | कुछ लोगो ने घर के अंदर आवाज़ भी लगाई, पर ये मारे डर के बोले नहीं कि कहीं बाहर निकाल के इन्हें और ना मारा जाए |

इस घटना के बाद से दो बातें हुईं, पहली तो बब्बू दादा महल्ले में और फेमस हो गए, हर कोई इन्हें जानने लगा, एक स्टार वाला रूतबा | दूसरा हम लोगो का घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया क्यूंकि घर का वही दरवाज़ा खुला रहता जिसपे या तो दादी का पहरा होता या माता श्री की पैनी निगाह |
उस दिन शाम को जब पापा ऑफिस से घर आये थे तो ये बात खुद बब्बू दादा ने डरते डरते पापा को बताई थी | “पापा आद अम को गए ते” | फिर ये अच्छे से सूते गए |
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-- देवांशु

Tuesday, June 18, 2013

इतिहास में डुबकी और बिजली का टोका !!!

१८७७ | साहब ऐसा लगता है जैसे इतिहास का कोई पावरफुल सन-वन है, जैसे ईसई सन में वास्कोडिगामा ने भारत खोजा हो, या महाराणा प्रताप ने किसी ओपची-तोपची को रगदा रगदा के मारा हो | पर डिराओ नहीं | कोई सन नहीं है | ये हमरे मोहल्ले का बड़ा इम्पोर्टेंट घर है | यहाँ हम रहते हैं |

पर अगर आप केवल १८७७ लिखने के बाद मोहल्ला-फोहल्ला का नाम लिख के शहर में चिट्ठी भेज दो तो कोई ज़रूरी नहीं कि वो हमारे ही घर पहुंचे | और वो इसलिए कि ये नम्बर हमारे मोहल्ले में कई घरों का है | दरसल जब प्लोटिंग की गयी थी , उस टाइम एक बहुत बड़े हिस्से का नंबर रखा गया १८७७ | उस हिस्से को आधा खरीदा हमारे परम-पूज्य दादाजी ने |

दादा जी
दादाजी को हमने क्या हमारी माता श्री ने नहीं देखा कभी | पापा की शादी से ५ साल पहले वो इस दुनिया को अलविदा कह गए | इसलिए उनके बारे में कुछ भी लिखने से पहले उनसे माफ़ी , यहाँ जो भी लिख रहे हैं सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है | तो दादाजी हमारे, अंग्रेजों के ज़माने में रजिस्ट्रार क़ानून-गो थे ,  हमारे शहर की तहसील में  | हमारा गाँव शहर से करीब ५० किमी दूर था | जब वो दसवीं में थे , तो फेल हो गए |उनके पिता जी ने उन्हें घर से पूरे सम्मान के साथ निकाल दिया | शहर आकर पहले तहसील में काम शुरू किया | हैण्ड-राइटिंग, खासकर उर्दू की , बहुत ज़बरदस्त थी उनकी , सालों से बंद कोठरी से निकले डायरी के पन्ने इसकी गवाही दे चुके हैं | तो लिखाई के कामों के लिए फेमस हो गए | फिर पढ़ाई भी किये तो बनते बनते एक दिन उसी तहसील में रजिस्ट्रार क़ानून-गो बन गए | हमारी दादी के कथ्य के अनुसार उनकी “तनखा" सन सैंतालीस में ५०० रूपया महीना थी |

ताऊ जी और पापा जी लोगो को उस ज़माने में जेब खर्च के लिए १-२ रुपये डेली मिलते थे | दादाजी ने बच्चन साहब की “लहू में पचहत्तर प्रतिशत हाला" वाली बात चरितार्थ की हुई थी सो शाम को अगर उन्हें आवाज़ लगाकर बुलाते सुना जाता तो , पापा और ताऊ जी चुपचाप लाकर उन्हें तखत पर लिटा देते | उस ज़माने में ना बैंकें थीं , और सरकार के नियम थोड़े कड़े भी थे तो पूरी जिंदगी की कमाई दादा जी ने चांदी के सिक्के में तब्दील करके एक “डेग” में ज़मीन में गाड़कर रख दी थी |

रिटायरमेंट के कुछ दिनों पहले उन्होंने ये प्लाट खरीदा था, १८७७ | तब वो आधा खाली था | तब केवल एक १८७७ था |

कुछ दिनों बाद खबर आयी कि वो सिक्कों वाली डेग चोरी हो गयी | घर की बाकी ज़मा पूंजी बुआ की शादी में लगा दी | ताऊ जी की शादी के लिए आधा प्लाट बेच दिया गया | अब तक बाकी आधे हिस्से के आधे हिस्से में एक “रस्तोगी जी “ ने घर ले लिया था , जो बाद में दशरथ के नाम से जाने गए क्यूंकि उन्ही के सुपुत्र का नाम था “राजाराम" | और जो बाकी का बचा आधा हिस्सा था उसमें दो और प्लाट निकाल दिए गए |

अब उस पूरे बड़े १८७७ के ५ हिस्से हो गए थे | तब तक अंग्रेजों को गए ज़माना गुजर  चुका था और उनके द्वारा छोड़ी गयी मशीनरी में जंग लग चुकी थी लिहाजा पाँचों घरों के मकान नंबर १८७७ हो गए थे |

“कुत्ता ढाल" से उतरने के बाद जो गलियों का आखिरी चौराहा आता है , उसको पार करते ही बाएं हाथ पर पहला घर निगम जी वाला १८७७ है | उससे लगा हुआ राजाराम वाला १८७७ , उसके बाद डेड-एंड | डेड-एंड पर एक गेट है | गेट के उस पार सतीश बाबू की कोठी का हाता | ऐसे तंग महल्ले में एक कोठी भी है |

राजाराम के ठीक सामने का घर शुकला हेड-मास्टर का है | ये उस बड़े प्लाट से अलग है , फिर भी इसका नंबर १८७७ ही है | इसका कारण आजतक नहीं मिला | शुकला हेड-मास्टर हमारे महल्ले के सबसे पढ़े-लिखों में आया करते थे |  रहते वो राजाराम के घर के सामने थे, पर अपने को कम्पेयर राजा दशरथ से करते | यहाँ इनके बारे में बताने का कोई फायदा नहीं है | उनके बारे में तसल्ली से बताया जाएगा कभी |

शुकला हेड-मास्टर से ठीक पहले और हमारे घर के सामने वाला घर है , गुड्डू उर्फ शत्रोहन लाल उर्फ “टोका मास्टर" का |

दादाजी की बात यहाँ बताना इसलिए ज़रूरी था क्यूंकि उन्होंने मोहल्ले के लिए दो काम किये थे | एक, सबसे पहला पक्का मकान बनाया था | दूसरा बिजली के खम्बों के लिए बिजली बिभाग में अर्जी दी थी और बिज़ली सुलभ हुई थी , महल्ले को |  और टोका मास्टर गुड्डू इसलिए ज़रूरी हैं उदधृत किये जाना काहे कि उन्हीं बिजली के खम्बों पर “कटिया-टोका" डालकर उन्होंने महल्ले में अपनी साख बनाई |

गुड्डू जिन्हें हम चाचा कहते थे, गुब्बारे-खिलौने बेचने का काम करते थे | पहले उनका  घर कच्चा बना हुआ था | तब वो गुब्बारे वाले के नाम से जाने जाते थे | फिर जब उनका घर भी पक्का बना और उनके घर का छज्जा ठीक बिजली के खम्बे के पास आकर रुका, उसके बाद से उन्हें “टोका मास्टर" की उपाधि से नवाज़ा गया |

गुड्डू कुल ६ भाई हैं | १ को छोड़ सबकी शादी हो चुकी है |  हैप्पीबड्डे-मुंडन-मड़चटना ये सब उबके यहाँ मासिक क्रियाकर्मों की तरह होते हैं | होली-दिवाली वार्षिक | पर एक काम जो सदियों से नहीं हुआ है वो है “बिजली के बिल का भरा जाना" | पर टोका मास्टर के घर में भीड़ है पर अँधेरा नहीं |  रात में जब लाईट बंद हो जाती है तो अगर उनके घर चोर घुसे तो निकलना तो छोड़िये साहब, आने का रास्ता भूल जाये | और इस बीच अगर किसी ज़मीन पर पड़ी वस्तु से टकरा जाए तो दोनों केस में ही सूता जाए , चाहे बर्तन से टकराए या किसी इंसान से |

खैर, “टोका" डालने की सिध्हस्त्ता के अलावा बिना बिल भरे बिजली जलाने में कोई अगर गुड्डू चाचा का सहायक था तो वो थे बिजली विभाग वाले वर्मा जी | उनके बारे में अफवाह ये थी कि उनकी चार बहुत सुन्दर लड़कियां हैं जिनकी शादी में होने वाले खर्चे के लिए उन्हें गुड्डू जैसे लोगों से मिलने वाले ५-१० रूपये , जो कालान्तर में २०० तक पहुंचे, का मुह ताकना पड़ता | चारों “बहुत सुन्दर" लड़कियों के दर्शन तो कभी नहीं हुए पर वर्मा जी के दर्शन कुछ सालों पहले बंद हो गए , जब वो रिटायर हो गए |

ये गुड्डू चाचा और वर्मा जी के खुले दिल का होने की महानता थी कि महल्ले में बिज़ली लाने की अर्जी का श्रेय लूटने वाले हमारे दादा जी के पोते और  दौड़-भाग-जुगाड़ लगाकर खम्बे लगवाने की वाहवाही लूटने वाले हमारे पापाजी के लड़के , अर्थात हम और हमारे छोटे भ्राता श्री जगहंसाई का पात्र बन गए थे | अकेले जो थे बिजली का बिल जमा करने वाले, पूरे महल्ले में |

राजाराम का कहना था कि टोका डालना तो उनके बाएं हाथ का खेल है | भरी बरसात में नंगे पैर डाल दें | करंट का ट तो दूर की बात है , क भी नहीं लग सकता | पर ना कभी गुड्डू चाचा ने उन्हें छत पर जाने दिया ना कभी हमें उसे दिव्य क्षण के दर्शन हुए |

वर्मा जी के रिटायर होते ही जो लौंडा आया ड्यूटी पर, गुड्डू चाचा की पहले दिन ही उनसे अनबन हो गयी | उन दिनों अन्ना-हजारे का आन्दोलन ज़ोरों पर था | टीवी पर लाइव आ रहा था | पर “ससुरे नए लौंडे" ने गुड्डू चाचा के घर का टोका कनेक्शन काट दिया और तार अपने कब्ज़े में कर लिया | चाचा घर से बाहर आ गए | पहले लौंडे का “सिस्टर-मदर डे” मनाया | अब चाचा की गालियों पर बुढ़ापा साफ़ झलकने लगा था | निहायत ही प्रेडिक्टेबल और पुरानेपन की झुर्रियों से लैस | लड़का नया खून था,  नए जोश से भरा हुआ | चाचा की एक ना चली |तार कब्ज़े में करके चल दिया | चाचा ने चाची को आदेश दिया “आइति है अबहीं” | कहके चप्पल चढ़ाई और लड़के के पीछे पीछे चल दिए |

थोड़ी देर में चाचा हाथ में तार मय मुंह में पान भरे वापस आये | चेहरे पर विजयी मुस्कान थी |  घर के ठीक नीचे चौराहे पर शुकला हेड मास्टर और राजाराम खड़े थे | सबसे पहले चाचा ने नाली में लाल मसौदा इन और काला मसौदा आउट किया “पच्च" की आवाज़ के साथ | फिर हेड-मास्टर साहब से आसीस लिया और राजाराम को छेड़ते हुए बोले “टोका डलिहो राजाराम" | “डाल तो हम देबे करी, इमा कोई गणित थोड़े है"  राजाराम बोले | चाचा ने आँख से इशारा किया “भक्क"  और बोले “ससुरा लड़का तार लिहे चला गवा , हम कहेन काहे ५० रुपिया केर तार खरीदी , दुई की चाय पिलावा ससुरेक , ५ केर एक पान , १० धरेन वहिकी जेब मा | १७ रुपियम काम बनिगा” | हेड-मास्टर साहब ने कहा “अउर का गुड्डू, लच्छमी जी ऐसे थोड़े ना जुड़ती हैं “ |

चाचा फलांगते हुए छत पर पहुंचे और कनेक्शन जोड़ दिया | अंदर टीवी फुल वोल्यूम पर चिल्लाया : “अन्ना ने अनशन खतम करने से मना किया” |

नीली छतरी के उस पार बैठे दादाजी की भी आँखों में आंसू आ गए होंगे !!!!!
                                                                                                                                                 --देवांशु

हमार महल्ला !!!

सर्दियों की बारिश मोहल्ले के लफड़ेबाज लड़कों की तरह होती है, एकदम कटकटुआ | बात पिछली सर्दियों की है , मारे बारिश के पूरी सड़क चहले ( कीचड़ ) से भरी थी | घर की गली से निकलने के बाद मैन-सड़क पर आते ही एक साढ़े-तिराहा पड़ता है | साढ़े तिराहा इसलिए क्यूंकि तीन सड़कें और एक गलियां एक जगह पर मिल जाती हैं | फिर भी चौराहा बोल देते पर दरसल गली “मीटिंग-पॉइंट" से करीब साढ़े चार फुट हट के है , इसलिए साढ़े तिराहा | इन साढ़े चार फुट का भी अपना “भौकाल" है | कहते हैं इन साढ़े-चार फुट में जिसने अपना ठेला ( चाट, पकौड़ी, समोसे, टिक्की इत्यादि का ) लगाया वो जल्दी ही पक्की दुकान का मालिक बन गया | धकम-पेल मची रहती है ठेला लगाने की यहाँ पर |

खैर, मुद्दा ये नहीं है | साढ़े-तिराहे के दो कोने भगवान जी के मंदिरों से सुसज्जित हैं | एक तरफ भोले बाबा पीपल के पेड़ के नीचे बैठे हैं तो दूसरी तरफ, पूरी भगवान मंडली है :  राम जी, सीता जी , हनुमान जी , लक्ष्मण जी , दुर्गाजी, भोले बाबा आदि  | दूसरे वाले मंदिर को थोड़ा एक्सटेंशन देकर धर्मशाला का भी जुगाड़ कर लिया गया है |

लेकिन मुद्दा ये भी नहीं है | मुद्दा ये है कि मैं वहीं कोने पर आँख बंद किये भगवान जी के सामने खड़ा हूँ | तभी कानों में आवाज़ पड़ती है “अऊर चटपटे , का हाल” |

चटपटे
बंगाल में लोगों के दो नाम होते हैं , डाक नाम ( मतलब जो डाक यानी चिट्ठी-पत्री के लिए यूज होता है, दूसरा भालो नाम, जो भलाई में लिया जाता है ) | हमारे महल्ले में लोगो के तीन नाम होते हैं : एक घर का ( भालो), एक इस्कूल का ( डाक) और एक मोहल्ले का ( असली नाम) |

घर का नाम छोटे, इस्कूल का घनश्याम | ५ साल की उम्र से आजतक वही, हल्का गुलाबी कुरता, सफ़ेद पायजामा लगाये घनश्याम बाबू को सड़क पर ( वही साढ़े-तिराहे की तीसरी सड़क जो ढाल बनके नदी तक जाती है ) पानी के “बशाते"  की दुकान लगाते देखा है | कुबिरिया टेम ( शाम का समय ) तवा टनटनाते घनश्याम ठेला लगाकर खड़े हो जाते हैं | रेसेशन का असर उनके “बशातों" पर नहीं पड़ा है | ५ ही देते हैं , बस पहले १ रूपये के देते थे, अब १० रुपयों के देते हैं | पर असली मजा तो उनके आलूओं में हैं , तीखे-मसालेदार एकदम चटपटे | इसी से उनका मोहल्ले का नाम है “चटपटे"  |

तो ठीक उस समय जब हम आँखें बंद कर भगवान जी से गुफ्तगू कर रहे थे, तब घनश्याम अपने बगल में थैला खोंसे बाजार जा रहे थे | उन्होंने इतनी ज़हमत भी नहीं उठायी कि देखें किसने पूछा है बस बोल दिए “सब ठीक, तुम सुनाओ" | और बिना कुछ सुने आगे बढ़ लिए | हमने आँखें खोली और घूम के देखा तो एक जानी पहचानी सी सूरत सामने खड़ी थी |  वो हमें नहीं पहचान पाए, पर हम पहचान गए | पर इससे पहले की हम पूछे कुछ भी , आधे जागे और पूरी तरह सोये दुकानदार ( जिनकी दुकान का नाम है “चेतनदास जनरल स्टोर”)   ने उनसे पूछ लिया “केक्के, अबे हियाँ” |

केक्के
घर का नाम “मोनू” , इस्कूल का “कृष्णकांत" , महल्ले का “केक्के" | हमारे बचपन के परम-मित्र | जब हमने पढ़ना शुरू किया था तब वो “बड़े इस्कूल मा जात रहे” | बड़े इस्कूल मतलब कक्षा ५ के पार | पर दोस्त पक्के |

हमारे घर का आँगन इतना बड़ा था के उसमे दो डेढ़-डेढ़ फुटिए  ( हम और हमारे छोटे भ्राता श्री ) क्रिकेट खेल लें, वो भी दो स्टंप लगाकर | आँगन पुराने ज़माने का ज़बर बना हुआ | करीब बीस फुट लंबा | लम्बाई के एक छोर पर “रसोई" और दूसरे छोर पर “गुसलखना” | मैदान के दो एंड थे , “किचेन एंड" से बालिंग और “गुसलखाना एंड" से बैटिंग | शाट मारने के बाद रन बनाने में दो चार कदम तो चलने ही पड़ते | पर “केक्के" शाट भी पिच के बीच से मारते और खड़े खड़े दोनों तरफ की क्रीज़ पर बैट रख कर ७-८ रन हर बाल पर पेल देते |

केक्के का और हमारा साथ बारहवीं क्लास तक रहा जो हम दोनों ने साथ पास की | उसके बाद “वै अपनी दुकान पर बैठे लगे"|

केक्के साहब दूसरे मोहल्ले में शिफ्ट हो गए थे | पर कभी कभी आते रहते | उस दिन भी वो घूमते हुए वहाँ आ गए थे | दुकानदार को उन्होंने जवाब दिया “मजे में , तुम भौंको का हाल” | इससे पहले की उनकी बात आगे बढ़ती हम बोले “अरे मोनू” |अब मोनू पहिचान गए हमें “अरे भईया तुम, कब आये ??” | और हमारे बिना बुलाये हमारे घर चल दिए | रास्ते में बहुत सारी बातें पूछ डाली उन्होंने | कब-कहाँ-कैसे-क्यूँ आये से लेकर कब जाओगे तक, सारे सवाल | सड़क से घर जाने की जो गली है, वो भी उतरती है , वो “कुत्ता ढाल” है | वहाँ से उतर रहे थे तो हमारे बचपन के एक और दोस्त भिंटा गए “गुड्डू" |

गुड्डू
इस नाम के कैरेक्टर हर जगह पाए जाते हैं | हमारे महल्ले में दो थे | एक पटवा के तीसरे लरिका , नाम -शत्रोहन लाल पटवा ( इस्कूल) , गुड्डू ( घर ), टोका मास्टर (महल्ला) , उनकी कहानी फिर कभी | हमको और केक्के को मिलने वाले गुड्डू दूसरे वाले थे |

इस्कूल का नाम “अजीत" , घर का “गुड्डू" और महल्ले का “महरिन के गुड्डू” | गुड्डू बचपन में चित्रहार थे | वो अपने माता-पिता के साथ , हमारे घर के डायगोनोली  अपोजिट घर में एक कमरे के किराये के मकान में रहते | रात में हमारे घर के चबूतरे में सो जाते | सोने से पहले  वो  दिन भर के सुने हुए सारे गानों को रिपीट करते | “कल कालेज बंद हो जाएगा तुम अपने घर को जाओगे" से लेकर “नफरत की दुनिया को छोड़कर प्यार की दुनिया में" सारे गाने गा डालते | जब कोई निकलता बाहर कुत्तों को खाना डालने के लिए,  तो उन्हें हड़का भी दिया करता  “सोय जाओ गुड्डू, कल सुनाय लियो चित्रहार" | अक्सर ये काम हमारी माता-श्री करती थीं |

गुड्डू आजकल रिक्शा चलाते हैं | उन्होंने हमको और केक्के को आते देख लिया | रिक्शा रोक कर बतियाने लगे |  पता चला कि महल्ले की सबसे फेमस हंस्ती “राजाराम” आज कुछ सामान खरीद कर लाये हैं अपने बड़े लड़के की शादी के लिए |

राजाराम 
ये महल्ले के अपवाद हैं काहे की इनका एक ही नाम है “राजाराम" | हर उम्र का इंसान , जो बोल सकता है , इनको इसी नाम से बुलाता है | इसीलिए ये “लादालाम” से लेकर “ससुरा राजाराम" तक कहलाये जाते हैं | “दुई पैडल मारिके घोड़ा चलाने” से लेकर  अपने घर की गिरी दीवार जोड़ना हो , या महंगी से महंगी शर्ट सिलने से लेकर बारात का खाना बनाना हो, उनसे बेहतर कोई कर नहीं सकता | हाँ चटपटे के आलू से वो हार मानते हैं | उनके द्वारा किया गया हर काम गारंटी के साथ ४-५ दिन तक लोगो को हँसा हँसाकर , खून बढ़ाता रहता है |

तो गुड्डू अपने रिक्शा पर राजाराम के बड़े लड़के की शादी का सामान खरीदवाकर वापस जा रहे थे | केक्के बोले “हमहूँ चलित है” | और जाते जाते हमें आर्डर दे गए कि अंटी याने की हमारी माताश्री को नमस्ते कह दिया जाए उनकी तरफ से और वो फिर आयेंगे |
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हम उन सबसे बिदा लेकर घर पहुंचे तो नीचे से ही फोन कर दिए की दरवाज़ा खोल दो | करीब १५ साल पहले हम लोग फर्स्ट फ्लोर पर शिफ्ट हो गए थे | हम दरवाजे पर खड़े थे तभी पीछे रहने वाले मास्टर  साहब निकले और हमसे बोले “भईया सब लोग ऊपर रहत हैं , घंटी बजाय देओ |”

मास्टर साहब  कोई अजनबी ही समझे थे मुझे | तब पता चला मेरा महल्ला , मुझे भूल चुका है | १२ साल से ज्यादा का वक्त वहाँ से बाहर बीत चुका है, पहले पढ़ाई फिर नौकरी के चलते | कभी गए भी तो दो-तीन दिन के लिए | किसी से मिलने, बात करने का भी टाइम नहीं रहता |

खैर, जब हम ऊपर पहुंचे तो राजाराम के लड़के की शादी के किस्से चल रहे थे और हमेशा की तरह लोगो हँस-हँसके बुरा हाल था |

आगे फिर कभी !!!!

*****
P.S. :  आज सुबह ना जाने कहाँ से “लपूझन्ना" का लिंक मिल गया, पूरे दिन बस वहीं पर पड़े पढ़ते रहे | एक दिन में पहली बार कोई ब्लॉग पूरा चाट डाला | कतई कतल जगह है लपूझन्ना, मूड एकदम हरा हो गया  है | रात का खाना खाते-खाते पंकज बाबू से बतियाते हुए ऊपर दिए कैरेक्टर्स की याद आ गयी , तो सोचा हमारा महल्ला क्यूँ पीछे रह जाए | बस ये सब ठेल दिए | देखा जायेगा जो होगा अब | फिर मिलेंगे टाटा !!!
--देवांशु
(लपूझन्ना से पूरी तरह इंस्पायर्ड)
(कहीं-कहीं पर कुछ जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल किया है, अगर किसी को बुरा लग जाए तो माफी एडवांस में मांग लेते हैं पर मंशा किसी को बुरा लगाने की नहीं है )

Wednesday, June 12, 2013

दास्तान-ए-इस्तीफ़ा


पिछले कुछ दिनों से मार्केट में “इस्तीफों" की बड़ी चर्चा है |

एक “सज्जन" थे, उनसे कहा गया की आपके राज-काज में बड़े लफड़े लोचे हुए हैं | तौलिया रख-रख के लोगों ने बड़े-बड़े काण्ड कर दिए, आप इस्तीफ़ा दो | वो नहीं माने | इस चक्कर में कई और लोगों ने इस्तीफ़ा दे डाला | फिर मीटिंग बुलाई गयी |  मीटिंग में वो टाइम पर पहुंचे, और टाइमिंग की महिमा देखो, सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी |
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इस बीच एक दूसरे सज्जन इस्तीफ़ा दे बैठे | उनसे सबने कहा की वापस लो भाई ये इस्तीफ़ा, ऐसे नहीं चलेगा  | कई दिनों तक नहीं माने,  बाद में मान गए | बाद में पता चला की पिछले ८ सालों में उन्होंने ये इस्तीफे वाला काण्ड ३ बार किया है |

हमारे प्रधानमंत्री जबसे प्रधानमंत्री बने हैं तबसे इतने “गेट" निकले ( जैसे “कोलगेट" ) की लोगों ने उनसे भी हर दूसरे महीने इस्तीफ़ा मांगना जारी रखा है | हालत तो ये है की अगर उनके अपने घर की बत्ती भी चली जाए तो उन्हें डर लगने लगता है की कहीं उन्ही से इस्तीफ़ा ना मांग लिया जाए |

पर इनलोगों को आइडिया नहीं है की बेचारे “इस्तीफों" की क्या हालत होती होगी ? हम बताते हैं | इस्तीफों में भी जान होती है, हमारी तरफ सोचते-समझते-जानते-बूझते हैं | उनमे फीलिंग्स होती हैं | पर जनता का क्या है , वो समझ नहीं पाती |

इस्तीफों का जनम ज्यादातर ऑफर लेटर्स से होता है | आमतौर पर जब तक कोई दूसरा ऑफर ना हो, लोग इस्तीफ़ा नहीं देते |  कभी कभी इस्तीफ़ा देते ही नए ऑफर मिल जाते हैं | पर लोग ऑफर को एक्सेप्ट कर लेते हैं , इस्तीफों को भूल जाते हैं |इस्तीफे कई तरह के होते हैं :

आम इस्तीफे :
इस्तीफों की जनसँख्या में सबसे बड़ी संख्या उन इस्तीफों की है जो आम होते हैं और अक्सर चुपचाप दे दिए और स्वीकार किये जाते हैं | इनके लिए कोई हो हल्ला नहीं होता | ये आम लोगों की होते हैं | चुपचाप लिखे जाते हैं और चुपचाप दे दिए जाते हैं | इतिहास में इनका कोई नाम नहीं होता |

भावखाऊ इस्तीफे :
दूसरे टाइप के इस्तीफे थोड़े भावखाऊ होते हैं | इस तरह के इस्तीफे इसलिए लिखे जाते हैं की ये खुद के एक्सेप्ट होने से पहले भाव खाएं | आई-टी इंडस्ट्री में ऐसे भावखाऊ इस्तीफों की भरमार है | इधर इस टाइप का इस्तीफ़ा दिया गया, उधर बता दिया जाता है की कब ये एक्सेप्ट हो जायेगा, इस बीच में जितना भाव खाना है खा लो |  ऐसे इस्तीफे कभी कभी लालची भी होते हैं | कुछ ठीक ठाक सा दिखा झट वापस हो गए | पर वापस होने का प्रतिशत कम रहता है |

ढुलमुल इस्तीफे :
इस तरह के इस्तीफों का उपयोग पिछले दिनों एक पितामह ने किया है | इसमें होता क्या है की इस्तीफ़ा लिखे जाने से पहले जानता है की उसे वापस लिया ही लिया जाना है | इनका उपयोग ज्यादातर लोगो की भद्द पिटाने के लिए, उन्हें औकात पर लाने के लिए किया जाता है | हल्ला इनपर खूब मचता है | मीडिया के लिए तो दुधारू गाय होते हैं ये इस्तीफे |

ढीठ इस्तीफे :
तीसरे टाइप के इस्तीफे होते हैं ढीठ इस्तीफे, इनको पता होता है की इनको वापस लेने के लिए बहुत प्रेशर डाला जायेगा | पर ये गदहे की चमड़ी के बने होते हैं , टस से मस नहीं होते | इतिहास गवाह रहा है इस तरह के इस्तीफों ने कई राजा-महाराजा तक के लोगों को नेस्तनाबूत कर दिया है | इसको देने वाला भी कोई बहुत कड़े दिल का होता है | इतिहास इन्हें कई पीढ़ियों तक याद रखता है |

लाचार इस्तीफे :
मुझे सबसे ज्यादा दया इस टाइप के इस्तीफों पर आती है | ये कभी दिए जाने वाले के द्वारा नहीं लिखे जाते | जिसको इन्हें देना होता है उसके अलावा हर कोई इन्हें लिए घूमता है | हर दूसरा आदमी इस तरह के इस्तीफों की मांग करता है, पर जिसे देना होता है वो चुप्पी मार के बैठा रहता है | हमारे प्रधानमंत्री से मांगे जाने वाले इस्तीफे इसी श्रेणी में आते हैं |

मुंह पे दे मारू इस्तीफे :
मेरे हिसाब से इन इस्तीफों के लिए कोई “इस्तीफाधिकार आयोग” बनना चाहिए | इस टाइप के इस्तीफे “ओन द स्पॉट” लिखकर सामने वाले के मुंह पर दे मारे जाते हैं | सामने वाले से पूछा भी नहीं जाता की एक्सेप्ट करोगे या नहीं |  बस दे मारा जाता है | इन इस्तीफों को भी काफी चोट लगती होगी, इसलिए इनके अधिकारों की बातें जनता के सामने आनी चाहिए |

इन सब बातों को यहाँ लिखने के दो मकसद हैं : एक तो इस्तीफों के बारे में जनता की जागरूकता बढ़ाना और दूसरा आपका खून पीना | पहले की सफलता तो वक़्त बताएगा पर दूसरे की सफलता की पूरी गारंटी है |  इसमें एक्सपर्ट हैं हम |

खैर!!! अभी चलते हैं |  फिर मिलेंगे तब तक आप एंटरटेनमेंट नेटवर्क, जिन्हें “न्यूज़ चैनल" कहा जाता है चलती फिरती भाषा में, उनपर इस्तीफ़ा कांडों के मजे लीजिये |

टाटा !!!
--देवांशु
#बहुत दिन हुए बकवास किये हुए
(फोटो गूगल के साभार चुराया)

Sunday, June 2, 2013

हैरी पॉटर की दुनिया !!!

पिछले कई महीनो से हैरी पॉटर के सारे उपन्यास और फिल्मे निपटाने में लगे हुए थे | कल फाइनली सब निपटा डाले | सही बताऊँ तो मज़ा आ गया | ऐसा लगता है कि किसी एक दुनिया के बारे में जानता ही नहीं था | बचपन में जादूगरों की कहानियां बहुत सुनी हैं |  अच्छी भी लगती थीं | हैरी पॉटर भी उसी तरह की एक कहानी है | बस इसकी रेंज बड़ी है , बहुत सारे कैरेक्टर्स हैं जो इसको बहुत इंटरेस्टिंग बना देते हैं |

कहानी :
कहानी का मुख्य नायक, हैरी पॉटर है | पर ये कह पाना मुश्किल है की वो नायक किस उम्र में बना | उसके माता-पिता जादूगर हैं | जब हैरी छोटा ही था तब उसके माता पिता को एक बुरा जादूगर, वोल्डेमोर्ट, मार देता है | जब वो हैरी को मारने की कोशिश करता है तो उसमें सफल नहीं होता, और अपना अस्तित्व ही खो देता है और जंगल में जाकर छुप जाता है |

और फिर एक स्कूल है जादूगरी का, होग्वार्ड्स | वहाँ के  हेड हैं , प्रोफ़ेसर एल्बस डम्बलडोर | डम्बलडोर दुनिया के सबसे बड़े जादूगर हैं और वोल्डेमोर्ट केवल उन्ही से डरता है | जब वोल्डेमोर्ट हैरी के माता-पिता को मार देता है तब  डम्बलडोर अपने साथियों की मदद से हैरी को उसकी मौसी के पास छोड़ आते हैं |

जब हैरी ११ साल का होता है, तब वो होग्वार्ड्स में दाखिल होता है | और यहाँ से शुरू होता है हैरी पॉटर का सफर | पूरे सात साल की कहानी , सात उपन्यासों में लिखी गयी है | हर साल हैरी को नए चैलेंजेस मिलते हैं | अपने दो दोस्तों रॅान और हरमोयनी के साथ मिलकर वो इनसे एक-एक करके निपटता है | और आखिर में जीत सच्चाई , दोस्ती और प्यार की होती है |


उपन्यास  :
उपन्यास फिक्शन और सस्पेंस की मिली जुली श्रेणी में आता है | इसके ७ भाग हैं:
१. हैरी पॉटर एंड फिलोसोफर्स स्टोन
२. हैरी पॉटर एंड चैम्बर ऑफ सीक्रेट्स
३. हैरी पॉटर एंड प्रिजनर ऑफ अज़क्बान
४. हैरी पॉटर एंड गोब्लेट ऑफ फायर
५. हैरी पॉटर एंड आर्डर ऑफ फीनिक्स
६. हैरी पॉटर एंड हाफ ब्लड प्रिंस
७. हैरी पॉटर एंड द डेथली हैलोस 

जे.के. रालिंग, जो इसकी लेखिका हैं, ने पूरी एक दुनिया गढ़ दी है | एक स्कूल, वहाँ की किताबें, पढ़ाए जाने वाले विषय , विषयों के कंटेंट, जादू की दुनिया, वहाँ के लोग,  लोगों के तौर तरीके,  उनकी सोसाइटी, उनकी सोच, ऊंचे जादूगर, नीचे जादूगर, वहाँ की मिनिस्ट्री, मंत्री  :  हर चीज़ का विस्तृत वर्णन है | पर कहीं पर भी बोरिंग नहीं | सबसे  महान इंसान भी कैसे गलती कर सकता है , गद्दी का लालच कैसे  हर इंसान की जान को दांव पर लगा देता है , मीडिया के भी सारे पहलू, सब कुछ मिलता है  |  एक फ्लो में बहता चला जाता है सब कुछ |  कहानी में जो कुछ भी घटता है उसका कोई न कोई कारण होता है और वो कारण वक्त आने पर पाठक के सामने खुलता जाता है | और शायद यही कारण है कि जैसे जैसे आप उपन्यास के अंदर जाते हो, आप खुद को इसके अंदर पाते हो | 

और हर उपन्यास के अंत में प्रो. डम्बलडोर हैरी को कुछ बातें बताते हैं , वैसे तो काफी फिलोसोफिकल होती हैं पर पढ़ने वाला कोई कम उम्र का है तो शायद बहुत ज़रूरी होती हैं उसके लिए | पर ऐसा नहीं है कि बड़ों के लिए उसमे कुछ नहीं | कभी कभी ज़िंदगी को समझने के लिए बच्चा बनना पड़ता है | बस यहीं पर हैरी पॉटर के सारे उपन्यास बड़ों के लिए भी पढ़ने वाले हो जाते हैं |

एक खासियत और है, सारे उपन्यासों की इस श्रंखला के :  सारे उपन्यासों की पूरी कहानी वोल्डेमोर्ट के द्वारा हैरी के माता-पिता की हत्या के इर्द-गिर्द है और हर उपन्यास उस घटना के बारे में कुछ नयी बातें उजागर करता है | और सबसे आखिरी हिस्से में आकर पूरी बात से पर्दा उठता है |

फिल्म :
७ उपन्यासों की कहानी को ८ फिल्मों में दिखाया गया है :

१. हैरी पॉटर एंड फिलोसोफर्स स्टोन ( अमेरिका और भारतीय उपमहाद्वीप में सोर्सर्स स्टोन के नाम से )
२. हैरी पॉटर एंड चैम्बर ऑफ सीक्रेट्स
३. हैरी पॉटर एंड प्रिजनर ऑफ अज़क्बान
४. हैरी पॉटर एंड गोब्लेट ऑफ फायर
५. हैरी पॉटर एंड आर्डर ऑफ फीनिक्स
६. हैरी पॉटर एंड हाफ ब्लड प्रिंस
७. हैरी पॉटर एंड द डेथली हैलोस पार्ट –१
८. हैरी पॉटर एंड द डेथली हैलोस पार्ट –२

पहली ६ फ़िल्में , ६ उपन्यासों पर हैं जबकी आखिरी उपन्यास को दो फिल्मों में तब्दील किया गया है  | हालांकि फ़िल्में उस डिटेल में नहीं जा पाती जिस डिटेल में उपन्यास है | बहुत से किरदार कम हो गए हैं फिल्म में | कुछ किरदारों को बहुत कम समय मिला है | इसलिए मुझे फ़िल्में देखने में ज्यादा मजा नहीं आया | हालांकि आप अगर सिर्फ फ़िल्में देखो तो भी कहानी का पूरा पता लग जायेगा | मुझे फिल्मों की तीसरी कड़ी, “प्रिजनर  ऑफ अज़क्बान ” अपने मूल उपन्यास के बहुत करीब लगी जबकी पांचवी कड़ी “आर्डर ऑफ फीनिक्स" सबसे दूर | बाकी सारी लगभग एक जैसी ही हैं |

सारे उपन्यास और फ़िल्में फ्लिप्कार्ट पर उपलब्ध हैं |
--देवांशु