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बुधवार, 22 जुलाई 2015

कुत्ता ढाल और मुन्ह्नोचवा आई गवा !!!


कुत्ता ढाल के बारे में संक्षिप्त वर्णन पहले बताये रहे |  कुत्ता ढाल, जैसे की नाम से लगता है एक कुत्ते से रिलेटेड है | दरसल “साढ़े तिराहे” से जौन ( जो ) सड़क नदी “वार” ( ओर )  जात ( जाती ) है , उसमें से पहला लेफ्ट टर्न १८७७ को जाता है | 

जैसे “गली आगे मुडती है” या “गली उतरती हैं” वैसे ही ये गली इस ढाल से सीधे लुढ़कती है | ढाल है न , इहै खातिर ( इसीलिए) |  ढाल से सटा हुआ एक बिना छज्जे वाला मकान है | इसी मकान में एक कुत्ता रहता था ( बाकी लोग भी रहते थे ) जब हम पांचवी या छठी क्लास में रहे होंगे और सुदर्शन साहब की तरह साइकिल की सवारी करने की कोशिश कर रहे थे | एक थी २० इंची नीले कलर की हीरो जेट हमारे पास |  उसकी इम्पोर्टेंस तो आज की कार से भी ज्यादा है , ऊ अलग बात है |

जब साइकल चलाते हुए इस ढाल से गुजरा जाता तो साइकिल गुज़रने की आवाज़ करती और  कुत्ता महाशय जो हमेशा सर्विलेंस ड्यूटी पर रहते थे , भयंकर गर्ज़ना और चीत्कार करते हुए छत से भागते हुए बाहर गली में आ जाते | उस घर का दरवाज़ा मानव रहित रेलवे क्रासिंग था | कोई कभी कैसे भी आ-जा सकता था | कुत्ता महाशय को कभी आने जाने की कोई दिक्कत नहीं हुई |

इसी परम महाशय “कुत्ता” महाराज की वजह से ही ढाल का नाम कुत्ता ढाल पड़ा |खैर,  इस सबसे इम्पोर्टेन्ट बात कुछ और है | 

बात उस समय की है जब अपन कॉलेज में थे और सेमेस्टर ब्रेक में घर आये हुए थे | गर्मी के दिन थे ( और रात भी ) |  अतिशयोक्ति अलंकार का उपयोग ना करें तो कहा जायेगा की  बिजली आती कम और जाती ज्यादा |  तब शहर में ना तो FM था , ना कंप्यूटर घर घर पहुंचे थे |  गाने, रेडियो कमेन्ट्री , समाचार सबका एक मात्र भरोसेमंद सहारा था हमारा फिलिप्स का ट्रांजिस्टर |  उसी पर विविध भारती, आल इंडिया रेडियो (लखनऊ) और उसके बाद सीधे बीबीसी  लन्दन  सुना जाता | ( अगर आप इससे अपन की ऐज का आईडिया लेने की कोशिश कर रहे हों तो बता दिया जाए ये सब सन २००० लगने के बाद की बात है ) |

जैसा की बताया गर्मी के दिन-रात थे, तो लोग ज्यादातर  अपनी अपनी छतों पर सोते थे |  रात ८ बजे के बाद घना घुप्प  अँधेरा ( सांय सांय करने वाला )| पर छतों पर हर तरफ बोलते लोगों की बातों से महफ़िल जमी रहती |

पर एक रोज़ भूचाल आ गया |

मुन्ह्नोचवा (मुंह नोच लेने वाला विचित्र प्राणी ) के आगमन की खबर पेपर में आ चुकी थी | हालंकि उनके हमार मोहल्ले में पदार्पण की कोई सूचना नहीं थी | पर उसी कुत्ता ढाल वाले मकान में रहने वाले एक शख्श ने एक दिन एलान  किया की कल उनको मुन्ह्नोचवा ने दर्शन दिए और “काट खाईस” (काट खाया)| 

मोहल्ले में हडकंप मच गया |  उस दिन से मुन्ह्नोचवा की कम से कम एक नयी बात ज़रूर पता चलती |

कटिया मास्टर गुड्डू चचा का कहना था की “सबै लोग अपने पास एक एक लट्ठ रखो, जहां आय सार रग्दाय के हौंको ( सब लोग अपने-अपने साथ एक डंडा रखो और जैसे ही उनके बीवी के भाई, मुन्ह्नोचवा जी आयें उनको दौड़ा के मारा जाए ) | 

डंडों के दाम में अचानक से बढ़ोत्तरी देखी गयी | साथ ही सर्वसम्मति से दो लोगों ने ( जिसमें राजाराम और टोका मास्टर दो ही थे ) ये फैसला भी लिया की रात भर बिजली आये ऐसी गुहार शर्मा जी से लगाई जाये | शर्मा जी का ओहदा किसी मंत्री से कम ना था | और कम हो भी क्यूँ भला , उसी रात से लाइट आने लगी | अब इसमें शर्मा जी का कितना रोल था इस पर तो जांच हो सकती है और CBI से नीचे की एजेंसी नहीं चलेगी |

खैर, सिवाय हमारे घर के, पूरे मोहल्ले में छतों पर बल्ब टंग गए | अब चूंकि राजाराम के यहाँ टोका कनेक्शन भी नहीं था और उनका घर हमारे घर से सटा हुआ था , उन्होंने ऑफिस जाते हुए हमारे पिताश्री को रोका और कहा “ निगम जी , अपनेओ छत पर एक बलब लगवाय देओ” ( श्रीमान निगम जी आप अपनी छत पर एक बल्ब लगवा दें )  | पिताश्री ने सरकारी विभाग में काम करने की अपनी सिद्धहस्तता को दर्शाया और मामला शाम तक मुल्तवी कर दिया जो अगली कई सुबहों और फिर कई और शामों के लिए मुल्तवी होता रहा |

अब हर शाम कहीं न कहीं से एक शोर उठता “आई गवा" ( आ गया ) | मोहल्ले भर से लट्ठ पीटने की आवाज़ आती | एक दिन एक खोजी ने बताया “वहिके गलेमा एक डिस्को लाइट जईस कुछ बंधा आय” | ( उसके गले में डिस्को लाइट , मिथुन दा के फिल्म वाली , जैसा कुछ बंधा है ) | साथ में ये भी बताया गया ये यंत्र “सेल" से चलता है | 

इसके बाद लोगों ने “सेल" पर पानी के प्रभाव के कारण लट्ठ के साथ एक बाल्टी पानी रखना भी अनिवार्य कर दिया |

इस बीच “विदेशी ताकतों" के हाथ की न्यूज़ आयी | बताया गया की ये पक्षी रिमोट से चलते हैं और उनका कण्ट्रोल सूनसान इलाके में किसी कार से किया जाता है | सुनने में ये भी आया की इस चक्कर में दो कारें जला दी गयीं |खबर ये भी आई की राज्य की तत्कालीन मुख्मंत्री ने आईआईटी के “टीचरों" की एक टीम बनाई है जो इस पर रिसर्च करेगी | पता नहीं वो टीम बनी की नहीं बनी और अगर बनी तो क्या रिपोर्ट आयी | खैर |

मुन्ह्नोचवा की रेंज बढ़ रही थी | अड़ोस पड़ोस के गावों से भी खबरें आ रही थी |  “वहिके तो भैया चिपटि गवा, जान लैकेहे छोड़िस” ( किसी को पकड़ लिया और तब तक नहीं छोड़ा जब तक मर नहीं गया ) |  दहशत बढ़ने लगी | लोगों ने रात में घरों से निकलना छोड़ दिया |  जाते भी तो ग्रुप में | सिनेमाघरों के रात के शो ठन्डे पड़ गए | शुक्ला मास्टर ने अपने दिव्य ज्ञान का हवाला देते हुए इसे प्रकृति का प्रकोप डिक्लेअर कर दिया |

ये तो ठीक से याद नहीं की इस दहशत की तिलांजलि कैसे हुई पर एक दिन किसी ने बताया की सारे मुन्ह्नोचवा नेपाल चले गए हैं | माहौल शांत होने लगा |

एक बात ये भी हुई की बारिश शुरू हुई और टोका मास्टर गुड्डू चचा का कहना था “अब सेल कैसे चलिहे , ससुरे भाग गए” ( अब बारिश में सेल भीग गए , इसलिए उनकी बीवी के पिताजी अर्थात मुन्ह्नोचवा जी भाग गए ) |
*****
कुछ सालों बाद फिर एक खबर उड़ी थी की ३१ दिसम्बर के दिन जो सोयेगा वो पत्थर का हो जाएगा |
-देवांशु

मंगलवार, 18 जून 2013

इतिहास में डुबकी और बिजली का टोका !!!

१८७७ | साहब ऐसा लगता है जैसे इतिहास का कोई पावरफुल सन-वन है, जैसे ईसई सन में वास्कोडिगामा ने भारत खोजा हो, या महाराणा प्रताप ने किसी ओपची-तोपची को रगदा रगदा के मारा हो | पर डिराओ नहीं | कोई सन नहीं है | ये हमरे मोहल्ले का बड़ा इम्पोर्टेंट घर है | यहाँ हम रहते हैं |

पर अगर आप केवल १८७७ लिखने के बाद मोहल्ला-फोहल्ला का नाम लिख के शहर में चिट्ठी भेज दो तो कोई ज़रूरी नहीं कि वो हमारे ही घर पहुंचे | और वो इसलिए कि ये नम्बर हमारे मोहल्ले में कई घरों का है | दरसल जब प्लोटिंग की गयी थी , उस टाइम एक बहुत बड़े हिस्से का नंबर रखा गया १८७७ | उस हिस्से को आधा खरीदा हमारे परम-पूज्य दादाजी ने |

दादा जी
दादाजी को हमने क्या हमारी माता श्री ने नहीं देखा कभी | पापा की शादी से ५ साल पहले वो इस दुनिया को अलविदा कह गए | इसलिए उनके बारे में कुछ भी लिखने से पहले उनसे माफ़ी , यहाँ जो भी लिख रहे हैं सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है | तो दादाजी हमारे, अंग्रेजों के ज़माने में रजिस्ट्रार क़ानून-गो थे ,  हमारे शहर की तहसील में  | हमारा गाँव शहर से करीब ५० किमी दूर था | जब वो दसवीं में थे , तो फेल हो गए |उनके पिता जी ने उन्हें घर से पूरे सम्मान के साथ निकाल दिया | शहर आकर पहले तहसील में काम शुरू किया | हैण्ड-राइटिंग, खासकर उर्दू की , बहुत ज़बरदस्त थी उनकी , सालों से बंद कोठरी से निकले डायरी के पन्ने इसकी गवाही दे चुके हैं | तो लिखाई के कामों के लिए फेमस हो गए | फिर पढ़ाई भी किये तो बनते बनते एक दिन उसी तहसील में रजिस्ट्रार क़ानून-गो बन गए | हमारी दादी के कथ्य के अनुसार उनकी “तनखा" सन सैंतालीस में ५०० रूपया महीना थी |

ताऊ जी और पापा जी लोगो को उस ज़माने में जेब खर्च के लिए १-२ रुपये डेली मिलते थे | दादाजी ने बच्चन साहब की “लहू में पचहत्तर प्रतिशत हाला" वाली बात चरितार्थ की हुई थी सो शाम को अगर उन्हें आवाज़ लगाकर बुलाते सुना जाता तो , पापा और ताऊ जी चुपचाप लाकर उन्हें तखत पर लिटा देते | उस ज़माने में ना बैंकें थीं , और सरकार के नियम थोड़े कड़े भी थे तो पूरी जिंदगी की कमाई दादा जी ने चांदी के सिक्के में तब्दील करके एक “डेग” में ज़मीन में गाड़कर रख दी थी |

रिटायरमेंट के कुछ दिनों पहले उन्होंने ये प्लाट खरीदा था, १८७७ | तब वो आधा खाली था | तब केवल एक १८७७ था |

कुछ दिनों बाद खबर आयी कि वो सिक्कों वाली डेग चोरी हो गयी | घर की बाकी ज़मा पूंजी बुआ की शादी में लगा दी | ताऊ जी की शादी के लिए आधा प्लाट बेच दिया गया | अब तक बाकी आधे हिस्से के आधे हिस्से में एक “रस्तोगी जी “ ने घर ले लिया था , जो बाद में दशरथ के नाम से जाने गए क्यूंकि उन्ही के सुपुत्र का नाम था “राजाराम" | और जो बाकी का बचा आधा हिस्सा था उसमें दो और प्लाट निकाल दिए गए |

अब उस पूरे बड़े १८७७ के ५ हिस्से हो गए थे | तब तक अंग्रेजों को गए ज़माना गुजर  चुका था और उनके द्वारा छोड़ी गयी मशीनरी में जंग लग चुकी थी लिहाजा पाँचों घरों के मकान नंबर १८७७ हो गए थे |

“कुत्ता ढाल" से उतरने के बाद जो गलियों का आखिरी चौराहा आता है , उसको पार करते ही बाएं हाथ पर पहला घर निगम जी वाला १८७७ है | उससे लगा हुआ राजाराम वाला १८७७ , उसके बाद डेड-एंड | डेड-एंड पर एक गेट है | गेट के उस पार सतीश बाबू की कोठी का हाता | ऐसे तंग महल्ले में एक कोठी भी है |

राजाराम के ठीक सामने का घर शुकला हेड-मास्टर का है | ये उस बड़े प्लाट से अलग है , फिर भी इसका नंबर १८७७ ही है | इसका कारण आजतक नहीं मिला | शुकला हेड-मास्टर हमारे महल्ले के सबसे पढ़े-लिखों में आया करते थे |  रहते वो राजाराम के घर के सामने थे, पर अपने को कम्पेयर राजा दशरथ से करते | यहाँ इनके बारे में बताने का कोई फायदा नहीं है | उनके बारे में तसल्ली से बताया जाएगा कभी |

शुकला हेड-मास्टर से ठीक पहले और हमारे घर के सामने वाला घर है , गुड्डू उर्फ शत्रोहन लाल उर्फ “टोका मास्टर" का |

दादाजी की बात यहाँ बताना इसलिए ज़रूरी था क्यूंकि उन्होंने मोहल्ले के लिए दो काम किये थे | एक, सबसे पहला पक्का मकान बनाया था | दूसरा बिजली के खम्बों के लिए बिजली बिभाग में अर्जी दी थी और बिज़ली सुलभ हुई थी , महल्ले को |  और टोका मास्टर गुड्डू इसलिए ज़रूरी हैं उदधृत किये जाना काहे कि उन्हीं बिजली के खम्बों पर “कटिया-टोका" डालकर उन्होंने महल्ले में अपनी साख बनाई |

गुड्डू जिन्हें हम चाचा कहते थे, गुब्बारे-खिलौने बेचने का काम करते थे | पहले उनका  घर कच्चा बना हुआ था | तब वो गुब्बारे वाले के नाम से जाने जाते थे | फिर जब उनका घर भी पक्का बना और उनके घर का छज्जा ठीक बिजली के खम्बे के पास आकर रुका, उसके बाद से उन्हें “टोका मास्टर" की उपाधि से नवाज़ा गया |

गुड्डू कुल ६ भाई हैं | १ को छोड़ सबकी शादी हो चुकी है |  हैप्पीबड्डे-मुंडन-मड़चटना ये सब उबके यहाँ मासिक क्रियाकर्मों की तरह होते हैं | होली-दिवाली वार्षिक | पर एक काम जो सदियों से नहीं हुआ है वो है “बिजली के बिल का भरा जाना" | पर टोका मास्टर के घर में भीड़ है पर अँधेरा नहीं |  रात में जब लाईट बंद हो जाती है तो अगर उनके घर चोर घुसे तो निकलना तो छोड़िये साहब, आने का रास्ता भूल जाये | और इस बीच अगर किसी ज़मीन पर पड़ी वस्तु से टकरा जाए तो दोनों केस में ही सूता जाए , चाहे बर्तन से टकराए या किसी इंसान से |

खैर, “टोका" डालने की सिध्हस्त्ता के अलावा बिना बिल भरे बिजली जलाने में कोई अगर गुड्डू चाचा का सहायक था तो वो थे बिजली विभाग वाले वर्मा जी | उनके बारे में अफवाह ये थी कि उनकी चार बहुत सुन्दर लड़कियां हैं जिनकी शादी में होने वाले खर्चे के लिए उन्हें गुड्डू जैसे लोगों से मिलने वाले ५-१० रूपये , जो कालान्तर में २०० तक पहुंचे, का मुह ताकना पड़ता | चारों “बहुत सुन्दर" लड़कियों के दर्शन तो कभी नहीं हुए पर वर्मा जी के दर्शन कुछ सालों पहले बंद हो गए , जब वो रिटायर हो गए |

ये गुड्डू चाचा और वर्मा जी के खुले दिल का होने की महानता थी कि महल्ले में बिज़ली लाने की अर्जी का श्रेय लूटने वाले हमारे दादा जी के पोते और  दौड़-भाग-जुगाड़ लगाकर खम्बे लगवाने की वाहवाही लूटने वाले हमारे पापाजी के लड़के , अर्थात हम और हमारे छोटे भ्राता श्री जगहंसाई का पात्र बन गए थे | अकेले जो थे बिजली का बिल जमा करने वाले, पूरे महल्ले में |

राजाराम का कहना था कि टोका डालना तो उनके बाएं हाथ का खेल है | भरी बरसात में नंगे पैर डाल दें | करंट का ट तो दूर की बात है , क भी नहीं लग सकता | पर ना कभी गुड्डू चाचा ने उन्हें छत पर जाने दिया ना कभी हमें उसे दिव्य क्षण के दर्शन हुए |

वर्मा जी के रिटायर होते ही जो लौंडा आया ड्यूटी पर, गुड्डू चाचा की पहले दिन ही उनसे अनबन हो गयी | उन दिनों अन्ना-हजारे का आन्दोलन ज़ोरों पर था | टीवी पर लाइव आ रहा था | पर “ससुरे नए लौंडे" ने गुड्डू चाचा के घर का टोका कनेक्शन काट दिया और तार अपने कब्ज़े में कर लिया | चाचा घर से बाहर आ गए | पहले लौंडे का “सिस्टर-मदर डे” मनाया | अब चाचा की गालियों पर बुढ़ापा साफ़ झलकने लगा था | निहायत ही प्रेडिक्टेबल और पुरानेपन की झुर्रियों से लैस | लड़का नया खून था,  नए जोश से भरा हुआ | चाचा की एक ना चली |तार कब्ज़े में करके चल दिया | चाचा ने चाची को आदेश दिया “आइति है अबहीं” | कहके चप्पल चढ़ाई और लड़के के पीछे पीछे चल दिए |

थोड़ी देर में चाचा हाथ में तार मय मुंह में पान भरे वापस आये | चेहरे पर विजयी मुस्कान थी |  घर के ठीक नीचे चौराहे पर शुकला हेड मास्टर और राजाराम खड़े थे | सबसे पहले चाचा ने नाली में लाल मसौदा इन और काला मसौदा आउट किया “पच्च" की आवाज़ के साथ | फिर हेड-मास्टर साहब से आसीस लिया और राजाराम को छेड़ते हुए बोले “टोका डलिहो राजाराम" | “डाल तो हम देबे करी, इमा कोई गणित थोड़े है"  राजाराम बोले | चाचा ने आँख से इशारा किया “भक्क"  और बोले “ससुरा लड़का तार लिहे चला गवा , हम कहेन काहे ५० रुपिया केर तार खरीदी , दुई की चाय पिलावा ससुरेक , ५ केर एक पान , १० धरेन वहिकी जेब मा | १७ रुपियम काम बनिगा” | हेड-मास्टर साहब ने कहा “अउर का गुड्डू, लच्छमी जी ऐसे थोड़े ना जुड़ती हैं “ |

चाचा फलांगते हुए छत पर पहुंचे और कनेक्शन जोड़ दिया | अंदर टीवी फुल वोल्यूम पर चिल्लाया : “अन्ना ने अनशन खतम करने से मना किया” |

नीली छतरी के उस पार बैठे दादाजी की भी आँखों में आंसू आ गए होंगे !!!!!
                                                                                                                                                 --देवांशु

हमार महल्ला !!!

सर्दियों की बारिश मोहल्ले के लफड़ेबाज लड़कों की तरह होती है, एकदम कटकटुआ | बात पिछली सर्दियों की है , मारे बारिश के पूरी सड़क चहले ( कीचड़ ) से भरी थी | घर की गली से निकलने के बाद मैन-सड़क पर आते ही एक साढ़े-तिराहा पड़ता है | साढ़े तिराहा इसलिए क्यूंकि तीन सड़कें और एक गलियां एक जगह पर मिल जाती हैं | फिर भी चौराहा बोल देते पर दरसल गली “मीटिंग-पॉइंट" से करीब साढ़े चार फुट हट के है , इसलिए साढ़े तिराहा | इन साढ़े चार फुट का भी अपना “भौकाल" है | कहते हैं इन साढ़े-चार फुट में जिसने अपना ठेला ( चाट, पकौड़ी, समोसे, टिक्की इत्यादि का ) लगाया वो जल्दी ही पक्की दुकान का मालिक बन गया | धकम-पेल मची रहती है ठेला लगाने की यहाँ पर |

खैर, मुद्दा ये नहीं है | साढ़े-तिराहे के दो कोने भगवान जी के मंदिरों से सुसज्जित हैं | एक तरफ भोले बाबा पीपल के पेड़ के नीचे बैठे हैं तो दूसरी तरफ, पूरी भगवान मंडली है :  राम जी, सीता जी , हनुमान जी , लक्ष्मण जी , दुर्गाजी, भोले बाबा आदि  | दूसरे वाले मंदिर को थोड़ा एक्सटेंशन देकर धर्मशाला का भी जुगाड़ कर लिया गया है |

लेकिन मुद्दा ये भी नहीं है | मुद्दा ये है कि मैं वहीं कोने पर आँख बंद किये भगवान जी के सामने खड़ा हूँ | तभी कानों में आवाज़ पड़ती है “अऊर चटपटे , का हाल” |

चटपटे
बंगाल में लोगों के दो नाम होते हैं , डाक नाम ( मतलब जो डाक यानी चिट्ठी-पत्री के लिए यूज होता है, दूसरा भालो नाम, जो भलाई में लिया जाता है ) | हमारे महल्ले में लोगो के तीन नाम होते हैं : एक घर का ( भालो), एक इस्कूल का ( डाक) और एक मोहल्ले का ( असली नाम) |

घर का नाम छोटे, इस्कूल का घनश्याम | ५ साल की उम्र से आजतक वही, हल्का गुलाबी कुरता, सफ़ेद पायजामा लगाये घनश्याम बाबू को सड़क पर ( वही साढ़े-तिराहे की तीसरी सड़क जो ढाल बनके नदी तक जाती है ) पानी के “बशाते"  की दुकान लगाते देखा है | कुबिरिया टेम ( शाम का समय ) तवा टनटनाते घनश्याम ठेला लगाकर खड़े हो जाते हैं | रेसेशन का असर उनके “बशातों" पर नहीं पड़ा है | ५ ही देते हैं , बस पहले १ रूपये के देते थे, अब १० रुपयों के देते हैं | पर असली मजा तो उनके आलूओं में हैं , तीखे-मसालेदार एकदम चटपटे | इसी से उनका मोहल्ले का नाम है “चटपटे"  |

तो ठीक उस समय जब हम आँखें बंद कर भगवान जी से गुफ्तगू कर रहे थे, तब घनश्याम अपने बगल में थैला खोंसे बाजार जा रहे थे | उन्होंने इतनी ज़हमत भी नहीं उठायी कि देखें किसने पूछा है बस बोल दिए “सब ठीक, तुम सुनाओ" | और बिना कुछ सुने आगे बढ़ लिए | हमने आँखें खोली और घूम के देखा तो एक जानी पहचानी सी सूरत सामने खड़ी थी |  वो हमें नहीं पहचान पाए, पर हम पहचान गए | पर इससे पहले की हम पूछे कुछ भी , आधे जागे और पूरी तरह सोये दुकानदार ( जिनकी दुकान का नाम है “चेतनदास जनरल स्टोर”)   ने उनसे पूछ लिया “केक्के, अबे हियाँ” |

केक्के
घर का नाम “मोनू” , इस्कूल का “कृष्णकांत" , महल्ले का “केक्के" | हमारे बचपन के परम-मित्र | जब हमने पढ़ना शुरू किया था तब वो “बड़े इस्कूल मा जात रहे” | बड़े इस्कूल मतलब कक्षा ५ के पार | पर दोस्त पक्के |

हमारे घर का आँगन इतना बड़ा था के उसमे दो डेढ़-डेढ़ फुटिए  ( हम और हमारे छोटे भ्राता श्री ) क्रिकेट खेल लें, वो भी दो स्टंप लगाकर | आँगन पुराने ज़माने का ज़बर बना हुआ | करीब बीस फुट लंबा | लम्बाई के एक छोर पर “रसोई" और दूसरे छोर पर “गुसलखना” | मैदान के दो एंड थे , “किचेन एंड" से बालिंग और “गुसलखाना एंड" से बैटिंग | शाट मारने के बाद रन बनाने में दो चार कदम तो चलने ही पड़ते | पर “केक्के" शाट भी पिच के बीच से मारते और खड़े खड़े दोनों तरफ की क्रीज़ पर बैट रख कर ७-८ रन हर बाल पर पेल देते |

केक्के का और हमारा साथ बारहवीं क्लास तक रहा जो हम दोनों ने साथ पास की | उसके बाद “वै अपनी दुकान पर बैठे लगे"|

केक्के साहब दूसरे मोहल्ले में शिफ्ट हो गए थे | पर कभी कभी आते रहते | उस दिन भी वो घूमते हुए वहाँ आ गए थे | दुकानदार को उन्होंने जवाब दिया “मजे में , तुम भौंको का हाल” | इससे पहले की उनकी बात आगे बढ़ती हम बोले “अरे मोनू” |अब मोनू पहिचान गए हमें “अरे भईया तुम, कब आये ??” | और हमारे बिना बुलाये हमारे घर चल दिए | रास्ते में बहुत सारी बातें पूछ डाली उन्होंने | कब-कहाँ-कैसे-क्यूँ आये से लेकर कब जाओगे तक, सारे सवाल | सड़क से घर जाने की जो गली है, वो भी उतरती है , वो “कुत्ता ढाल” है | वहाँ से उतर रहे थे तो हमारे बचपन के एक और दोस्त भिंटा गए “गुड्डू" |

गुड्डू
इस नाम के कैरेक्टर हर जगह पाए जाते हैं | हमारे महल्ले में दो थे | एक पटवा के तीसरे लरिका , नाम -शत्रोहन लाल पटवा ( इस्कूल) , गुड्डू ( घर ), टोका मास्टर (महल्ला) , उनकी कहानी फिर कभी | हमको और केक्के को मिलने वाले गुड्डू दूसरे वाले थे |

इस्कूल का नाम “अजीत" , घर का “गुड्डू" और महल्ले का “महरिन के गुड्डू” | गुड्डू बचपन में चित्रहार थे | वो अपने माता-पिता के साथ , हमारे घर के डायगोनोली  अपोजिट घर में एक कमरे के किराये के मकान में रहते | रात में हमारे घर के चबूतरे में सो जाते | सोने से पहले  वो  दिन भर के सुने हुए सारे गानों को रिपीट करते | “कल कालेज बंद हो जाएगा तुम अपने घर को जाओगे" से लेकर “नफरत की दुनिया को छोड़कर प्यार की दुनिया में" सारे गाने गा डालते | जब कोई निकलता बाहर कुत्तों को खाना डालने के लिए,  तो उन्हें हड़का भी दिया करता  “सोय जाओ गुड्डू, कल सुनाय लियो चित्रहार" | अक्सर ये काम हमारी माता-श्री करती थीं |

गुड्डू आजकल रिक्शा चलाते हैं | उन्होंने हमको और केक्के को आते देख लिया | रिक्शा रोक कर बतियाने लगे |  पता चला कि महल्ले की सबसे फेमस हंस्ती “राजाराम” आज कुछ सामान खरीद कर लाये हैं अपने बड़े लड़के की शादी के लिए |

राजाराम 
ये महल्ले के अपवाद हैं काहे की इनका एक ही नाम है “राजाराम" | हर उम्र का इंसान , जो बोल सकता है , इनको इसी नाम से बुलाता है | इसीलिए ये “लादालाम” से लेकर “ससुरा राजाराम" तक कहलाये जाते हैं | “दुई पैडल मारिके घोड़ा चलाने” से लेकर  अपने घर की गिरी दीवार जोड़ना हो , या महंगी से महंगी शर्ट सिलने से लेकर बारात का खाना बनाना हो, उनसे बेहतर कोई कर नहीं सकता | हाँ चटपटे के आलू से वो हार मानते हैं | उनके द्वारा किया गया हर काम गारंटी के साथ ४-५ दिन तक लोगो को हँसा हँसाकर , खून बढ़ाता रहता है |

तो गुड्डू अपने रिक्शा पर राजाराम के बड़े लड़के की शादी का सामान खरीदवाकर वापस जा रहे थे | केक्के बोले “हमहूँ चलित है” | और जाते जाते हमें आर्डर दे गए कि अंटी याने की हमारी माताश्री को नमस्ते कह दिया जाए उनकी तरफ से और वो फिर आयेंगे |
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हम उन सबसे बिदा लेकर घर पहुंचे तो नीचे से ही फोन कर दिए की दरवाज़ा खोल दो | करीब १५ साल पहले हम लोग फर्स्ट फ्लोर पर शिफ्ट हो गए थे | हम दरवाजे पर खड़े थे तभी पीछे रहने वाले मास्टर  साहब निकले और हमसे बोले “भईया सब लोग ऊपर रहत हैं , घंटी बजाय देओ |”

मास्टर साहब  कोई अजनबी ही समझे थे मुझे | तब पता चला मेरा महल्ला , मुझे भूल चुका है | १२ साल से ज्यादा का वक्त वहाँ से बाहर बीत चुका है, पहले पढ़ाई फिर नौकरी के चलते | कभी गए भी तो दो-तीन दिन के लिए | किसी से मिलने, बात करने का भी टाइम नहीं रहता |

खैर, जब हम ऊपर पहुंचे तो राजाराम के लड़के की शादी के किस्से चल रहे थे और हमेशा की तरह लोगो हँस-हँसके बुरा हाल था |

आगे फिर कभी !!!!

*****
P.S. :  आज सुबह ना जाने कहाँ से “लपूझन्ना" का लिंक मिल गया, पूरे दिन बस वहीं पर पड़े पढ़ते रहे | एक दिन में पहली बार कोई ब्लॉग पूरा चाट डाला | कतई कतल जगह है लपूझन्ना, मूड एकदम हरा हो गया  है | रात का खाना खाते-खाते पंकज बाबू से बतियाते हुए ऊपर दिए कैरेक्टर्स की याद आ गयी , तो सोचा हमारा महल्ला क्यूँ पीछे रह जाए | बस ये सब ठेल दिए | देखा जायेगा जो होगा अब | फिर मिलेंगे टाटा !!!
--देवांशु
(लपूझन्ना से पूरी तरह इंस्पायर्ड)
(कहीं-कहीं पर कुछ जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल किया है, अगर किसी को बुरा लग जाए तो माफी एडवांस में मांग लेते हैं पर मंशा किसी को बुरा लगाने की नहीं है )