Tuesday, October 2, 2012

काश!!! कुछ छोड़ पाना आसान होता...

जनवरी २०११ को हम तीनों (पंकज, रवि और मैं ) इस घर में शिफ्ट हुए | शिफ्ट क्या हुए आलसियों का हुजूम लग गया | तीनो एक से बढ़कर एक | काफी बड़ा घर , सबके लिए एक अपना एक अलग कमरा | सबने अपनी दुनिया उसी में ज़मानी शुरू की |

वक्त गुज़रता रहा, काफी अच्छा वक्त | मूवीज़, बोलिंग, गो-काटिंग, स्विमिंग, गिटार, देर रात तक घूमना सब चालू हो गया | ऑफिस भी कुछ कदमों की दूरी पर था, जब सारा ऑफिस सुबह सुबह अपनी कैब पकड़ने के लिए स्टैंड्स पर होता, हम सोकर उठने का प्लान कर रहे होते और फिर भी उनलोगों के आसपास ही ऑफिस पहुंच जाते | ऑफिस का ग्रुप भी मस्त बन गया था | सब एक से बढ़कर एक नौटंकी, बड़ा मजा आता | इंडिया को वर्ल्ड कप यहीं जितवाया, धुआंदार और शानदार जश्न हुआ था जीत का  | 

यहीं पर नयी कंपनी के लिए इंटरव्यू भी दिए | नयी नौकरी लगी, पर पता नहीं मन क्यूँ गुड़गांव रहने के लिए तैयार नहीं था, वापस बंगलौर जाने का निर्णय लिया और पिछले साल अगस्त में बंगलौर चले गए और फिर वहाँ से तुरंत ही अमेरिका का असाइनमेंट मिल गया | रूम की बस यादें रह गयीं |

इस रूम में ही रहते हुए, ब्लॉग लिखना शुरू किया | पंकज ने ही काफी हद तक उसके लिए इंस्पायर किया था | उससे पहले बस कुछ लोगों को पढ़ता रहता था |  पी डी से भी मुलाकात यहीं हुई | और फिर जब एक बार चस्का लग गया तो अमेरिका जाकर भी ब्लॉग लिखने का मन बना रहा | और भी बहुत से लोगों से दोस्ती हुई | ढेर सारी बातें | कुछ लोग तो बहुत ही क्लोज़ फ्रेंड बन गए | ३ तो ब्लॉगपोस्ट इस घर पर लिख डाली गयी | 

फिर इस साल जून में इंडिया वापस आना पड़ा, कुछ वजहों के चलते दुबारा बंगलौर नहीं जा पाया , वापस गुड़गांव आ गया और इसी रूम में | पर तब तक रवि जा चुका था | और कुछ पर्सनल प्रोब्लम्स के कारण मैं भी ज्यादा एक्टिव नहीं रह पाया | धीरे धीरे घर बहुत बड़ा लगने लगा | ज्यादा जगह भी कभी कभी बहुत डराती है |  जब कभी अकेला होता तो लगता कि मैं कोई आत्मा टाइप हूँ और इस घर में भटक रहा हूँ |

कुछ दिन मम्मी जी भी आकर रहीं यहाँ पर | जबसे जॉब ज्वाइन की है तबसे इतना वक्त उनके साथ कभी नहीं बिताया | बहुत सारी बातें करता उनके साथ, कभी कभी लड़ाई झगड़े भी | कुछ दिनों के लिए वो भी मौसी जी के यहाँ चली  गयी और हमने भी ये घर बदलने का मन बना लिया | नया घर काफी हद तक मम्मी जी की ही पसंद का है , एक बालकनी, छत के साथ |

गए वीकेंड नए घर में शिफ्ट भी कर गए | पर ना जाने क्यूँ इतनी ज्यादा यादें जुड़ी सी लगती हैं इस घर से कि चाह के भी इससे खुद को अलग नहीं कर पा रहा हूँ | अभी इसमे नए किरायेदार आये नहीं थे तो आना जाना भी अलाउड था | नेट कनेक्शन भी अभी यहीं पर था तो वैसे भी आते रहते | अपने कमरे में जाकर बड़ा सुकून मिलता है अभी भी | खाली करने के बाद भी कई कई बार उसे देख चुका हूँ, एक एक अलमारी, दराज़ सब कुछ | पर हर बार लगता है कि कुछ रह गया | कुछ घंटों बाद फिर आने का मन करता है | फिर सब टटोलता हूँ, पर कुछ भी नहीं मिलता | फिर उदास बैठ जाता हूँ |  आज नए किरायेदार आ जायेंगे फिर यहाँ आना नहीं होगा |कल सोने से पहले यही सब सोच रहा था, नींद भी काफी देर से आयी और सुबह जल्दी ही टूट गयी | कुछ ४ बजे के आस पास का ही वक्त रहा होगा | थोड़ा उजाला होने दिया और फिर जैसे ही आ पाया यहाँ एक बार और आ गया | 

कुछ चीज़ें वाकई में छूट कर भी नहीं छूट पाती , और वो तो बिलकुल भी नहीं जहाँ से ज़िंदगी को नयी राह मिलती है | जाने-अनजाने कितने लोग जुड़ जाते हैं इन्ही यादों के सहारे | इन सब को छोड़कर जाना बहुत मुश्किल हो जाता है | वैसे गए सालों में घर कई बार बदले | हर बार छोड़ते वक्त थोड़ा उदास होता था, पर तुरंत ही सब सही हो जाता | कारण ये भी था कि मैं उन घरों में जैसा गया था वैसा ही वापस भी हो जाता था | पर इस बार ऐसा नहीं हो रहा | मैं वो नहीं बचा हूँ जो यहाँ आया था, खुद को बहुत बदला हुआ पा रहा हूँ | और शायद यही वो कारण है कि खुद को, उन यादों के बहाने इसी कमरे में ढूँढने चला आता हूँ | 

आज इस घर से वास्ता खत्म हो जायेगा पर...काश!!! कुछ छोड़ पाना आसान होता...
-- देवांशु

21 comments:

  1. क्या वाकई वास्ता ख़त्म हो जायेगा?

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    1. कहते तो सब यहीं है, पर असल में होता कहाँ है पीडी भाई !!!! कोई वास्ता खत्म नहीं होता, कभी नहीं होता !!!

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  2. ओह! मैं दिल्ली के अपने इस कमरे में पाँच साल से रह रही हूँ. इसीलिये नहीं छोड़ा क्योंकि मुझे निर्जीव चीज़ों से भी प्यार हो जाता है. वैसे देखो तो कोई चीज़ निर्जीव नहीं होती क्योंकि उससे हमारी फीलिंग्स जुड़कर उसे जीवंत बना देती हैं. और न ही कोई चीज़ ऐसी होती है, जिससे कभी वास्ता खत्म हो क्योंकि यादें तो कभी नहीं जातीं.

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    1. सही कह रही हो आप, ऐसा हमें लगता है कि वास्ता खत्म हो गया, पर यादें तो हमेशा साथ रहती हैं !!!
      और हाँ वाकई कोई चीज़ निर्जीव नहीं होती, भगवान की मूरत भी तो हम सजीव मानकर पूजते हैं!!!

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  3. कब तक शहरों से, दीवारों से, कमरों से दिल जोड़ते रहोगे यार तुम लोग :):).
    वैसे लिखा ठीक है..इतनी जल्दी टूटता भी नहीं नाता.

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    1. नाता टूटता नहीं, और जब दिल जुड़ जाएँ तो और भी मुश्किल, लोग तो वास्ता खत्म करने को कह देते हैं , कुचल तो दो दिल जाते हैं | शायद इसीलिए शहर, दीवार और कमरे बेहतर हैं | बाकी भगवान का फज़ल है सब :) :) :)

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  4. उस घर से तो हमारी भी यादें जुड़ी हैं। एक बार आये थे जब तुम अमेरिका गये थे। अब तो उस घर से एक ठो पोस्ट और जुड़ गयी। नया घर कहां लिया? उसके बारे में भी लिखा जाये अब !

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    1. नया घर भी पास ही में है, उसमे कुछ हो तो लिखा जाये | अभी तो ढेर सारे अगड़म-बगड़म सामान के बीच जगह बना के सो रहे हैं :)

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    2. पडोस में ही है.. और अब एक मिठाई की दुकान भी खुल गयी है बगल में.. :)

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  5. एक ही ठांव पे ठहरोगे तो थक जाओगे
    धीरे धीरे ही सही राह पे चलते रहिये
    होके मायूस न यूं शाम से ढलते रहिये
    ज़िदगी भोर है सूरज से निकलते रहिये

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    1. वाह अरविन्द जी, बढ़िया पंक्तियाँ !!!!

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  6. आजकल मौसम में एक अजीब सी उदासी फ़ैली हुयी है.. ऊपर से तुम भी सेन्टियाये जा रहे हो.. :)

    याद है तुम्हे इस घर में किस तरीके से लाया गया था। और सबसे ज्यादा आजादी वाली फ़ीलिंग तुम्हारे लिये ही थी। ऊपर से दो और आलसी लोग.. मतलब तीनो में अगर आपस में बेस्ट आलसी का कंपटीशन हो, तो पक्का तीनों तीसरे स्थान पर आयें..
    सच कहूँ तो इस घर में बडे मज़े रहे यार.. अपना भी थोडा और एक्स्प्लोरेशन हुआ.. हम सब शायद जैसे इस घर में आये थे अपने अपने अलग अलग शेड में, जाते वक्त बाकियों का कुछ न कुछ शेड ले गये अपने साथ...
    संकल्प बाबू इसी घर में अपने शेरों के साथ अक्सर पाये जाते थे.. अनूप जी से भी पहली बार यहीं मुलाकात हुयी थी| बडे मजे आये थे और रवि तो हंस-हंसकर पागल हो गया था.. भाभी के हाथों की चाय भी मिली थी और कानपुर आने का इन्विटेशन भी B-)
    सागर साहेब ने यहीं गिटार को ढोलक बनाकर कुछेक गाने भी गाये थे.. और पीडी तो खैर बहुत ही ज्यादा अच्छा गाता है.. आज भी यहाँ की दीवारें अकेले में त्राहि माम, त्राहि माम कहती पायी जाती है..

    और वैसे घर छोडा कहाँ है? चार दिन से तो यहीं पडे हो.. अभी भी मैं उसी घर से कमेंट कर रहे हैं.. मतलब पूरे ब्लॉगर हो चुके हो... कद्दू कटेगा और हल्ला पूरा मचेगा.. :P..
    अब सेंटियाओ मत.. और बाकी सामान पैक किया जाय.. :)

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    1. हाँ मालिक, जिसे रात १० बजे घर के अंदर हो जाना होता हो उसे रात में कभी भी बाहर निकलने का मौका मिल जाए तो अंधे को दो आँखें वाली बात हो गयी , क्यूँ हैं जी !!!

      हाँ ये बात तो है कि हमने एक दूसरे के शेड का कुछ कुछ हिस्सा ग्रहण कर लिया है , मैं ब्लॉग लिखने लगा , तुमने लिखना छोड़ दिया और रवि तो कविता करने लगा :) :). रवि के वन लाइनर्स तो काफी मिस किये जायेंगे !!!!

      बाकी काफी लोगो से मिलना अच्छा लगा , खासकर पीडी से :) अनूप जी से मिलना तो मैं मिस कर गया, अगली बार पक्का मिलेंगे :)

      और रही बात यहाँ ४ दिन से टिके रहने की तो उसका तो ये है कि शुक्र करो कि कोई नया किरायेदार इस घर में नहीं आया वरना अपन तो कब के बाहर ठेल दिए गए होते ( बात ये भी है कि अपने भी पैसे फंसे हैं )

      कुल मिलकर इसे ये कह सकते हैं कि किरायेदार "होकर भी नहीं होना" :) :) :)

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  7. दोस्त....हर वो चीज़ जो हमे बदल दे... उसे छोड़ना मुश्किल होता है....और सच तो ये है की ऐसी चीज़ों में छोड़ने वाला कांसेप्ट ही नहीं होता है.... आज से ऐसा सोचो की अब तक तुम उस घर में रह रहे थे... और आज से वो घर तुममे रहेगा.....वो भी बिना रेंट के ;)

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  8. थोड़ी तकलीफ होना लाजिमी है क्योंकि इंसानी फितरत है, लेकिन इतना मोह!!! वो भी निर्जीव से!! वक़्त है ऊपर उठने का बन्धु, थोड़ी तटस्थता की हीलियम भरो मन में.. :)

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    1. निर्जीवों से मोह करने के अपने अलग पोज़िटिव्स हैं, बस और क्या :)

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    1. कुछ बताइएगा भी कि बस यादै करते रहेंगे :)

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  10. देवांशु भाई, बैंगलोर में मेरे उस कमरे की याद आपने दिला दी...एक और कमरा जो मेरे पुराने क्वार्टर में हुआ करता था(पटना में) वो भी बेतरह याद आता है.....
    फुर्सत हो तो जावेद साहब की ये नज़्म पढियेगा(वैसे आपका शायद पढ़ा हुआ होगा)....मैं तो बड़े आसानी से रिलेट कर लेता हूँ उनकी इस नज़्म से.. - वो कमरा याद आता है

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  11. बेजान घरों को छोड़ना इस कदर मुश्किल है जो उनमें जान होती...? :(

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