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सोमवार, 1 जुलाई 2019

नाम में कुछ तो रखा है !!! ( इश्क वाली कहानी भाग -२ )

कहने को तो बड़े लोग कह गए हैं की नाम में कुछ रखा नहीं , पर नाम जाने बिना काम चलता भी कहाँ है | जैसे चेहरा पहचानने से ज़्यादा अंतर भेदने के काम आता है, कुछ कुछ वैसा ही नाम के साथ है | नाम ऐसी बला है जो है तो आपकी पर उसका उपयोग सबसे ज्यादा दूसरे करते हैं , जैसे रिक्शेवाले का रिक्शा हो : होता रिक्शेवाले का है पर बैठते और लोग ही हैं |

इसलिए नाम की महिमा अपरम्पार न भी हो तो अपार तो है ही...

तो , अब तक की कहानी में ( मने भूमिका की भी भूमिका में ) आपने जाना कालोनी , घर और हमारे अब तक के तीन पात्रों के बारे में | अब चूँकि ये तीनों काफी दूर तक जायेंगे तो इनके नाम भी पता होने ज़रूरी हैं | चीज़ों का आईडिया रहेगा |

नायकों को नाम देना उतना ही मुश्किल काम है मेरे लिए जितना कोई एक कहानी कह पाना | इसलिए नाम अप्रसांगिक लगें तो गलती मेरी होगी |

ये कहना मुश्किल है की तीनों में कहानी का मुख्य पात्र कौन सा है इसलिए परिचय एक बार फिर कालोनी के भूगोल के आधार पर कराने की कोशिश कर रहा हूँ |

दो दोस्तों के घर की दीवारें कॉमन नहीं हैं पर कोने कॉमन हैं | उसमे से एक का नाम शिव और एक का नाम शेखर  है |शेखर  को घर में शेखू  भी कहते हैं | शिव के पिताजी शहर के नामचीन दवाइयों के सप्लयार हैं | शेखर  का अपना घरेलू व्यापार है, घरों के रख रखाव के सामान का | तीसरे दोस्त रवि का घर भौगोलिक रूप से डिस्कनेक्टेड है बाकी दोनों से | शिव और रवि की गली एक है पर घर डायगोनली अपोजिट | रवि के बगल वाला घर शिव के घर के ठीक सामने है और अभी तक "तालायमान" है |

शेखू छत फांद कर अक्सर शिव के घर आ जाता है और चूँकि शिव की पढाई का कमरा ऊपर ही है , इसलिए अक्सर वहीँ पाया जाता है | शेखू  का पढ़ाई से नाता बहुत दूर के फूफा के पड़ोसी जैसा है | शिव को पढाई में इंटरेस्ट है या नहीं, इस पर विद्वानों में मतभेद है , क्यूंकि वो उनके साथ भी रहता है जिनको पढाई में इंटरेस्ट है ( जैसे रवि) और उनके साथ भी , जिनको इससे कुछ लेना देना नहीं है ( जैसे अपना शेखू ) | शिव अपने  ऊपर डॉक्टर या इंजिनियर बनने  का सामाजिक दबाव महसूस करता है , और चूंकि अब वो  नौवीं में आ गया  हैं इसलिए अत्यधित ऊंचाई ज्यादा दबाव डाल  रही है |

बात जहाँ तक रवि  की है , तो उसका मामला क्लियर है , उसे न डॉक्टर बनना है और ना इंजिनियर , क्यूंकि पिताजी डॉक्टर  हैं और माँ इंजिनियर रह  चुकी  हैं | वो आर्मी में जाना  चाहता है , पढ़ने का शौक है उसे |

कहानी पढ़ाई पर आकर अटक गयी , इसलिये थोड़ा भटका जाए |

शिव के मामा , जो कहीं बाहर सेटल हो गए हैं , गर्मियों की छुट्टियों में  उसके लिए वीडियो गेम लेकर आये , पर उस पर एकक्षत्र  साम्राज्य शेखू का है , खासकर मारिओ  और डकहंट  पर उसका हाथ काफी साफ है |  रवि को टैंक और टेनिस पसंद है | शिव मोरल सपोर्ट देने में विश्वास रखता है |

तीनों अपने घरवालों की नज़रों में शिव के कमरे में मिलते हैं और पढ़ते हैं , बाकी का आईडिया आप लोगों को लग गया होगा | इसके आलावा  तीनों  के मिलने की एक और ख़ुफ़िया जगह है |  और इस जगह पर मिलकर बैठने की ज़रुरत उसी लिए है जो नौवीं के लड़कों को अक्सर होती है |

अरे भावनाओं में बहकर आप भी ना जाने क्या क्या सोचने लगे | अरे लड़कों ने केवल दो कामों के लिए वो ख़ुफ़िया जगह बनायी है , एक तो पेपर में आने वाले साप्ताहिक "रंगायन" के इम्पोर्टेन्ट नोट्स इकट्ठे कर लें ( "रंगायन" का आईडिया आपको अगर नहीं है तो बता दूँ वो महिला सशक्तिकरण वाला अखबार है जिसमें  फोटो और कंटेंट दोनों में प्राथमिकता महिलाओं को दी जाती है ) | दूसरा काम है , बिजली के तारों और बल्बों से खुराफात | इसी ख़ुफ़िया जगह पर ही पिछली दीवाली तीनों को शानदार आईडिया आया था की क्यों ना पूरी कालोनी  की झालरों को आपस में जोड़कर ऐसे सिंक किया जाए की सारे झालरें एक साथ जलें  और बुझें | टेस्टिंग  भी इसी जगह की गयी | बस हाँ, पूरी कालोनी ने दिवाली दिए जलाकर मनाई , वो बात अलग है | मामला एको -फ्रेंडली  रहा |  तीनों के घरों के फ्यूज़ बल्ब यहाँ पाए जा सकते हैं जिनको दुबारा जलाकर थॉमस अल्वा एडिसन की आत्मा को ठंडक पहुंचाई जाती है और असफल होने पर , रंग बिरंगा पानी भरकर बल्बों को लटका दिया जाता है |

खैर , अब आते हैं की ये ख़ुफ़िया जगह है कहाँ | तो ये जगह है शिव के घर के ठीक सामने वाले "तालायमान" घर में | जिसकी छत रवि की छत से मिलती है और वहां पहुँचने का जरिया भी वही छत है | बिजली  का कनेक्शन भी तार के ज़रिये रवि के घर से पहुँचाया गया है |

इस जगह के खोजे जाने की भी एक छोटी सी कहानी है |  दरसल एक बार रवि और शिव ने मिलकर शेखू को चैलेन्ज दिया था की इस घर में घुसकर दिखाओ , रात में १२ बजे | शेखू जय बजरंगबली करता घुस गया, छत के रास्ते  | पीछे बाकी दोनों भी पहुँच गए | एक कमरा जो थोड़ा अलग सा पड़ता था , और  जिसकी खिड़की से केवल शिव की खिड़की दिखती थी, वो तीनो को पसंद आ गया , नाम दिया गया "प्रयोगशाला"   | बाकी जुगाड़ भी सेट कर लिए गए |

वर्तमान में ,  कमरे की दीवारों पर "रंगायन" के नोट्स चस्पा हैं | चित्रों को प्राथमिकता दी गयी है और सिर्फ उन्हीं से कमरा सुसज्जित है | लाखों के दिलों की धड़कन , "ममता कुलकर्णी" का एक बड़ा चित्र है | जिसे बीचों बीच जगह मिली है | बाकी दीवारों  पर या तो तार हैं या बल्ब |

तीनों खाना खाने के बाद अक्सर यहाँ मिलते हैं | क्यूंकि इस टाइम तीनों , ऑफिशियली पढ़ने की समय सीमा से बाहर  होते हैं |

*****
आज सुबह एक आदमी बहुत सारा पेंट और बाकी सामान खरीदने शेखू की दूकान पर आया , शेखू वहीँ था और पता कन्फर्म किया तो  रवि के घर के सामने वाला घर निकला है | कल  से काम शुरू होना है , कोई एक फैमिली शिफ्ट होने जा रही है | तीन लोग हैं , हस्बैंड - वाइफ और एक "लड़की" | कल वो लोग भी घर देखने आ  रहे हैं | 

शेखु का दिल लड़की सुनकर उछला तो है | पर "प्रयोगशाला" की सफाई ज्यादा ज़रूरी है | बेज्जती ख़राब होने का डर  है | 

दोपहर में ही रवि और शिव को इत्तिला कर दी गयी |  शाम को सफाई के लिए के लिए और प्रयोगशाला को अंतिम विदाई देने के लिए इकठ्ठा हुआ गया |  उस  वक़्त ना किसी को आना था , ना किसी को जाना | पर पता नहीं किस बात की हड़बड़ी मचाई गयी | सारे तार रवि के घर में , बल्ब उसी घर की छत पर फेंक दिए | नोट्स नोचकर पिछली  गली में फेंके गए | सारी  दीवारें साफ़ करके जब सेना रवि के  घर में राहत की सांस ले ही  थी , की तभी कॉमन ख़याल आया की ममता कुलकर्णी तो वहीँ रह गयीं |  अब लाइट बची नहीं थी नहीं तो अँधेरे में टटोलते टटोलते , ममता कुलकर्णी को भी उतारा गया और वापस कमरे में पहुँच कर रियलाइज़ हुआ की उनके कुछ विशेष "हिस्से" वहीँ कमरे में रह गए | पर अब वापस जाना किसी को ज़रूरी नहीं लगा | 

****

तीनों वापस छत  पर आ बैठे |  
शेखू  बोला " हो ना हो यहाँ अपने शिव की सेटिंग हो जाएगी " | 
"कैसे" आवाज़ में अजब सी असहिष्णुता थी और आवाज़ रवि की थी | 
"अबे मेरा अंदाज़ा है " शेखू बोले | 
"देखते हैं" रवि की आवाज़ में इसबार थोड़ी आह थी | 


ये हाल तब था , जबकि कड़की "है" के आलावा और कुछ पता भी नहीं था | उस घर के दरवाज़े पर लटके कुए ताले पर प्रेशर बहुत ज्यादा ही बढ़ चुका था | 

शेखू ने "किस" शब्द पर जोर देते हुए ये गाना गाया और शिव ब्लश करने लगा... 





मंगलवार, 20 मार्च 2018

तो कहानी शुरू होती है.... ( इश्क वाली कहानी भाग -१ )

शहर बहुत आसान सा था । आमतौर पर शहर आसान ही होते हैं , मुश्किल तो रहने वाले लोग उसे बना देते हैं । पर इस शहर के लोग आसान से ही थे , तो शहर भी आसान सा हो पड़ा था । शहर में एक कॉलोनी थी , मोहल्ले जैसी नहीं । बेफ़िक्री थोड़ी कम थी लोगों में इसलिए मोहल्ला नहीं था । मोहल्ले में बेफ़िक्री कुछ ज़्यादा हो जाती है । यहाँ नहीं थी ।

कॉलोनी में घरों के डिज़ाइन एक जैसे ही थे , एक सिमिट्री थी । जैसे घरों के दरवाज़े आमने सामने , मिली हुई छतें । कमरे , उनकी खिड़कियाँ एक दूसरे को देखती हुईं । कालोनी ज़्यादा पुरानी नहीं तो लोग कम थे । टाइम भी कम ही हुआ था तो लोगों ने मॉडिफ़िकेशन कम कराए थे । काफ़ी सारे घर अभी भी ख़ाली पड़े थे । घरों में ताले थे , जो मकानमालिकों या किराएदारों के इंतज़ार में थे और इंतज़ार करने के विश्वकीर्तिमानों को ध्वस्त करने की फ़िराक़ में थे । 

ज़माना भी 90 के दशक का शुरुआती दौर था ,  तो इंटर्नेट पढ़ी जाने वाली मैगज़ीन में पाया जाता था । एफ़॰एम॰ का दौर भी अभी नहीं आया था । कुछ घरों में ही केबल कनेक्शन था और आम राय ये थी कि पढ़ने लिखने वाले बच्चों के घर में केबल टीवी नहीं होनी चाहिए ,  पढ़ाई ख़राब हो जाती है । ज़्यादातर घरों में सहारा सिर्फ़ दूरदर्शन का था । रेडियो पर मीडीयम वेव और शॉर्ट वेव का रुतबा था ।

हाँ , विडीओ गेम ने दस्तक दे दी थी । पर उसका असर गली में  क्रिकेट खेलने वालों पर कम हुआ था । कह सकते हैं वो सारा कुछ था जो उस बचपन की निशानी था , जो घर के अंदर और बाहर बराबर बीता करता था । रहने वाले परिवारों में हर उम्र के बच्चे थे , कुछ बचपन में थे , कुछ जवान , कुछ जवानी की दहलीज़ पर जो ना बच्चों में गिने जाते और ना बड़ों में । ऐसे ही तीन नमूने इस कहानी के मुख्य बालक / पुरुष पात्र हैं ।

पढ़ाई लिखाई वैसे तो अपने यहाँ काम मानी नहीं जाती बल्कि उसे ज़िंदगी जीने के बाद दूसरे नम्बर का धर्म माना जाता है ।इन तीनों का भी मुख्य काम यही  था , ऐसा विचार उनके पैरेंट्स का तो था ही कम से कम ।बाक़ी कॉलोनी वालों के विचार इतर  थे जो बेवजह नहीं थे । कारणों की चर्चा आएगी बाद में । फ़िलहाल पात्रों  पर आते हैं । तीनों में ऐसा कुछ नहीं की नोटिस किया जाए पर हरकतें ऐसी की इग्नोर भी नहीं कर सकते । चेहरे से अगर नूर नहीं बरसता तो हैवानियत भी नहीं टपकती थी । दोस्त तीनों इतने गहरे की काफ़ी का दाग़ उतना गहरा ना हो ।

बंद घरों में भूत होने की कहानियाँ बनाने-सुनाने की उम्र पार हो गयी थी । फ़िल्मी गानों को सुनकर तीनों को लगता था कि कन्या नामक एंटिटी का जीवन में प्रवेश ज़रूरी है पर ऐसा कुछ हो नहीं पा रहा था । अव्वल तीनों ब्वायज़ स्कूल में पढ़ते , दूसरा कॉलोनी  के अवेलेबल संसाधन इन्हें घर की मुर्ग़ी दाल बराबर लगते थे, तीसरा इन उपलब्ध पॉसिबल प्रॉस्पेक्ट में से काफ़ी ने इन्हें राखी के बंधन में बाँध लिया था । साथ ही दूसरे मोहल्ले और कॉलोनी के लड़कों से इनकी सुरक्षा का अनकहा ज़िम्मा भी इनके मज़बूत कंधों पर दे दिया गया था या इन्होंने ले रखा था । अब चूँकि इस तरह के ज़िम्मेदार अन्य मोहल्ले और कॉलोनी में भी  थे इसलिए और कहीं जहाँ भी इन्होंने दाल का कुकर चढ़ाया कोई ना  कोई सीटी निकाल भागा । 

दिल दुखता पर टूटता नहीं । किसी रोज़ विविध भारती पर गुलज़ार का गाना सुन लिया था , बस उस दिन से तीनो छत पर शाम को अक्सर यही गुनगुनाते पाए जाते :



सारी उम्मीद उन लटकते तालों पर थी अब ....


( दास्ताँ शुरू होना बाक़ी है ... )

— देवांशु 

बुधवार, 22 जुलाई 2015

कुत्ता ढाल और मुन्ह्नोचवा आई गवा !!!


कुत्ता ढाल के बारे में संक्षिप्त वर्णन पहले बताये रहे |  कुत्ता ढाल, जैसे की नाम से लगता है एक कुत्ते से रिलेटेड है | दरसल “साढ़े तिराहे” से जौन ( जो ) सड़क नदी “वार” ( ओर )  जात ( जाती ) है , उसमें से पहला लेफ्ट टर्न १८७७ को जाता है | 

जैसे “गली आगे मुडती है” या “गली उतरती हैं” वैसे ही ये गली इस ढाल से सीधे लुढ़कती है | ढाल है न , इहै खातिर ( इसीलिए) |  ढाल से सटा हुआ एक बिना छज्जे वाला मकान है | इसी मकान में एक कुत्ता रहता था ( बाकी लोग भी रहते थे ) जब हम पांचवी या छठी क्लास में रहे होंगे और सुदर्शन साहब की तरह साइकिल की सवारी करने की कोशिश कर रहे थे | एक थी २० इंची नीले कलर की हीरो जेट हमारे पास |  उसकी इम्पोर्टेंस तो आज की कार से भी ज्यादा है , ऊ अलग बात है |

जब साइकल चलाते हुए इस ढाल से गुजरा जाता तो साइकिल गुज़रने की आवाज़ करती और  कुत्ता महाशय जो हमेशा सर्विलेंस ड्यूटी पर रहते थे , भयंकर गर्ज़ना और चीत्कार करते हुए छत से भागते हुए बाहर गली में आ जाते | उस घर का दरवाज़ा मानव रहित रेलवे क्रासिंग था | कोई कभी कैसे भी आ-जा सकता था | कुत्ता महाशय को कभी आने जाने की कोई दिक्कत नहीं हुई |

इसी परम महाशय “कुत्ता” महाराज की वजह से ही ढाल का नाम कुत्ता ढाल पड़ा |खैर,  इस सबसे इम्पोर्टेन्ट बात कुछ और है | 

बात उस समय की है जब अपन कॉलेज में थे और सेमेस्टर ब्रेक में घर आये हुए थे | गर्मी के दिन थे ( और रात भी ) |  अतिशयोक्ति अलंकार का उपयोग ना करें तो कहा जायेगा की  बिजली आती कम और जाती ज्यादा |  तब शहर में ना तो FM था , ना कंप्यूटर घर घर पहुंचे थे |  गाने, रेडियो कमेन्ट्री , समाचार सबका एक मात्र भरोसेमंद सहारा था हमारा फिलिप्स का ट्रांजिस्टर |  उसी पर विविध भारती, आल इंडिया रेडियो (लखनऊ) और उसके बाद सीधे बीबीसी  लन्दन  सुना जाता | ( अगर आप इससे अपन की ऐज का आईडिया लेने की कोशिश कर रहे हों तो बता दिया जाए ये सब सन २००० लगने के बाद की बात है ) |

जैसा की बताया गर्मी के दिन-रात थे, तो लोग ज्यादातर  अपनी अपनी छतों पर सोते थे |  रात ८ बजे के बाद घना घुप्प  अँधेरा ( सांय सांय करने वाला )| पर छतों पर हर तरफ बोलते लोगों की बातों से महफ़िल जमी रहती |

पर एक रोज़ भूचाल आ गया |

मुन्ह्नोचवा (मुंह नोच लेने वाला विचित्र प्राणी ) के आगमन की खबर पेपर में आ चुकी थी | हालंकि उनके हमार मोहल्ले में पदार्पण की कोई सूचना नहीं थी | पर उसी कुत्ता ढाल वाले मकान में रहने वाले एक शख्श ने एक दिन एलान  किया की कल उनको मुन्ह्नोचवा ने दर्शन दिए और “काट खाईस” (काट खाया)| 

मोहल्ले में हडकंप मच गया |  उस दिन से मुन्ह्नोचवा की कम से कम एक नयी बात ज़रूर पता चलती |

कटिया मास्टर गुड्डू चचा का कहना था की “सबै लोग अपने पास एक एक लट्ठ रखो, जहां आय सार रग्दाय के हौंको ( सब लोग अपने-अपने साथ एक डंडा रखो और जैसे ही उनके बीवी के भाई, मुन्ह्नोचवा जी आयें उनको दौड़ा के मारा जाए ) | 

डंडों के दाम में अचानक से बढ़ोत्तरी देखी गयी | साथ ही सर्वसम्मति से दो लोगों ने ( जिसमें राजाराम और टोका मास्टर दो ही थे ) ये फैसला भी लिया की रात भर बिजली आये ऐसी गुहार शर्मा जी से लगाई जाये | शर्मा जी का ओहदा किसी मंत्री से कम ना था | और कम हो भी क्यूँ भला , उसी रात से लाइट आने लगी | अब इसमें शर्मा जी का कितना रोल था इस पर तो जांच हो सकती है और CBI से नीचे की एजेंसी नहीं चलेगी |

खैर, सिवाय हमारे घर के, पूरे मोहल्ले में छतों पर बल्ब टंग गए | अब चूंकि राजाराम के यहाँ टोका कनेक्शन भी नहीं था और उनका घर हमारे घर से सटा हुआ था , उन्होंने ऑफिस जाते हुए हमारे पिताश्री को रोका और कहा “ निगम जी , अपनेओ छत पर एक बलब लगवाय देओ” ( श्रीमान निगम जी आप अपनी छत पर एक बल्ब लगवा दें )  | पिताश्री ने सरकारी विभाग में काम करने की अपनी सिद्धहस्तता को दर्शाया और मामला शाम तक मुल्तवी कर दिया जो अगली कई सुबहों और फिर कई और शामों के लिए मुल्तवी होता रहा |

अब हर शाम कहीं न कहीं से एक शोर उठता “आई गवा" ( आ गया ) | मोहल्ले भर से लट्ठ पीटने की आवाज़ आती | एक दिन एक खोजी ने बताया “वहिके गलेमा एक डिस्को लाइट जईस कुछ बंधा आय” | ( उसके गले में डिस्को लाइट , मिथुन दा के फिल्म वाली , जैसा कुछ बंधा है ) | साथ में ये भी बताया गया ये यंत्र “सेल" से चलता है | 

इसके बाद लोगों ने “सेल" पर पानी के प्रभाव के कारण लट्ठ के साथ एक बाल्टी पानी रखना भी अनिवार्य कर दिया |

इस बीच “विदेशी ताकतों" के हाथ की न्यूज़ आयी | बताया गया की ये पक्षी रिमोट से चलते हैं और उनका कण्ट्रोल सूनसान इलाके में किसी कार से किया जाता है | सुनने में ये भी आया की इस चक्कर में दो कारें जला दी गयीं |खबर ये भी आई की राज्य की तत्कालीन मुख्मंत्री ने आईआईटी के “टीचरों" की एक टीम बनाई है जो इस पर रिसर्च करेगी | पता नहीं वो टीम बनी की नहीं बनी और अगर बनी तो क्या रिपोर्ट आयी | खैर |

मुन्ह्नोचवा की रेंज बढ़ रही थी | अड़ोस पड़ोस के गावों से भी खबरें आ रही थी |  “वहिके तो भैया चिपटि गवा, जान लैकेहे छोड़िस” ( किसी को पकड़ लिया और तब तक नहीं छोड़ा जब तक मर नहीं गया ) |  दहशत बढ़ने लगी | लोगों ने रात में घरों से निकलना छोड़ दिया |  जाते भी तो ग्रुप में | सिनेमाघरों के रात के शो ठन्डे पड़ गए | शुक्ला मास्टर ने अपने दिव्य ज्ञान का हवाला देते हुए इसे प्रकृति का प्रकोप डिक्लेअर कर दिया |

ये तो ठीक से याद नहीं की इस दहशत की तिलांजलि कैसे हुई पर एक दिन किसी ने बताया की सारे मुन्ह्नोचवा नेपाल चले गए हैं | माहौल शांत होने लगा |

एक बात ये भी हुई की बारिश शुरू हुई और टोका मास्टर गुड्डू चचा का कहना था “अब सेल कैसे चलिहे , ससुरे भाग गए” ( अब बारिश में सेल भीग गए , इसलिए उनकी बीवी के पिताजी अर्थात मुन्ह्नोचवा जी भाग गए ) |
*****
कुछ सालों बाद फिर एक खबर उड़ी थी की ३१ दिसम्बर के दिन जो सोयेगा वो पत्थर का हो जाएगा |
-देवांशु

गुरुवार, 9 जून 2011

कहानी

कहानी…अगर सोंचे तो कहानी किसी न किसी की जिंदगी में होने वाली वो घटना है जिसे वो किसी को बता सकता है…वो घटना जिसे वो किसी को नहीं बताता कभी कहानी के रूप में आ ही नहीं सकती…
तो क्या जो  कहानी लिखी जाती हैं…वो किसी न किसी कि जिंदगी में हुई हों ऐसा ज़रूरी है क्या?
मसलन…आज की ही बात  …बात हुई कुत्ते वाली कहानी की ..एक कुत्ता जो अपने मुह में रोटी दबा के कहीं जा रहा था…रस्ते में उसे नदी मिली..नदी में अपनी परछाई देख के वो उसपे भोंकने लगा कि उसे दूसरी रोटी भी मिल जाये..और उसकी अपनी रोटी भी गिर गयी…इस कहानी से शिक्षा मिलाती है कि लालच करना गन्दी बात है…
सवाल? ? सवाल वो होता है कि जो आपके दिमाग में तब आये जब आपको कुछ समझ न आये…खराब सवाल वो होता है  जिसका जवाब सामने वाले को न पता हो…सिर्फ सवाल वो होता है जिसका जवाब सामने वाला  आसानी से दे दे और बढ़िया सवाल वो जिसकी वो तैयारी कर के आया हो…कुल मिला के सवाल कि कोटि पूंछने वाले पे नहीं बताने वाले पे निर्भर है…
हाँ तों कहानी का सवाल….कुत्ता रोटी ले के कहाँ जा रहा था? और वो जा ही क्यूँ रहा था..कहीं बैठ के रोटी खाता आराम से? उसने ये बात किसे और कब बताई?? या कोई था जो उस “सेलिब्रिटी" कुत्ते के पीछे भाग रहा था..जैसे कुछ लोग आज “फेमस" लोगो के पीछे भागा करते हैं..
कुत्ता…कुत्ता बहुत वफादार होता है…वफादार होना गाली होती है…जैसे गधा…गधा बहुत सीधा होता है…सीधा होना भी गाली होती है…सीधा और वफादार होना वैसा ही है जैसे कुत्ते और गधे का  “हाइब्रिड" होना..
ठीक…तो कुत्ते की कहानी का सवाल…वो वहीँ का वहीँ है…कुत्ते ने रोटी क्यूँ नहीं खायी?…अरे भाई खा लेता तो कहानी कैसे बनती? फिर से एक सवाल..इस बार कहानी पे ही सवाल….
नदी…एक आइना है…जो एक जगह से शुरू होती है और दूसरी जगह पे खतम हो जाती है…पर हर कदम पे आने जाने वाले को आईने कि तरह सच्चाई बताती रहती है…कम से कम पाप तो धो ही देती है…और हम नदी को ही गन्दा कर देते हैं…
रोटी…वो तो हर किसी को खानी है…किसी को वातानुकूलित घर में और किसी को खुले आसमान के नीचे…किसी को रोटी के साथ सब्जी भी है तों किसी को सिर्फ रोटी…किसी किसी को तो कुछ भी नहीं…
एक बार फिर…रोटी लिए हुए कुत्ते कि कहानी जिसमे नदी है…फिर सवाल.. कि अब ये क्या है? यही तों जिंदगी है प्यारे…ध्यान से सोचो …क्या ऐसा नहीं लगता कि उस कुत्ते को भूक नहीं थी? अगर होती तो वो रोटी खा नहीं लेता? जबकि नदी भी उसे बता रही थी कि तुम्हारे पास रोटी है..जिंदगी भी ऐसी ही कहानी है…जो है नहीं वो चाहिए..और जो नहीं है…उसके पीछे जो है उसे भी खो देना…
कभी सोचता हूँ कि मैं भी तो वही कुत्ता हूँ…जो पास में है वो दिखता नहीं…और अगर नदी देखता हूँ तों दूसरों के पास भी वही दिखता है जो मेरे पास है फिर भी लगता है मेरे पास ही कुछ नहीं है…
इंसान थोडा चालाक हो गया है…अब अपनी रोटी साइड में रख के नदी पे भौंकता है…पर जब देखता है कि सामने वाले के पास भी रोटी नहीं है तों बोलता है “रेसेशन" आ गया है…
अक्सर ऐसा लगता है कि बचपन कि इन्ही छोटी छोटी कहानी को तब ही समझ लेते तो जिंदगी आज  कितनी सुकून भरी होती…पर फिर एक सवाल उठता है कि क्या हम वाकई इतने नासमझ थे? पर आज तों समझदार होने का दम भरते हैं फिर भी इस कहानी की सीख नहीं समझ पा रहे….और पूंछ रहे हैं तों केवल सवाल…नदी..रोटी..कुता….और कहानी…
                                                                                                  -- देवांशु