Friday, May 5, 2017

पड़ोसी .. एक जासूसी कहानी !!!

मैं अपने पड़ोसी का पड़ोसी हूँ | अपने बगल वाले पड़ोसी के बगल में , सामने वाले के सामने और पीछे वाले के आगे रहता हूँ |

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चर्चा ये आम है आजकल मोहल्ले में पड़ोसी के दूसरे पड़ोसी , शर्मा जी : आजकल रात में ग़ज़ल तो सुनते ही हैं , साथ में २-४ लगा लेते हैं | अब दो  या चार , ये पता नहीं क्यूंकि आजतक मुझको किसीको इन्वाइट नहीं किया , तो कन्फर्म नहीं कह सकते | पर  पिछले सन्डे रात जब वो घर आ रहे थे , इस बार "सुना" बाहर से ही कहीं लगाने के बाद , तो सोसाइटी के बाहर "सुना" उनको काफी सारे कंटाप रसीद कर दिए चौकीदार ने |


आपने गौर किया होगा "सुना" कई बार उपयोग किया गया ऊपर | दरसल पड़ोसी की पहली खूबी यही होनी चाहिए की उसे सुनने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए | एक सफल पड़ोसी  की सुनने की क्षमता ऐसी होती है की वो केवल सुन सुन के अमरचित्र कथा अपने दिमाग में बना सकता है | वो बात अलग है इस चक्कर में उसे बहुत कुछ सुनना पड़ सकता है |

पड़ोस के ही मेहता जी , ज़रा ऊंचा सुनते हैं | काफी पड़ोसियों ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन इस वजह से किया है की वो गाने बड़ी ऊँची आवाज़ में बजाते हैं | वैसे इस बात का पुष्ट प्रमाण नहीं है और ना ही इसे लेकर सारे पड़ोसी एकमत हैं | कुछ का कहना है की मिसेस मेहता  , मेहता जी को दिनभर क्या क्या "कहती" रहती हैं , ये कोई सुन ना ले , इससे बचने के लिए वो गाने सुनते हैं | आप साहबान ये "कहने " वाली क्रिया पर भी गौर फ़रमाया होगा | ये सफल पड़ोसी होने का दूसरा गुण  है | इस दावे के साथ की हमारा मुंह मत खुलवाओ , पड़ोसी अक्सर बहुत कुछ "कह"  जाते हैं | 

मुंह अक्सर ना दिखाने लायक रहने के ही  काम आता है | घर में घटित होने वाली किसी भी घटना की वीभत्सता इस बात के समानुपाती होती है की इस बात के  घर से बाहर  पता चलने पर मुंह किस हद तक छुपाना पड़ेगा | नाते रिश्तेदारी में मुंह दिखाने लायक बनाये रखने की कवायद में तीन चौथाई इंडिया धराशायी पड़ा है | 

वैसे रिश्तेदार और पड़ोसी में मुख्य अंतर दूरी का होता है | लोगों के दूर के रिश्तेदार होते हैं | दूर के रिश्ते में पड़ोसी कोई नहीं होता | 

अब दूर से ये भी याद आया की बगल में रहने वाले मिश्रा जी की दूर की नज़र कमज़ोर है , पास का साफ़ साफ़ नज़र आता है | उनके बगल वाले तिवारी जी की पास की नज़र कमज़ोर है , दूर का साफ़ साफ़ दिखाए देता है | रिश्ते में दोनों एक दूसरे के दूर के साढ़ू  हैं | रिश्तेदार का पड़ोसी हो जाना "बापू" से भी  ज्यादा सेहत के लिए हानिकारक हो जाता है , इस बात का जीता जागता प्रमाण मिश्रा जी के "लौंडे" हैं | उनकी कम्बल कुटाई  में मिश्रा जी की पास और तिवारी जी की दूर की नज़रों का तेज़ होना मुख्य समस्या है | 

हानिकारक तो वैसे ये भी है की अगर आपके आस पड़ोस कोई ऐसा चेहरा रहता हो जिसको बस आप देखते रहना चाहें | बस दिक्कत दोहरी होती है : वो देख ले तो डर रहता है की कहीं चोरी तो नहीं पकड़ी गयी और ना देखे तो  लगता है की ऐसा क्या हो गया की  देखती भी नहीं | आप गर शादीशुदा हैं तो ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है | अक्सर इसीलिए पड़ोस का धार्मिक प्रवृत्ति का होना "नितांत" आवश्यक है | 

मिश्रा जी का बीच वाला लौंडा , छोटे वाले को नितांत तब बुलाता था , जब वो तुतलाता था |  अभी निशांत बोलता है |  निशांत उसे सुशांत दद्दा | दोनों अपने सबसे बड़े भाई को भाई साहब बुलाते हैं , प्रशांत नहीं बुलाते | बड़े अदब के लौंडे हैं | 

पड़ोसियों की एक और खास बात होती है , इनके छज्जे अक्सर टकरा जाते हैं | इन छज्जों पर बचपन में पतंग का और जवानी में अक्सर नयनों का टांका भिड़ जाता है | 

ऐसा ही टांका भिड़ा था प्रशांत का , मेहता जी की बेटी की कजिन सिस्टर के साथ जो अक्सर शाम को छत पर अपनी कजिन मतलब मेहता जी की बेटी के साथ बतियाने आती थी | 

दिन सर्दी का एक सन्डे था | प्रशांत को छत पर रजाई सुखाने का वीकली टास्क मिला हुआ था | मेहता जी के छज्जे  पर हालाँकि लाल इमली कानपुर वाला रोंएदार कम्बल सूख रहा था , पर उस पर  टेक लगाकर कोई शोभायमान थीं तो वो थी प्रशांत बाबू की एकतरफा माशूक़ | एकतरफा इसलिए की इज़हार-ऐ -इश्क़ अभी हो नहीं पाया था | वैसे दोनों घरों की दूरी "छुड़ैया " भर की थी | छुड़ैया  कार में धक्का मार के स्टार्ट करने का , पतंगबाज़ी वर्ज़न है जिसमें एक खुदा का नेक बन्दा पतंग को कोनों से पकड़कर पहले तो मेन पतंगबाज़ से थोड़ा दूर जाता है और फिर पैरों की उछाल और हाथ से पतंग को ऊपर छोड़ने के तालमेल का मुजायरा करते हुए पतंग को हवा में लहरा देता है | डोर मेन पतंगबाज़ के हाथ में होती है और जल्दी ही पतंग हवा में हिलोरे लेने लगती है | 

हाँ तो , एक तरफ छत पर रज़ाई सूख रही थी | दूसरी तरफ छज्जे पर कम्बल सूख रहा था , कानपुर लाल इमली का रोएंदार | नज़रें बार बार छिप छिप के ही सही, पर मिल ज़रूर  रहीं थी | "इधर चिलमन से हम झांके उधर चिलमन से वो झांके" टाइप माहौल था | माहौल में गंभीरता घोल रहा था मेहता जी के यहाँ बजता गाना :

"ये लड़की मेरे सामने , मेरा दिल लिए जाये जाये जाये , हाय हुकु हाय हुकु हाय  हाय "

मिश्रा जी के बाकी दोनों लौंडे भी छत पर ही थे जो निम्नवत काम कर  रहे थे :

एक  पतंग में कन्ने बांधने के पास उसे दूसरी तरफ से अपने सर पर रख के दोनों कोने  नींचे खींच के मुढ्ढे ठीक कर रहे थे | दूसरे राजकुमार चरखी पर सद्दी चढाने के बाद बरेली ब्रांड का कांच मिला मांझा चढ़ा रहे थे | 

मतलब माहौल पतंगबाज़ी का फुलटू था | बड़े भैया इश्क़ का माहौल सेट कर रहे थे | निशांत का माहौल देखकर सुझाव ये था की लव लेटर , पतंग में रखकर भेजा जाए | और चूंकि शुशांत हिंदी के सेकंड पेपर में निबंध में पूरे नंबर ले आये थे , इसलिए लव लेटर भी वही लिखेंगे , एक्चुअली अंदेशा था की मैडम मैडम आ सकती हैं , इसलिए लेटर पहले से तैयार ही था | 

बस पतंग में पत्र फंसा के प्रशांत को निशांत ने छुड़ैया  दी | पतंग छज्जे से टकराई | साथ में नायक नायिका की आँखें भी टकराईं | गाना चेंज हुआ :

"हम दो प्रेमी छत के ऊपर , गली गली में शोर शोर शोर शोर | 
आ रा रा रा अहा ओ  रे , आ रा रा रा अहा ओ  रे , आ रा रा रा अहा ओ  रे, आ रा रा रा अहा ओ  रे |"

प्रशांत ने इशारे से चिट्ठी उठाने का इशारा किया | जो एक बार इग्नोर किया गया | पर अगली बार मान लिया गया | पतंग छज्जे में टकराने के बाद डोर से थोड़ी हवा में लटक गयी थी | एक छोटे डंडे से उसे सावधानी से ऊपर लाने की जुगत की जाने लगी | इस  बीच गाना फिर चेंज हो गया :

"इस प्यार से मेरी तरफ ना देखो , प्यार हो जायेगा"| 

दोनों जोड़ी  नज़रें कभी कभी एक दूसरे की तरफ देख रही थीं | 

बस यहीं एक गलती हो गयी | डंडे का एक प्रहार उस मासूम पत्र पर ऐसा हुआ की , पतंग फट गयी और चिट्ठी सीधा मेहता जी के पड़ोसी , वही शर्मा जी , के घर पहुँच गयी | 

मोहल्ले में  छत पर होने वाले क्रिकेट के कतई अफरीदी थे उस ज़माने में निशांत | छक्के मारने पर "जो मारेगा वो गेंद लेकर भी आएगा" रूल के चलते , छत भी जबर फांद लेते थे | और इसी कारण  वो ये भी पता लगा पाए थे की शर्मा जी सन्डे को दिन में दारू पीने का डे मानते थे | इस खोज के चलते शर्मा जी उनके जाती दुश्मन बन गए थे | 

शर्मा जी की छत से पत्र उठाने की ज़िम्मेदारी निशांत पर आयी | शर्मा जी ताक में बैठे थे | निशांत जैसे ही कूदे , पकड़े गए | पकड़े क्या गए जनाब ये कहिये कूट दिए गए | नज़रों के अपने अपने दोषों के चलते मिश्रा जी ने ये नज़ारा पास से और तिवारी जी ने दूर से, साफ़ साफ़ देखा | इसलिए आये खोपचे में प्रशांत भी | पर हैंडराइटिंग मिली शुशांत की | सूते वो जबर गए | 

गाना फिर चेंज हुआ :

"प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया , के दिल करे हाय "

और इसके बाद हाय तीनों की एक साथ निकली | इस घनघोर सुताई में कैटेलिस्ट का काम कर रहे थे मेहता जी क्यूंकि  उनका कहना था की वो रिश्तेदारी में मुंह दिखाने के लायक नहीं बचे | कुल ५-७  मिनट के सामूहिक कुटाई अभियान से तीनों किसी तरह बचे | 

उस दिन वो शर्मा जी पर ख़ास गुस्सा थे | 

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अभी लेटेस्ट पड़ोस में ये चर्चा आम है की उस रात शर्मा जी जब घर लौट रहे थे तो दअसल चौकीदार उन्हें बचाने आया था ,  मारने नहीं | और अँधेरे का फायदा उठाकर शर्मा जी को कूटने वाले कोई चार लोग थे | 

कुछ आईडिया है चौथा कौन रहा होगा ???

-- देवांशु 

Sunday, February 26, 2017

आदि शिव

कल शिवरात्री थी । ये शिव से जुड़ा हुआ त्यौहार है । शिव के आगे "आदि" जुड़ा हुआ है । आदि मतलब जिसकी शुरआत कहाँ से हुई , ये पता ही ना हो ।  अंत का भी पता नहीं । ब्रह्मा जी ने ऐसा पता लगा लेने का दावा किया था जो गलत था और उन्हें पूजे ना जाने का श्राप मिला ।

आज बात शिव के नाम के आगे आदि जुड़े होने से । शिव को न केवल सबसे बड़ी शक्ति अपितु अल्टीमेट लवर और डांसर भी समझा जाता है । "नटराज"  उन्हीं का एक रूप है ।  उसी नटराज की एक बात आज याद आयी ।

दिसम्बर में इंडिया ट्रिप के दौरान भीम बेटीका , जो भोपाल के पास स्थित है , जाने का मौका मिला । जहाँ की ये फोटो है । फोटो में एक डांसर को बनाया गया है , जिसकी भंगिमा नटराज से मिलती जुलती है । आप खुद ही देख लीजिये ।

अब इस फोटो के बारे में कुछ : पहली बात ये ओरिजिनल है खुद खींची है दूसरा ये यूनेस्को द्वारा वर्ल्ड हेरिटेज का दर्ज़ा पाए भीमबेटीका की है । और इस फोटो को "फोटो ऑफ़ अर्ली मैन" की श्रेणी में रखा गया है । और इसका काल्यखंड मेसोलिथिक बताया गया है , जो करीबन १०,०० ० से ५००० बीसी तक जाता है , जो औसतन अब से साढ़े सात हज़ार साल पुराना वक़्त है । कुछ लोग इसे २०,००० से साढ़े नौ हज़ार पुराना वक़्त बताते हैं ।

मतलब इतने पुराने वक़्त में एक अल्टीमेट डांसर "नटराज" की परिकल्पना थी । और शिव के आगे भी आदि लगा  हुआ है ।

बस पता नहीं क्यों ये हमारे यहाँ किताबों में कभी पढ़ाया क्यों नहीं गया । एक विश्वविद्यालय विशेष के लोग जिन्होंने खासकर इतिहास लिखने, पढ़ने और बताने का ठेका सन ४७ से लिया हुआ है , वो पता नहीं कभी यहां गए भी हैं या नहीं । हाँ , शिवरात्री को एक मानव शरीर के अंग विशेष से जोड़कर , दर छिछोरी बातें करने में नहीं हिचकिचाते । अपनी अपनी सोच है ।

भीमबेटिका जाने के बाद ,  शिव के आदि होने का मेरा विश्वास और दृढ हो गया । आप को भी जाना चाहिए ।

भगवान् शिव सबके जीवन को मंगलमय करें !!!

तो बोलो हर हर हर !!!!

Tuesday, January 24, 2017

ऑन डिमांड , रोमांटिक बात !!!

आने वाली २६ जनवरी को अपनी शादी के दो साल हो जायेंगे । इसलिए ये दुशाला पोस्ट । डिमांड मैडम की है । उन्होंने अपनी शादी के बारे में २ पोस्टें लिखीं ( , ) जो अंग्रेजी में थीं इसलिए  समझ नहीं आईं अपने  । पर  मैडम का कहना है की कुछ ज्यादा नहीं तो कमसकम उनका जवाब ही लिख दो , मेरे बारे में कुछ ना भी लिखो तो भी । तो बस इसीलिए पेश-ए -खिदमत है , ऑन डिमांड रोमांटिक बातों से भरी पोस्ट । 
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दीवाली अच्छा त्यौहार है । धूमधाम से मनाया जाता है । सब लोग एक दूसरे के घर जाते हैं , मेवे और मिठाई देते हैं । पर कभी कभी किसी को मिठाई देना कितना महंगा पड़ जाता है ये कोई इस अदना से इंसान से पूछे । २०१३ की दीवाली पर पापा के एक बहुत पुराने दोस्त के घर गए । "मिठाई वाला" के यहाँ से मिठाई लेकर । मिठाई और जेस्चर दोनों आंटी को पसंद आ गए,  कुछ ज्यादा ही  । और उसके बाद सब हिस्ट्री है । फैक्ट  ये है  की आंटी मैडम की मौसी हैं । तो मजमून ये हुआ  हज़रात "मिठाई बाँटें पर ज़रा संभल कर।" 

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मेरा अमरीका आने का टिकेट हो चुका था । शुक्रवार की रात निकलना था । उसके ठीक पहले वाले संडे को मैडम से मिलने का फरमान हुआ । गए । बातें हुईं । वापस आ गए और निकल भी लिए अमरीका । और फिर डेढ़ साल में गिनती के १०-१२ मेसेज की अदलाबदली हुई वो भी शुरआती १० दोनों में । उसके बाद लंबी ख़ामोशी । ये तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी थी । हम भी लग गए दुनिया भर के कामों में । 

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फिर गज़ब बोरियत का शिकार होकर २०१४ के आखिर में एक फ्रेंड से मिलने कोलम्बस गए । वहीँ एक दिन माता श्री ने फ़ोन पर बताया की हमें बांधे जाने की सुगबुगाहट चल रही है । इस बार इंडिया जाने का टिकेट हो रखा था । चले गए । उसके बाद भी सबकुछ हिस्ट्री ही है । 

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मैडम ने अपना सायरी वाला ब्लॉग देखा । यहीं पर एक्सपेकटेशन गलत सेट हो गयीं । बोली मेरे लिए भी सायरी लिखो । उन्हें आईडिया नहीं था की वो तो अपना नकली चेहरा है ।असली तो यहाँ है । लेकिन आप हज़रात की शादी अगर हो रखी है तो आपको मुआलूम तो होगा ही की पत्नी को सीधे ना नहीं कहना चाहिए । इसलिए कुछ रोमांटिक टाइप बातें कह डालीं हमने बीते दो सालों में । जैसे :

एक बार उन्होंने पूछा की कभी मैं तुम्हारे सपनों में आती हूँ ? हमने जवाब दिया तुमने कभी मुझे आधी रात में बदहवास सा घूमते देखा है ?
पता जाने मैडम क्यों नाराज़ हो गयीं । जबकि मेरे कहने का मल्लब था की सपनों में तुम ही आती हो और मैं सुकून की नींद सोता हूँ । 

खैर, एक मर्तबा मैडम ने पूछा की क्या तुम मेरे बिना रह सकते हो ? मैंने कहा ना बिलकुल नहीं , जब भगवान् मुझे स्वर्ग देगा तो मैं उसे छोड़ के तुम्हारे पास आ जाऊंगा । वो बोलीं क्यों ? मैंने कहा मैं अकेला वहां क्या करूंगा ।

फिर नाराज़गी !!!

उनके रोज़ रोज़ के एक सवाल पर मैं कालजयी कविता लिखने के फ़िराक़ में हूँ , मुखड़ा है :

"बड़ा बुरा ज़माना है , पहले ये बताओ खाने में क्या खाना है ?"

आप अंतरा सुझाओ तो आगे लिखा जाए ।

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बीते साल मैडम को सरप्राइज देने का प्लान बनाया २६ जनवरी को । परम मित्र आशीष की धर्म पत्नी प्रोफेशनल केक मेकर हैं । वो इंडिया में थीं उस वक़्त । अगर उन्हें डॉक्टर माना जाए तो आशीष भाई की हैसियत कम्पाउण्डर से कम नहीं थी । रिश्ता हमारा भी मरीज़ का था । अपने यहाँ ५ दिन डॉक्टर के पास बैठने वाला भी खुद को डॉक्टर समझता फिर आशीष भाई तो पूरे कंपाउंडर थे । २५ तारीख को ऑफिस से हम ३ बजे ही निकलकर डिस्पेंसरी ( आशीष भाई के घर ) पहुँच गए । केक बनाने के विडियो ढूंढें गए । फाइनली कैरेट केक पर बात पक्की हुई । २ बार तो विडियो चलाकर केक बनाने की एक्टिंग सीखी गयी । फिर असलहा जुगाड़ा गया , और केक बनाना शुरू किया गया ।

५ बजे मैडम का पहला SMS आया "कहाँ हो ?" । हमने रिप्लाई किया "काम से आशीष के यहाँ हैं " ।

६ बजे फिर : "कब तक आओगे ?" । हमने रिप्लाई किया "आधे घण्टे में पहुँचते हैं ।

७ बजे : "खाना बना दिया है , बाहर मेज पर रखा है । खा लेना ।" इसके बारे में आशीष भाई की एक्सपर्ट एडवाइस थी "डरो नहीं, इसकी आदत डाल लो" । हमने जवाब नहीं दिया ।

७:३० बजे : "कार में सोने का मन ना हो तो जल्दी आ जाओ" । मैंने आशीष भाई को बोला देखो ऐसा है गुरु तुम एक्सपर्ट हो भले ही , अपनी तो पहली "गिरहसाल" है । सरप्राइज के चक्कर में कहीं सर ही ना रिस्क में आ जाए इसलिए  मैं निकलता हूँ । आइसिंग का काम तुम संभाल लेना । और अपन कट लिए ।

घर पहुंचे तो घर कोपभवन बना हुआ था । खाना वादानुसार मेज पर था । मैडम सोने चली गयीं थीं । ठण्ड तगड़ी  थी और कम्युनिटी में कंस्ट्रक्शन चल रहा था इसलिए पार्किंग की काफी दिक्कत थी । सरप्राइज पार्टी के लिए जिन दोस्तों को बुलाया था उनके लिए पार्किंग रोकनी थी । जुगाड़ किया गया ।

१२ बजे सब आये । मैडम जो भयंकर गुस्से में थीं , उठ गयीं । काफी सरप्राइज हुईं । मामला सुलट गया । आशीष भाई मंद मंद मुस्किया रहे थे देख देखकर ।

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पर ऐसा नहीं हैं की केवल हम ही सरप्राइज करते रहे । श्रीमती जी ने भी हमारी बर्थडे पर हमको गिफ्ट देकर सरप्राइज किया । वो बात अलग है  उन्होंने गिफ्ट हमारे कार्ड से ही खरीदा था जिसका अलर्ट हमें आ गया था । और सब कुछ जानते हुए ३ दिन तक कुछ ना जानने और फिर सरप्राइज होने की एक्टिंग करनी पड़ी । 

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वैसे शादी के बाद बहुत कुछ बदल जाता है । रोमांटिक वाली बात है कि ज़िन्दगी में रंगों की रेंज बढ़ जाती है । जैसे कुंवारों के  जीवन में रंग होते हैं , शादी के बाद शेड्स भी जुड़ जाते हैं । लाल से : डार्क लाल , ऑफ बीट लाल , ब्रिक लाल , गाजरी लाल , सिंदूरी लाल आदि आदि । मसलन मैंने एक दिन पूछा "मैडम , मेरा नीला वाला बैग कहाँ है " । जवाब मिला "वो नीला नहीं , बैंगनी है "।

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बाकी ऐसे ही चलती हैं जिंदगी । बहुत लोग अपने पार्टनर के बारे में बहुत कुछ लिखते हैं , मैडम ने भी हमारे बारे में लिखा है । हमें लगता है जब कोई आपके बीते हुए कल , आज और आने वाले कल : तीनों को अपना समझे तो लाइफ बड़ी कलरफुल हो जाती है , सारे शेड्स के साथ । 

अउर है का ज़िन्दगी में !!!!

(नीचे की फोटो कोलाज है जो दीवार पर मैडम ने हमारी घूमी हुई जगहों का बनाया है , मल्लब घुम्मक्कड़ी काफी हुई है )

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Monday, January 16, 2017

बाकी बहुत कुछ रहता है !!!

बस का सफर मुझे पसंद नहीं था , और रात का तो बिलकुल भी पसंद नहीं । पर नौकरी वाले शहर पहुँचने को अक्सर वही एक ज़रिया बचता । खासकर त्योहारों पर क्योंकि आखिरी वक़्त तक मालूम ना होता की कब जाना है और कब आना है । जब कभी स्लीपर बस मिल जाती तो देर रात तक कुछ पढता रहता और फिर सो जाता , सुबह ८ बजे बस ठहरती आखिरी मंजिल पर , बस वही अपनी मंजिल भी होती ।

उस रोज़ भी बस का वेट कर रहा था । साथ हमेशा की तरह केवल बैग-पैक था । दीवाली के बाद की हलकी ठण्ड थी । बस ठीक वक़्त पर आयी थी और मैं चढ़ कर सीट पर बैग रख दरवाज़े तक वापस आया था पानी लेने । सामने एक कार आकर रुकी  , कार से अपनी बाहों में एक छोटे से बच्चे को लिए एक औरत को उतरते देखा जो बस की तरफ ही आ गयी थी । 

उस चेहरे से पहचान पुरानी थी । मैं नीचे उतर गया और बच्चे को अपने हाथ  लेकर उसे बस पर चढ़ने में मदद की  । मैं उसके लिए भी पानी लेकर वापस आया  । मेरे सामने वाली बर्थ उसी की थी । बच्चा ,जो पहले से सो रहा था उसने उसे लिटा दिया था । मैंने पानी दिया तो बोली :

"थैंक्स , अच्छा हुआ तुम मिल गए , ये इस बार नहीं आ पाए और मुझे वापस भी अकेले जाना पड़ रहा है"

मैंने मुस्कुरा के जवाब दिया "कोई ज़रुरत हो तो बोल देना मैं सामने की  बर्थ पर ही हूँ" ।  मैं कुछ और बोलना चाहता भी नहीं था । अपनी बर्थ पर लेट गया । बस अभी चली नहीं थी । 

"आज चाय नहीं पिलाओगे क्या ?" उसने नीचे से खड़े खड़े ही पूछा । वो सामान लगा रही थी बर्थ पर । 

"तुम्हे पीनी हो तो ला देता हूँ ?"

"तुम नहीं पियोगे क्या ?"

"नहीं , मैं चाय नहीं पीता"

"कबसे " उसने पूछा । मैंने जवाब नहीं दिया और जाकर उसके लिए चाय ले आया । नीचे की बैठने वाली सीटों पर अभी  कोई आया नहीं था । दोनों वहीँ बैठ गए । बात उसी ने फिर से शुरू की । 

"सोचा नहीं था तुमसे यूँ मिलना होगा कभी "

"मैंने भी नहीं"

"इतना फॉर्मल होकर बात करनी है तो रहने दो"वो बोली । 

मैं लगातार बाहर देखे जा रहा था । 

"इनफॉर्मल ज्यादा कुछ है नहीं बात करने को" मैंने जवाब दिया । 

"हम्म , पुरानी बातों को इतना भी क्या दिल से लगाना , तुम भी जानते हो जो होना था वो चुका " 

"कुछ बातों को नहीं भूला जा सकता चाहे वो कितनी भी पुरानी  क्यों ना हो जाएँ । खासकर वो जब आपको पता हो की आप बहुत कुछ होने से रोक सकते थे " मैं इसबार अंदर देख रहा था , पर उसकी ओर  नहीं । 

"कुछ चीज़ें हो जाती हैं क्योंकि उन्हें होना होता है , बाद में उनके बारे में सोचने का कोई फायदा नहीं , भूल जाओ सब"

"सब भूल सकता हूँ पर अपनी वो गलती नहीं भूल सकता , शायद उस वक़्त मुझे इतना कमज़ोर नहीं पड़ना था" पहली बार उसकी ओर देखा । उसकी आँखों में नमी ज़रूर थी । 

"छोड़ो , जाने भी दो ये सब । ताली एक हाँथ से बजती नहीं, यही मान लो । शायद थोड़ा रिलैक्स फील करो । १५ मिनट हुए हैं और एक पल के लिए भी तुम वो नहीं दिख रहे जो हुआ करते थे । " वो बोली । 

"मैं , शायद अब वैसा कभी नहीं बन सकता" । 

"बन जाओगे , वक़्त सब ठीक कर देता है " । चाय का कुल्हड़ उसने मुझे बाहर फेंकने को दिया और बोली "चलो अब मैं सो जाती हूँ , तुम भी सो जाओ "

"सुनो" मैंने कहा । 

"हाँ , बोलो " । 

"विल यू एवर बी एबल टू फॉरगिव मी " मैंने पूछा ।

"तुमसे नाराज़ रहने की भी ज्यादा कोई वजह भी तो नहीं रहती , एक चाय के तो हम कर्ज़दार भी हो गए " । कहकर वो बात जान बूझकर अधूरी छोड़ सोने चली गयी । 

मुझे पूरी रात नींद नहीं आयी । सवेरे जब बस रुकी तो उसके हस्बैंड ने उन्हें आकर रिसीव किया । उसने हमारी पहचान भी कराई , एक पुराना दोस्त बताकर । बच्चा जाग गया था और अपने पेरेंट्स के साथ खुश था । इनफैक्ट तीनों बहुत खुश थे । 

वो थोड़ी देर रुके और "कभी घर आना" कहके चले गए । 


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हमेशा सोचता था की कभी ज़िन्दगी की किताब दुबारा पलटी तो उसके नाम से सराबोर पन्ने पर आकर रुकुंगा । मेरा सबसे चहेता पन्ना होगा वो । गुज़रे एक बहुत बड़े वक़्त तक वो पन्ना टीस ही देता रहा । पर उस रोज़ उसे अपनी  ज़िन्दगी में यूँ खुश देखकर ना जाने क्या हुआ । मैं उस पन्ने पर फिर से रुकने लगा था क्योंकि किसी के ज़िन्दगी में ना होने के गम से कई गुना बड़ी ख़ुशी वो एक लम्हा रखता है जो उसके साथ गुज़रा होता है । 

बड़ा सेंटिमेंटल लगेगा पर वाकई में मैंने चाय पीनी फिर शुरू कर दी थी । 

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( एक दोस्त ने करीबन दो साल पहले अपनी ये आपबीती सुनाई थी , मुझे कुछ समझाते हुए । सोच रहा हूँ की हर चीज को डिटेल में पूछने की आदत होने के बावज़ूद मैंने ये नहीं पूछा था कि आप दोनों मिल क्यों नहीं पाए । वजह शायद ज़रूरी नहीं रहती हमेशा । प्यार की दास्ताँ भी तो बस दो लफ़्ज़ों की होती है "मिल गए" या "नहीं मिले" । इसके इतर कुछ नहीं, इसके अलावा भी कुछ नहीं । )