Tuesday, December 11, 2012

रोते हुए आते हैं सब !!!

बहुतै फेमस गाना !!!  एक  दम हिट कि रोते हुए आते हैं सब, हँसता हुआ जो जायेगा, वो फलाने का ढीमाका कहलायेगा | समझे | 

अपने यहाँ रोना बहुत बुरा माना जाता है | अरे बाहर भी माना जाता है | लोग बहुत कोशिश करते हैं कि ना रोये | और रोके फायदा भी क्या? रोने से कुछ होता है भला? 

पर सोचो अगर रोने के पैसे मिलते तो ?आइडिया शानदार है |

लोग-बाग मौका ढूँढते कि कब रोया जाये | किसी ने आपके बारे में कड़वा बोलना तो दूर, जरा सा सोचा भर की आप घडों रो लेते | खुशी के आंसू निकलते तो भी कहते कि भईया हम रो ही रहे हैं | 

मुस्कुराना “टाइम वेस्ट" करने जैसा होता | “हाहा-ठीठी बनाये खराब, रोना धोना बनाये नवाब" | घरवाले डांटते “बाहर खड़े खड़े पता नहीं का कर रहे हैं , ये नहीं घर के अंदर आ जाएँ, थोड़ा रो ही लें” |

फिर किसी को भूखे सोना नहीं पड़ता | ५ मिनट रोये रोटी का जुगाड़, ५ मिनट और रोये सब्जी भी हो गयी | ये सब देख के बीवी की आँख में आंसू आ गए | सलाद भी रेडी है जी |

पढाई-लिखाई तो वैसे भी अपने यहाँ हेलमेट की तरह है, ज़रूरी है पर मजबूरी समझी जाती है | पर अगर रोने के पैसे मिलते तो धड़ाधड़ रोने के कॉलेज खुल जाते | डिग्री डिप्लोमा होने लगते | डिग्री वाले कहते डिप्लोमा वाले रोते हैं पर वो क्वालिटी नहीं है | डिप्लोमा वाले समझाते “बेट्टा कह कुछ भी लो, ग्राउंड रियलटी तो हम डिप्लोमा वाले ही जानते हैं” | इस लड़ाई-झगड़े में अगर रोना गाना हो जाता तो उसके पैसे भी सबमें बराबर बांटे जाते |

रोने के साथ साथ रुलाने वालों का भी बोलबाला हो जाता | फलाने मास्टर साहब बड़ी आसानी से रोना सिखाते हैं | पर रोने पर मिली कमाई का तीन चौथाई रख लेते हैं | लालची हैं | मास्टर कहते आप तो अपने बच्चों को कहीं बड़ी जगह पर रोने भेज देंगे हमारे बच्चे क्या करेंगे | पता चला उन्ही मास्टर साहब का बेटा दिल खोल के हँसता | दुनिया कहती चिराग तले अँधेरा |
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रोना सोसाइटी में स्टैण्डर्ड समझा जाता | लोग संयुक्त परिवार की तरफ बढ़ते | घर में जितने बर्तन उतना ही बजेंगे | खूब मार-कुटाई होती | खूब आंसू बहते | खूब पैसा आता | कोई तीज-त्यौहार होता, तो बड़े-बड़े परिवारों के लोग आपस में ही रो लेते | न कोई बाहर से आये ना किसी से रूपया बांटना पड़े | “भईया उन केर घर केरी बात अलग आय , इत्ते जने हैं , सब आपसय मा रोय लेत हैं, काहे लगावे लगे बाहेर वालन का”|

तब कवियों का भी उद्धार हो जाता | जो जित्ती रुआंसी कविता लिखता, उसकी डिमांड उत्ती बढ़ जाती | पी बी शेली ने कहा था “our sweetest songs are those, those have the saddest thought” ,तब जमाना इस बात को और अच्छी तरीके से समझता | सेंटी पद्य लिखने वाले भी खूब पूछे जाते | जिसको पढ़ के जितना रोना आये , किताब उतनी महंगी बिकती |

तब न, कॉमेडी फ़िल्में नहीं बना करती | न कोई जॉनी वाकर होता, न जॉनी लीवर | राजू श्रीवास्तव भी ना आये होते | उदय चोपड़ा, उपेन पटेल, फरदीन खान, तुषार कपूर जैसे लोगो का बोलबाला होता | “अंदाज़ अपना अपना” कोई ना पूछता | “टशन", “झूम बराबर झूम", “जोकर" जैसी फिल्मे चल जाती | राजेश खन्ना भी तब कहते “पुष्पा!!!! आई लव टियर्स रे !!!!”

गाने कैसे बनते :
“थोड़े आंसू तू हमका उधर दइ दे , और बदले में यूपी बिहार लई ले” ,
“रोना, रोना, भर भर के रोना , जब भी टूट जाए कोई खिलौना , लल् ला”

सटायरबाजों और कार्टूनिस्टों की हालत तब भी अब के जैसी ही रहती | जनता उन्हें ठोकने पर उतारू रहती | कार्टून बनाने पर जेल भेज देना तब भी आम बात होती |

पंकज बाबू के हिसाब से सोचना “इंटलेक्चुअल" प्रोपर्टी है | मेरे हिसाब से “रोना" ही “एक्चुअल" प्रोपर्टी होती  Smile Smile Smile  | तब औरत और मर्द के रोने में भी कोई अंतर ना समझा जाता और शिखा जी को एक पोस्ट नहीं लिखनी पड़ती Smile Smile Smile|

पर हाँ , कोई किसी को फलते - फूलते तब भी न देख सकता | पम्मी आंटी, गुप्ता आंटी को शर्मा आंटी की केवल अच्छी बात ही बताती , कहीं गुप्ता आंटी रो न दें, इस डर से |  मेहता साहब के बारे में लोग कहते “मन ही मन तो रोता होगा लेकिन दिखायेगा कि जैसे मनों खुस है , दिल में चोर है उसके” |

लेकिन कुछ भी कहो अगर रोने के पैसे मिलते तो रोना दूभर हो जाता और हर तरफ खुशी ही खुशी फ़ैल जाती !!! है की नहीं ???

खैर, फिलहाल आपको इतना ही रुलाते हैं,  फिर कभी खून पियेंगे आपका , तब तक रोते रहिये-रुलाते रहिये , आई मीन खुश रहिये, आबाद रहिये, दिल्ली रहिये या इलाहाबाद रहिये !!!!

खुदा-हाफ़िज़ !!!!!


P.S. : अगर आपको ये सब पढ़ के रोना आ गया हो ( अगर क्या, पक्का आ गया होगा , सेल्फ कांफिडेंस ) तो जो पैसे इकठ्ठा हुए हों उसका हिस्सा हमें भी मिलना चाहिए | पोस्ट का आइडिया तभी आया , जब हम मोनाली की टांग खीच रहे थे कि उसकी पोस्ट बहुत रुलाती हैं | और देखिये उसने कसम खाकर एक हंसती-गुदगुदाती पोस्ट लिख मारी कि कहीं लोग अमीर न हो जाएँ Smile Smile Smile |


--देवांशु

Wednesday, November 28, 2012

कहानी कोफ्ते की !!!

आज सुबह माताश्री ने कल के बचे कोफ्ते के मटीरियल से फिर से कोफ्ते बनाये और हमने दबा-दबा के खाए | कोफ्ते का शेप चिकन नगेट्स की तरह दिखा…हमें लगा की कोफ्ते को अंग्रेज़ी में नगेट्स कहते होंगे, सोचा विद्वजनों से भी पूछ लिया जाए, सटा दिए फेसबुक पर :

“कोफ्ते को अंग्रेजी में का कहते हैं भाई ??? Nuggets ???”

विद्वजनों ने अपने विचार भी रखे :

अतुल जी ने इंकार कर दिया की उन्हें नहीं पता, उलटे उन्होंने “कोफ़्त" की अंग्रेजी पूछ मारी | हमें बड़ी “कोफ़्त" हुई |

आराधना जी का कहना था की नगेट्स “मुन्गौडी” को कहते हैं | दो दिन पहले ही आलू-मुन्गौडी की सब्जी खाई गयी थी | मन किया समर्थन कर दिया जाए |

मोनाली ने चैट में और शिवम् भाई ने स्टेटस पर कोफ्ते का विकी पेज शेयर कर दिया | अंग्रेजी नाम वहां भी नहीं मिला | मोनाली का ये भी कहना था की कोफ्ते को “कटलेट” या “वेजिटेबल बाल्स” कहते हैं, कुछ भी बताया जा सकता है | ४ लोगो ने इसे लाइक भी किया |

पंकज साहब का अमरीका से कहना था की “कोफ्ता आलू की तरह मसाला नहीं होता” इस लिए उसकी अंग्रेजी नहीं होती | पर मटर की तरह कोफ्ता एक सब्जी होती है इसलिए अंग्रेजी तो बनती है भाई इसकी, पंकज बाबू आप चाहे मानो या ना मानो | 

गुडगाँव से सोनल जी का कहना था की वो अंग्रेजी तब बतायेंगी जब हम उन्हें कोफ्ते खिलाएंगे |

इन्ही बातों के बीच में पंकज और सोनल जी के बीच हुए वार्तालाप से ये भी पता चला की बिंगो को अंग्रेज़ी में “ओ तेरी" कहते हैं |

मोनाली की ही तरह शिखा जी का लन्दन से ये कहना था की इसे “बाल्स" कह सकते हैं |  हमने उन्हें चैट पर पूछा “कोफ्ते बोले तो बाल्स , बाल्स बोले तो गेंद, माने की कोफ्ते से क्रिकेट खेला जा सकता है |”

उन्होंने बोला , हाँ और वैसे भी हमारी टीम यही तो खेल रही है आजकल |

आइडिया बढ़िया लगा हमें , कोफ्ते से क्रिकेट | भाईसाहब | सोचो कमेंट्री कैसी होती :

- ज़हीर खान को नया कोफ्ता सौंपा गया है | एक लम्बे रन-अप के साथ वो कोफ्ता लेकर चले | साईट-स्क्रीन में कुछ प्रॉब्लम | अम्पायर ने उन्हें कोफ्ता फेंकने से रोका | ( ऐसा लगता अम्पायर को कोफ्ता पसंद है और वो खा जाने के मूड में है)

- जैसे जैसे कोफ्ता पुराना होता जायेगा, वो घूमेगा |

- प्रज्ञान ओझा ने बहुत बढ़िया कोफ्ता फेंका | (इतना बढ़िया कोफ्ता था तो फेंका क्यूँ??? }

अब तो कमेंट्री भी हिंदी में आ रही है टीवी पर | इस तरह की कमेंट्री और भी मजेदार लगती | सिद्धू पाजी बोलते : “कोफ्ता हवा में उछल कर इतना ऊपर गया गुरु की ऊपर बैठी एयर-होस्टेस की प्लेट में गिरा, और उसने अपने हाथों से वापस फेंका, खटैक”

अरुण लाल कहते “जी हाँ मनिंदर, मुझे भी समझ नहीं आता धोनी इस समय नया कोफ्ता क्यूँ नहीं ले रहे हैं, पुराना इस्तेमाल करते हुए ८० ओवर से ज्यादा हो गए हैं”

कुछ शब्दों के मीनिंग कैसे हो जाते :

नो बाल : नही कोफ्ता

वैलिड बाल : हाँ!!! कोफ्ता!!!

डेड बाल : मर्तुला कोफ्ता

वाइड बाल : चौड़ा कोफ्ता

बाल टेम्परिंग : कोफ्ते के साथ छेड़-छाड़ बोले तो “ईव-टीजिंग”

इंग्लैंड टीम के कप्तान का नाम भी तब ठीक लगता “कुक" | “कुक ने अगला ओवर फेंकने के लिए स्वान को कोफ्ता थमाया ( और स्वान कोफ्ता खा गया ) |

शाहिद अफरीदी को कोफ्ते खाने के चक्कर में दो मैचों का प्रतिबन्ध झेलना पड़ता |

ना केवल क्रिकेट , बल्कि और भी खेलों में कोफ्तों का इंतज़ाम रहता | फुटबाल के कोफ्ते बड़े बड़े होते | लातिआये भी जाते | स्नूकर के कोफ्ते रंग-बिरंगे होते | टेनिस के कोफ्ते स्पोंजी होते |

वैसे अगर कोफ्तो को गेंद बोलते तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ता | “लौकी की गेंद” , “मलाई की गेंद" | ठीक ही रहता |

क्रिकेट से ध्यान आया कि अपनी टीम की हालत काफी पतली हो गयी | इंग्लैण्ड ने घर पर आके हमें धोया है |  हमारी टीम के लिए पिच घूम रही थी (ऐसा तो १०-१२ पेग के बाद होता है ), और अँगरेज़ टीम के “कोफ्ते" घूम रहे थे | सारा खेल घूमने का है |

क्रिकेट के भगवान कहलाने वाले सांसद सचिन तेंदुलकर साहब भी आजकल सवालों के कटघरे में है | उनकी फॉर्म चली गयी है | लोगो का कहना है की रेफ्लेक्सेस भी काम नहीं कर रहे हैं | उन्हें अब रिटायर हो जाना चाहिए | ऐसा ही कुछ पोंटिंग साहब के लिए भी कहा जा रहा है जिनकी नाक में दम साउथ अफ्रीका के “कोफ्ता"बाजों ने कर रखा है |

खैर वो सब बड़े लोग हैं, अपने हिसाब से देखेंगे, हमारी थोड़े ही सुनेंगे |

इस बीच खबर ये भी आयी है की अपने अनूप शुक्ला जी जिन्हें फुरसतिया के नाम से जाना जाता है ने क्रिकेट का बल्ला थाम लिया | अरे बा-कायदा फोटो भी लगा दी उन्होंने | उनसे परमीशन लेकर यहाँ चिपका दे रहे हैं , आप भी देखो :

image यहाँ दो बातें गौर करने वाली हैं | एक तो अनूप जी ने सचिन को खुल के “चैलेंजिया" दिया है | की अब हम मैदान में आ गए हैं , फॉर्म संभालो वर्ना प्रोपर रिप्लेसमेंट रेडी है | हम ये बात बोले तो अनूप जी लाइक कर के चले गए कुछ बोले नहीं |

और दूसरी बात ये है की भारतीय टीम की जीत के लिए एक नया तरीका भी बता दिया है इस फोटो में , ४ स्टम्प्स का विकेट | शायद अब तो हमारे “कोफ्ते" विकेट पर लग जाएँ |

हमारे कैप्टन कूल को इस सुपर कूल तरकीब की तरफ ध्यान देना चाहिए | शायद जीत जाएँ |

बस यही सब चल रहा है आजकल | बाकी सब भी चलता रहेगा , अब हम भी चलते हैं | खाना-वाना खा लिया जाए |

आप भी मौज करते रहिये ….

नमस्ते !!!!

Friday, November 9, 2012

राम भरोसे की चाय भरोसे !!!!


जबसे  जाड़ा  शुरू हुआ है, बवाल मचा हुआ है |  सही बताऊँ तो पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में ठण्ड दिख जादा रही है, लग कम रही है |  धुंध छाई है पर ना दांत कटकट कर रहे हैं , ना खुद की सांस दिख रही है | पुरानी रस्मों के चलते गरम पानी से नहाना शुरू कर दिया है बस |
ऐसा कहा जा रहा है की पड़ोसी राज्यों में लोग पुराने पत्ते, कूड़ा-कबाड़ जला रहे हैं इस वजह से धुंध छाई हुई है | पर साथ में ये भी कहा जा रहा है की दिल्ली के वाहनों के प्रदूषण का इससे कुछ लेना देना नहीं है | काफी सटीक पता लगाया है कारणों का |
पर ठण्ड के चलते और भी चीज़ें नोट की गयी हैं | अपने यहाँ सुबह सोना कितना मुश्किल है |
कल सुबह-सुबह अर्ली मोर्निंग, ६ बजे लगा की हमारी खिड़की पर हमला हो गया | “धाड़" से कुछ लड़ा आकर | हमने कहा कल रात तक तो सीमा पर सब ठीक था , ये अचानक से दिल्ली में गोला-बारी|  पर लगा की देखना चाहिए | या तो शहीद होंगे , नहीं तो बहादुर कहलायेंगे | निद्रा-त्याग कर खिड़की खोली तो पता चला “न्यूज़ पेपर” वाला था | पहले उसने पेपर फेंका था फिर खुद आ गया था “बिल" लेकर | मतलब पहले कवर फायर किया था , फिर घुसपैठ की थी | बिल लिया और हम फिर सो गए ये कहकर कि कल ले जाना आके रुपये | अब सुबह सुबह इतने सारे कपड़ो के बीच वालेट कौन ढूंढें !!!
फिर सोये तो घन्टी बजा दी किसी ने | “केन्य केन्य” | एक तो पता नहीं ई कौन टाईप की घंटी है | फिर उठे , दरवाज़ा खोला | देखा तो कूड़े वाला था | चिल्ला के बोला “कूड़ा है” | मन किया बोल दूं “अबे मैं क्या कूड़े में रहता हूँ , रोज़ सुबह आ जाता है , कूड़ा है |” पर  मैंने कहा “नहीं है , हमारा घर साफ़ सुथरा है” | कमरे के अन्दर वापस आये तो रियलाइज़ हुआ की सुबह सुबह झूठ भी बोल दिया | :) :)
फिर सोये तो दरवाजे पर दस्तक हुई | “ख़ट-ख़ट" | फिर उठे | तो काम वाली , सफाई करने आयी थी |  बोली सफाई करनी है | फिर मन में ख़याल आया की घर मेरा है तो मैं इसके कहने पर सफाई क्यूँ कराऊँ , पर तब तक उसने दूसरा कमरा साफ़ कर दिया था | मैंने भी फटाफट लैपटॉप , टीवी सबके वायर सही किये और झाडू लगाव डाली | पोछा लगाने से मना कर दिया नहीं तो फिर वो पंखा चला के चली जाती |
इतनी बार नींद टूट गयी कि दुबारा नींद नहीं आयी |  तो समझ में आया की यहाँ तो मैंने सिस्टम उल्टा कर रखा है | सबसे पहले सफाई करवानी चाहिए , फिर कूड़े वाले को कूड़ा देना चाहिए , फिर पेपर वाले से पेपर लेकर पढ़ना चाहिए | वाकई में अपने यहाँ सारा काम उल्टा होता है |
अब नींद टूट गयी थी | अब सोचे की रेगुलर नींद तो आएगी नहीं , पॉवर नैप ले लेते हैं | लेटे तो ख्याल आया की पता किया जाये की फेसबुक पर क्या चल रहा है | और एक बार फेसबुक पर गए तो फिर कहाँ नींद | पूरे ५५ मिनट तक “अब सोते हैं” का प्लान करते रहे , फिर ध्यान आया  की प्लान तो हमने ३० मिनट ही सोने का किया था | एक दोस्त को फोन किया तो पता चला की साहब चाय पी रहे हैं , हमने कहा यार थोड़ी यहाँ दे जाओ तो जवाब आया खुद बना लो | दिव्य-ज्ञान मिल गया “बिना मरे भले स्वर्ग मिल जाए, पर सर्दी में बिना बनाये चाय नहीं मिल सकती”|image

 घड़ी देखी तो ऑफिस का टाइम हो गया था | अपनी मनोदशा फेसबुक पर डाली और तैयार होने निकल लिए | सोने का प्रोग्राम ऑफिस तक मुल्तवी कर दिया |

 ऑफिस पहुचे तो देखा भर भर के काम था | फिर लगा की सो ही लेना चाहिए था | काम में लग गये | बड़ी नींद आ रही थी इसलिए  दिन भर चाय पी पी कर काम किया  | फिर लगा की अपने यहाँ कितने सारे काम तो चाय भरोसे चलते हैं | एक चाय वाले को जनता हूँ उसका नाम है “राम भरोसे” |  मन में ख्याल आया “राम भरोसे की चाय भरोसे” ही सारा काम चल रहा है | लाइन मारू लगी | सोचे जब दबंग-२ आ सकती है तो काहे नहीं , कालजयी कविता पार्ट -२ लिखी जाए | तो बस लो झेलो ( अब आ गए हो तो पढ़ ही लो) :

 Disclaimer :  ये कविता पूर्णतया तुकबंदी का काम है और अगर इसमे किसी लाइन का कोई मतलब निकल आये तो इसे मात्र एक संयोग कहा जायेगा |
तीन रुपये की मट्ठी खाओ, पांच रुपये के समोसे,
राम भरोसे की चाय भरोसे, राम भरोसे की चाय भरोसे |

बुढिया की खटिया बाढ़ में बह गयी , बैठी बरखा को कोसे,
राम भरोसे की चाय भरोसे, राम भरोसे की चाय भरोसे |

बोया बीज पोपिंस का, चाकलेट पाओगे कैसे ?
राम भरोसे की चाय भरोसे, राम भरोसे की चाय भरोसे |

नाम रखे हैं कर्म-राज, पड़े आलसियों जैसे,
राम भरोसे की चाय भरोसे, राम भरोसे की चाय भरोसे |

घर जाने का वक़्त आ गया, रिज़र्वेशन को फिर से तरसे,
राम भरोसे की चाय भरोसे, राम भरोसे की चाय भरोसे |

तीन रुपये की मट्ठी खाओ, पांच रुपये के समोसे,
राम भरोसे की चाय भरोसे, राम भरोसे की चाय भरोसे |


अरे बस बस !!! अब गरिआओ नहीं | इतनी ही लिखी है | बाकी फिर कभी सुनायेंगे | अभी चलते हैं | कुछ काम कर लिया जाए |
तब तक मौका मिले तो आप भी “नैपियाते" रहिये | :) :) :)
नमस्ते
--देवांशु
(चित्र गूगल इमेजेस से)

Friday, October 12, 2012

हैप्पी बड्डे टू मी !!!!

इससे पहले कि कोई और ये सौभाग्य छीनता, रात के १२ बजते ही हमने सबसे पहले खुद को बड्डे विश करने का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने की सोची, पर एस एम एस भेज के एक परम मित्र ये बाज़ी मार ले गए | लेकिन कभी-कभी बाज़ी हारने में भी सुख ही मिलता है, वैसा ही हुआ  | हमारे रूम-मेट साहब को भी शायद आईडिया नहीं था कि इस महापुरुष का आज ही जन्मदिन है, वो कुछ देर पहले ही सोने खिसक लिए थे !!!!

पर काफी देर तक जब किसी का फ़ोन नहीं आया तो लगा कि जनता अपना टाइम ले रही है | फिर थोड़ी देर और हुई तो हमसे ना रहा गया, भला बिना बधाई के भी कोई जन्मदिन होता है भला, लोगो को हम खुदई फोन लगा दिए | काफी देर बातचीत भी किये| खून पिए, बधाई भी मिल गयी साथ में :) :)

सुबह उठे तो सबसे पहले एक शर्ट निकालकर "इस्त्री" की | तब समझ में आया कि इसे "इस्त्री" क्यूँ कहते हैं | इसी टाइम किसी "स्त्री" की कमी काफी महसूस होती है | :)  :)

सबसे पहले हम माताश्री को फोन किये | उन्होंने आशीर्वाद दिया तो हम खुश हो गए | फिर काफी लोगो से बात हुई,  फोने  पर  | बाद में फेसबुक पर बधाई सन्देश देखे | हमारे एक स्कूल के समय के दोस्त ने हमें बड्डे का केक फेसबुक पर भेज दिया | उन्हें शायद हमारी उम्र का कुछ खास  आईडिया नहीं होगा | केक में उम्र की मोब्बती में उन्होंने २ लगा दिया और बाकी फोटो को एडिट कर हटा दिया | दोस्त!!! इस बार तो तुम सही निकले, पर अगली बार ये ट्राई किया तो गलत साबित होगे :) :)

ऑफिस  में एक दिन पहले ही टीम मीटिंग में बता दिया गया था कि महाशय कल जन्मदिन मना रहे हैं, हम सुबह से डरे सहमे बैठे रहे , पर कोई पार्टी के लिए भी नहीं आया | फिर लंच पर गए तो क्यूबिकल के साथी ने एक फाइव-स्टार चॉकलेट गिफ्ट की , हम तो सुपर-स्टार हो गए |

हमारे एक घने दोस्त हैं, हम सब उन्हें बड़े मालिक बोलते हैं, उनकी बेटर-हाफ ने हमें बोला कि घर आ जाओ यहीं बड्डे मनाते हैं तुम्हारा | पर काम के कारण जाना संभव ना हो सका | तभी बड़े मालिक ने फोन किया और इस तरह एक्टिंग करने लगे कि घर में किसी काम कि वजह से पार्टी आज संभव नहीं है | पर ये भी पूंछ लिया कि शाम को कहीं जा तो नहीं रहे हो | हम समझ गए हम कहीं याएं या न जाएँ पर ये ज़रूर आने वाले हैं, हम तैयार हो गए कि आज रात तो हुड़दंग हो कर ही रहेगी |

शाम को हम पंकज, वही हमारे रूम-मेट,  को ऑफिस से सीधे चाय की टपरी पर बुला लिए | वो हाथ में एक थैला लेकर आ रहे थे, हम मन ही मन खुश हुए की चलो इन्हें पता चल गया, हमारे लिए गिफ्ट लेकर आये हैं | मिलते ही बोले “लो मालिक, तुम्हारे लिए” | हमने कन्फर्म करने के लिए पूछा “अरे ये किसलिए?” | वो उवाचे “अरे यार कुछ गिफ्ट कूपन पड़े थे, सोचा कुछ खरीद लिया जाये, छेने और बिस्कुट हैं |” हमने कहा धत्त तेरे की | फिर हमने उन्हें कहा चलो यार आज कहीं बाहर खाते हैं, शानदार डिनर किया जाये | वो तब भी नहीं पूछे कि काहे बे, कौन ख़ुशी ??

तभी हमारे एक और दोस्त का फोन आया, उनसे बात करते टाइम , पंकज बाबु कुछ ताड़ गए | “मालिक कुछ ख़ास है क्या,  आज ?” | “फेसबुक पर जाओगे नहीं और ना याददाश्त को भी तुम्हारी याद है कि लास्ट टाइम कब ठीक से चली थी?” हमने कहा | “अरे मालिक , हमें लग रहा था , तुम लिब्रन हो, होना तो बड्डे इधर ही चाहिए, कोई नहीं देखो तुम्हारे लिए छेने तो ले ही आये हैं|” उन्होंने माहौल संभालने की कोशिश की |  फिसल पड़े तो हर गंगे|

खाना खा के घर पहुंचे ही थे कि बड़े मालिक का फोन आ गया “हरियाणा डेरी” पर खड़े हैं तुम्हारे सेक्टर की , फटाफट आ जाओ” | उनको लेने गए | साथ में तीन और दोस्त आ गए थे | सबके लिए खाना खरीदा गया | फिर छत पर गए | वहाँ पार्टी का जुगाड़ किया गया | केक काटा , वो भी ठीक १२ बजे के बाद | मालिक का कहना था “यार बड्डे तो पूरा वीक चलता है, कोई नहीं"| केक खाए जाने से ज्यादा मूह पर लपेटे जाने की प्रथा है | हमारा मेक-अप कायदे से किया गया |

फिर सुबह ४ बजे तक गप्प-गोष्ठी चलती रही | गाने भी सुने गए खूब सारे | खाना खाया गया | मालिक ने बहुत सारा ज्ञान दिया | डेली सोप्स की खिल्ली उड़ाई बड़े मालिक और हमारे दूसरे शादी-शुदा मित्र ने | इससे समझ में आया कि ये भी “स्त्री-इफेक्ट" है |  :)  :)

*****

बचपन में पापा,मम्मी, भाई और बहन के साथ मंदिर जाकर मनाते थे ये दिन |  घर पर मम्मी मेरी पसंद की कोई चीज़ बनाती थी | बड़ा मजा आता | घर से बाहर निकले हुए भी १० साल से भी ऊपर का वक़्त हो गया | तबसे कभी मनाया ये दिन, कभी नहीं भी मनाया | पर हर बार सबसे बात करके मन लेते थे ये दिन |

पापा जी के जाने के बाद ये पहला जन्मदिन था |  थोड़ा सा मन उदास सा था पर लगा कि उदास रहना शायद उन्हें भी ना पसंद आता | तो और ख़ुशी ख़ुशी मनाया ये दिन | लगभग सारे दोस्तों, फैमिली के लोगो से बातें की | शाम तक आते-आते मन एक बार फिर खुश हो उठा | दरसअल ज़िंदगी बड़ी उठा-पटक करती रहती है | गए दिनों और भी बहुत सारी बातें चलती रही लाइफ में | इस बार बात करते समय दोस्तों से उन बातों का गाहे-बगाहे ज़िक्र आता रहा | बहुत सी बातें सुनी-समझी-जानी | जो सबसे महत्वपूर्ण बात समझ आये वो कुछ यूँ थी :

“जिन्दगी में जिद और लक्ष्य दोनों ज़रूरी हैं, पर जब लक्ष्य न मिलता दिख रहा हो तो हौंसला मत छोड़ना और जब जिद ना पूरी हो रही हो तो दिल मत तोड़ना”

बात बहुत सोलिड टाइप लगी | फेसबुक पर शेयर भी कर दिए |

कुल मिलाके एक बढ़िया बड्डे बीता |

और हाँ अमिताभ बच्चन साहब को हम बड्डे विश नहीं कर पाए , का करते दिन भर फोन जो बिजी रहा | कोई बात नहीं बिग बी “बेटर लक नेक्स्ट टाइम” |  :)  :)  :)

नमस्ते !!!!

-- देवांशु

Tuesday, October 2, 2012

काश!!! कुछ छोड़ पाना आसान होता...

जनवरी २०११ को हम तीनों (पंकज, रवि और मैं ) इस घर में शिफ्ट हुए | शिफ्ट क्या हुए आलसियों का हुजूम लग गया | तीनो एक से बढ़कर एक | काफी बड़ा घर , सबके लिए एक अपना एक अलग कमरा | सबने अपनी दुनिया उसी में ज़मानी शुरू की |

वक्त गुज़रता रहा, काफी अच्छा वक्त | मूवीज़, बोलिंग, गो-काटिंग, स्विमिंग, गिटार, देर रात तक घूमना सब चालू हो गया | ऑफिस भी कुछ कदमों की दूरी पर था, जब सारा ऑफिस सुबह सुबह अपनी कैब पकड़ने के लिए स्टैंड्स पर होता, हम सोकर उठने का प्लान कर रहे होते और फिर भी उनलोगों के आसपास ही ऑफिस पहुंच जाते | ऑफिस का ग्रुप भी मस्त बन गया था | सब एक से बढ़कर एक नौटंकी, बड़ा मजा आता | इंडिया को वर्ल्ड कप यहीं जितवाया, धुआंदार और शानदार जश्न हुआ था जीत का  | 

यहीं पर नयी कंपनी के लिए इंटरव्यू भी दिए | नयी नौकरी लगी, पर पता नहीं मन क्यूँ गुड़गांव रहने के लिए तैयार नहीं था, वापस बंगलौर जाने का निर्णय लिया और पिछले साल अगस्त में बंगलौर चले गए और फिर वहाँ से तुरंत ही अमेरिका का असाइनमेंट मिल गया | रूम की बस यादें रह गयीं |

इस रूम में ही रहते हुए, ब्लॉग लिखना शुरू किया | पंकज ने ही काफी हद तक उसके लिए इंस्पायर किया था | उससे पहले बस कुछ लोगों को पढ़ता रहता था |  पी डी से भी मुलाकात यहीं हुई | और फिर जब एक बार चस्का लग गया तो अमेरिका जाकर भी ब्लॉग लिखने का मन बना रहा | और भी बहुत से लोगों से दोस्ती हुई | ढेर सारी बातें | कुछ लोग तो बहुत ही क्लोज़ फ्रेंड बन गए | ३ तो ब्लॉगपोस्ट इस घर पर लिख डाली गयी | 

फिर इस साल जून में इंडिया वापस आना पड़ा, कुछ वजहों के चलते दुबारा बंगलौर नहीं जा पाया , वापस गुड़गांव आ गया और इसी रूम में | पर तब तक रवि जा चुका था | और कुछ पर्सनल प्रोब्लम्स के कारण मैं भी ज्यादा एक्टिव नहीं रह पाया | धीरे धीरे घर बहुत बड़ा लगने लगा | ज्यादा जगह भी कभी कभी बहुत डराती है |  जब कभी अकेला होता तो लगता कि मैं कोई आत्मा टाइप हूँ और इस घर में भटक रहा हूँ |

कुछ दिन मम्मी जी भी आकर रहीं यहाँ पर | जबसे जॉब ज्वाइन की है तबसे इतना वक्त उनके साथ कभी नहीं बिताया | बहुत सारी बातें करता उनके साथ, कभी कभी लड़ाई झगड़े भी | कुछ दिनों के लिए वो भी मौसी जी के यहाँ चली  गयी और हमने भी ये घर बदलने का मन बना लिया | नया घर काफी हद तक मम्मी जी की ही पसंद का है , एक बालकनी, छत के साथ |

गए वीकेंड नए घर में शिफ्ट भी कर गए | पर ना जाने क्यूँ इतनी ज्यादा यादें जुड़ी सी लगती हैं इस घर से कि चाह के भी इससे खुद को अलग नहीं कर पा रहा हूँ | अभी इसमे नए किरायेदार आये नहीं थे तो आना जाना भी अलाउड था | नेट कनेक्शन भी अभी यहीं पर था तो वैसे भी आते रहते | अपने कमरे में जाकर बड़ा सुकून मिलता है अभी भी | खाली करने के बाद भी कई कई बार उसे देख चुका हूँ, एक एक अलमारी, दराज़ सब कुछ | पर हर बार लगता है कि कुछ रह गया | कुछ घंटों बाद फिर आने का मन करता है | फिर सब टटोलता हूँ, पर कुछ भी नहीं मिलता | फिर उदास बैठ जाता हूँ |  आज नए किरायेदार आ जायेंगे फिर यहाँ आना नहीं होगा |कल सोने से पहले यही सब सोच रहा था, नींद भी काफी देर से आयी और सुबह जल्दी ही टूट गयी | कुछ ४ बजे के आस पास का ही वक्त रहा होगा | थोड़ा उजाला होने दिया और फिर जैसे ही आ पाया यहाँ एक बार और आ गया | 

कुछ चीज़ें वाकई में छूट कर भी नहीं छूट पाती , और वो तो बिलकुल भी नहीं जहाँ से ज़िंदगी को नयी राह मिलती है | जाने-अनजाने कितने लोग जुड़ जाते हैं इन्ही यादों के सहारे | इन सब को छोड़कर जाना बहुत मुश्किल हो जाता है | वैसे गए सालों में घर कई बार बदले | हर बार छोड़ते वक्त थोड़ा उदास होता था, पर तुरंत ही सब सही हो जाता | कारण ये भी था कि मैं उन घरों में जैसा गया था वैसा ही वापस भी हो जाता था | पर इस बार ऐसा नहीं हो रहा | मैं वो नहीं बचा हूँ जो यहाँ आया था, खुद को बहुत बदला हुआ पा रहा हूँ | और शायद यही वो कारण है कि खुद को, उन यादों के बहाने इसी कमरे में ढूँढने चला आता हूँ | 

आज इस घर से वास्ता खत्म हो जायेगा पर...काश!!! कुछ छोड़ पाना आसान होता...
-- देवांशु

Friday, September 21, 2012

जुगलबंदी..बोले तो दो तीर से एक शिकार!!!!

जुगलबंदी तो सुनी ही होगी...क्या कहा , नहीं सुनी ? अरे पक्का सुनी होगी...भले ही क़ुबूल ना करो !!!

जुगल ( हंसराज ) पर अगर अभिनय और निर्देशन करने की "बंदी" लगा दी जाये तो इसे ही "जुगलबंदी" नहीं कहते, अपितु जब दो सूरमा आपस में बैठते हैं तो उनके बीच की फ्रेंडली झड़प को जुगलबंदी कहते हैं |

जैसे दो तबलावादक अक्सर इस टाइप की झड़प करते हैं |
तबलावादक १ : "ता धिन धिन न, न धिन तिन न"
तबलावादक २: "ता धिन धिन न, न धिन तिन न, तगड़-धगड़"
तबलावादक १: "ता धिन धिन न, न धिन तिन न, तगड़-धगड़,झगड़-तगड़-पकड़, कूट-पीट-भाग"

और दर्शक वाह वाह करते हैं | जर्नली अईसे प्रोग्राम्स के बाद पार्टी रखी जाती है, जिसमे ड्रिंक्स के साथ जुगलबंदी की बातें होती हैं :

क्रिटिक १ : "यार उसने तीन ताल सही नहीं बजाई, थोड़ा भटक गया"
क्रिटिक २ : "अरे क्या बात कर रहे हैं आप जनाब , बिलकुल सही बजाई, आपने ध्यान नहीं दिया शायद"

फिर क्रिटिक २ अपने हाथ की एक उंगली, क्रिकेट अम्पायर की तरह आउट देने कि इस्टाइल में उठाता है , और लहराते हुए एक ताल को मन ही मन पढता है और बुदबुदाने की एक्टिंग करता है :

"झागड़-तागड़, धिनक तुन-तुन, तिनक धुन-धुन , ता दा धा धा धिन"

और फिर बोलता है "सही कह रहे हैं आप, एक ताल मिस कर गया वो, मान गए आपकी पकड़"

क्रिटिक २ एक कुटिल मुस्कान फरमाते हैं और मन ही मन कहते हैं "मैं न कहता था "

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खैर !!! ये तो थी रेगुलर बकवास , अब मुद्दे की बात | दरसल जुगलबंदी में पार्टिसिपेट करने वाले मुझे शिकारी टाइप लगते हैं | जिनके शिकार उनके श्रोता होते हैं | मुझे एक "एक तीर से दो शिकार" की उलट बात लगती है ये | आखिर शिकार तो जनता का ही होता है |

वैसे जुगलबंदी कई टाइप की होती है , कुछ बजा के जुगलबंदी करते हैं, कुछ गा के करते हैं | कवि लोग भी लग लेते हैं जुगलबंदी में, ये एक कविता, ये दूसरी और ये दोनों पर भारी तीसरी  | नेता-फेता भी घोटालों-फोटालों की जुगलबंदी करते अक्सर सुने जाते हैं |

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पिछले दिनों फेसबुक पर एक फोटो दिख गयी, बड़ी शानदार टाइप फोटो लग रही थी | हम डाउनलोडिया लिए, लगा कि कोई "कालजयी" कविता-कहानी लिखेंगे | पर ध्यान से देखा तो बहुत चीज़ें समझ में आयी फोटो के बारे में | पहले आप फोटो देख लो फिर बतायेंगे कि क्या सोचे हम :

१. पहली चीज़ जो ये समझ में आयी कि ये एक फोटो है |

२. पर इस फोटो में जो घर है वो हवा में कैसे लटका है ? ज़रूर कोई मैग्नेटिक लेविटेशन का फार्मूला लगाया गया होगा, वैसे ही जैसे बुलेट ट्रेन चलती है |
३. पर घर को हवा में लटकाने का फायदा क्या ? घर में तहखाना कैसे बनेगा? पार्किंग की भी जगह नहीं है |
४. मेरे को लगा चाँद से पेड़ फंसा हुआ है , पेड़ से ज़मींन और ज़मीन से घर | इस तरह शायद घर हवा में लटका हुआ नहीं है |
५. ये "दोनों कपल" कौन हैं ? ये कहाँ से आ रहे हैं ?
६. दोनों एक दूसरे की तरफ नहीं देख रहे हैं , इससे लगता है या तो ये शादी-शुदा हैं  या तो हिन्दुस्तानी हैं, जिनके घरवाले इनकी शादी के खिलाफ हैं,  तो उदास टाइप हैं | बाकी, प्यार में तो लोग एक - दूसरे की तरफ देखते हैं |
७. ऐसा भी हो सकता है सब कुछ ठीक है, पर ऑफिस से वापस आ रहे हों | लड़के को बॉस ने बहुत हड़काया है | लड़की को भी प्रमोशन नहीं मिला है इस बार |
८. पर घर की लाईट क्यूँ जल रही है | शायद जब ये लोग घर से गए हों तो पावर कट हो गया हो , और ट्यूब लाइट खुली भूल गए हों | अब घर जाकर लड़के कि खैर नहीं, "तुमसे एक ट्यूबलाईट भी बंद नहीं की जाती, एकदम ट्यूबलाईट हो"|
९. पर बारिश तो हो नहीं रही | फिर ये घर से पानी क्यूँ गिर रहा है ? लगता है लड़की "किचन" का डायरेक्ट नल बंद करना भूल गयी | चलो अब लड़का बच जायेगा, वो ट्यूबलाईट भूला तो वो भी तो नल चलता छोड़ गयी , हिसाब बराबर |
१०. हो ये भी सकता है कि घर हो तो रेगुलर मोहल्ले में , पर जब पानी बहना शुरू हुआ तो मोहल्ले वालों ने "ब्रह्मा" जी को याद किया | ब्रह्मा जी आ तो गए पर "मास्टर की" लाना भूल गए | वर्ना घर खोल के नल बंद कर देते | उन्होंने उठा के घर को ही समंदर पर लटका दिया, ड्रेनेज का भी लफड़ा नहीं  | घर के हवा में लटकने, सीढ़ियों आदि की व्यवस्था  विश्वकर्मा जी ने तुरत-फुरत कर दी | वैसे भी विश्वकर्मा जी भारत के बल्लेबाजों की तरह हैं, अंडर प्रेशर अच्छा परफोर्म करते हैं | लंका भी दुबारा से उन्होंने ऐसे ही बनाई थी |

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ये सब हम सोच ही रहे थे कि सोनल जी ने शिखा जी की एक  फोटो पर कविता रच डाली | कविता पढने के बाद हमने सोनल जी को ये फोटो भेज दी कि इसपे कुछ लिखा जा सकता है | उन्होंने हामी भरी और ५ मिनट में ये कविता हमें भेज दी :
"लेकर आया था
वो सारे तोहफे
बाँध कर पोटली में
चमकीला सा चाँद
अलसाई सी रात
धुंआ होते बादल
मचलता समंदर
गुनगुनाती हवा
इंतज़ार में घर
सब कुछ था
पर घबराया था
तुम्हे पसंद आएगा
तुमने ही तो
उकेरे थे सभी
नीले कागज़ पर
कहा था काश
सच हो जाए
देखो एक ही
फ्रेम में जड़ दी
उसने जन्नत..."

कविता बड़ी शानदार लगी , तो  हमने सोचा कि ये कविता क्यूँ न हम अपनी पोस्ट पर ठेल दें, सोनल जी ने परमीशन भी दे दी |

( वैसे उन्होंने ये भी बताया कि ध्यान से देखो , चिमनी से धुआं निकल रहा है, शायद सब्जी भी जल गयी होगी, पर प्राइमा-फेसी तो हमें धुआं नहीं दिखा और दूसरा कि ये कि हम ई सब टाइप की गलती नहीं करे कभी, अब जो करेगा वही जानेगा ना :) :) )

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इसी को जुगलबंदी कहते हैं | जुगलबंदी के बारे में ज्यादा जानने के लिए ये पोस्ट ऊपर से पढ़ें :) :) :) | और अगर आपको सब समझ में आ गया हो तो "क्रिटिक" बन जाओ , नीचे कमेन्ट बॉक्स है ही |

नमस्ते !!!!

-- देवांशु