Tuesday, July 5, 2011

भीगी तन्हाई…


         ड्राइंग रूम में पड़ी कुर्सी को बालकनी तक वो  खींच के ले आया, हलकी - हलकी बारिश शुरू हो गयी थी..पहाड़ों पे अक्सर शाम को ऐसे ही बारिश होने लगती है…बालकनी की रेलिंग काफी ऊंची नहीं थी..उसके हाथ उस पर आसानी से टिक गए..
         बालकनी से दूर पहाड़ियां दिखती है…दिन में तो लगता है की क्या कोई वहाँ पहुँच भी सकता है? पर रात में जब कोई दूर से  गाड़ी निकलती है तो उसकी रोशनी को देखते ही पता चलता है की इन्सान न जाने कहाँ कहाँ पहुंच गया है…
         एक बहुत बड़ा कैनवास सा  है पहाड़ों का…और उसपे पूनम का चाँद ,जो अभी कुछ दिनों पहले ही बीता है, बीचो बीच में लटका हुआ ऐसा दिखता है मानो किसी चित्रकार ने बड़ी मेहनत से कोई पेंटिंग बनाई है…
IMG_0235
          वो अक्सर गर्मियों में यहाँ आ जाया करता है…शहर से दूर …इस बार थोड़े लंबे ब्रेक पे आया था..किसी से उसे दूर भागना था…साथ में था तो सिर्फ उसका फोन और लैपटॉप, जिससे वो किसी किसी ईमेल का जवाब देता था, कभी फेसबुक भी चेक कर लेता…पर गुमशुदगी में..
          अब उसने पैर रेलिंग पर टिका लिए थे …चाँद अधूरा सा था…बारिश का पानी पैरों पे गिरने लगा था…

“बादलों पे लटके हुए अधूरे चाँद को देखा,

तुम्हारा चेहरा कुछ धुंधला सा है,

एक ज़माना जो गुज़रा अब तुमको देखे हुए…”

        वो वहाँ से उठा, किचन में जाकर एक कप चाय बनाई…लौटते वक्त एक डायरी अपने हाथ में लेकर आ गया…चाय के घूंटों के साथ पन्ने पलटने शुरू किये…नज़र रुकी तो एक फोटो पे ..एक मुस्कुराता हुआ सा चेहरा था उसमे, हाथ को किसी पेड़ की टहनी से लपेट रखा था…आसमानी रंग के कपड़ों में तस्वीर ठीक वैसी ही थी जैसी इस समय पहाड़ियों के बीच हो रही थी…आसमानी बादलों के बीच चमकता चाँद…
       उसने रेलिंग पे पैर रख खुद को एक धीमा सा धक्का दिया…और कुर्सी के साथ खुद भी हलके हलके झूलने लगा…फोटो डायरी के साथ उसके ठीक दिल पे आके ठहरी..उसकी आँखें बंद थीं..होठों पे शायद मुस्कान ही थी…

“दोनों ही लाजवाब हैं, तुम्हारी तस्वीर और मेरा दिल,

एक में तुम हो,पेड़ हैं, मौसम है,

और एक में…बस सिर्फ तुम…”

       कुछ देर पहले एक स्टेटस अपडेट आया था “एन्जोयिंग मैरीड लाइफ..पिक्स विल बी अपलोडेड सून"…तब से उसका दिल टूट सा रहा था…उसे सब पता था पर किसी को भी नहीं बताया था इस बारे में ..बस चला आया था यहाँ…
        कब? कैसे ? किसलिए? सवाल कई थे..जवाब वो जनता था…पर जानना नहीं चाहता था..किसी को बताता भी तो क्या बताता…तभी फोन के घंटी बजी…उसने फोन उठाया..
“हेलो"…
“हाँ यार ठीक हूँ..”….
“हाँ पता है…”
“क्या बताता यार…”
“कल सुबह निकल रहा हूँ…मिलते हैं…”
“नहीं यार..डोंट वरी..आई एम्..फाइन"
“चल ठीक है…थैंक्स फॉर कॉल यार"…
           फोन रख दिया…डायरी और फोटो को संभालते हुए वो उठा…इन्टरनेट कनेक्ट किया.. फेसबुक …उसने अलग अलग पिक्स डाले हुए थे…३-४ दोस्तों ने उसे पहले ही ऑफ लाइन पिंग कर दिया था ...सवाल घूम फिर के एक ही था सबका…
         एक एक करके वो पिक्स देखता गया…एक फोटो पे आके वो रुक गया…कुछ घूरने सा लगा…आंसूं शायद पहली बार ही निकले थे…

कुछ तस्वीरों में सौ आंसूं छुपे हैं,

आज कौन समझेगा इनको,

काश खुद को होता हक तुम्हे भूल जाने का…

       उसने लैपटॉप बंद किया और सोने चला गया…कल फिर उसे कहीं के लिए निकलना था….

-- देवांशु

9 comments:

  1. अच्छा तो आप ऐसा भी लिखते हैं....
    साला यहाँ सभी देवदास हैं...:D
    खैर मज़ाक नहीं, क्या रापचिक लिखा है...बोले तो झक्कास...

    ReplyDelete
  2. जे बात.. शेखू का शुक्रिया, जो उसने आपसे मिलवाया. दोस्त यह मिलना फिर बिछड़ना और फिर से मिल जाना.. दुनिया गोल है..

    फ़िलहाल पोस्ट बढ़िया है, बीच बीच में त्रिवेणी इसको और भी खूबसूरत बना रही है !

    मनोज
    http://www.manojkhatrijaipur.blogspot.com/

    ReplyDelete
  3. Ye saala love type jo cheez hoti h wo aaj tak kisi ki lyf me khushi bhi laayi h ya tension baantne ka hi dhandha h... Sick of readin posts frm heart broken ppl...

    Bt on da writing front... its just lovely to read u :)

    ReplyDelete
  4. कई लोगों के जिंदगी के धूल लगे पन्नों को पलट दिया आपने...कितने ना जाने अपने अतीत में कहाँ तक चले गए होंगे, पता नहीं वहाँ से निकल पाना कितना मुश्किल रहा होगा....

    ReplyDelete
  5. रूमानी पोस्ट...चाँद और पहाड़ों के देश में याद ऐसे ही दबे पांव उतरती है...खो देने का अहसास और उसपर ऐसी प्राकृतिक खूबसूरती...दर्द रात को वाकई गहरा गया होगा.

    ReplyDelete
  6. एकदम आधुनिक सी लगी.. :)

    ReplyDelete
  7. badhiyaa kuchh aise hee rang mere keyboard se bhi guzre hai
    http://sonal-rastogi.blogspot.in/2011/05/facebook.html

    ReplyDelete
  8. जाने क्यूँ आज इस पोस्ट की तरफ चला आया, कुछ तन्हाईयों के रंग में लिपटा अपना भविष्य... खैर, यकीन मानो बेपरवाही से पढ़ते पढ़ते आंसू की दो बूँद टपक आई है... जब ये पोस्ट लिखी गयी थी तब से लेकर आज तक ज़िन्दगी कई करवट बदल चुकी है... शायद इसलिए मेरे पहले कमेन्ट और इस कमेन्ट में कई रंग बदले बदले से लगेंगे तुम्हें.. मोनाली ने सही कहा, ये प्यार हमेशा ऐसा ही कुछ रंग फैला जाता है ज़िन्दगी में... इसके रंगों की बनावट समझते समझते ज़िन्दगी बीत जाती है, और इस रंगीन से प्यार के तोहफे आंसुओं का कोई रंग भी नहीं होता...

    ReplyDelete
  9. मैं यहाँ हर बार लगा अलग मूड में आया हूँ और हर बार ये पोस्ट एकदम नयी सी लगी है.... लिखा करो दोस्त... कब तक पुराना पलट पलट कर पढ़ता रहूँ...

    ReplyDelete