Monday, July 8, 2013

तुमि तो ठेहेरे परदेसी , साथि क्या निभावोगे…

“यार ज़िंदगी से कलर चला गया |”

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नौसिखिया दारूबाजों को दारू के अलावा दो और चीज़ों की सख्त आवश्यकता होती है : घर से दूरी और एकांत | बड़े शहरों में एकांत के बिना भी काम चल जाता है, पर छोटे शहरों में इसकी आवश्यकता ऐसी है जैसे सरकार को सीबीआई की | और अगर इन दोनो के साथ ताज़ा-ताज़ा दिल टूटा हो तो क्या कहना, सोने पर सुहागा | 

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बात तब की है जब हम कॉलेज में नए-नए शिफ्ट हुए थे, और बात-बेबात मौका निकाल कर घर जाया करते थे | महल्ले में उस समय प्यार का रोग भर भर के चढा था, हर कोई इश्क में बावरा हुआ पड़ा था | हमारे एक बचपन के दोस्त थे जो पांचवी क्लास तक हमारे साथ पढ़े थे और हमारे घर से ३ गली छोड़ कर रहते थे , नमन |


नमन

घर  का नाम : बड़कन्ने, इस्कूल का : नमन त्रिवेदी | वो अपनी हृष्ट-पुष्ट काया से सिर्फ बब्बू दादा को ही टक्कर दे सकते थे | बचपने में ही महल्ले के ही किसी जीव-वैज्ञानिक ने खबर उड़ा दी थी, “केंचुआ" आगे पीछे दोनों तरफ से एक जैसा चल सकता है और नमन का नाम भी आगे-पीछे से एक जैसा था तो महाशय का महल्ले का नाम रख दिया गया , “केंचुआ" | उनकी बाडी भी नाम को पूरा समर्थन देती थी | लचर गर्दन, जो बोलते बोलते किसी भी तरफ झुक सकती थी, जैसे थाली पर के बैंगन | मिमियाती आवाज़, बकरी को भी मत दे दे और बहती नाक, जिसके कुछ कतरे गालों के अंत तक पाए जाते थे |


पर बड़े होकर ऐसा कुछ ना रहा | हमारे बी टेक का पहला साल था, श्रीमान केंचुआ जी , बी ए - दूसरे साल में थे | अब तक उनका बाकी शरीर तो जस का तस रहा था, तोंद ने बोरे का रूप लेना शुरू कर दिया था |


हमरे शहर में एक मैनरोड है, जो एक पंचराहे से शुरू होकर रेलवे क्रोसिंग तक जाती है | वहाँ अभी तो ओवरब्रिज बन रहा है ( जिसका जिक्र फिल्म साहब बीवी और गैंगस्टर में आया है) , उस समय नहीं बन रहा था | केंचुआ अपने एक दोस्त के साथ , करीब शाम को सात बजे मैनरोड पर ही भिंटा गए | अब चूँकि वो हमारे इस्कूल के दोस्त थे तो उनका संबोधन वैसा ही रहा “अरे भईया दिवान्सू, कब आयेओ” | हमने बताया कल ही आये हैं, १ हफ्ता रुकेंगे |


उन्होंने कुछ इशारा किया अपने दोस्त को और बोले “आज बड़े सही दिन मिले हो भईया तुम, चलो आज हमरे साथ चलो” | अपनी बाइक में ट्रिपलिंग करते हुए वो हमें उठा के चल दिए | रेलवे क्रोस्सिंग से उनकी बाइक पटरी के सहारे-सहारे बाएं मुड़ ली और करीब आधे किलोमीटर दूर जाकर रुकी | सबसे पहले हम कूदे, बाद में उनके दोस्त फिर केंचुआ महाशय |


वहाँ पास में एक छोटा खँडहर था , रेलवे का ही कोई “परित्यक्त" केबिन | एकांत आ गया था | उसके अंदर “टोर्च" वाले मोबाइल का इस्तेमाल करके रोशनी की गयी | इसके बाद उनके दोस्त ने बैग से “रायल स्टैग" का खम्भा निकाल लिया , साथ में प्लास्टिक के गिलास और एक थैली  जिसमें सूखे मेवे भरे हुए थे  | पानी की बोतलें भी थीं | उस समय हम “मैं कोलेज पढ़ने आया हूँ, सिर्फ पढ़ने" के सिद्धांत का पालन करते थे तो केवल दो पेग बने | फटाफट केंचुआ और उनके दोस्त ने दो दो पेग अंदर ढकोले | इसके बाद इंट्रो शुरू हुआ |


“अरे हम तो बतैबे नहीं किये,  ई हमार दोस्त है , चिलगोजा , ससुरे की बाप की सूखे मेवा की दुकान है , यही लिए सारेक् ई नाम पड़ा" अपने दोस्त को इंट्रोड्यूस करते हुए केंचुआ महाशय बोले |
“और ई हैं हमरे दोस्त दिवान्सू, इनका पढेक बड़ी खुजली है बचपन सेने, अबहीं दिल्ली में पढ़ी रहे हैं, सार ना जाने का करिहें पढ़ी के” हमारा इंट्रोडकशन भी दे दिया गया |


अब बारी चिलगोजा जी के बोलने की थी “भईया, आप तो दिल्ली मा कालेज मा पढ़त हो , वहन तो बहुतै सही कन्यायें पढ़े आती हुइहें” | हम बस केवल मुस्किया दिए | वो आगे बढ़े  “कोई पटाय पायेओ की नाहीं" | अब बारी हमारे शर्माने की थी | एक इसी मैदान में तो चारों खाने चित्त थे हम |


“अरे ई ससुरे सीधे लरिका हैं" | तीसरे पेग के बाद आयी झुमाई के साथ केंचुआ बोले |

“पर ई सार केंचुआ, यहु नाय माना, तुम्हरे महल्ले की एक लड़की का प्रपोज़ मार दिहिस"  चिलगोजा ने हिकारत भरी नज़रों से केंचुआ को देखते हुए हमें संबोधित किया | अब ये खबर थी | महल्ले की सारी कंडीडेट लड़कियों की तस्वीरें ज़हन में घूमने लगीं , गेस करने लगे कौन होगी वो बदनसीब, हालांकि डाटा पुराना था हमारा  | अब तक केंचुआ की सुबकाई शुरू हो गयी थी | एक और पेग अंदर गया |  और बोले “यार दुई गली छोड़ के पहले  मकान वाली, मास्टर की छोटी बिटिया” |  


चिलगोजे ने बड़े ओर का ठहाका लगाया | हम फोटो याद करने में लगे थे , बहुत मेहनत से भी नहीं याद आयी |
श्रीमान केंचुआ जी अब दहाड़ मार कर रोने लगे थे | बोले : “यार ज़िंदगी से कलर चला गया |”


“तौ कलर हम लाये देइत है” ये कहते हुए चिलगोजा ने अपने बैग से एल चाइनीज़ पोर्टेबल कैसेट प्लयेर निकाला और ऑन किया | ऑन करते ही सबसे पहले , उसमे हर तरफ लाल-नीली बत्तियाँ जलीं और पलक झपकते ही खँडहर डिस्कोथेक में बदल गया |  साथ में  अल्ताफ राजा की आवाज़ गूंजी “तुम तो ठहरे परदेसी, साथ क्या निभाओगे" | अल्ताफ राजा के गानों के ज़हर की तीव्रता उनके द्वारा बीच बीच में छोड़े गए शेरों से और बढ़ जाती है | वही हुआ , मेरा केंचुआ की स्टोरी में कोई इंटरेस्ट नहीं बचा |


“यार, बहुतै मतलब वाला गाना है" केंचुआ जी ने जिव्हा खोली और हमारी तरफ देखा | हम फटाफट कट लेने वाले मोड में थे | बोले “तुम नाय समझियो" | हम चिलगोजा भाई की तरफ इशारा करके पूछे कि माजरा क्या है | उन्होंने बताया |


“इन्हैक किलास मा पढ़त है मास्टर केर बिटिया, ई गधऊ, लब-लेटर लिख दिहिन और वहिकी कापी मा रखि दिहिन | ऊ देखिस नाही, वहिकी कापी वहिकी अम्मा ठीक से लगाती रहें की इनका परचा गिरि परा |”

केंचुआ ने गम-गलत करने के मकसद से एक पेग और अंदर किया और कराहे “हाए"|


“अम्मा तो ब्लैक लेटर बफैलो हैं, चिट्ठी पढ़े वहिके बड़े भईया  | पहले तो वहे सुजाय दी गयीं | फिर जब पता चला उधर से कुछ नाय है तब ई पकरे गए |”


“अबे तो कैसे पता चला कि लेटर इन्होने लिखा है” हमने समझने की कोशिश की | केंचुआ की एक और आह निकली | चिलगोजा आगे बढ़े |


“इ ससुर लेटर के आखिरी मा हिन्दी के बिद्वान बनी गए रहे लिखी दिहिन , तुम्हें नमन करता है तुम्हारा नमन | वहिके बाद इनकी पहिले हुई ढंुढाइ , फिर हुई धुनाई |


अल्ताफ राजा कोई एक शेर पढके आगे बढ़े | केंचुआ का रोना अब थम गया था बोले “ऊ शुकला मास्टर , वहू शाम का चठिया लगाये ब्रह्मा-विष्नू कर रहा रहे , मारे वाले ५-७ और बढ़ी गए | और तो और पापाओ का बताय दिहिस | वहो मारिन |”


इस बीच खम्बा खतम हो चुका था | मामला समिट रहा था | हमने घावों को कुरेदते हुए पता किया “ फिर कन्या ने जवाब दिया?” | केंचुआ तमतमा गए बोले “अगलिहे दिन से वहिके दोनों भाई ऊका कालेज ले-छोड़े आये लगे, अभी उसका जवाब आना बाकी है” |


माहौल में दर्द बढ़ गया था | हमने बोला इस हालत में घर कैसे जाओगे | तो पता चला चिलगोजे के घर में सब लोग बाहर गए हैं , केंचुआ आज उसी के यहाँ रुकेंगे, अकेले चिलगोजे को डर ना लगे कहीं | हमने चिलगोजे का मुआयना किया और पाया कि इससे वीभत्स प्राणी मैंने शायद ही कहीं देखा हैं, इसे किस्से डर लगेगा | खैर हमने दोनों को उनके घर छोड़ा और वापस अपने घर की ओर चल दिए | पीछे से उन दोनों के रेंकने की आवाज़ आ रही थी …

तुमि तो ठेहेरे परदेसी , साथि क्या निभावोगे…
(हालांकि मास्टर और उनका पूरा खानदान, कम से कम पिछले ३० साल से महल्ले में रह रहा था )

#जाके पैर ना फटी बिवाई, सो का जाने पीर पराई |

-- देवांशु

8 comments:

  1. ई त कलर वापसी है।

    जय हो!

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    1. कलर का क्या है ना, की आता जाता रहता है :)

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  2. गज़ब -
    ब्रांड की तारीफ़ करें कि तुम्हारे दोस्त की किस्मत पर अफ़सोस या फिर एडवेंचर अतीत की बधाई ?
    तुम्ही बोलो ?

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    1. दोस्त की किस्मत पर अफ़सोस मत करिए , उसका जवाब आना बाकी है :) :)

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  3. एक बात तो सच है दिवान्सू कि हमारे छोटे शहरों में आशिकों और नामों दोनों को ही तोडा बडी बेदर्दी से जाता है ;)

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  4. वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |

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  5. छोटे शहरों में प्रेमियों के भाग्य भी छुटा जाते हैं।

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