Monday, August 19, 2013

१५ अगस्त का तोड़ू-फोड़ू दिन !!!

 
सबेरे उठे तो सालाना आदत के चलते माताश्री १५ अगस्त के शुभ-अवसर पर प्रधानमंत्री का भाषण सुन रही रहीं | सबसे पहले जो डायलोग कानों में गया वो ये रहा (शब्द थोड़े अलग हैं):

“गरीबी को नापना एक मुश्किल काम है , लोगो के अलग अलग ख़याल हैं, पर कोई भी परिभाषा अपनाएं २००४ के बाद से गरीबी बहुत कम हुई है”

हमें लगा इससे ज्यादा ना सुन पाएंगे भाई , अभी एक और  साहब का भी सुनना है स्पीच , वो पहिले ही दावा कर दिए हैं की प्रधानमंत्री से अच्छा भाषण देंगे | सोचे शाम को दोनों का एक-एक करके सुनेंगे | फिर से सो गए |

देशभक्ति तो आज के दिन ऐसे तोड़ू तरीके से जगती है की पूछो मत |  नीचे की फ्लोर पर रहने वाले लड़कों ने तो एक दिन पहले से मनाना शुरू कर दिया | काफी रात तक नाच गाना चलता रहा | आजादी का नशा कोई मामूली नशा नहीं होता है | हम भी बोले की हम आज़ाद हैं और रात १२  बजे से पूरे चार घंटे का गिटार प्रोग्राम चलाएंगे तो जवाब में सिस्टर जी ( अब बहन जी तो नहीं बोल सकते ना ) ने कहा हम भी आज़ाद हैं , गिटार संभाल लेना फिर |  हमने अपने अरमानों का गला घोंट दिया |

आज़ादी का दिन था  तो हम वैसे ही देर से उठे  |  बचपन में १५ अगस्त एक दम पूजा टाइप लुक देता था | कथा टाइप भाषण होते और बाद में परसाद में बूंदी के लड्डू मिलते |  फिर वक़्त बदला , आजादी का मतलब भी बदल गया |

सबसे पहले घूमने निकले की देखा जाए की कहाँ कैसे आज़ादी मनाई जा रही है | सामने के सेक्टर में भाषण-बाजी चल रही थी | थोड़ी देर सुने फिर आगे बढ़ गए | ऐसा लगभग ३-४ पार्कों में हो रहा था | आगे मंदिर पहुँच गए | वहां भी बराबर भीड़ थी | मुझे लगा की भगवान् की पूजा तो आज भी होनी चाहिए | उन्ही के भरोसे तो ये देश चल रहा है |  वरना डुबाने वाले तो कबसे उतारू बैठे हैं | भगवान् जी से मुलाकात करके आगे बढे | हलवाई के यहाँ से घेवर खरीदा, माताश्री को बहुत पसंद है |

घर वापसी पर मकान-मालकिन को किराया बढ़ाये जाने को लेकर वार्षिक बहस हुई, जो हमने १००० के मुकाबले १०० रुपयों से जीती  |

तभी  सोनल का फ़ोन आ गया “आज तो आज़ाद होगे ??”
हमने कहा “नहीं जी , बड़ी गुलामी में जी रहे हैं”
उधर से आवाज़ आयी “तो फिर सही समय पर ठिकाने पर पहुच जाना” |

दरअसल सोनल के घर पर एक गप्प-गोष्ठी का आयोजन किया गया था |  कई अतिथि आ रहे थे, और सारे मुख्य-अतिथि  |  शिखा जी , अनु जी , आराधना जी , अभिषेक बाबू | हम भी इन-वाईटेड थे |

सोनल जिस कम्युनिटी में रहती हैं उसके गेट पर खड़े  गार्ड ने हमें सबसे पहले रोका | बोला टिकस लै लेयो | हमें लगा की उसे आइडिया लग गया है की बड़े बड़े लोग आ रहे हैं, तभी इंट्रीटिकस लगा दिया है ( अब तो भाषण सुनने के भी रुपये लगते हैं )  | हमने कहा एक टिकस दै देयो |  पर वो बोले पहले उनसे बात कराओ जिनके पास जाना है | सोनल से बात कराई गयी | तब जाकर टिकस मिला | फोन पर ही पता चला की अभिषेक बाबू भी आ गए होंगे, देख लो  | देखा तो वो गेट में घुस ही रहे थे, हमने कहा टिकस पर +१ कर दो |

कम्युनिटी बहुत शानदार रही |  हमने अभिषेक से कहा यार बड़े महंगे घर हैं, अपनी औकात से बाहर | उन्होंने भी हामी भर दी | फिर हमने कहा “एक घर तो ना ले पाएंगे , पूरी कम्युनिटी कितने में बिकेगी ये पता लगाओ" | उन्होंने हमें घूर के देखा |

अन्दर दूसरे गार्ड से बिल्डिंग की लोकेशन पूछी , बोले है तो यही पर. टिकस है ? हमने दन्न से टिकस दिखाया | तब अन्दर जाने को मिला | बड़ा ताम-झाम वाला काम रहा यहाँ तक |

DSC01458शिखा जी पहले पहुँच चुकी थीं | हम लोग भी पहुँच गए | पता चला बाकी लोग नहीं आयेंगे इस लिए गप्प-वार्ता-आलाप शुरू किये गए | दुनिया जहान की बातें |  इसे ब्लॉगर-मीट कहना उतना ही सही रहेगा जैसे हिन्दुस्तान को लोकतंत्र कहना (सटायर) |

गप्प की रेंज एटम बम की रेंज से ज्यादा होती है |  शुरुआत हुई खस के शरबत से जिसमे सोडा मिला हुआ था |  पहले सब लोग सभ्यता के साथ हँसते रहते , बाद में सभ्यता की डोरी टूट गयी और चिग्घाड़-चिग्घाड़ के हंसाई प्रोग्राम चालू हो गया |

सोनल ने दोपहर का डिनर बहुत फोड़ू टाइप बनाया था | स्पेशली मिक्स-वेज | ठूंस-ठूंस के खाए |  मिठाई भी बहुत बढ़िया थी |
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गप्प-गोष्ठी पार्ट-२ शुरू हुआ | बीच बीच में फोटो खीच के सोनल फेसबुक पर डालती रहीं | ऐसे ही टाइप की एक मीटिंग लास्ट इयर भी भई रही | हम पहले ही बोले थे सोनल को की किसी और को भी बुला लेना वरना लगेगा की लास्ट इयर की डाल दिहिन हैं फोटो | पर अनु जी ने ना आकर हमें बचा लिया | लेकिन परशांत बाबू यही कमेन्ट कर दिए  ( इंगेजमेंट के बाद इंसान काफी प्रेडिक्टेबल हो जाता है ) | उनसे भी निपटा गया |


सही बताएं तो भूल गए हैं की कौन कौन सी बात पर और कित्ता हँसे | पर हँसे बहुत | फिर ये हुआ की कॉफ़ी पी जाए | हमने कहा हम बना देते हैं | काफ़ी बनाई तो शर्त ये रखी गयी की पियेंगे तब , जब तुम ट्रे में सजा के लाओगे |  हम बहुत सीधे वाले बच्चे हैं , फटाफट मान गए | पर शिखा जी ने तुरंत फोटो खींच ली | और सोनल ने फेसबुक पर डाल दी |  जनता भी ना !!!!

DSC01478फोटो पर अनूप जी ने पहले तो कहा की पल्लू भी डाल लो हीरो बेटा , फिर अगले कमेन्ट में कह दिए की कोर्ट में जाकर केस कर दो, निजता का उल्लंघन हुआ है तुम्हारी |  बात तो गौर करने वाली है वैसे, देखते हैं किसी टाइम |
 
थोड़ी देर के लिए ब्लॉग के बारे में बात हुई | ज्यादातर ब्लोगरों को हम जानते ही नहीं थे तो इस हिस्से में हम सन्नाटे में रहे , सुनते रहे | पर ये चर्चा ज्यादा देर चल नहीं पायी | सब वापस औकात पर गए | सबकी बारी बारी से टांग खिचाई हुई |

शिखाजी ने अपनी नयी किताब “मन के प्रतिबिम्ब" हम लोगो को गिफ्ट की | अभी पढ़ नहीं पाए हैं , उसके बारे में फिर कभी  | आजकल “ट्यूसडेज विध मोरी” पढने में टाइम निकला जा रहा है | ये किताब पिछली मुलाकात में अनु जी ने सजेस्ट की थी | पहली बार कोई किताब पढ़ रहे हैं जो हर पन्ने पर अपना समय मांग रही है  | बहुत बढ़िया किताब है   |

शाम हो गयी थी तो अब वापस जाने का समय हो गया | सोनल ने अपनी ड्राइविंग कौशल का परिचर दिया , हम सब को सकुशल पंहुचा दिया | सबसे मिलना एक बार फिर बहुत बढ़िया लगा |

घर  आकार परधानमंत्री और सो-काल्ड भावी परधानमंत्री दोनों का भाषण सुने फिर से | सही बताएं तो दोनों बेकार लगे | एक ने कहा “हमने ये ये किया इसलिए अगली बार हमको वोट दो” | दूसरे ने कहा “देखो उन्होंने ये ये किया इसलिए अब हमको वोट दो” |

रात में अनूप जी का फ़ोन आया , उन्होंने कहा की पोस्ट लिखी जाए इस मीटिंग पर | हमने चिट्ठा चर्चा की डिमांड कर दी | उन्होंने कहा तुम लिखो पोस्ट, हम चर्चा शुरू कर देंगे | उन्होंने अपना वादा पूरा कर दिया पर हम पोस्ट ठेल नहीं पाए | वीकेंड भी भागा-दौड़ी में निकल भागा | अनूप जी ने फिर से चेताया की बेटा ये बड़े ब्लोगरों के लक्षण हैं जो कहने पर भी पोस्ट नहीं लिखते | अब इस आरोप से बचना बहुत ज़रूरी था तो बस ठेल दी ये पोस्ट, बाकी इसमे हमरी और कोनू गलती नहीं है |

फिलहाल आज़ादी के दिन की बिलेटेड शुभकामनायें !!!!

मनस्ते !!!!
-- देवांशु

Monday, August 5, 2013

लिफाफे में सादा कागज़ निकलने से हड़कंप

नई दिल्ली | प्रधानमंत्री कार्यालय को मिले एक पत्र के लिफाफे में सादा कागज़ निकलने से हडकंप मच गया है | सारे नौकर और अफसर शाह आदतानुसार बगले झांकने लगे है |

दरसल ये घटना सत्ता धारी गठबंधन की अध्यक्षा द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे पत्र से खड़ी हो गयी | पिछले दिनों झुमरीतल्लैया  ( जिसको असली में कोडरमा के नाम से जाना जाता है ) से कुछ लोग माननीया से मिलने आये थे | उनका कहना था की विविध भारती पर प्रकाशित होने वाले कार्यक्रम “आप की फरमाइश" में पिछले करीब १५ सालों से उनके परिवार के कुत्ते का नाम बार-बार लिया जा रहा है | १५ साल पहले जब उन्होंने रक्षाबंधन के त्यौहार पर “बहना ने भाई की कलाई पर प्यार बाँधा है” वाला गान सुनने के लिए चिट्ठी लिखी थी तो उन्होंने अपने कुत्ते का नाम “शेरू" भी लिख दिया था | पर वो ये लिखना भूल गए थे की ये उनके कुत्ते का नाम है |

शेरू की मौत करीब १० साल पहले हो चुकी है |  पर हर साल रक्षाबंधन पर विविध भारती वाले उसका नाम ले लेते हैं उसी चिट्ठी का हवाला देकर, जिससे परिवार आहत हो जाता है |  फिर वैसे भी अब कुत्ते का मरना राष्ट्रीय आपदा है | उन्होंने इस आशय के कई पत्र विविध भारती और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को लिखे पर कोई कार्यवाही नहीं हुई | इस लिए अब वो सीधे माननीया के पास अर्जी लेकर आये हैं | अर्जी लेकर आये लोगो में मोनू , सोनू, बंटी , राजू और उनके सभी दोस्त शामिल थे |

मुलाकात के बाद जब शाम को प्रधानमंत्री ने अपनी रेगुलर परमिशन कॉल की माननीया को, तो उन्होंने इस घटना का संज्ञान लेते हुए कहा की वो इसके बारे में कल एक पत्र भेजेंगी जिसके बाद प्रधानमंत्री इस पर कोई त्वरित एक्शन लेने का एलान करेंगे | प्रधानमंत्री ने अपना पसंदीदा डायलोग दाग दिया "ठीक है" |

प्रधानमंत्री ने इस घटना के बारे में तुरंत एक्शन की घोषणा सुबह सुबह कर दी |  इसे माननीया के द्वारा भेजे गए पत्र के लिए  उठाया  गया कदम बताया और शाम को इसके बारे में विस्तृत जानकारी देने के लिए प्रेस-कांफ्रेंस बुला ली |  पर दोपहर में प्रधानमंत्री कार्यालय से खबर आ गयी की पत्र के लिए जो लिफाफा भेजा गया उसमे सिर्फ सादा कागज था | ये बात प्रधानमंत्री तक नहीं पहुँच पायी और वो सीधे प्रेस-कोंफ्रेंस में पहुच गए |

उन्होंने  उठाये गए क़दमों को पहले तो  युवराज की पहल और माननीया की देश के प्रति चिंता बताया फिर पहले से निर्धारित प्रश्नों के जवाब दिए | तभी एक खुराफाती पत्रकार ने ये सवाल दाग दिया की सादे कागज पर ही एक्शन कैसे ले लिए तो प्रधानमंत्री के पीए  असमंजस में आ गए | किसी को कुछ समझ नही आया की क्या कहें और क्या करें |  कुछ लोगो ने इसे हल्की सी गलती बताया जिसपे भारी हंगामा हो गया | कांफ्रेंस संसद भवन में तब्दील हो गयी | कुछ पत्रकार पक्ष में आ गए कुछ विपक्ष में | शब्द बाण चलने लगे |

माहौल बिगड़ता देख प्रधानमंत्री ने अपनी शायरी के ज्ञान के चलते एक लाइन में बात निपटाई :
“हम वो हैं जो लिफाफे का रंग देख ख़त का मज़मून जान लेते हैं” |
तब जाकर मामला शांत हुआ |

इस बीच नाम ना लिए जाने की शर्त पर प्रधानमन्त्री कार्यालय के एक उच्चपदासीन अधिकारी ने बताया है की दरसल वो सादा कागज़ प्रधानमंत्री कार्यालय को पिछले बयान के चलते दी गयी क्लीन चिट थी जो गलती से गलत लिफाफे में चली गयी | इस घटना के बाद से प्रधानमंत्री के द्वारा  आने वाले स्वतंत्रता दिवस के लिए बोली जाने स्पीच के लिफाफे की ट्रेकिंग पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है |

अभी तक पीड़ित परिवार से कोई संपर्क नहीं हो पाया है |
--देवांशु
(फोटू के लिए गूगल बाबा की जय हो )