सीन-१
लड़की बुक फेयर की भीड़ में खोई हुई है | हाथ में किताबों का बोझ है | भीड़ ज्यादा है , तेज चलने में दिक्कत हो रही है | आगे एक स्टाल के बाहर ७-८ लड़कों का हुजूम खड़ा है | सब चिल्ला-चिल्ला कर बातें कर रहे हैं | हा-हा ठी-ठी के दौर चल रहे हैं | वो उनकी तरफ देखे बिना निकल जाना चाहती है |
उसी हुजूम में एक लड़का खड़ा है, लंबी-चौड़ी कद काठी का | वो शायद उसे पहचानती है | पर श्योर नहीं है | वो उससे बात करना चाहती है | पर एक तो भीड़ और फिर ये भी पता नहीं कि ये वही है या नहीं | वो आगे बढ़ती है | जैसे ही उसके पास से गुज़रती है , उसकी आवाज़ उसके कानों में चली जाती है | वो रुक कर बोलती है :
“अभिषेक?? रिमेम्बर, वी मेट समटाइम बैक"
लड़का अजीब से एक्सप्रेसन देता है | डरा सहमा सा | झेंपते हुए बोलता है :
“हाँ , हाँ , याद है , इनसे मिलो, ये सब मेरे दोस्त हैं, ये दो तो ब्लॉगर “भी" हैं !!!”
सीन-२
लड़का अपने दोस्तों के बीच खड़ा है | एक दोस्त की तरफ इशारा करते हुए दूसरे दोस्त से बोलता है :
“मैं इनको जानता ३ साल से जानता हूँ, पर इनसे मिल पहली बार रहा हूँ|”
दूसरा दोस्त : “मिल तो मैं भी पहली बार रहा हूँ, इनको पढ़ा बहुत है, पर आजकल आप लिख नहीं रहे , पिछले डेढ़ साल से कुछ लिखा क्यूँ नहीं ??”
तीसरा दोस्त (वही जो काफी टाइम से लिख नहीं रहा) : “बड़े खाली रहते हो यार, काउंट कर रहे हो कि डेढ़-दो साल से कुछ नहीं लिखा”|
ठहाकों से पूरा पुस्तक मेला गूँज रहा है |
तभी लड़का एक गुज़रती लड़की की तरफ देखता है |
ये तो वही है जिसने लास्ट टाइम भरे मॉल में उसे पहचान लिया था | बड़ी टांग खींची गयी थी उसकी | मन ही मन अपने इष्ट देव को याद करता है कि “हे प्रभु मैंने कभी जिंदगी में कोई एक भी पुण्य का काम किया हो तो ये आज मुझे न पहचाने" |
चेहरे पर सायरन छा जाता है | पर भगवन भी ईसई टाइम पर धोखा दे जाते हैं अक्सर | लड़की कहती है :
“अभिषेक?? रिमेम्बर, वी मेट समटाइम बैक"
लड़का अजीब से एक्सप्रेसन देता है | डरा सहमा सा | झेंपते हुए बोलता है :
“हाँ , हाँ , याद है , इनसे मिलो, ये सब मेरे दोस्त हैं, ये दो तो ब्लॉगर “भी" हैं !!!”
“ओह् नाईस टू मीट आल ऑफ यू, मुझे लगा तुम मुझे नहीं पहचान पाओगे |” लड़की कहती है |
लड़के का चेहरा पीला पड़ने लगा है | उसके वही ब्लॉगर दोस्त , जो काफी टाइम से नहीं लिख रहे हैं कहते हैं:
“नहीं, नहीं, अभिषेक “भी" बहुत अच्छा लिखता है”
इसके आगे लड़के की बहुत खिंचाई होती है | चेहरे पर पसरा सायरन कानों में बजने लगता है और उसे कुछ सुनायी नहीं देता है |
सीन-३
मैं वाणी प्रकाशन के काउंटर पर बुक्स टटोल रहा हूँ | मोबाइल पर कॉल आ रही है | मैं फोन उठाता हूँ | एक बहुत ही सभ्य और शालीन आवाज़ …
“सर कहाँ पर हैं?”
“वाणी के स्टाल में तुम कहाँ हो ?”
“मैं भी वहीं बाहर खड़ा हूँ"
“रुको, मैं आता हूँ”
मैं बाहर जाता हूँ | अभिषेक अपने दोस्तों के साथ खड़े हैं | सबसे परिचय कराते हैं | अगला सवाल :
“
पंकज भी आये हैं ना"
मैं हामी भरता हूँ और पंकज को फोन करके वहीं बुला लेता हूँ | पंकज का स्वागत बड़ी गर्मजोशी से होता है |
अभिषेक पंकज की ओर देखते हुए अपने दोस्त
अन्जुले से बोलते हैं :
“मैं इनको जानता ३ साल से हूँ, पर इनसे मिल पहली बार रहा हूँ|”
अन्जुले : “मिल तो मैं भी पहली बार रहा हूँ, इनको पढ़ा बहुत है, पर आजकल आप लिख नहीं रहे , पिछले डेढ़ साल से कुछ लिखा क्यूँ नहीं ??”
पंकज : “बड़े खाली रहते हो यार, काउंट कर रहे हो कि डेढ़-दो साल से कुछ नहीं लिखा”|
ठहाकों से पूरा पुस्तक मेला गूँज रहा है |
तभी एक कन्या ने आकर अभिषेक की तरफ इशारा करते हुए कहा :
“अभिषेक?? रिमेम्बर, वी मेट समटाइम बैक"
अभिषेक अजीब से एक्सप्रेसन देता है | डरा सहमा सा | झेंपते हुए बोलता है :
“हाँ , हाँ , याद है , इनसे मिलो, ये सब मेरे दोस्त हैं, ये दो तो ब्लॉगर “भी" हैं !!!”
इन दोनों में एक पंकज और दूसरा मैं हूँ |
पंकज तुरंत बोल देते हैं “नहीं, नहीं, अभिषेक “भी" बहुत अच्छा लिखता है”|
फिर थोड़ी देर तक किताबों के बारे में बातें होती हैं | जो मुझे ज्यादा समझ तो नहीं आती पर मैं मुस्कुराता रहता हूँ | लड़की रुखसत होती है |
थोड़ी देर बाद हम लोग भी जाने की बात करते हैं | अभिषेक की टांग काफी देर से खिंच रही थी तो वो बोलते हैं :
“आप लोग इस तरफ जाओ, हम इस तरफ जाते हैं”
पंकज : “लड़की ने हाय क्या बोल दी, दोस्तों से रास्ता ही अलग कर लिया तुमने”
सब फिर हँसते हैं | मैं
अभिषेक को धमकी देता हूँ कि पोस्ट लिख दूंगा इस घटना पर | वो हमें हलके में ले लेते हैं|
ये पोस्ट बस उसी का बदला है |
डिस्क्लेमर : इस पोस्ट की सभी घटनाएँ, पात्र और जगह, एक दम सच्ची हैं | और
प्रशांत प्रियदर्शी की तरह अभिषेक बाबू भी एक अच्छे इंसान हैं | और अभिषेक चाहें तो इस पोस्ट की चर्चा “ब्लॉग-बुलेटिन" पर भी कर सकते हैं |
P.S. : आज का दिन रहा दिल्ली बुक-फेयर के नाम | मम्मी और पंकज के साथ वहाँ गया | अभिषेक और उनके दोस्तों से मुलाकात हुई | कुछ फोटो नीचे हैं | खरीदी गयी किताबों की फोटो शो-ऑफ के लिए लगाई गयी है |
--देवांशु