Saturday, July 2, 2011

काश जिंदगी लैपटॉप होती…

                  बड़े दिनों से मेरा लैपटॉप काफी परेशां सा था, न ज़ल्दी स्टार्ट हो पा रहा था, शट डाउन होने में तों सदियाँ लग रही थी | किसी एप्लीकेशन को चलाना तो पूँछिये ही मत…संगीत भी खत्म था (गाने भी नहीं चलते थे)…

                  लक्षण तो बीमारी के थे | जाने माने डॉक्टर को दिखाया गया | कुछ इम्पोर्टेंट डाटा का बैकअप लिया उन्होंने | पूरा सिस्टम फॉर्मेट कर दिया | नया ओपरेटिंग सिस्टम डाला | कुल दो ड्राइव बनाई | सब कुछ बड़े करीने से सजाया | समय लगा कुल २-३ घंटे का | लेकिन अब लैपटॉप एक दम चकाचक चलने लग पड़ा है |

                  कभी - कभी बिस्तर पर लेटने और सोने के बीच में थोडा समय लगता है | उसी बीच कुछ ख्याल आ जाते है | कुछ तो ऐसे ऐसे की पूँछिये ही मत | एक ऐसा ही ख्याल ये आया की गर जिंदगी भी लैपटॉप होती तो?

                 फ़र्ज़ करो … आप जिंदगी से उकता गए हो ..न सोने की इच्छा करती है न जागने की…मन न कुछ खाने का होता है न कुछ सीखने का |

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                 तब कोई ऐसा ही आये और आपकी जिंदगी को फॉर्मेट कर दे | कुछ इम्पोर्टेंट डाटा का ही बैकअप लिया जाये | नया ओपरेटिंग सिस्टम  डाल दे | दिल के दो हिस्से कर दे | एक तन चलाने के लिए और एक जिंदगी…बाकी कुछ भी न रहे वहाँ | कर दे दिमाग के तीन हिस्से | दो दिल जैसे , एक सोंचने के लिए अलग…दिल को सोंचने की क्या ज़रूरत है?

                बाकी सब पुराना “गार्बेज" डाटा मिट जाये ..जैसे की कोई तकरार, अधूरा प्यार या टूटी दोस्ती..|  फिर से मिले तो केवल वही एप्लीकेशन जिससे जिंदगी चलती है…

                सोंचो इसके बाद अगर आप सोकर उठो..तो आप में सारी कमियां खत्म…आप पूरी तरह से नायाब बन चुके हो..जो कुछ अच्छा था वो आपमे वापस…सब कुछ कितना बढ़िया हो जायेगा न???

               पर जिंदगी कोई लैपटॉप तो नहीं…कोई कहीं से नहीं आता…इसे खुद ही फॉर्मेट करना होता है… और वो भी पूरा नहीं होता…कुछ न कुछ छूट ज़रूर जाता है…

                शायद कुछ नया सीखते रहना ही “बेटर आप्शन" है…पुराने पे ध्यान न देना ही उसको भूलना है ….

                अब तक ये सबसे सुनता था…अब कर के देख रहा हूँ…आराम मिल रहा है…कुछ-कुछ नया सीखने की कोशिश जारी है…पर कभी कभी फिर भी ये मन यही कहता है...की काश ये जिंदगी लैपटॉप होती…

 

कोई छेड़ देता जो तार,   सरगम निखर जाती,

देता उड़ा चांदनी का दामन जो , शबनम बिखर जाती|

जिंदगी कुछ इस तरह बोझल है ए बुतनशीं,

तू फिर जिला देता, तो दुनिया संवर जाती||

 

--देवांशु

(फोटो मानस के फेसबुक एल्बम से )

6 comments:

  1. बहुत खूब...
    ये काश भी न...

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  2. Gehri Soch maalik.......V. Nice.

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  3. कल्पना की उड़ान तो बहुत ऊँचे आसमान तक गयी है...वाकई जिंदगी लैपटॉप होती तो कितनी सिम्पल होती. आखिरी चाँद पंक्तियाँ भी खुबसूरत हैं.

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  4. क्या हसीन कल्पना है! जिंदगी भी लैपटाप होती! :)

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