Saturday, January 7, 2012

वो “सात” दिन : मुख्य अंश और एक “एक्सक्लूजिव” साक्षात्कार…


आप साहबान ने बहुत से महापुरुषों, लेखकों, खिलाडियों की डायरियां पढीं होंगी |  उससे उनके जीवन का “आइडिया" लगता है |  जिस तरह से किसी “सिस्टम” को बनाने की दो “अप्रोच” होती हैं ..”बॉटम अप” और “टॉप डाउन" ..उसी तरह डायरी लिखने की भी यही दो अप्रोच होती हैं…

बॉटम अप अप्रोच में कोई भी इंसान पहले जिंदगी से फाईट करता है, रोज आके उन “फाईट सीन" को डायरी के सुपुर्द करता है | फिर एक दिन वो  महान बन जाता है |  उसकी डायरी तलाशी जाती है | फिर उस डायरी को छापा जाता है | लोग उसे हाथों हाथ खरीद लेते हैं, ड्राइंग रूम में सजाते हैं, किताबों के कलेक्शन में रखते हैं|


टॉप डाउन अप्रोच में आदमी सबसे पहले “फेमस" होता है,  फिर वो डायरी खरीदता है, फिर अपने “संघर्ष" के दिन याद करके उसमे डालता जाता है |  डायरी खरीदने से लिखने तक काफी लोग उनके आगे पीछे लगे रहते हैं| लिखते ही धर के छपती है किताब| बाकी सब ऊपर वाली अप्रोच के मुताबिक होता है|

कुछ सालों पहले तक डायरियां झमाझम बिकती थीं | फिर अचानक से महापुरुषों की बाढ़ आ गयी| साथ में डायरियां भी काफी आ गयी मार्केट में| जनता तो उतनी ही रही | सप्लाई बढ़ गयी डिमांड कम हो गयी | 

काफी लोगो की डायरियां फिर भी  खूब बिकीं, असली थी और “ये पब्लिक है सब जानती है"| खैर वो लोग तो खुश रहे |

कुछ लोग जो “जेनुइन” थे पर बढ़िया मार्केटिंग ना होने के चक्कर में उनकी डायरी नहीं बिकीं | पर वो संतोष कर गए | “संतोषं परमं सुखम” | इसको उन्होंने चरितार्थ किया|  कुछ लोगो की कीमत संसार को बहुत बाद में पता चलती है|

पर “महापुरुषों" की इसी बाढ़ में कुछ ऐसे भी थे, जिन्हें लगा की वो महापुरुष तो हैं पर जनता को पता नहीं हैं |  वो भी डायरी लिख मारे | ऐसे लोगो की डायरी की पब्लिसिटी तगड़े से की जाती है | जैसे कुछ हिस्से छपने से पहले लीक किये जाते हैं, किसी विवादास्पद घटना (जो कम से कम १० साल से ३० साल पुरानी हो, लोगो को धुंधली याद हो बस ) पे उनके “हटके" विचार लिखे होते हैं|  किसी बड़ी हस्ती को पानी पी पी के गाली दे देते हैं |  अपने पुराने किसी लफड़े-राड़े के बारे में बताया जाता है|  किसी और के संबंधों के बारे में भी लिख देते हैं|  बिक ही जाती है किताब इसके बाद |


खैर!!!! मुद्दा ये नहीं है, आज मैं आपको एक महापुरुष की डायरी के कुछ अंश बताता हूँ, पूरी डायरी आपको जब भी मौका लगे पढ़ लेना |

महापुरुष किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं | एक ज़माने में साधारण से इंसान थे , नलके बनाने का काम करते थे, पाइप फिट करते थे , फिर एक दिन उन्होंने एक महल में कैद एक राजकुमारी को आज़ाद कराया | उनकी ये “प्रेम कहानी” गली मोहल्लों तक में फेमस हुई | उसके बाद से ये भी  काफी “फेमस" हुए | जी हाँ सही पहचाना मैं बात कर रहा हूँ हर दिल अज़ीज़ “मारियो" भाई की , जिन्हें हम “सुपर मारियो" के नाम से भी जानते हैं|mario-1890

उनकी डायरी उन दिनो  की है जब वे राजकुमारी ढूंढ रहे थे, अपने संघर्षों और अनुभवों को उन्होंने कलमबद्ध किया है इस कृति में… नाम है “दोज सेवेन डेज़" , उसका हिंदी रूपान्तरण भी छपा है “वो सात दिन"…

पहले दिन के बारे में वो लिखते हैं…

“शुरुआत करते हुए बड़ा डर लगा , ना जाने कहाँ होगी राजकुमारी , पता नहीं कैसे हाल में होगी| पर भगवान का नाम लेकर शुरुआत कर दी है | शुरुआत में ही एक बिलौटा सामने  से आता दिखा , डर के मारे मैं उछल पड़ा, मेरा सर दीवार से टकराया उससे एक मशरूम निकला, मैंने लपक के उसे खाया, लगा जैसे ताकत बढ़ गयी, बिलौटे से डट के मुकाबला किया"

आगे उन्होंने पाइप में छुपे एक खतरनाक पौधे का वर्णन किया है

“देखने में तो साधारण पाइप दिख रहा था, मैं उसपे चढ खड़ा हुआ , पर उसके अंदर एक छुपा हुआ कटखैया पौधा था, भला हो मशरूम का वरना जान से मरहूम होना पड़ता, लेकिन तभी दिमाग की घंटी बजी की अगर ये नीचे जा रहा है तो नीचे कुछ ना कुछ होगा ही, नीचे गया तो देखा सिक्के ही सिक्के फैले हैं, चूंकि मेरी मशरूमी ताकत तो पौधा खा चुका था इसलिए मैं ज्यादा जोर लगा के उछला , सिक्के बटोरे और आगे बढ़ चला”

एक विशेष फूल के बारे में बताते हुए वो लिखते हैं…

“रस्ते में कुछ अजीब तरफ के फूल मिले, वो कुछ-कुछ सूरजमुखी जैसे लगते थे, उनको मैंने खा तो लिया पर लगा कहीं उल्टी ना हो जाए मेरे को, पर देखा तो मेरे अंदर से गोलियाँ निकल रही थीं…”

पहले दिन के चार पहरों में हर पहर में उन्होंने कोई ना कोई “झंडा" फतह किया, आगे के रस्ते भी मिलते गए, चौथे पहर आके वो एक महल में पहुँच गए | उसके बाहर एक ड्रैगन भाई खड़े थे उनसे मुक्का-लात हुई| किसी तरह आगे बढे| महल में पहुंचे वहाँ उनके नाम एक संदेश रखा हुआ था कि बहुत-बहुत शुक्रिया यहाँ आने के लिए लेकिन राजकुमारी किसी और महल में हैं | उनका दिल टूट गया…

“हताशा बढ़ गयी  सन्देश पढ़ के, जीवन कोरा भ्रम लगने लगा है | रात वहीँ गुजर करने का मन बनाया है , शुक्र है अपना ए एम रेडियो साथ रख लिया था | उसे चलाया तो विविधभारती स्टेशन लग गया , उसपे हवामहल प्रोग्राम आ रहा था, अंदाज़ा लगाया की रात के साढ़े आठ बजे होंगे|”

दूसरे दिन से लेकर सातवें दिन की डायरी का हाल चाल लगभग एक सा दिखता है, कठिनाइयाँ उनके जीवन का हिस्सा बनती सी दिखती हैं, हर रोज के चौथे पहर बाद वो अपनी डायरी लिखते रहे| दूसरे दिन के चौथे हिस्से का वर्णन उन्होंने कुछ यूं किया है…

“मुझे दो दिन से ये चौथा हिस्सा पार करना बड़ा मुश्किल लग रहा है, एक तो अँधेरा होने लगता है और ठीक महल के दरवाजे पे खड़ा ड्रैगन, साथ में कल-कल कर बहती नदी का पुल, बड़ा मुश्किल हो जाता है| शुक्र है की फ्लड लाईट लगी हुई हैं और बत्ती बराबर आ रही  है| पर महल के अंदर अँधेरा सा है| मुझे मोहम्मद रफ़ी का गाना याद आता है “चराग दिल का जलाओ, बहुत अँधेरा है”, महल के अंदर मै उसी  चरागे में सोने जा रहा हूँ, इस उम्मीद में की कल तो मुझे राजकुमारी मिल जायेगी|”

तीसरा दिन भी ऐसे ही बीत जाता हुआ दिखा है | चौथे दिन के हिस्से ऐसे दिख पड़े हैं…

“तंग आ गया हूँ मैं, इन बिलौटों, बतखों से लड़ते हुए, रोज का वही लफड़ा, कहाँ तक लडूं इस जालिम दुनिया, बेरहम समाज से, कोई इंसान भी तो सामने नहीं आता, जानवर भेजे पे भेजे जा रहा है, कुछ एक बार में मर रहे हैं, कुछ दो बार में, कुछ को खाई में फेंकना पड़ रहा है, इतने पाप करने पड़ रहे हैं| पाप का घड़ा भरने को है, पता नहीं राजकुमारी से मिलने से पहले फूट ना जाए| यमराज की भी टेंशन बराबर बनी रहती है|”

यहाँ तक आते आते राजकुमारी से मिलने की बेताबी भी साफ़ झलकने लगी…

“तुम पता नहीं कैसी होगी, दिखती कैसी होगी, क्या तुम मुझे देखते ही मुझसे प्यार करने लगोगी? तुम्हारे लिए कोई भेंट भी तो नहीं ला पाया, जल्दी में था और सोमवार को दुकाने भी कम खुलती हैं, उसपर भारत-पकिस्तान का मैच चल रहा था, जनता खाना तो खा नहीं रही थी, दुकान क्या खोलती | उम्मीद है की तुम मुझे माफ कर दोगी | मेरे सच्चे प्यार को ही तोहफा समझना | तुमसे मिलने की बेकरारी बढती जा रही है |”

पांचवे दिन मुश्किलों के और बढ़ जाने की बात लिखी है उन्होंने|  छटा दिन भी ऐसे ही बीता | दो दिन से गोलियों , बंदरों का भी मुकाबला करने की बात लिखी है| सातवें दिन के एंड में वो लिखते हैं…

“मेरे सब्र का बाँध टूट गया है, ऐसी कौन सी मुश्किल है जो मैंने नहीं झेली | ऊपर वाला मेरे सब्र का इम्तेहान ले रहा है | सब्र का फल मीठा होता है और ज्यादा मीठा खाने से  डाइबिटीज़  रोग हो जाता है | इसलिए ज्यादा ये मिठाई नहीं खाऊंगा | एक-दो दिन और देखता हूँ नहीं तो फिर किसी मैट्रीमोनी साईट पे अपनी प्रोफाइल बना दूंगा, किसी से भी शादी कर लूँगा| राजकुमारी से प्यार महंगा ना पड़ जाए"

यहीं पे किताब खतम होती है | किताब के अंत में प्रकाशक का एक नोट है..

“इस तरह मुश्किलों से जूझते हुए मारियो ने अपनी राजकुमारी को पा लिया, आप भी मेरे साथ उन दोनों के उज्जवल भविष्य की कामना करें, पुस्तक पढ़ने पर बधाई और अगर आपने ये किताब खरीद के पढ़ी है तो शुक्रिया भी|”

****

किताब पढ़े हुए मुझे काफी टाइम हो गया, कुछ सवालात थे , मैंने प्रकाशक से संपर्क करने की कोशिश की तो वहाँ से कोई जवाब नहीं आया | फिर एक दिन एक शौपिंग मॉल में घूमते हुए (उछलते हुए पढ़ें) मारियो खुद ही दिख गए…मैंने नमस्ते की तो मुझे एक बार में पहचान गए | हमने कॉफी के लिए आमंत्रित किया तो वो मान गए| इस मौके पे मैंने कुछ सवाल दागे| वो यहाँ हैं:

मैं: नमस्ते मारियो जी, कैसे हैं, आज यहाँ मॉल में क्या कर रहे हैं?
मारियो जी : नमस्ते , बढ़िया हैं एकदम, आज जरा सोचा की मैडम को थोड़ी शौपिंग करा दी जाये , इसलिए आ गए|

मैं: अच्छा, ये तो बढ़िया सोचा आपने, इसी बहाने मुलाकात भी हो गयी|
मारियो जी : दरसल पिछले ३-४ महीने से बहाने बना रहे थे, कभी कोई त्यौहार का बहाना, कभी इंडिया की हार का बहाना, शौपिंग “अवाइड" कर रहे थे, पर आज मैडम बोलीं की अगर शौपिंग नहीं कराओगे तो खाना पानी बंद |  अब “रेसेशन" के टाइम में मैडम से पंगा कौन ले | कड़की चल रही है | तो सोचा की शौपिंग करा देते हैं, शायद सस्ती पड़े |

मैं (हँसते हुए) : शौपिंग और सस्ती?
मारियो :  अरे नहीं, अब आप तो घर के आदमी हो आपसे क्या छुपाना, मैंने उन्हें अपना क्रेडिट कार्ड दिया है, उसकी लिमिट ही इतनी कम रखी है, कितना भी करो शौपिंग पैसा तो उतना ही जायेगा जितना हम चाहेंगे |

मैं : मान गए आपको, मैंने आपकी डायरी “वो सात दिन" पढ़ी है ?
मारियो (चौंकते हुए) : आपने पढ़ी????

मैं : जी हाँ, आप मेरे हीरो रहे हैं, इंस्पिरेशन, कुछ सवाल है पूंछना चाहूँगा?
मारियो :  दागो

मैं :  आपको राजकुमारी को ढूँढने में आठ दिन लगे, पर कहानी केवल सात दिन की, ऐसा क्यूँ?
मारियो : अब आप की शादी तो हुई नहीं है अभी तक | आप नहीं समझोगे |  यार वो आठवे दिन ही पकड़ के शादी हो गयी | पूरी रात मेहमान लोगो ने खिला खिला के मार डाला | दूसरे दिन से घर में अपने झगड़े शुरू | जहाँ दो बर्तन होते हैं खनकते ही हैं| बस इन्ही बर्तनों को संभालने में जिंदगी कट रही है | डायरी कहाँ से लिखें ? आखिरी का नोट भी किसी और से लिखवाना पड़ा प्रकाशक को|

मैं: ओह तो ये बात है , अच्छा ये बताइए पहले दिन तो आपने बताया आप रेडियो सुन रहे थे, उसके बाद नहीं सुना क्या, उसकी बात कहीं और नहीं की आपने ?
मारियो : “ कैसे सुनते, उसी रात हमने फरमाइशी गीतों का प्रोग्राम लगाया, फरमाइश करने वालों के नाम सुनते सुनते आ गयी हमें नींद, जब जागे तब तक सेल का सत्यानाश हो चुका था| रेडियो पहले महल में ही तोड़ना पड़ा|

मैं : तोड़ना क्यूँ?
मारियो : अरे वही जैसे जंग में लोग गोली खतम हो जाने पे अपनी बन्दूक तोड़ देते हैं|

मैं : हम्म | आप तो जापान के रहने वाले हैं , फिर आकाशवाणी कैसे सुनते हैं?
मारियो : असल में मेरी माँ भारतीय मूल की हैं, उन्हें हिंदी गाने बड़े पसंद हैं, वहीं से आदत पड़ी|  और अब तो हिन्दुस्तान में रह भी रहे हैं, जापान में तो बड़े भूकंप आते हैं इसलिए | किशोर कुमार मेरे फेवरेट हैं|

मैं : वो तो हर प्यार करने वाले के फेवरेट हैं, प्यार की बात करते हैं, आपको कैसे प्यार हुआ राजकुमारी से?
मारियो : ये भी अंदर की बात है, सिचुएशन मरता क्या ना करता वाली थी, हालत अपनी पतली थी, कई बड़े घर की लड़कियों पे चांस मारा, सब जगह से दुत्कारे गए| फिर महल में बंद राजकुमारी का पता चला, बस|

मैं : तब तो दिन मजे में कट रहे होंगे अब ?
मारियो : अजी ख़ाक कट रहे मजे में, मुद्दे की बात तो किसी को पता नहीं है, इनका नाम केवल राजकुमारी निकला, और महल एक खंडहर | इन्हें कोई छिपाया नहीं गया था, एक बार पड़ोसी के बगीचे से अमरुद चुरा के भागी तो खंडहर में कहीं खो गयी| ऊपर से ये न्यूज़ चैनल वाले, गड्ढे में गिरने से लेकर महल में खोने तक की न्यूज़ ऐसे दिखाते हैं और सरकार भी भर भर  के पैसे लुटाती है , इन्ही सब लफड़ों में पड़ गए| जैसे इन्हें ढूँढा, जनता वाह-वाही करती आ गयी, एक-दो मंत्री-संत्री भी आये, होटल वालों ने अपनी तरफ से रियायती दर पे डिनर करवाया| नेताओं ने लंबी चौड़ी घोषणाएँ कर दी | तब से सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहा हूँ उन्हीं पैसों के लिए | उन आठ दिनों में जिन जानवरों से सामना हुआ वो अच्छे लगने लगे हैं| जो जमा पूंजी थी और जो सिक्के उन गुफाओं में मिले वो होटल वाले ले गए | जो बचे वो नेता लोग अपनी पार्टी के चंदे के रूप में उठा ले गए | फिर से नलका बना के, टोंटी लगा के काम चला रहे हैं| वो तो कहो इस लाइन में ठीक ठीक पैसा मिल जाता है तो ज़िंदगी चल रही है|

मैं (इससे पहले की वो हमसे ना पूंछ लें की कैसी हालत है तुम्हारी, हम तपाक से बोल पड़े): आजकल हर किसी की हालत पतली है|
मारियो : सही कह रहे हैं|

मैं : अच्छा आपका एक भाई का , लूगी, वो कहाँ है आजकल?
मारियो :  ये सब अफवाह है, मेरा इस नाम का कोई भाई नहीं है और ना ही मैं इस नाम के किसी इंसान को जानता हूँ | मैंने पहले ही इस बाबत एक इश्तेहार अखबार में छपवाया है कि इस नाम के किसी व्यक्ति से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है|

इसी बीच वो थोड़ा हडबड़ाते हुए दिखे | राजकुमारी जी ने उन्हें हाथ से अपनी शॉप के अंदर आने का इशारा किया |  वो ऐसे दौड़े की जैसे उन्हें पता ही ना हो कि क्या हो रहा है| हमने भी नज़रों से उनका पीछा किया|

वो क्रेडिट कार्ड को मुंह से फूंकते, कपड़े से साफ़ करते दिख रहे थे…….
****
और जाते जाते मारियो साहब के जीवन पे बनी एक डॉक्यूमेंट्री आपको दिखा देते हैं…
सुपर मारियो : एक अनूठी प्रेम-संघर्ष-कथा

नमस्ते!!!!!

18 comments:

  1. वाह मालिक... शादीलाल की दुकान याद दिला दी और वो ५ रूपये में एक घंटे का वीडियोगेम.. :)

    ReplyDelete
  2. :):) कहाँ कहाँ से आइडिआज आते हैं आपको भी :)

    ReplyDelete
  3. “महापुरुषों" की इसी बाढ़ में कुछ ऐसे भी थे, जिन्हें लगा की वो महापुरुष तो हैं पर जनता को पता नहीं हैं | वो भी डायरी लिख मारे |

    ReplyDelete
  4. हम भी अब डायरी लिखने का प्लान करते है!

    ReplyDelete
  5. हे भगवान् !!! कहाँ पहुँच गई ..गेम की सारी यादें ताज़ा हो गई और तो और खेलने का मन भी हो आया

    ReplyDelete
  6. @पंकज...मालिक शादीलाल की दुकान तो बचपन का "कसीनो" थी...आज भी वहाँ से गुजरो तो लगता है कि एक बार खेल के आगे बढ़ा जाए!!!!कसम से !!!

    @ शिखा जी.... :) :) :) शुक्रिया ...बस विडियो गेम खेलने का मन कर रहा था

    @ सोमू (२ बार)...मालिक कैसे हैं ???

    @ आशीष जी ... जल्दी लिखिए, मार्केट में कम्पटीशन तगड़ा है.. :) :) :)

    @ सोनल जी...गेम के टच में बनी रहिये ..बहुत बढ़िया खेल है | स्कोर अपडेट देती रहिएगा :) :) :)

    @ बी एस पाबला जी... इन्तजार है ..वैसे इस गेम को खेलने वाले हमेशा लेट रहते हैं :) :) :) (खुद मेरी ट्रेन छूटते-छूटते बची कई बार ) :) :) :)

    ReplyDelete
  7. kamal hai tumara jawab nhi...ek pura shodh kr dala ,keep it bro

    ReplyDelete
  8. Ye to teesre type ki diary ka idea haath lag gaya... dusre ki diary chhap k publicity bator le jao :P

    ReplyDelete
  9. आलोक भाई..शोध नहीं है किसी का जीवन है :)

    मोनाली...तुम्हारा जवाब नहीं है, कुछ अलग ही निकाल लाती हो खोज के :)

    ReplyDelete
  10. अरे मालिक, कहाँ से लाते हैं इतना बकर? और लाते हैं तो रखते कहाँ है?
    मजा आ गया..
    हमारे यहाँ शादीलाल तो नहीं थे, हाँ उन्हीं का एक डुप्लिकेट "तेवारी जी" थे.. :)

    ReplyDelete
    Replies
    1. पीडी भाई...ऐसे लोग डुप्लिकेट नहीं होते, एक ही होते हैं, खुदा के भेजे फ़रिश्ते टाइप... :) :) :)

      Delete
  11. अरे मालिक, कहाँ से लाते हैं इतना बकर? और लाते हैं तो रखते कहाँ है?
    मजा आ गया..
    हमारे यहाँ शादीलाल तो नहीं थे, हाँ उन्हीं का एक डुप्लिकेट "तेवारी जी" थे.. :)

    ReplyDelete
  12. दो दो फंतासियों का अद्भुत सम्मिलन :)

    ReplyDelete
  13. बहुत सुन्दर लिखा है सारी यादें ताज़ा हो गई

    ReplyDelete
  14. कही से डॉ.देवांशु की डायरी हाथ लग जाये...एक शोध-पत्र तो तैयार हो ही जायेगा!

    ReplyDelete
  15. गजब की डायरी लिखी है। इत्ती डायरी के मसाले में तो तीन चार महापुरुष निकल सकते थे। लेकिन आपके वाले महापुरुष की बात ही जरा हटकर थी।

    बहुत खूब! बिन्दास!

    ReplyDelete