Friday, May 5, 2017

पड़ोसी .. एक जासूसी कहानी !!!

मैं अपने पड़ोसी का पड़ोसी हूँ | अपने बगल वाले पड़ोसी के बगल में , सामने वाले के सामने और पीछे वाले के आगे रहता हूँ |

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चर्चा ये आम है आजकल मोहल्ले में पड़ोसी के दूसरे पड़ोसी , शर्मा जी : आजकल रात में ग़ज़ल तो सुनते ही हैं , साथ में २-४ लगा लेते हैं | अब दो  या चार , ये पता नहीं क्यूंकि आजतक मुझको किसीको इन्वाइट नहीं किया , तो कन्फर्म नहीं कह सकते | पर  पिछले सन्डे रात जब वो घर आ रहे थे , इस बार "सुना" बाहर से ही कहीं लगाने के बाद , तो सोसाइटी के बाहर "सुना" उनको काफी सारे कंटाप रसीद कर दिए चौकीदार ने |


आपने गौर किया होगा "सुना" कई बार उपयोग किया गया ऊपर | दरसल पड़ोसी की पहली खूबी यही होनी चाहिए की उसे सुनने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए | एक सफल पड़ोसी  की सुनने की क्षमता ऐसी होती है की वो केवल सुन सुन के अमरचित्र कथा अपने दिमाग में बना सकता है | वो बात अलग है इस चक्कर में उसे बहुत कुछ सुनना पड़ सकता है |

पड़ोस के ही मेहता जी , ज़रा ऊंचा सुनते हैं | काफी पड़ोसियों ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन इस वजह से किया है की वो गाने बड़ी ऊँची आवाज़ में बजाते हैं | वैसे इस बात का पुष्ट प्रमाण नहीं है और ना ही इसे लेकर सारे पड़ोसी एकमत हैं | कुछ का कहना है की मिसेस मेहता  , मेहता जी को दिनभर क्या क्या "कहती" रहती हैं , ये कोई सुन ना ले , इससे बचने के लिए वो गाने सुनते हैं | आप साहबान ये "कहने " वाली क्रिया पर भी गौर फ़रमाया होगा | ये सफल पड़ोसी होने का दूसरा गुण  है | इस दावे के साथ की हमारा मुंह मत खुलवाओ , पड़ोसी अक्सर बहुत कुछ "कह"  जाते हैं | 

मुंह अक्सर ना दिखाने लायक रहने के ही  काम आता है | घर में घटित होने वाली किसी भी घटना की वीभत्सता इस बात के समानुपाती होती है की इस बात के  घर से बाहर  पता चलने पर मुंह किस हद तक छुपाना पड़ेगा | नाते रिश्तेदारी में मुंह दिखाने लायक बनाये रखने की कवायद में तीन चौथाई इंडिया धराशायी पड़ा है | 

वैसे रिश्तेदार और पड़ोसी में मुख्य अंतर दूरी का होता है | लोगों के दूर के रिश्तेदार होते हैं | दूर के रिश्ते में पड़ोसी कोई नहीं होता | 

अब दूर से ये भी याद आया की बगल में रहने वाले मिश्रा जी की दूर की नज़र कमज़ोर है , पास का साफ़ साफ़ नज़र आता है | उनके बगल वाले तिवारी जी की पास की नज़र कमज़ोर है , दूर का साफ़ साफ़ दिखाए देता है | रिश्ते में दोनों एक दूसरे के दूर के साढ़ू  हैं | रिश्तेदार का पड़ोसी हो जाना "बापू" से भी  ज्यादा सेहत के लिए हानिकारक हो जाता है , इस बात का जीता जागता प्रमाण मिश्रा जी के "लौंडे" हैं | उनकी कम्बल कुटाई  में मिश्रा जी की पास और तिवारी जी की दूर की नज़रों का तेज़ होना मुख्य समस्या है | 

हानिकारक तो वैसे ये भी है की अगर आपके आस पड़ोस कोई ऐसा चेहरा रहता हो जिसको बस आप देखते रहना चाहें | बस दिक्कत दोहरी होती है : वो देख ले तो डर रहता है की कहीं चोरी तो नहीं पकड़ी गयी और ना देखे तो  लगता है की ऐसा क्या हो गया की  देखती भी नहीं | आप गर शादीशुदा हैं तो ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है | अक्सर इसीलिए पड़ोस का धार्मिक प्रवृत्ति का होना "नितांत" आवश्यक है | 

मिश्रा जी का बीच वाला लौंडा , छोटे वाले को नितांत तब बुलाता था , जब वो तुतलाता था |  अभी निशांत बोलता है |  निशांत उसे सुशांत दद्दा | दोनों अपने सबसे बड़े भाई को भाई साहब बुलाते हैं , प्रशांत नहीं बुलाते | बड़े अदब के लौंडे हैं | 

पड़ोसियों की एक और खास बात होती है , इनके छज्जे अक्सर टकरा जाते हैं | इन छज्जों पर बचपन में पतंग का और जवानी में अक्सर नयनों का टांका भिड़ जाता है | 

ऐसा ही टांका भिड़ा था प्रशांत का , मेहता जी की बेटी की कजिन सिस्टर के साथ जो अक्सर शाम को छत पर अपनी कजिन मतलब मेहता जी की बेटी के साथ बतियाने आती थी | 

दिन सर्दी का एक सन्डे था | प्रशांत को छत पर रजाई सुखाने का वीकली टास्क मिला हुआ था | मेहता जी के छज्जे  पर हालाँकि लाल इमली कानपुर वाला रोंएदार कम्बल सूख रहा था , पर उस पर  टेक लगाकर कोई शोभायमान थीं तो वो थी प्रशांत बाबू की एकतरफा माशूक़ | एकतरफा इसलिए की इज़हार-ऐ -इश्क़ अभी हो नहीं पाया था | वैसे दोनों घरों की दूरी "छुड़ैया " भर की थी | छुड़ैया  कार में धक्का मार के स्टार्ट करने का , पतंगबाज़ी वर्ज़न है जिसमें एक खुदा का नेक बन्दा पतंग को कोनों से पकड़कर पहले तो मेन पतंगबाज़ से थोड़ा दूर जाता है और फिर पैरों की उछाल और हाथ से पतंग को ऊपर छोड़ने के तालमेल का मुजायरा करते हुए पतंग को हवा में लहरा देता है | डोर मेन पतंगबाज़ के हाथ में होती है और जल्दी ही पतंग हवा में हिलोरे लेने लगती है | 

हाँ तो , एक तरफ छत पर रज़ाई सूख रही थी | दूसरी तरफ छज्जे पर कम्बल सूख रहा था , कानपुर लाल इमली का रोएंदार | नज़रें बार बार छिप छिप के ही सही, पर मिल ज़रूर  रहीं थी | "इधर चिलमन से हम झांके उधर चिलमन से वो झांके" टाइप माहौल था | माहौल में गंभीरता घोल रहा था मेहता जी के यहाँ बजता गाना :

"ये लड़की मेरे सामने , मेरा दिल लिए जाये जाये जाये , हाय हुकु हाय हुकु हाय  हाय "

मिश्रा जी के बाकी दोनों लौंडे भी छत पर ही थे जो निम्नवत काम कर  रहे थे :

एक  पतंग में कन्ने बांधने के पास उसे दूसरी तरफ से अपने सर पर रख के दोनों कोने  नींचे खींच के मुढ्ढे ठीक कर रहे थे | दूसरे राजकुमार चरखी पर सद्दी चढाने के बाद बरेली ब्रांड का कांच मिला मांझा चढ़ा रहे थे | 

मतलब माहौल पतंगबाज़ी का फुलटू था | बड़े भैया इश्क़ का माहौल सेट कर रहे थे | निशांत का माहौल देखकर सुझाव ये था की लव लेटर , पतंग में रखकर भेजा जाए | और चूंकि शुशांत हिंदी के सेकंड पेपर में निबंध में पूरे नंबर ले आये थे , इसलिए लव लेटर भी वही लिखेंगे , एक्चुअली अंदेशा था की मैडम मैडम आ सकती हैं , इसलिए लेटर पहले से तैयार ही था | 

बस पतंग में पत्र फंसा के प्रशांत को निशांत ने छुड़ैया  दी | पतंग छज्जे से टकराई | साथ में नायक नायिका की आँखें भी टकराईं | गाना चेंज हुआ :

"हम दो प्रेमी छत के ऊपर , गली गली में शोर शोर शोर शोर | 
आ रा रा रा अहा ओ  रे , आ रा रा रा अहा ओ  रे , आ रा रा रा अहा ओ  रे, आ रा रा रा अहा ओ  रे |"

प्रशांत ने इशारे से चिट्ठी उठाने का इशारा किया | जो एक बार इग्नोर किया गया | पर अगली बार मान लिया गया | पतंग छज्जे में टकराने के बाद डोर से थोड़ी हवा में लटक गयी थी | एक छोटे डंडे से उसे सावधानी से ऊपर लाने की जुगत की जाने लगी | इस  बीच गाना फिर चेंज हो गया :

"इस प्यार से मेरी तरफ ना देखो , प्यार हो जायेगा"| 

दोनों जोड़ी  नज़रें कभी कभी एक दूसरे की तरफ देख रही थीं | 

बस यहीं एक गलती हो गयी | डंडे का एक प्रहार उस मासूम पत्र पर ऐसा हुआ की , पतंग फट गयी और चिट्ठी सीधा मेहता जी के पड़ोसी , वही शर्मा जी , के घर पहुँच गयी | 

मोहल्ले में  छत पर होने वाले क्रिकेट के कतई अफरीदी थे उस ज़माने में निशांत | छक्के मारने पर "जो मारेगा वो गेंद लेकर भी आएगा" रूल के चलते , छत भी जबर फांद लेते थे | और इसी कारण  वो ये भी पता लगा पाए थे की शर्मा जी सन्डे को दिन में दारू पीने का डे मानते थे | इस खोज के चलते शर्मा जी उनके जाती दुश्मन बन गए थे | 

शर्मा जी की छत से पत्र उठाने की ज़िम्मेदारी निशांत पर आयी | शर्मा जी ताक में बैठे थे | निशांत जैसे ही कूदे , पकड़े गए | पकड़े क्या गए जनाब ये कहिये कूट दिए गए | नज़रों के अपने अपने दोषों के चलते मिश्रा जी ने ये नज़ारा पास से और तिवारी जी ने दूर से, साफ़ साफ़ देखा | इसलिए आये खोपचे में प्रशांत भी | पर हैंडराइटिंग मिली शुशांत की | सूते वो जबर गए | 

गाना फिर चेंज हुआ :

"प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया , के दिल करे हाय "

और इसके बाद हाय तीनों की एक साथ निकली | इस घनघोर सुताई में कैटेलिस्ट का काम कर रहे थे मेहता जी क्यूंकि  उनका कहना था की वो रिश्तेदारी में मुंह दिखाने के लायक नहीं बचे | कुल ५-७  मिनट के सामूहिक कुटाई अभियान से तीनों किसी तरह बचे | 

उस दिन वो शर्मा जी पर ख़ास गुस्सा थे | 

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अभी लेटेस्ट पड़ोस में ये चर्चा आम है की उस रात शर्मा जी जब घर लौट रहे थे तो दअसल चौकीदार उन्हें बचाने आया था ,  मारने नहीं | और अँधेरे का फायदा उठाकर शर्मा जी को कूटने वाले कोई चार लोग थे | 

कुछ आईडिया है चौथा कौन रहा होगा ???

-- देवांशु