रविवार, 16 सितंबर 2012

लीविंग होम…एंड हेडिंग टुवर्ड्स द “लाइफ"

“पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया ना कोय | ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय |”  -- संत कबीर

इस दोहे को हम सब कभी न कभी पढ़ चुके हैं, अर्थ भी समझते हैं |  प्रेम जीवन जीने की एक विधा है और जिसने इस विधा को जान लिया उसे किसी और ज्ञान की ज़रूरत नहीं है |

प्रेम की कोई परिधि नहीं | ये विशाल-अनंत आकाश की तरह है |  किसी चीज़ को पाने का जूनून भी एक तरह का लगाव है, प्यार है | कभी कभी इंसान को वो पाने के लिए सारी हदें पार कर देनी होती हैं | और जो ऐसा कर देते हैं वो संत कबीर के दोहे को चरितार्थ कर देते हैं और इसका मतलब दुनिया को समझा सकते हैं |

“लीविंग होम" जयदीप वर्मा द्वारा निर्मित और निर्देशित फिल्म है, जो ऐसे ही कुछ जुनूनी लड़कों ( हाँ मैं लड़के ही कहूँगा) की कहानी है | ८० के दशक में ( मेरे पैदा होने के आस-पास ही ), जब देश एक वित्तीय संकट से गुजर रहा था ( ऐसा मैंने सिर्फ पढ़ा ही नहीं है, घरवालों से सुनता भी आया हूँ)  और हर कोई अपने करियर, जॉब, प्रोफेशन को लेकर सजग और जागरूक हो रहा था | पढ़ाई-लिखाई एक मात्र जरिया थी, आगे बढ़ने का | उस समय कुछ लड़कों ने संगीत को अपना जूनून बनाया | इसके रस्ते पर चले | नए साथी मिले, पुराने साथ छोड़ते भी गए | मुसीबतें आयीं, उनका मुकाबला भी किया | कभी सब कुछ खत्म होता सा लगा | पर हौंसला नहीं टूटने दिया | आखिरकार उन्हें वो मक़ाम मिला | दुनिया ने सराहा | सम्मान दिया |

“लीविंग होम" उसी बैंड “इन्डियन ओशियन" की कहानी है | उनके कुछ चुनिन्दा गानों का इवोल्यूशन , बैंड के मेम्बर्स की जिंदगी , उनका बीता कल, उनकी इंस्पिरेश, उनकी खासियत हर चीज़ के बारीकी को एक मोतियों की माला में पिरोकर पेश की गयी एक अनूठी रचना है “लीविंग होम"|

संगीत और सिनेमा दोनों की समझ मुझमे कम ही है, पर इतना ज़रूर जान पाया हूँ दो बार फिल्म देखकर की इन दोनों में ईमानदारी की बहुत ज़रूरत है | “इन्डियन ओशियन" का संगीत और “लीविंग होम" दोनों में ये बात झलकती है |

फिल्म पूरी तरह आपको बाँध के रखती है, और बैंड के मेम्बर्स के साथ आपको जोड़ती चलती है | साथ में उनके चुनिन्दा कंपोजिशंस को आपके सामने लाकर रख देती है |  यकीन मानिए अगर आपने वो गाने पहले न भी सुने हों तो भी आप उन्हें गुनगुनाने के लिए मजबूर हो ही जाओगे | एक अलग समां बंध जाता है | साथ में हैं बैंड के कुछ लाइव पर्फोर्मेंसेज़, मेम्बर्स और उनके परिवार वालों के इंटरव्यूज़, जाने माने गायकों, गीतकारों, संगीतकारों की बातें | खासकर पीयूष मिश्र को सुनना बहुत अच्छा लगा | “बंदे" गीत, जो धार्मिक उन्माद की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है और सौहार्द की बात करता है,  के बारे में वो कहते हैं “इस तरह की बात कहने के लिए एक बदतमीज़ गीतकार और संगीतकार की ज़रूरत है” |

दृश्यों के साथ चलते हुए जो वन लाइनर्स हैं वो इन्फोर्मेशन भी रख रहे हैं साथ ही उसमे एक स्मार्टनेस है जो आपको गुदगुदाती है | फिल्म के सभी किरदारों को एक आजादी दी गयी है , जिसमे वो अपनी बात कहने से ज्यादा आपसे बात करते हुए पाए जाते हैं | आप उनको आसानी से रिलेट कर सकते हो | दिल्ली की सड़कों की रिकॉर्डिंग देखने लायक हैं और काफी तो उन जगहों की हैं जहाँ से यहाँ आने वाले लोग अक्सर गुज़रते रहते हैं |

बैंड के बारे में ज्यादा लिखने से अच्छा आपको फिल्म देखना सजेस्ट करूँगा |  मुझे तबला वादक अशीम और बॉस गिटारिस्ट राहुल राम का बेबाकी से अपनी बातें रखना बहुत पसंद आया | लीड गिटारिस्ट सुस्मित का सिम्पल एंड सोबर नेचर काबिले तारीफ़ है | ड्रमर अमित ने जीवन का फलसफा कुछ यूँ बयां किया जो उन्होंने अपनी माँ से सीखा था :

"Only those people have disappointments who have the appointments with future"

चारों के जूनून को देखकर मुझे कबीर याद आये, क्यूंकि इन्होने अपने प्यार ( संगीत) को समझा और उसी को जीने की कोशिश भी की | कबीर की ही एक रचना “झीनी" को बैंड ने अपने एक कम्पोजीशन में गाया भी है |

बाकी फिल्म बहुत अच्छी लगी मुझे | दो बार देख चुका हूँ, कुछ दिनों बाद फिर देखूँगा | रेकेमेंड करूँगा की आप भी देखें | इस तरह के अलग विषयों फ़िल्में अपने यहाँ कम ही बनती हैं | “लीविंग होम" जैसी तो मैंने ये पहली फिल्म ही देखी है | ये एक अनोखा शिल्प है जिसके लिए जयदीप वर्मा और उनकी पूरी टीम बधाई की पात्र है |

आशा है ये फिल्म आपको जीवन में एक नयी सोच लाएगी और एक “रियल फील गुड" फैकटर से सराबोर कर देगी |

जाते-जाते “इंडियन ओशियन” के मेरे दो पसंदीदा कम्पोजीशन :

-- देवांशु

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

एक वेल्ला दिन !!!

 आज हम काफी वेल्ले रहे, मतबल खाली रहे | नहीं ऐसी बात नहीं है कि और दिन नहीं रहते हैं, और दिन भी रहते ही हैं, बस आज कुछ ज्यादा खाली रहे | रोज कम से कम सुबह ९ से शाम ६ बजे तक “बिजी" होने का नाटक बिना अटके हुए खटाखट करते रहते हैं | उसमे हमारा “लैपटपवा” हमारी भरपूर मदद करता है | 

पर आज सुबह अचानक “लैपटॉप" साहब के मिजाज़ बिगड गए | लाईट सारी जला रहे पर दर्शन न दे रहे | हम परेशान हो लिए | तुरत-फुरत ऑफिस भागे | कम्प्लेंट डाल दिए दन्न से | फोन पर उस तरफ से आ रही बहुत ही मधुर आवाज़ में कन्या ने कहा कि सर्विस इंजीनियर आपको थोड़ी देर में काल करेंगे |

अब हम पूरे ऑफिस में खाली बैठे थे | सोच रहे थे कि का करें | ध्यान आया कि बड़े दिन हुए बंगलौर वाले अपने पुराने रूममेट से बात नहीं किये | उनको फोनिया दिए | उनकी “काइनेटिक" ने भी उन्हें सुबह सुबह धोखा दे दिया था | ऑटो से ऑफिस जा रहे थे | बहुत ज्यादा शोर के बीच में हमने कुछ बातें एक्सचेंज की | तभी सर्विस इंजिनियर का फोन आ गया | हमने अपने मित्र से कहा तुम उधर निपटो, हम इधर निपटते हैं |

सर्विस इंजीनियर ने कहा कि मय लैपटॉप हमारी डेस्क पर आ जाओ | हमने डेस्क नंबर पूछ लिया पर फ्लोर नंबर पूछना भूल गए | कॉल बैक कर नहीं सकते थे क्यूंकि “ऑफिस" के नम्बर से फोन आया था जो रिसेप्शन पर जा रहा था | हमने उन्हें सबसे पहले फर्स्ट फ्लोर पर ढूँढा | भगवान के फज़ल से वहाँ पर पता चला कि वो साहब थर्ड फ्लोर पर बैठते हैं | हम उनके पास दनदनाते पहुँच गए |

इंजिनियर साहब अपने डेस्कटॉप की स्क्रीन से चिपके हुए थे | चैट विंडो खुली हुई थी , किसी कन्या की फोटो दिख रही थी | आगे पढ़ना हमने उचित न समझा | वो मुस्कुरा मुस्कुरा कर चैटियाये जा रहे थे | कुछ ५-७ मिनट हम खड़े रहे उनके पास | फिर हम बोल दिए “एक्सक्यूज मी”| उन्होंने उसी मुस्कान के साथ हमें “एक्सक्यूज" कर दिया |  (चेहरे पर मुस्कान थी पर मन ही मन तो गरिया ही रहे होंगे )

उन्होंने कुछ देर लैपटॉप घुमा फिराकर देखा | चेहरे पर कुटिल मुस्कान चालू थी उनके | हमको लगा कि कहीं ये न कह दें कि लैपटॉप के आगे कान पकड़ के उठक बैठक लगाओ अपने आप चलने लगेगा | जैसे “पंचलाईट” में रेणु जी ने लिखा था | पर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा | बोले सर्विस सेंटर वाले देखेंगे | और उन्होंने एक मेल डाल दी सर्विस सेंटर को | “चार घंटे बाद आकर टिकट नंबर ले जाना” ऐसा कह कर उन्होंने हमें विदा किया और लग गए चैटियाने -मुस्कियाने |

अब समस्या ये आ गयी कि चार घंटे क्या किया जाये | सोचा कि लोगो को फोन करके परेशान किया जाये पर ऑफिस का समय था हमने किसी को डिस्टर्ब करना उचित न समझा | 

“अकेले निपटेंगे इस वेल्लेपन से” कहकर  हम  सबसे पहले “पैंट्री" गए | वहाँ थोड़ी फिसलन सी लग रही थी फर्श पर | “फैसिलिटी" को फोन करके बोले साफ़ करो आकर | और जब तक सफाई नहीं हो गयी वहीँ खड़े रहे | देख -रेख करते रहे |

फिर “टपरी" पर चाय पीने गए | चाय वाले ने देखते ही बोला “आज जल्दी आ गए ऑफिस सर" |  तब पता चला कि अपनी इमेज काफी दूर तक खराब है | दो चार और जान पहचान के लोग पहली बार चाय पीते मिल गए | एक ने सिगरेट ऑफर करते हुए बोला “डू यू स्मोक" | इससे पहले की हम कुछ बोलें चाय वाले भाईसाहब ने ही बोल दिया “सर जी सिगरेट नहीं पीते" | बाकी सबने घूर के मेरी तरफ देखा और हमने फ़ोकट में मिली चाय की ओर , जिसके पैसे बाकी लोगो में से किसी एक ने दिए |

अब दिमाग में ये विचार आने लगे कि और क्या क्या किया जा सकता है | तो निम्नलिखित खुराफातें कर डाली | आप अगर कभी वेल्ले हो तो ये सब अपने रिस्क पर करना :

१. सबसे पहले हमने गिना कि कितनी अलमारियाँ है | टोटल निकली ६४ | जिसमे ४० सेक्योर एरिया में हैं | फिर हमने अलमारियों के दरवाजे गिने | निकले १२८ | और इस तरह हमें पता चला कि अलमारियों में २ दरवाजे होते हैं |

२.  ये भी पता लगा सकते हो कि ऑफिस में कितने फ्लोर हैं | किस किस फ्लोर पर आपको जाना अलाउड है | जैसे हमारे यहाँ ७ फ्लोर हैं और हम सातों पर बेरोकटोक जा सकते हैं |

३. लिफ्ट में घुस गए , ग्राउंड फ्लोर पर ही | अकेले ही थे तो सारे फ्लोर के बटन दबा दिए | हर फ्लोर पर रुक रुक कर सातवें फ्लोर पहुचे | बीच बीच में लोग आते जाते रहे , सब पता नही क्यूँ हमें घूर रहे थे | इतने भी स्मार्ट नहीं हैं हम | लोग भी ना |
 
४. सातवें फ्लोर पर दिखा काफी लोग अंदर आने लगे लिफ्ट में, तो हम बाहर निकल लिए | कुछ ८-१० मिनट वेट करने के बाद हमें फिर मौका मिला अकेले लिफ्ट में जाने का | फिर सारे फ्लोर के बटन दबा दिए | १० मिनट में भला कहीं स्मार्टनेस कम होती है | लोग अभी भी हमें घूरे जा रहे थे , जो भी आ जा रहे थे |

५. ये भी पता किया कि किस किस फ्लोर का स्ट्रक्चर सेम है, किसका डिफरेंट | 

६. फिर अपने फ्लोर पर वापस पहुँच गए और ये देखने लगे कि कौन क्या कर रहा है | ज्यादातर लड़कियों को हमने काम करते पाया | लड़कों की स्क्रीन्स काम और फेसबुक के बीच डोल रही थी |

७. कुछ लोग काल्स पर भी थे | उनकी काल्स सुनने की भी कोशिश की | सुनते पहले भी थे पर कभी समझने की कोशिश नहीं की | आज की भी, तो भी कुछ न समझ आया | लगा कि क्या बकवास करते रहते हैं कॉल पर | फिर सोचा हम भी तो अक्सर कॉल पर रहते हैं ये लोग भी ऐसे ही सोचते होंगे हमारे बारे में |

८. फिर एक रूम दिखा जहाँ श्रेडर मशीन्स खुद के श्रेड किये जाने का वेट कर रही थीं | एक दो बार पहले पर्सनल काल्स लेने के लिए इस रूम में आये थे पर आज पहली बार पता चला काफी ठंडा रहता है वहाँ | पैर फैला कर बैठ गए | इन्फैक्ट लेट गए | 

९. कैंटीन गए , वहाँ सड़क सुरक्षा अभियान का कोई प्रोग्राम चल रहा था | सौरव गांगुली का कोई एक विडियो दिखाया जा रहा था | फिर याद आया दादा तो काफी सुरक्षा के साथ खेलते थे| खैर हमने ज्यादा ध्यान नहीं दिया उनकी बातन पर | एक प्लेट “पास्ता सैलिड” खाया और निकल लिए |

१०. फिर ये देखने गए कि एम्बुलेंस कहाँ खड़ी होती है | ये सब भी पता रहना चाहिए | फायर एक्सिट्स और स्टेयर्स की लोकेशन भी देख डाली |

ये सब करने में कुछ २ ही घंटे बीते | फिर सोचा कि किसी को फोन ही करते हैं | फोनबुक खंगाली |  फिर रुक गए | अपनी डेस्क पर वापस आ गए | आस पड़ोस वालों के साथ बैठकर इधर उधर की बातें की | बंगलोर, पुणे और नॉएडा से टीम के बाकी लोगो की काल्स आती रही | सबकी शंकाओं का समाधान फोन पर ही कर दिया और लगा कि हम तो काफी इंटेलिजेंट भी हैं |

इसी तरह ३ घंटे काटे | बाद में पता चला कि लैपटॉप आज सही नहीं हो पायेगा | कल सुबह ही होगा |  हमने घर वापसी की राह पकड़ी |

रस्ते में सोचा काफी टाइम बर्बाद हो गया आज | बाकी लोगो का भी होना चाहिए और घर आके ये पोस्ट लिख डाली | और देखिये पूरी तरह से सक्सेसफुल रहे | आपका भी टाइम बर्बाद करा ही दिया ना !!!! Smile Smile Smile

अरे बुरा न मानो, भड़ास निकालने के लिए नीचे कमेन्ट बॉक्स है ही और ये गाना भी है सपेशल आपके लिए :

--देवांशु

सोमवार, 3 सितंबर 2012

अजनबी, तुम जाने पहचाने से लगते हो !!!


सीन-१
लड़की बुक फेयर की भीड़ में खोई हुई है | हाथ में किताबों का बोझ है | भीड़ ज्यादा है , तेज चलने में दिक्कत हो रही है | आगे एक स्टाल के बाहर ७-८ लड़कों का हुजूम खड़ा है | सब चिल्ला-चिल्ला कर बातें कर रहे हैं | हा-हा ठी-ठी के दौर चल रहे हैं | वो उनकी तरफ देखे बिना निकल जाना चाहती है |
उसी हुजूम में एक लड़का खड़ा है, लंबी-चौड़ी कद काठी का | वो शायद उसे पहचानती है | पर श्योर नहीं है | वो उससे बात करना चाहती है | पर एक तो भीड़ और फिर ये भी पता नहीं कि ये वही है या नहीं | वो आगे बढ़ती है | जैसे ही उसके पास से गुज़रती है , उसकी आवाज़ उसके कानों में चली जाती है | वो रुक कर बोलती है :
“अभिषेक?? रिमेम्बर, वी मेट समटाइम बैक"
लड़का अजीब से एक्सप्रेसन देता है | डरा सहमा सा | झेंपते हुए बोलता है :
“हाँ , हाँ , याद है , इनसे मिलो, ये सब मेरे दोस्त हैं, ये दो तो ब्लॉगर “भी" हैं !!!”

सीन-२
लड़का अपने दोस्तों के बीच खड़ा है | एक दोस्त की तरफ इशारा करते हुए दूसरे दोस्त से बोलता है :
“मैं इनको जानता ३ साल से जानता हूँ, पर इनसे मिल पहली बार रहा हूँ|”
दूसरा दोस्त : “मिल तो मैं भी पहली बार रहा हूँ, इनको पढ़ा बहुत है, पर आजकल आप लिख नहीं रहे , पिछले डेढ़ साल से कुछ लिखा क्यूँ नहीं ??”
तीसरा दोस्त (वही जो काफी टाइम से लिख नहीं रहा) : “बड़े खाली रहते हो यार, काउंट कर रहे हो कि डेढ़-दो साल से कुछ  नहीं लिखा”|
ठहाकों से पूरा पुस्तक मेला गूँज रहा है |
तभी लड़का एक गुज़रती लड़की की तरफ देखता है |  

ये तो वही है जिसने लास्ट टाइम भरे मॉल में उसे पहचान लिया था | बड़ी टांग खींची गयी थी उसकी | मन ही मन अपने इष्ट देव को याद करता है कि “हे प्रभु मैंने कभी जिंदगी में कोई एक भी पुण्य का काम किया हो तो ये आज मुझे न पहचाने" |

चेहरे पर सायरन छा जाता है | पर भगवन भी ईसई टाइम पर धोखा दे जाते हैं अक्सर | लड़की कहती है :
“अभिषेक?? रिमेम्बर, वी मेट समटाइम बैक"
लड़का अजीब से एक्सप्रेसन देता है | डरा सहमा सा | झेंपते हुए बोलता है :
“हाँ , हाँ , याद है , इनसे मिलो, ये सब मेरे दोस्त हैं, ये दो तो ब्लॉगर “भी" हैं !!!”
“ओह् नाईस टू मीट आल ऑफ यू, मुझे लगा तुम मुझे नहीं पहचान पाओगे |” लड़की कहती है |
लड़के का चेहरा पीला पड़ने लगा है | उसके वही ब्लॉगर दोस्त , जो काफी टाइम से नहीं लिख रहे हैं कहते हैं:
“नहीं, नहीं, अभिषेक “भी" बहुत अच्छा लिखता है”
इसके आगे लड़के की बहुत खिंचाई होती है | चेहरे पर पसरा सायरन कानों में बजने लगता है और उसे कुछ सुनायी नहीं देता है |

सीन-३
मैं वाणी प्रकाशन के काउंटर पर बुक्स टटोल रहा हूँ | मोबाइल पर कॉल आ रही है | मैं फोन उठाता हूँ | एक बहुत ही सभ्य और शालीन आवाज़ …
“सर कहाँ पर हैं?”
“वाणी के स्टाल में तुम कहाँ हो ?”
“मैं भी वहीं बाहर खड़ा हूँ"
“रुको, मैं आता हूँ”
मैं बाहर जाता हूँ | अभिषेक अपने दोस्तों के साथ खड़े हैं | सबसे परिचय कराते हैं | अगला सवाल :
“पंकज भी आये हैं ना"
मैं हामी भरता हूँ और पंकज को फोन करके वहीं बुला लेता हूँ | पंकज का स्वागत बड़ी गर्मजोशी से होता है |
अभिषेक पंकज की ओर देखते हुए अपने दोस्त अन्जुले से बोलते हैं :
“मैं इनको जानता ३ साल से हूँ, पर इनसे मिल पहली बार रहा हूँ|”
अन्जुले : “मिल तो मैं भी पहली बार रहा हूँ, इनको पढ़ा बहुत है, पर आजकल आप लिख नहीं रहे , पिछले डेढ़ साल से कुछ लिखा क्यूँ नहीं ??”
पंकज  : “बड़े खाली रहते हो यार, काउंट कर रहे हो कि डेढ़-दो साल से कुछ नहीं लिखा”|
ठहाकों से पूरा पुस्तक मेला गूँज रहा है |
तभी एक कन्या ने आकर अभिषेक की तरफ इशारा करते हुए कहा :
“अभिषेक?? रिमेम्बर, वी मेट समटाइम बैक"
अभिषेक अजीब से एक्सप्रेसन देता है | डरा सहमा सा | झेंपते हुए बोलता है :
“हाँ , हाँ , याद है , इनसे मिलो, ये सब मेरे दोस्त हैं, ये दो तो ब्लॉगर “भी" हैं !!!”
इन दोनों में एक पंकज और दूसरा मैं हूँ |
पंकज तुरंत बोल देते हैं “नहीं, नहीं, अभिषेक “भी" बहुत अच्छा लिखता है”|
फिर थोड़ी देर तक किताबों के बारे में बातें होती हैं | जो मुझे ज्यादा समझ तो नहीं आती पर मैं मुस्कुराता रहता हूँ | लड़की रुखसत होती है |
थोड़ी देर बाद हम लोग भी जाने की बात करते हैं | अभिषेक की टांग काफी देर से खिंच रही थी तो वो बोलते हैं :
“आप लोग इस तरफ जाओ, हम इस तरफ जाते हैं”
पंकज : “लड़की ने हाय क्या बोल दी, दोस्तों से रास्ता ही  अलग कर लिया तुमने”

सब फिर हँसते हैं | मैं अभिषेक को धमकी देता हूँ कि पोस्ट लिख दूंगा इस घटना पर | वो हमें हलके में ले लेते हैं|

ये पोस्ट बस उसी का बदला है |

डिस्क्लेमर : इस पोस्ट की सभी घटनाएँ, पात्र और जगह, एक दम सच्ची हैं | और प्रशांत प्रियदर्शी की तरह अभिषेक बाबू भी एक अच्छे इंसान हैं | और अभिषेक चाहें तो इस पोस्ट की चर्चा “ब्लॉग-बुलेटिन" पर भी कर सकते हैं |

P.S. : आज का दिन रहा दिल्ली बुक-फेयर के नाम | मम्मी और पंकज के साथ वहाँ गया | अभिषेक और उनके दोस्तों से मुलाकात हुई | कुछ फोटो नीचे हैं |  खरीदी गयी किताबों की फोटो शो-ऑफ के लिए लगाई गयी है |
--देवांशु

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

नखलऊ


इस वीकेंड हमें थोड़े काम से घर जाना पड़ा |  घर पड़ता है लखीमपुर-खीरी में | दिल्ली से वहाँ जाना एकदम आसान नहीं है |


एक तो छोटी लाइन है वहाँ पर, मीटर गेज़ बोलते हैं जिसे | तो कोई कनेक्टिविटी भी नहीं मिलती | या तो बरेली होकर जाओ (हाँ वही जहाँ काफी पहले झुमका गिरने वाली घटना हुई थी ) या फिर लखनऊ होकर जाओ (मुस्कुराइए की आप लखनऊ में हैं, वही वाला लखनऊ) |  मम्मी जी कानपुर से आ रही थी तो हम लखनऊ वाले रूट से निकले लखीमपुर के लिए |


लखनऊ मेल , दिल्ली-लखनऊ के लिए सबसे शानदार ट्रेन्स में से एक है, हम भी वही पकड़े | ट्रेन एक दम ठीक टाइम पर ५ मिनट की देरी से स्टार्ट हो गयी | हम भी अपनी सीट पे चौड़े होकर लेट गए |


अपना रिज़र्वेशन कन्फर्म हो तो आर-ए-सी वालों के देखकर बड़ा सुकून मिलता है |  खाना खाने के बाद नींद आयी तो हमने उन्ही तरसती निगाहों वाले “आर-ए-सी” और “वेटिंग" टिकट वालों की तरफ अंगडाई लेते हुए कहा “ज़ोरों की नींद आ रही है सोया जाये" और लुढ़क गए अपनी अपर बर्थ पर |


नींद खुली तो पाया कि हम पूरे डिब्बे में अकेले हैं, सोते सोते लखनऊ आ गया | सुबह का अर्ली मार्निंग साढ़े ६ बज रहा था | ट्रेन से बाहर आये, एक कप चाय गटके और वेटिंग रूम की तरफ निकल लिए | मम्मी को अभी लखनऊ पहुँचाने में कुछ टाइम था |


वेटिंग रूम , मोबाइल चार्जिंग रूम बना पड़ा था | मानो करेंट की गंगा बह रही है, सब अपने अपने हिस्से का रसास्वादन कर रहे हैं, बड़ी तल्लीनता से | कुछ अपने पात्र लिए खड़े हैं कि कब मैया कि किरपा हो जाये | कटोरा अपना भी खाली ही था, हम भी भक्तों में शामिल हो गए |


वहीं वेटिंग रूम में एक सज्जन मिल गए, बंगाल प्रांत से थे, इलाज़ के सिलसिले में लखनऊ आये थे | हमसे बोले:
“आप यहाँ का लोकाल है?”  (६ महीने कोलकाता रहे इसलिए समझ गए आसानी से)
“नहीं, पर बताइए कि क्या पता करना है, शायद हेल्प कर सकूं"
“हमको आलमबाग जाना है, ऑटो कहाँ से मिलेगी”
“बाहर निकलिएगा और जो ऑटो लेफ्ट को जा रहे , सब आलमबाग जा रहे होंगे"


हमको लगा हमने किसी की तो हेल्प की | पर जल्दी ही उनका अगला सवाल आ गया |
“ये लाखनाऊ कैसा स्टेशोन है ?”
हमने घूर के उनकी तरफ देखा, पर इससे पहले कि हम कुछ बोले वे ही बोल दिए “ मतलब की हावड़ा जैसा है कि उससे खराब"


अब मैं ये सोच रहा था कि या तो हावड़ा अपने आप में कोई रेफेरेंस पॉइंट है जिसके बारे में सारा हिंदुस्तान जानता है, या मेरे चेहरे पर लिखा है कि मैं हावड़ा जा चुका हूँ |
“हावड़ा जैसा बड़ा तो नहीं है, हाँ पर ठीक है” हमने जवाब से मामला सुलटाने की कोशिश की |
“खाने को मिलता है इधर, भात?? हावड़ा में २५ रुपये में भेजिटेबल और ३५ रुपये में फीश देता है, इधर देता है क्या??”

मैंने मन में सोचा की बोल दूं कि भाई ये यूपी है, यहाँ बता देंगे कि सब्जी महंगी है इसलिए ५० रुपये, और चूंकि मछली नहीं है इस लिए साठ रुपये दाम है एक प्लेट का | पर हमने वहाँ से कट लेना बेहतर समझा |


चारबाग स्टेशन से बहार निकले  तो रिक्शे वाले ने ६० रुपये मांग लिए  ऐशबाग जाने के लिए,  क्यूंकि छोटी लाइन की गाड़ियाँ चारबाग से न जाकर  ऐशबाग से जाती हैं  | हमने अपनी व्यवहार कुशलता और बार्गेनिंग पावर दिखाई और बोले ५० रुपये लो, रोज का आना जाना है हमारा | रिक्शे वाले ने घूर के देखा कि सारी दुनिया में ऐशबाग से चारबाग के "डेली" चक्कर लगाने के आलावा तुम्हारे पास कोई काम नहीं है क्या?? वो मान गया | पर माताश्री अड़ गयीं की १५ रुपये लगते हैं | मामला २० रुपये में सुलटा | फिर हमें दिव्यज्ञान मिल गया, ४० रुपये मेरे ट्राली बैग के थे | माताश्री ने बोला  "एक फटहा झोला साथ लिए होते तो १५ में भी आ जाते" | सब श्रद्धा की बात है | बेढब बनारसी याद आ गए “यहाँ कपड़ा कम पहनो तो जजमान और न पहनो तो देवता बन जाओ" |


ऐशबाग पहुंचकर चिल्लर की दरकार हुई, माताश्री उसी के अरेंजमेंट और टिकेट लेने के लिए निकली तो हमारी नज़र सड़क किनारे बैठे , एक बाबा पर गयी | उनका कहना था कि वो भविष्य बता देते हैं | खुले आम, सरे-स्टेशन| सबका भविष्य बता रहे थे, फीस मात्र २० रुपये | ब्रह्मा-विष्णु-महेश कि सत्ता को चैलेंजिया रहे थे | हमने सोचा चलो भविष्य के बारे में पूंछा जाये, फिर लगा कि मेहनत रिक्शेवाले ने ज्यादा की है | माताश्री ने उसे २० रुपये देकर मामला रफादफा किया |


ऐशबाग स्टेशन १९४० के किसी भी स्टेशन की याद दिला दे P20-08-12_10.47(कृपया इस सेंटेंस से हमारी उम्र का आइडिया न लगाईयेगा, कुछ राज़ पिछले जनम के भी होते हैं) | रेलवे को काफी मशक्कत करनी पड़ी होगी इसे मेंटेन करने में | हाँ एक वाटर कूलर लगा हुआ था , उसकी पॉवर का कनेक्शन कटिया डाल के किया हुआ लग रहा था | हमने फोटो खैंच ली |


चहास लगी तो प्लेटफोर्म पर ही चाय की दुकान से चाय ली | चाय में ऐसा लग रहा था कि कुछ कण तैर रहे हैं | पूछने पर पता चला दूध के कण है | पीने पर उल्टी हो जाने की संभावना दिखी | ऐसा बहुत कम ही होता है पर हमने चाय फेंक दी |


रेलवे इन्क्वायरी से बढ़िया इन्फोर्मेशन चाय वालों के पास होती है ट्रेन्स की आवक-जावक के बारे में | टाइम टेबल कह रहा था कि हमारी ट्रेन १०:५५ पर जायेगी, चाय वाले का कहना था कि ११ बजे जायेगी |

ट्रेन चली तो घड़ी ११ ही बजा रही थी | छोटी लाइन की ट्रेन में बैठना भी आसान नहीं है, एक निश्चित आवृत्ति पर आपको हिलते रहना पड़ता है इससे ट्रेन के साथ आप कदम से कदम मिलाते दिखते हैं |


अपने एरिया में आजकल सलमान भाई की “एक था टाइगर" ने बवाल मचाया हुआ है | और जो एक स्पेशल टाइप का चेक वाला गमछा उन्होंने लपेटा है न गले में , हर दूसरा वही गमछा उसी इश्टाइल में लपेटे दिख रहा है |

एक लड़के को वो गमछा नहीं मिल पाया, उसने वैसा ही रुमाल बाँध के रसम अदा कर ली | उसी ने चिल्लाकर पूंछा “ या टिरेन नखलऊ से आय रही है कि नखलऊवार जाय रही है” | हमने इंज़न की तरफ इशारा करके दिखाया और इनडायरेक्टली कहा कि खुद समझ जाओ | बस ऐसे ही कैरेक्टर्स के साथ लखीमपुर तक का रस्ता कटा | इन कैरेक्टर्स की कहानी फिर कभी !!!

घर पहुंचे तो पुरानी यादें जालों की तरह हर तरह हर तरफ फैली हुई थी | उनमे से कुछ, जो कूड़ा बन चुकी थीं, हमने साफ़ की और अगले २४ घंटे वहाँ रहने के लिए जो कुछ भी ज़रूरी था जुगाड़ कर लिया |
--देवांशु

सोमवार, 6 अगस्त 2012

दोस्त…

 

सीन-१

तीन दोस्त, गोवा की एक टूटी सी दीवार, जिसके दूसरी ओर समन्दर है, पर बैठे हुए समंदर की  ओर देख रहे हैं | एक जहाज दिख रहा है | तीनो कुछ बातें करते हैं |  आने वाले वक्त की बातें | दुबारा गोवा आने की बात होती है | एक कहता है कि हर साल आना चाहिए | दूसरा भी कहता है कि ज़रूर आना चाहिए | तीसरा सोचता है कि पता नहीं मिल पाए या नहीं, गोवा आना तो दूर की बात है  | तीनो दीवार से उतरते हैं और मजाक करते हुए चले जाते हैं|

लड़ झगड़ कर भी तीनो साथ रहे क्यूंकि तीनो दोस्त थे  !!!!

सीन-२

कॉलेज की कैंटीन | ५-६ दोस्त | हाथ में किताबें नहीं | ना बीते कल पर शिकवा न आने वाले कल की चिंता | एक टीवी लगी हुई है वहाँ पर, जिसके चैनल टीवी को झापड मार कर बदले जाते हैं | एक दोस्त कविता करता है , हाथ देखता है | दो टेनिस की बाल पटक पटक कर एक दूसरे की तरफ फेंक रहे हैं | बाकी कुछ खा रहे हैं , टीवी पर कैट वाक करती मोडेल्स को देख कर “लेफ्ट राईट लेफ्ट” कर रहे हैं | एक दम बेफिकरे !!!

ज़िंदगी में तूफ़ान आ गया सभी की, साथ कुछ ऐसा कर गुज़रे जो करना आसान नहीं था | पूरे समाज के दकियानूसी ख्यालों के परखच्चे उड़ाकर ऐसा तमाचा मारा कि सबकी आँखें न केवल खुली रह गयी बल्कि डबडबा गयी | और वो ऐसा इसलिए कर पाए क्यूंकि वो दोस्त थे !!!!

सीन-३

एक दोस्त की बोर्ड पर है, एक ड्रम पर | एक गिटार बजा रहा है और गाना भी गा रहा है | पर गाने में कुछ कमी है | पर क्या?? कोई नहीं जानता उन तीनो के अलावा | चौथा दोस्त कार में है, कहीं दूर  | जिस तरह से चारों कि ज़िंदगी बीती है उसके हिसाब से चौथे दोस्त को थोड़ी देर में रवाना होने वाले जहाज़ में होना चाहिए और ये ज़रूरी भी है उसके परिवार के लिए | पर वो स्टेज पर जाता है | बाकी तीनो भी पागल हो उठते हैं | लाइफ का मजा आ जाता है |

वो चारों दोस्त थे !!!!

सीन-४

नहीं पता कि तीसरा दोस्त कहाँ है | एक ने हवाई जहाज की इमरजेंसी लैंडिंग कराई, एक अपनी पैंट तक छोड़ कर भागा | रस्ते में तीसरे दोस्त की गर्लफ्रेंड को उसकी शादी से उठाया | और ढूँढते हुए पहुँच गए तीसरे के पास | लात घूँसा मार कर गले लग गए |  बाकी सारी बातें बेमानी हो गयी |

वो तीनो भी दोस्त थे!!!!

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दरसल दोस्ती की कोई शर्त नहीं होती | दोस्ती में कोई बाउंडेशन भी नहीं होती | दोस्ती बहती नदी सी होती है |

मैं बहुत लकी हूँ, मेरे बहुत से दोस्त हैं |  ज्यादातर दोस्त मेरे स्कूल या कॉलेज से हैं | वो मुझे जानते हैं | कुछ बाद में बने | कुछ तो ऐसे हैं जिनसे मैं मिला भी नहीं कभी | बस नाम की तरह जानता हूँ या किसी किसी की आवाज़ भर सुनी है | बीती ज़िंदगी में वक्त-बेवक्त इन सबकी ज़रूरत पड़ती रही है | जो जैसे काम आ सका है, आया है |

जानता हूँ आगे भी तुम सबकी ज़रूरत पड़ेगी | और ये भी जानता हूँ कि तुम सब फिर मेरे साथ होगे |

तुमपे भरोसा है दोस्तों!!!!!

Dedicated to all my friends, wishing you all a very Happy Friendship Day!!!!!

(ऊपर जिन ४ फिल्मों का ज़िक्र है वो मेरे काफी सारे दोस्तों की पसंदीदा हैं, उनके साथ बैठकर कई-कई बार इन्हें देखा भी है)

-- देवांशु

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

मैं, वो जो नहीं था….

समय : सुबह के ३ बजकर १४ मिनट
मैं अपने घर की छत पर बैठा हूँ | सामने सड़क एकदम साफ़ दिख रही है | कोई चहल पहल नहीं है | एक पुलिस की वैन खड़ी है सड़क के किनारे | कुछ पुलिस वाले कुछ नाप रहे हैं , साथ में खड़ा एक दूसरा पुलिस वाला एक नोटबुक में सब लिखता जा रहा है | सड़क पर गुजरने वाली इक्का-दुक्का गाड़ियां आस पास से गुजर तो रही हैं, पर शायद पुलिस की वजह से रुक नहीं रही हैं |
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समय : सुबह के कोई २ बजे
मैं अपने घर की छत पर बैठा हूँ | सामने सड़क एकदम साफ़ दिख रही है |  शायद कोई मर गया है | एक औरत मरने वाले के सर के पास रो-रो कर बिखरी जा रही है | कुछ लोग उसे संभाले हुए हैं | एक एम्बुलेंस भी खड़ी है पास में , कुछ पुलिस वाले भी | अभी एम्बुलेंस से एक स्ट्रेचर लेकर दो सफ़ेद कपडे पहने लोग निकले हैं, सर पर सफ़ेद टोपी भी है | उन्होंने  लाश को उठाकर एम्बुलेंस में डाल दिया है | वो औरत भी एम्बुलेंस में बैठ गयी है | एम्बुलेंस जा रही है|
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समय : रात के कुछ साढ़े १२ बजे के आस पास
मैं अपने घर की छत पर बैठा हूँ | सामने सड़क एकदम साफ़ दिख रही है |  एक लड़का, जिसकी उम्र कुछ २५ से ३० साल के बीच होगी , सड़क पर तड़प रहा है |  सर से शायद खून बह रहा है | कराह रहा है | हाथ उठ रहे हैं और गिर जा रहे हैं | सड़क पर और कोई भी नहीं है | मुझे शायद एम्बुलेंस को बुलाना चाहिए | पर….
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समय : रात के ठीक सवा १२ बजे
मैं अपने घर की छत पर बैठा हूँ | सामने सड़क एकदम साफ़ दिख रही है | एकदम खाली है सड़क |  एक बाइक आती सी दिख रही है | आराम से चला रहा है उसे एक लड़का | तभी पीछे से एक तेज़ी से आता हुआ ट्रक उसे टक्कर मार देता है | बाइक मेरे सामने ऊपर हवा में गयी है | लड़के को लेकर नीचे गिरती है | मैं ट्रक का नंबर नोट कर सकता हूँ | पर….
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.....दरअसल मैं खुद से डर रहा  था...और इसी डर ने उस रात मेरी जान ले ली...मैंने खुद को ही खत्म कर लिया...फिर अगले दिन मुझे खुद को खत्म करने के इलज़ाम में ताउम्र तड़पने की कैद-ए-बामुशक्कत सुनायी गयी...तब से ही सब मुझे तड़पता देख रहे हैं पर मैं खुद को जिंदा नहीं पाता…
--देवांशु

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

मेलोंकॉली


शहर के कोने में कुछ सीढियां दिखती थी, ऊपर की ओर जाती हुई | और इसी से लगता था जगह कहीं बहुत गहराई में है |  कुछ सुराख़ थे वहाँ, जिन से धुंधला सा उजाला आता रहता | उसी से जिंदगी चलती शहर की |

एक छोर पर एक कारखाना था, जहाँ इंसानी जिस्म तैयार किये जाते |  जान ठूंस दी जाती उनके अंदर | ठीक उसके आगे एक बड़ा सा कमरा था | उस कमरे में पोथी रखी हुई थी | पोथी से पानी रिसता रहता | स्वाद में कड़वा | पीते ही आँखों की रोशनी कम हो जाती | पर उसे पीना निहायत ज़रूरी | ना पीने पर कमरे के पीछे बने आग के कुंड में फेंक दिया जाता लोगो को | किसी ने कभी पोथी को पलटकर नहीं देखा | सब पानी पीते रहे |

कमरे के ठीक सामने एक मैदान सा था | वहाँ लोग गोल गोल घूमते रहते | सबको कहा जाता की जो गोल न घूमा उसे कोड़े पड़ेंगे | किसी ने कोड़े नहीं खाए कभी, पर कोई भी ऐसा नहीं जो गोल ना घूमा | जिनके हाथ पैर टूटते वो मैदान के कोने में लाये जाते | उन पर औज़ार चलते, अगर वो ठीक हो जाते तो मैदान में वापस भेज दिए जाते, नहीं तो वहीँ पर बनी एक-काल कोठरी में पटक दिया जाता उन्हें | 

कोठरी में कोई दानव था शायद, वहाँ से कुछ बाहर नहीं आया कभी, सिवाय चीखों के | पर पोथी वाले कमरे के लाउड स्पीकर हमेशा उन चीखों को दबा दिया करते |

इतनी सी थी उस शहर के हर जीने वाले की ज़िंदगी |

ऐसा माना जाता था कि अगर कोई औरत-मर्द का जोड़ा एक बार उन ऊपर जाती सीढ़ियों को पार कर जाये तो शहर बदल सकता है | एक बार एक जोड़े ने कोशिश भी की, कुछ ही देर में उनके सर लुढकते हुए ज़मीन पर आ गिरे, उन्ही सीढ़ियों से | पोथी वाले कमरे से आवाज़ आयी की सीढ़ी पार करने की कोशिश अधर्म है | एक बुढिया , जिसे खींच के काल-कोठरी में ले जाया जा रहा था, उसने पूरे शहर को उस दिन अभिशाप दिया कि सबका खून काला हो जाये|

पर किसी का खून काला नहीं हुआ | हाँ, बुढिया को सारे शहर के सामने क़त्ल कर दिया गया | उस रात शहर को खाने में सोंचने की ताकत खत्म कर देने वाला अर्क, अमृत बता के पिला दिया गया | शहर को सबसे पवित्र शहर घोषित कर दिया गया | बोला गया यहाँ पैदा होने भर से ज़िंदगी के मतलब पूरे हो जाते हैं |

तबसे किसी ने एक जोड़े के सीढ़ियों उस पार जाने वाली बात भी नहीं की उस शहर में और पोथी से रिसने वाला पानी दिन-ब-दिन और कड़वा होता गया | अब वो जिस्म भी खोखला कर देता है |

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कहते हैं सीढ़ियों के उस पार खुदा रहता है !!!!!
-- देवांशु

बुधवार, 4 जुलाई 2012

और हम पहुँच गए वतन!!!!

हाँ हाँ इसी सोमवार हम पहुँच गए अपने देश…अपने वतन.."ये जो देस है तेरा स्वदेस है तेरा" टाइप गाना गाते !!!

जब गए थे तब लपूझन्ना टाइप ब्लॉगर थे, हैं अभी भी लपूझन्ना , बस कांफिडेंस बढ़ गया है | तो तुरंतै सोचे की एक ठो पोस्ट चिपकाई जाये |  कंटेंट ढूँढने के लिए इधर उधर हाथ पाँव मारे | सोचा देश-भक्ति पर कुछ लिखा जाये | फिर सोचा ये लिखा जाये की हमारा देश कितना महान है | यहाँ और वहाँ की “सोसायटी" में क्या फरक है इसपे भी लिखने का सोचा | और तभी बत्ती गुल हो गयी | और हम भरी गर्मी में बिना पंखा, पसीने में नहाये “ये जो देस है मेरा स्वदेस है मेरा" गाते हुए कमर सीधी करने बिस्तर पर लुढ़क लिए | बत्ती महारानी लागातार आती जाती रहीं और हमें बल्ब के बार बार जलने और बुझने से आभास हो गया की अपने यहाँ अल्टरनेटिंग करंट (AC) आती है | अमरीका में तो लगता था कि केवल डायरेक्ट करंट (DC) आता है | नो चेंज एट आल |


हाँ तो जैसे पहुंचे !!!!


पंकज बाबू एकदम वेट कर रहे थे| जैसे ही हम कार से निकले बोले “मालिक!!! राजकपूर DSC00191लग रहे हो” | हमने कहा "अबे ऋतिक बोलो"| पर तबतक हमें बैकग्राउंड नहीं पता थी | हुआ यूँ कि जब हम चले वहाँ से तो हमारे परम मित्रों आशीष भाई और दीपक भाई ने हमारी  फोटो, जो उन्होंने एअरपोर्ट पर खीची थी, फेसबुक पर डाल दी और हम थे २४ घंटे आफ लाइन |  इसी बीच हमको फेसबुक पर राजकपूर बोल दिया गया | अब बगल में लगी फोटू देखिये | (इस फोटो में ये देखने कि कोशिश है टिकट तो ले लिया है पर जाना कहाँ है)


जैसे ही घर में घुसे पंकज मालिक ने माजा पिलाई और फिर बोले “मालिक!!! बड़े दिन हुए तुम्हारे हाथों कि चाय पिए हुए"| फिर हमने चाय बनाई | सुबह के साढ़े ५ बज रहे थे | (ये लाइन स्पेशली प्रशांत बाबू के लिए है)| चाय के साथ साथ गिटार बजाया गया | ६ बज गया | पंकज बाबू फिर बोले "मालिक!!! सुबह सुबह दौड़ना अच्छी बात है"| सामान खोला, जूते निकाले और चल दिए मैदान पर ४ चक्कर में सांस फूल गयी | पंकज मालिक ६ चक्कर लगा लिए | फिर घर आये तो भूख लग आयी | मैगी बनाई, खाए | 


फिर हमने छेड़ दिया "मालिक!!! आजकल लिख नहीं रहे, क्या बात है" | मालिक तो एकदम सेंटी हो गए "क्या बताएं मालिक, काम बहुत है, टाइम है नहीं" | और इसी टाइप के १५-२० रेडीमेड बहाने उन्होंने चिपका दिए | असली कहानी हमें कुछ औरे लग रही है | खुलासा जल्दी होगा |



ये घर पुरातत्व विभाग को दिया जा सकता है !!!!


और जैसे ही सोने जाने का प्रोग्राम हुआ हमें हमारी साल भर पुरानी टूटी चप्पलें दिख गयी | जो अपनी जगह पे पिछले करीब १० महीने से वैसी पड़ी थी | पंकज मालिक का कहना है कि "वो तो कुछ दिन पहले सोफा हिलाया था तो दिख भी गयी वर्ना ये तो अंदर थी"| तुरंत घर का जायजा लिया गया | कई मसाले के डिब्बे, पुराना गैस सिलेंडर का रेगुलेटर, फ्यूज बल्ब (हाँ वही फ्यूज बलब जिसके बारे में पहले भी बताये थे), पुराने डियो की बोतलें, शैम्पू की बोतलें जिनका दम निकाला जा चूका था , ९-१० महीने से वैसी की वैसी पड़ी थी | हमने मालिक की तरफ देखा| वो बोले "ये रवि भी न, रोबोट की ज़िंदगी जीता था"| हम तो निरुत्तर हो गए | 

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खोयी हुई चीज़ों का मिलना बदस्तूर जारी है | और जिस गति से चीज़ें मिल रही हैं उससे पंकज बाबू को उम्मीद जगी है कि उनका ८ महीने पहले खोया मोबाइल भी मिल जायेगा जो उन्होंने घर में “कहीं” रखा था |  Smile Smile Smile


फिर काफी देर इधर उधर की बातें हुई | एक-एक कप चाय और गटक गए | फिर हम तो निकल लिए सोने , पंकज बाबू चल दिए ऑफिस |


अगले दिन सुबह फिर देर से उठे !!!

रात में काफी देर बैठ के दुनिया जहाँ की बातें हुई | हम जानने कि कोशिश करते रहे कि पंकज बाबू क्यूँ नहीं लिख रहे हैं | पर उन्होंने नहीं बताया | गाने सुने गए | एक दूसरे की टांग खींची | और जल्दी-जल्दी रात में १२-१ बजे तक सो गए | अगले दिन उठे ८ बजे, कोई नहीं गया दौड़ने आज |


 एक नाईट आउट भी हो गया !!!

अभी थोड़ी देर पहले बढ़िया हवा चल रही थी, बारिश जैसा माहौल बना हुआ था, कुत्ते भी भौंक रहे थे | हम दोनों चल दिए अपने पुराने ऑफिस के पास, चाय पीने | जैसे हमारे घर में कुछ नहीं बदला था वैसे ही ये ऑफिस के पास वाली दुकाने भी नहीं बदली थी | वैसे की वैसी और रात में २ बजे भी बदस्तूर चालू हालत में | चाय पी | पुराने ऑफिस में जाकर बाहर फोटो सेशन भी हो गया | बाद में गार्ड ने बताया फोटो लेना "अलाउड" नहीं है |

करीब ३ बजे घर पहुंचे तो पुरातत्व में रूह-आफज़ा की बोतल भी मिल गयी | अभी एक्सपायर नहीं हुई थी, ज़िंदा थी | रूह-अफज़ा के "पेग" बने | टाइमर लगा के यहाँ भी फोटो सेशन हुआ | कुछ फोटो फेसबुक पर हैं | एक जो हमें बेहतरीन लगी वो नीचे है :
DSCN0563-1
इस फोटो में बाईं तरफ पंकज उपाध्याय हैं जिनकी कुछ दाढ़ी पिछली बार बनाते हुए छूट गयी है  | दायीं तरफ जो स्मार्ट और हैंडसम सा इंसान है, वो हम हैं | दोनों तरफ एक एक गिटार भी दिख रहे हैं जो शो-ऑफ के लिए रखे गए हैं|


कुल मिलाकर स्टार्टिंग के २ दिन बड़े धाँसू बीते हैं | अब आगे २-३ हाई-प्रायोरिटी काम पड़े हुए हैं | उन्हें निपटाया जाये | फिर कहानी आगे बढ़ेगी |


बाकी तो ये पब्लिक है सब जानती है !!!!


(रूम की जिस दुर्गति का जिक्र ऊपर किया गया है, उसे करने में हमारा भी विशेष सहयोग रहा था, बस उसको मेंटेन रखने का काम पंकज और रवि बाबू ने बड़ी मेहनत से किया है, पीडी कब आ रहे हो फिर तुम ) Smile Smile Smile

नमस्ते!!!
--देवांशु

शनिवार, 9 जून 2012

इश्क और फेसबुक

 
आज सुबह हम अपने एक बहुत घनिष्ठ मित्र से “चैटिया” रहे थे, घनिष्ठ बोले तो एकदम "घणे"।
मैं : "कैसे हैं महाराज?"
वो : "एक दम दनादन"
मैं : "वाह ये तो बढ़िया स्टेट है?"
वो : "हाँ!!!"
मैं : "तो आजकल किस कन्या के पीछे पड़े हो?"
वो : "यार है एक, सोच रहा हूँ फेसबुक पे फ्रैंड रिक्वेस्ट भेज दूं"
मैं : "हम तो पहले से ही ताड़ गए थे बेट्टा , कुछ गड़बड़ है, काहे की तुम जैसा इन्सान जो इनविजिबल रहता है ,आज हरी बत्ती जलाये, विडियो चैट ओन किये बैठा है "
वो : "अमा तुम तो यार, खैर जाओ अब हमें कन्या को टार्गेट करने दो"
 
हम समझ गए कि हमने सही ताड़ा , हम अब "ताड़नहार" हो गए हैं ।तभी हमें एक धाँसू ख़याल आ गया "प्यार का पहला और आखिरी कदम फेसबुक है" । तड़  से डाल दिए फेसबुक पे । पटापट लोगो ने लाइक  किया । हम समझ गए लोग काफी "अनुभवी" हैं इन सब मामलों में"। Smile Smile 
 
हमने आगे अपने दोस्त से पूछा की हमारी होने वाली भाभी जी का प्रोफाइल लिंक भेजो , हमारा भी अप्रूवल ज़रूरी है । उन्होंने भेज भी दिया। हमने प्रोफाइल देखी तो प्रोफाइल फोटो से कुछ क्लियर नहीं हो रहा था और कवर फोटो में 5 लड़कियां थीं (दो तो हमें भी पसंद आ गयी, मन किया हम ही फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज डालें, फिर दोस्ती की हिप्पोक्रेटिक ओथ याद आ गयी , इसलिए रुक गए )।
 
हमने कई बार नोट किया है की लड़कियां अपनी प्रोफाइल या कवर फोटो अकेले वाली नहीं लगाती हैं, 2-4 और लोग होते ही हैं । इस बात पे जब और सोचा तो लगा की निम्नलिखित कारण हो सकते हैं इसके :
१.  एक कारण जो सीधा सीधा लगा वो ये की कोई उन्हें एक बार में पहचान न पाए ।
 
२. हो सकता है की घर वालों का "फैमिली प्रेशर" हो कि अपनी फोटो नहीं डालोगी । इस तरह की फोटो डालकर वो ये कह के बच जाती हैं कि  देखो मैंने कहाँ "केवल" अपनी फोटो डाली है । बबिता, साधना, हेमा, जया भी तो हैं ।
 
३.  हो ये भी सकता है की वो कोई ऐसी फोटो लगाती हों जिसमे वो बाकी सबसे ज्यादा खूबसूरत (कम से कम खुद को तो ) लग रही हों, जिससे कोई पूछे की इनमे से तुम कौन हो तो कह सकें "वही जो सबसे खूबसूरत दिख रही है"।
 
अच्छा ये तो हुई फालतू की बात , मुद्दे की बात पे आते हैं । हमने अपने दोस्त से पूंछा की अबे इनमे से कौन है तो बोले "बांयें से पांचवी"। पर फोटो में तो ५  ही हैं , दायें से पहली क्यूँ नहीं बताई । फिर लगा बेचारा "गर्लफ्रेंडव्रता" होगा । सीधे नाम क्या, फोटो में भी  इशारा नहीं कर सकता ।
 
हमने उन्हें "आल दा बेस्ट" बोला । आने वाले "चैलेंजेस" के बारे में छोटा सा भाषण दिया, जो १५ मिनट का था । और उनसे रुखसत हुए ।
 
दरसल ये प्यार और फेसबुक का रिश्ता काफी गहरा है । कितनी ही प्रेम कहानियां यहाँ बनी होंगी । लोगो का कहना है कि सोशल नेटवर्किंग के आने से प्यार-इश्क का माहौल परवान चढ़ रहा है । कुछ लोग तो इसी चक्कर में सोशल नेटवर्किंग के विरोध में आ गए हैं । क्या पता आमिर खान को आने वाले टाइम में सोशल नेटवर्किंग के सपोर्ट में सत्यमेव जयते का एक आध  एपिसोड भी करना पड़े Smile
 
हमें लगता है कि  सोशल नेटवर्किंग के आने से प्यार में "कम्पटीशन" बढ़ गया है । पहले "वन-साइडेड" लवर्स की रेंज एक - दो मोहल्ले,  स्कूल-कॉलेज तक होती थी । आज मामला ग्लोबल हो गया । अचानक से बढे इस कम्पटीशन से हमारे टाइप के लोग हलकान हैं । कल तक अनीता (काल्पनिक नाम ) पर मोहल्ले के बबलू और पिंकू, कॉलेज के अजीत , महेश और सतिंदर (कुछ नाम काल्पनिक, कुछ महा-काल्पनिक) लाइन मारते थे । आज न जाने कहाँ कहाँ से आ गए हैं , 1672 तो कुल जमा दोस्त हैं फेसबुक पे अनीता के, जिसमे, 1523 मेल । खुद अपना नाम उसकी फ्रेंड लिस्ट में सर्च करने जाओ तो केवल डी से शुरू होने वाले 128 फ्रेंड है ।  जिसे देखो वो उसे "गुड-डे" "गुड-नाईट" की पोस्ट में टैग कर रहा है । साला समझ ही नहीं आता की हो क्या रहा है । परसों उसने लिखा "नेट कनेक्शन डाउन है" । सौ से ऊपर तो लाइक आ गए । कुछ तो पूंछने लगे कहाँ, कब, कैसे, क्यूँ कितना, किसका । ये भी तक न समझे जब कनेक्शन डाउन है तो उसने पोस्ट कैसे किया । और अगर कर भी दिया मान लो कैसे भी तो, अब जवाब देने के लिए भी बैठेगी क्या? और अगर यही करना था तो उसने "नेट कनेक्शन डाउन है" का पोस्ट ही क्यूँ किया ???
 
इन्ही सब लफड़ों को ध्यान में रखकर फेसबुक के मालिक ने पहले गर्लफ्रेंड बनाई थी बाद में फेसबुक, या ये कहें फेसबुक बना भी था इन्ही लफड़ों के बाद Smile Smile Smile
 
वैसे फेसबुक मैनेज करना भी आसान नहीं है । बड़े बड़े लोग इससे अक्सर छेड़-छाड़ करते रहते हैं । कुछ लोग घर जाते हैं तो "वाल" को अपने साथ ले जाते हैं । कुछ जब देखो तब "वाल" गायब कर देते हैं ।
 
अभी सुनने में आया है की कम्पनियाँ अपने एम्प्लोयी के फेसबुक अकाउंट मोनिटर करने जा रही हैं । ये काम तो मेरे पहचान के एक मैनेजर ने बहुत पहले किया था । वो बहुत फ्रेंडली थे । सबने उन्हें फ्रेंड लिस्ट में एड  कर लिया । अब सबको ऑफिस में फेसबुक खोलने में भी डर लगता है|
 
वैसे प्यार बनाम फेसबुक में जीत हमेशा मोबाइल सर्विस प्रोवाईडर्स की होती है । मामला अन्तर्राष्ट्रीय होने पर बाजी "स्काइप" मार ले जाता है । :) :) :)
 
ये कहानी बहुत लम्बी है फिर कभी बताएँगे अभी मन नहीं कर रहा ।पर  जाते-जाते आपको  एक कालजयी शेर ज़रूर  सुना देते हैं :
 
उन्होंने गरियाया हमें हमारी ही वाल पे, उनकी इनायत है ,
कभी हम उसपे आये कमेंट्स, तो कभी लाइक्स को देखते हैं ।
 
अब आप हमें कमेंट्स में न गरियाना  :) :)
 
नमस्ते !!!!

रविवार, 6 मई 2012

विकी डोनर : पटाखा फिल्लम!!!!

याद है सत्ते पे सत्ता का वो सीन जिसमे अमिताभ बच्चन “दारू पीने से साला लीवर खराब हो जाता है" कहते सुने जाते हैं |  सीन में उनके साथ अमज़द खान भी हैं |  

दर-असल अपनी हिंदी फिल्मों में इस तरह के सीन पुरुषों के खाते में ही आते रहे हैं | पर कुछ दिनों पहले रिलीज़ हुई “विकी डोनर - लाखों में एक” में इस तरह का एक सीन गया है दो महिला किरदारों के खाते  में | जहाँ आमतौर पर सास -बहु लड़ते झगड़ते दिखाई देती हैं , यहाँ साथ में बैठ के “ड्रिंक" कर रही हैं | बहु प्यार से पेग बना रही है | सास पी रही है | बहु भी पी रही है | अपने दुःख दर्द बाँट रही हैं दोनों | पर ये भी एहसास है कि कल जब दोनों की "उतर" जायेगी तो फिर लड़ाई शुरू होगी |

पिछले कुछ सालों में दिल्ली कई फिल्मों में  दिखी है | “ओए लकी, लकी ओए", “लव आजकल",“दो दूनी चार", “प्यार का पंचनामा", ”राकस्टार"  जैसी कई फ़िल्में दिल्ली और आसपास के इलाकों के इर्द-गिर्द बुनी गयी हैं | “विकी डोनर" भी उसी श्रृंखला में आती है | दिल्ली का वो कल्चर जिसमें “पंजाबी" तड़का लगा होता है, इन सभी फिल्मों में देखा जा सकता है | खासकर दिल्ली की शादियों में कार की डिक्की में रखकर दारू की बोतलें खोलना Smile Smile Smile

तो हाँ , ऊपर जिस सीन की बात कर रहा था, वो विकी (आयुष्मान)  की दादी (कमलेश गिल) और माँ (डॉली अहलुवालिया) पर फिल्माया गया है | दोनों पंजाबी वाली अंग्रेजी में बात कर रही हैं | हॉल में तालियाँ बज रही हैं हर डायलोग पे | तभी मेरे रूम-मेट , जो बंगाल से आते हैं (यहाँ पर बंगाल पे ध्यान देना ज़रूरी है), मेरे कान में एक पुराने लतीफे का सार सुना देते हैं “सबसे ज्यादा अंग्रेजी पंजाब में रात ८ बजे के बाद बोली जाती  है” | सभी हंस रहे हैं , हम भी हंसते हैं |

पर ये बंगाली-पंजाबी लड़ाई थोड़ी देर में परदे पर दिखती है | अरे नहीं नहीं, कोई खून खराबा टाइप नहीं है | एक दम मस्त, बिंदास |  हीरो यानी विकी ,पंजाबी है जबकी हिरोइन यानी आशिमा (यामी गौतम) बंगाली हैं | दोनों दिल्ली में रहते हैं | विकी “स्पर्म डोनर" है और आशिमा “बैंकर" है | दोनों में प्यार हो जाता है | शादी को लेकर दो राज्यों को लेकर लड़ाई के जो सीन लिखे गए हैं, उसमे आप पेट पकड़ पकड़ के हंसोगे , पक्का |  विकी आशिमा को “फिश" बोलता है तो आशिमा विकी को “बटर चिकन" |

“एमटीवी रोडीज़" से आये चंडीगढ़ के आयुष्मान, वाकई में एक दिल्ली वाले लड़के लगे हैं | और चंडीगढ़ से ही आयी यामी, एक दम बंगाली बाला  | आयुष्मान ने बढ़िया अभिनय किया है  | बातों से नहले पे दहला मारता हुआ, एकदम दिल्ली का लड़का  |  अगर एक सीन को छोड़ दें , जिसमे नायिका नायक से नाराज़ होती है, तो यामी ने भी बढ़िया एक्टिंग करी है | बस एक उसी  सीन में वो चीखती हुई ज्यादा नज़र आयी मुझे |

फिल्म का सबसे असर-दार कैरेक्टर हैं अन्नू कपूर, जिन्होंने डॉ. चड्ढा का रोल प्ले किया है | वे एक मंझे हुए कलाकार हैं, और वो साफ़ झलकता है | फिल्म की बैक-बोन हैं डॉ. चड्ढा | विकी उन्ही की क्लिनिक में स्पर्म डोनेट करता है |  कई जगह तो अन्नू कपूर ने अपनी भाव भंगिमा और डायलोग डिलीवरी से सीन में हंसी का फव्वारा छोड़ दिया है | मसलन स्पर्म बोलते वक्त अपनी दो उँगलियों को हवा में लहराना | लोग हॉल में ही उसे कॉपी करने लगे थे |

फिल्म में बाकी भी कई किरदार हैं, जैसे आशिमा के पिता और बुआ, जो बोलते बोलते बंगाली शब्दों का प्रयोग करते हैं और सीन देखने लायक बन जाता है | विकी के दोस्त और रिश्तेदार भी हैं, जो जगह जगह पे अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते हैं | पूरी फिल्म में जिसको जितना भी रोल मिला है , सभी ने तरीके से निभाया है |

तकनीकी पक्ष में, फिल्म की कहानी अच्छी है और स्क्रीनप्ले चुस्त-दुरुस्त | “स्पर्म डोनर" का सब्जेक्ट बहुत सेंसिटिव था और कहानी या स्क्रीन-प्ले में थोड़ी सी भी ढील उसे बेहद बेहूदा बना सकती थी, पर ऐसा नहीं हुआ |  संगीत की खास बात ये है कि अलग से घुसेड़ा हुआ नहीं लगता | खुद आयुष्मान ने भी एक गाना गाया है | फिल्म एक भावनात्मक मोड़ पे खतम होती है, फिर भी हॉल से जॉन अब्राहम को परदे पर देखे बिना आप नहीं निकलोगे |

कुल मिला के मुझे फिल्म बढ़िया लगी |  हॉल में खूब ताली बजाई, जोरजोर से हँसे | विकी, डॉ. चड्ढा , मिसेज़ खुराना ,  विकी की दादी  और फिल्म के डायलोग के चलते फिल्म को दुबारा भी देखा जा सकता है | दुबारा देखने पर भी हंसी आने की पूरी संभावनाएं हैं | Smile Smile Smile

-- देवांशु

शुक्रवार, 4 मई 2012

ए ट्रेन टू पाकिस्तान!!!

राजधानी एक्सप्रेस में एक किताब यात्रियों को मिलती है , जिसमे रेलवे के अतीत और वर्तमान के बारे में बताया जाता है | साथ में एक कहानी भी होती है जो ट्रेनों के इर्द-गिर्द लिखी गयी हो | पिछले साल दो बार राजधानी में सफर किया, दोनों बार एक-एक कहानी पढ़ने को मिली, एक थी रस्किन बोंड  की “टाइगर इन द टनेल" , और दूसरी थी एक कहानी एक गाँव के बारे में , पूरा गाँव ट्रेनों की आवाजाही से खुद को ट्यून रखता था | ट्रेन का आना जाना उनकी दिनचर्या चलाता था | खुशवंत सिंह के प्रसिद्ध उपन्यास “ट्रेन टू पाकिस्तान" का पहला अध्याय है वो कहानी |

जब से पढ़ी वो कहानी,  पूरा उपन्यास पढ़ने का मन था | पर कहीं मिली नहीं या ये कहें कि मन से कोशिश भी नहीं की | फिर पिछले दिनों यहाँ की डिस्ट्रिक्ट लाइब्रेरी में भारतीय लेखकों की किताब ढूंढते ढूंढते मिल गयी |  और पूरे दो हफ़्तों में पढ़ के निपटा डाली | आज उसी किताब के बारे में लिख रहा हूँ |

संक्षेप में कहानी : 
एक प्रेम कहानी है जो भारत-पाकिस्तान के बंटवारे की पृष्ठभूमि में लिखी गयी है | कहानी का मुख्य पात्र “जग्गा बदमाश" है|  वो एक सिख है | वो अपने गाँव की ही एक मुसलमान लड़की , नूरन, से प्यार करता है | गांव का नाम "मनो-माजरा" है | समय १९४७ के सितम्बर के आस-पास का है और जगह जगह धर्म के नाम पर  दंगे भड़के हुए हैं | जग्गा को सूरज ढलने के बाद गाँव छोड़कर जाने की इज़ाज़त नहीं है | पर वो रात के अँधेरे में ही नूरन से मिलने जाता है |  उसी रात उसका एक दुश्मन, मल्ली, गाँव के एक मात्र हिंदू परिवार लाला रामलाल के घर डकैती डालता है और उसका खून कर देता है | 

अगले  दिन गाँव में इक़बाल नाम का समाजसेवी आता है जो गांव के गुरूद्वारे में ठहरता है | लाला रामलाल के खून के सिलसिले में पुलिस जग्गा और इकबाल दोनों को गिरफ्तार कर लेती है |  पुलिस जग्गा से मल्ली बदमाश का नाम उगलवा लेती है और गिरफ्तार भी कर लेती है |

इसी बीच "मनो-माजरा" स्टेशन पर एक ट्रेन आकर रुकती है |  ट्रेन पाकिस्तान से आयी हुई होती है जो लाशों से भरी होती है | दंगे भड़कने का खतरा हो जाता है | शहर के मजिस्ट्रेट “हुकुम चंद" एक चाल चलते हैं जिससे वो मुसलमानों को सुरक्षित कैम्प में पहुँचाने में सफल तो हो जाते हैं पर पुलिस को मल्ली बदमाश को छोड़ना  पड़ता है और वो कुछ और लोगो के साथ मिलके "खून का बदला खून" की तर्ज़ पे पाकिस्तान जाने वाली ट्रेन में लोगो को मार डालने का प्लान बनाता है | 

उपन्यास में एक प्रेम कहानी और भी है , मजिस्ट्रेट “हुकुम चंद” और “हसीना" की भी | हसीना पेशे से एक वेश्या है और उस ट्रेन में भी सवार है जो पाकिस्तान जा रही है | हुकुम चंद के कहने पर पुलिस जग्गा और इकबाल को छोड़ देती है | जग्गा को जब ये पता चलता है कि मल्ली ट्रेन में जा रहे लोगो को मारने वाला है और उसी ट्रेन से मनो-माजरा के मुसलमान भी जा रहे हैं जिसमे से एक नूरन भी है | तो वो अपनी जान पर खेलकर मल्ली के मंसूबों को कामयाब नहीं होने देता है | 


उपन्यास  के बारे में :
१९५६ में प्रकाशित हुआ ये उपन्यास, लेखक खुशवंत सिंह के सबसे प्रसिद्ध उपन्यासों में से एक है |  मुझे जो संस्करण मिला वो भारत की आजादी की साठवीं imageसालगिरह पर प्रकाशित विशेष अंक है | इसमे मार्गरेट बौर्के- व्हाइट के लिए कुछ चित्र भी हैं जो उन्होंने १९४७ में बंटवारे के समय लिए थे | चित्र भयावह हैं और इसीलिए  उपन्यास के मुख-पृष्ठ पर ही “विचलित कर देने वाले चित्र" की चेतावनी भी लगी हुई है |

कहानी के अलावा मुझे उपन्यास के दो अंश बहुत बढ़िया लगे | एक तो जिसमे लेखक ने "मनो-माजरा" के लोगों की दिनचर्या और वहाँ से गुजरती ट्रेन की आवाजों का तारतम्य दिखाया है | और दूसरा वो जिसमे खुशवंत सिंह “मानसून" का वर्णन करते हैं | दोनों ही हिस्से थोड़े लंबे ज़रूर लगे हैं पर कहानी के साथ गुंथे हुए हैं | कुछ देर बाद ही उनकी आवश्यकता , जो कथानक के लिए है, समझ आ जाती है | 

चित्र वाकई में  ह्रदय विदारक हैं  | कुछ को देखकर दिल दहल उठता है | मसलन एक वो चित्र जिसमे रेलवे लाइन के पास एक लाश पड़ी है और पास के प्लेटफोर्म से लोग गुजर रहे हैं, किसी को फर्क ही नहीं पड़ रहा है | ज़िंदगी इतनी सस्ती होती दिखती है | एक और चित्र है जिसमे कूड़े के ढेर में  कटा हुआ पैर का पंजा पड़ा हुआ है | एक चित्र में घरों की छत पे गिद्ध बैठे हुए हैं और उसका वर्णन पढ़ के समझ आता है कि वो किस लिए बैठे हुए हैं |


अब अपनी बात :
उपन्यास को पिछले शनिवार खतम किया और अगले दिन इसी पर बनी फिल्म देखी जिसका नाम भी उपन्यास के नाम पर ही है |  यहाँ से वो लिख रहा हूँ जो मेरे दिमाग में चल रहा है |

बंटवारा किसी के लिए अच्छा नहीं हुआ | दिल्ली में बैठे हुकुमरानों ने इसका निर्णय लिया और हजारों लोग उस एक फैसले की कुर्बानी चढ़ गए | ना केवल वो जो मारे गए, बल्कि वो भी जो अपना सब कुछ छोड़ के सरहदों को पार कर गए | ये एक ऐसी त्रासदी थी जिसका भुगतान दोनों देश आजतक भुगत रहे हैं |

खैर इस मुद्दे पर बातें बहुत होती आयी हैं, और आगे भी होती रहेंगी |बात उपन्यास की करते हैं एक बार फिर से, पर अब कहानी के बारे में नहीं , किरदारों के बारे में | देखा जाये तो कोई भी किरदार पूरी तरह से सकारात्मक नहीं है | एक तरफ जग्गा और मल्ली हैं, जो बदमाश हैं | दूसरी तरफ मजिस्ट्रेट और उनका सरकारी ताम-झाम है |  पूरा अपनी मर्जी का मालिक | उसके पास ताकत है पर नीयत नहीं है | या ये कहें कि खुद को “प्रैक्टिकल" होने की दहलीज में बाँध लिया है | इतनी सब ताकत होने के बावजूद पूरा तंत्र दंगे होने के नाम से ही सिहर उठता है | गलत फैसले करता है |


"हुकुम चंद", रंग-रलियों में डूबे हुए हैं | पूरे जिले की जिम्मेदारी है उनपर, वो भी ऐसे समय में जब कुछ भी स्थिर नहीं है , पर उन पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है | उनके सलाहकार भी ऐसे ही हैं | 

एक इकबाल है , समाज सेवी है | लन्दन में पला बढ़ा है |  समान अधिकारों की बात करता है | पर गांव में पूरी तरह फिट नहीं बैठता | टिन के डब्बों में बंद खाना खाता है | लोग उसकी बात सुनते हैं क्यूंकि वो पढ़ा लिखा है | पर जब कुछ करने की बारी आती है तो नशे में धुत होकर सोचता है “The doer must do only when the receiver is ready to receive. Otherwise, the act is wasted” | और सो जाता है |

फिर एक गांव है, जिसमे लोग रहते हैं | उनमे कोई आपस में गिला-शिकवा नहीं है |  दंगों की घटना से डरे-सहमे तो  हैं , पर साथ रहने को तैयार हैं | लेकिन उन्हें बंटना पड़ता है , ना चाहते हुए भी | उनकी गलती बस यही है कि उनकी किस्मत वो नहीं, दिल्ली में बैठे लोग तय करते हैं |  मल्ली और उसके साथी भी फायदा उठा कर घरों को लूटते हैं और उनको पुलिस का संरक्षण भी मिलता है | पर जग्गा का प्यार जाग उठता है | वो बदमाश है पर फिर भी उसमे दिल है | प्यार हुकुम चंद को भी हो जाता है हसीना से | पर ना तो वो उसे पाकिस्तान जाने से रोक पाते हैं और ना उन लोगो के खिलाफ भी कुछ  कर पाते हैं जो ट्रेन में लोगो को मारने जा रहे हैं |

कुल मिलाके , जिसके पास जितनी शक्ति है वो उतना कमज़ोर बना हुआ है | ठीक वैसा जैसा हम आज तक देख रहे हैं | ये उपन्यास इसलिए भी एक अलग अहमियत रखता है क्यूंकि इसमे हम बीते कल में हुई गलती देख सकते हैं | उस कमी को देख सकते हैं जो आज़ादी लेते समय रह गयी | वो कमी जो आजतक लोगो को बड़े-छोटे, अमीर-गरीब में बांटती रहती है | वो कमी जो आजतक लोगो को देश से पहले खुद के बारे में बार बार सोचने पर मज़बूर करती रहती है | 

ऐसा नहीं था कि मनो-माजरा के मुसलमानों को पाकिस्तान जाना ज़रूरी था क्यूंकि गांव का माहौल खराब था ही नहीं | माहौल बिगाड़ा हुकुम चंद के गलत फैसलों ने | और फिर वो खुद ही उसको संभाल नहीं पाए | कहना पड़ा कि जो हो रहा है होने दो, कहाँ तक रोकेंगे | “गोली हुकुम चंद देखकर रुक नहीं जायेगी, वो तो चलेगी ही” ये सोचके खुद नहीं गए और लोगो को मरने के लिए छोड़ दिया |  उपन्यास ये भी बताता है कि चुपचाप जुल्म सहते रहना भी गलत है | गांव के सब लोग अच्छे थे पर चुपचाप रहे , एक साथ खड़े नहीं हो पाए |  नतीजा सबके सामने था |मुझे तो "मनो-माजरा" कोई एक गाँव नहीं पूरा भारत लगा | वही बेफालतू की लड़ाई, अफरातफरी, खून-खराबा | वो काम करना जिसका कोई हासिल नहीं | इंसान की ज़िंदगी की कौड़ियों में कीमत लगाना | 

और आखिर में :
मन में तो बहुत कुछ आ रहा है कि लिखूं, पर शायद वो बात को भटका देगा | वो फिर कभी | फिलहाल इतना ही कि “ट्रेन टू पाकिस्तान" और इस जैसे कई और उपन्यास, कहनियाँ और किताबें पढ़ना इसलिए भी ज़रूरी है कि हमें अपनी गलतियों का एहसास हो | जो बीत गया उसे भुला देना ठीक है पर बिना कुछ सीखे हुए नहीं | इतिहास रोने के लिए नहीं होता केवल, वो भविष्य निर्माण का रास्ता भी दिखाता है | अगर इस तरह का कोई बदलाव अगर पढ़ने वाले में ला सके तो “ट्रेन टू पाकिस्तान" एक असाधारण उपन्यास है |

आजादी की कीमत कई तरह से चुकानी पड़ी है | अहिंसा के मार्ग पर चलकर हमें आज़ादी तो मिल गयी, पर लोगो के एक जुट ना हो पाने का खामियाजा बहुतों को भुगतना पड़ा | रामधारी सिंह “दिनकर" की चार पंक्तियाँ याद आती हैं:
“पातकी ना होता है प्रबुद्ध दलितों का खड्ग,
पातकी बताना उसे दर्शन की भ्रान्ति है |
शोषण की श्रंखला के हेतु बनती जो शान्ति,
युद्ध है, यथार्थ में भीषण अशांति है |”
                                                                                                           (“कुरुक्षेत्र", तृतीय सर्ग)

मुझे उपन्यास अच्छा लगा,  उसपर बनी फिल्म तो और भी अच्छी | बाकी आपकी पसंद है, समय मिले तो उपन्यास ज़रूर पढ़ें, फिल्म भी देखें | (फिल्म जब बनी थी तो केवल वयस्कों के लिए ही बताई गयी थी, पर आज का माहौल अलग है )
--देवांशु