बुधवार, 10 अप्रैल 2013

मुझे आपकी फिर से ज़रूरत है पापा !!!

आपको गए हुए कुछ एक साल गुजर गया है पापा | सही बताऊँ तो एक एक दिन बड़ी मुश्किल से बीता है | कभी कभी लगा कि काश वक्त  के पर होते  क्यूंकि काफी सारे लम्हे बहुत परेशान करके गुजर रहे थे | पिछले एक साल में इतना कुछ बदल गया | ना जाने कहाँ से कहाँ आ गए हम सब | कई ऐसे लम्हे आये जब हम सबने आपको बहुत मिस किया | बहुत ज्यादा |

दर-असल ज़िंदगी किसी की भी हो, पूरी तरह से उसकी अपनी नहीं होती | जिंदगी के कई हिस्से होते हैं और वो अलग-अलग लोगो के होते हैं | आप हम सभी कि ज़िंदगी का अहम हिस्सा हमेशा रहोगे जैसे हम आपकी ज़िंदगी के हिस्से थे | आपको खोने के साथ खोने का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जो ना जाने कहाँ जाकर रुके , पापा |

कभी-कभी सोचता हूँ कि शायद मैं दुनिया के कुछ ऐसे लड़कों में होऊंगा जो अपने पापा जैसा नहीं बनना चाहते | आप मेरे आइडियल भी नहीं थे | और इसका एक ये भी कारण है कि आपने कभी ऐसा नहीं चाहा | आप हमेशा हमें किसी और की तरह बनाने की कोशिश करते रहे | और हम किसी और में अपने आइडियल ढूंढते रहे |  पर ज़िंदगी में जब भी सबसे ज्यादा उदास हुआ , मैंने हमेशा आपको अपने पास पाया था | प्री-फ़ाइनल इयर में जब मेरी बैक आयी थी तो कॉलेज की हट पर फूट-फूट के रो रहा था | सबसे बात की पर रोना थमा तो आप से बातकर के | जब आपने कहा था “अबे फर्स्ट डिविज़न तो आ ही जाओगे, हम तो सेकंड के ऊपर कभी ना बढ़े” | अक्सर ये भी सोचता हूँ कि मुश्किल से मुश्किल बातों को हल्के से लेने की हिम्मत भी मुझे आप ही से आयी है |

पापा, आप कोई अन्ना हजारे नहीं थे | पर करप्शन को हैंडल करने का आपका अंदाज़ मुझे हमेशा इम्प्रेस करेगा | अपनी नौकरी के पहले ही दिन एक आदमी ने आपको २ रूपये रिश्वत देने की कोशिश की थी | आपने लेने से माना कर दिया | उस आदमी का काम नहीं हुआ | उसने कंप्लेंट कर दी कि कम रुपये दे रहे थे तो मेरा काम नहीं किया | उस दिन आपके साहब ने आपको समझाया था कि काम भले ही किसी का हो रुपये जो दे लेते चलो वरना, ऐसे ही कम्प्लेंट खाओगे | ये वो सरकारी दफ्तर है जहाँ पेशकार तक फाइल बढ़ाने के लिए उसपर “महात्मा गांधी" को रखना पड़ता है | और उसका हिस्सा ऊपर तक जाता है | आपने एक नयी स्टाइल निकाल दी | “जितनी रिश्वत लूँगा सारी मैं रखूंगा , किसी और को एक पैसा नहीं दूंगा| जब गाली मेरी तो पैसा भी मेरा |” शायद ही कोई ऑफिसर रहा होगा जो आपसे खुश होगा | अपने पूरे करियर का एक बड़ा हिस्सा आपने पूछ-ताछ कार्यालय में इसीलिए बिता दिया क्यूंकि वहाँ कोई स्कोप नहीं दिखता था किसी को  |  आप की अहमियत क्या थी ये आपके जाने के बाद आपके ऑफिस वालों को पता चल रही है | कितनो के एरियर्स अभी भी लटके हुए हैं | अक्सर जाता हूँ आपके ऑफिस , वहीं पर लोग बताते हैं | आप जिस सीट पर थे वहाँ पर बैठकर कितनो की पेंशन बंधने में आपने मदद की | उसी सीट पर विराजमान महाशय को मैं हजारों रूपए की “रिश्वत" दे चुका हूँ जिससे मम्मी की पेंशन चाहे कुछ टाइम बाद बंधे पर उन्हें दौड़ना ना पड़े | पर ऐसा पूरी तरह से हो भी नहीं रहा | हम सबकी पढ़ाई के लिए आपने जो मेहनत की वो हम सबसे छुपी नहीं है | रात-रात भर आप काम करते थे | कितने ही लोग अपने “नक़्शे" आप से बनवा के ले जाते थे | कईयों ने कहा है कि ना जाने कैसे होगा अब काम | पर ये वही ऑफिस है जहाँ के लोगो ने आपका २ साल पहले जबरदस्ती पड़ोस के एक गाँव में ट्रान्सफर कर दिया था | उसी दौड़ से आपकी हेल्थ बिगड़ी और फिर बिगड़ती ही गयी | मैंने आपसे कहा भी था कि ट्रान्सफर रुकवाने के लिए जो भी मांग रहे हों दे दो, पर आप नहीं माने थे |आप शायद पूरी तरह से ईमानदार भले नहीं थे, पर दूसरों की बेईमानी आप पर कभी हावी नहीं हो पायी |

कुछ “महा पोंगा” ज्योतिषियों ने कहा है कि मेरे और मेरे भाई की “कुंडली” में कुछ ऐसा है कि हमें पितृ-शोक होगा और इस वज़ह से आप नहीं रहे | इन “कमीने"  ज्योत्षियों को काश मैं खुले आम मार सकता | पहली बात तो मैं इन सबपे विश्वास नहीं करता | और अगर ये सब सही भी है तो आपकी अहमियत हम दोनों के लिए और बढ़ जाती है कि आपने पैदा होते ही हमें मार नहीं दिया | खुद भले ही नहीं रहे पर हमें जीने दिया |  वैसे आप इनसब पर बहुत विश्वास करते थे | घर आये एक ऐसे ही कैरेक्टर ने आपकी उम्र की भविष्यवाणी की थी ८३ साल | पर आप तो ५८ साल ही जिए | पिछले कई बार से उसे ढूंढ रहा हूँ लखीमपुर में , पूरे २५ साल का हिसाब मांगना है कमीने से |

पापा आपको जाते-जाते भी नहीं देख पाया | आखिरी बार आपको लखीमपुर के रेलवे स्टेशन पर देखा था , आप मुझे छोड़ने आये थे | तब लगता था कि आपसे फिर मिलूँगा |मैंने आपको कई बार बीमार पड़ते देखा और आप हमेशा ठीक होकर बाहर आ गए | इस बार भी लग रहा था कि आप ठीक हो जाओगे | पर शायद ये होना तय था | आपको आखिरी वक्त ना देख पाने का दुःख मुझे हमेशा रहेगा |

एक बात और है जो आपको कभी नहीं बता पाऊंगा  | आपके जाने के कुछ घंटों बाद मैं न्यूयार्क एअरपोर्ट पर अपनी फ्लाईट का वेट कर रहा था | मैं अकेला था वहाँ | पर एक आवाज़ थी मेरे साथ | उसको मैंने पहले कभी देखा नहीं था | उसने मुझे बाँध कर रखा था वरना टूट कर बिखर गया होता | उस आवाज़ की रोशनी धुंधली हो रही है पापा |  मुझे आपकी फिर से ज़रूरत है पापा उसको बचा के रखने के लिए| कहीं से आ जाओ ना पापा !!!!

अपने जाने के बाद आप बहुत सारी जिम्मेदारियां छोड़कर गए हो | पता नहीं उनमे से कितनी पूरी कर पाऊंगा | पर कोशिश करूँगा जितनी भी निभा पाऊँ, ढंग से निभाऊं | कहते हैं ऊपर हर कोई मिलता है एक दूसरे से | कोशिश करूँगा जब आप से मिलूँ तो आपसे नज़रें मिला सकूं और कह सकूं कि देखिये आपके जाने के बाद भी मैंने कुछ बिगड़ने नहीं दिया , सब संभाल लिया मैंने |  बस जहाँ भी हो मुझे हेल्प करते रहना पापा |

I miss you a lot Papa!!!!
 ****

“You think the dead we have loved ever truly leave us? You think that we don’t recall them more clearly than ever in times of great trouble? Your father is alive in you , Harry, and shows himself most plainly when you have need of him” – J.K. Rowling in “Harry Potter and the Prisoner of Azkaban”

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

बाइक की सवारी, गाँव घुम्मकड़ी और बाबा गुप्तिनाथ के दर्शन !!!

पिछले दिनों घर जाना हुआ | एक शाम पंकज के पापा घर पर मिलने आये | उनसे बात करते करते पता चला कि अगले दिन वो अपने गाँव जाने का प्रोग्राम बना चुके हैं | पंकज और हमारा गाँव भी एक ही है |  हमने भी जाने का प्रोग्राम बना लिया | भाई को भी तैयार कर लिए |

अगले दिन का पहला टास्क था, बाइक की सफाई | पापा के जाने के बाद से वो कमरे में पड़ी धूल खाती रहती है | झाड़-पोंछ के रेडी की गयी | काम भर का पेट्रोल भी डाला गया जिससे पेट्रोल पम्प तक पहुंचा जा सके | फिर बाइक के कागज़ ढूंढें गए जिससे कोई लफड़ा-लोचा हो तो निपटा जा सके | आजकल गुस्सा काफी आने लगा है सो एक दो बार चिल्लाये भी सबपर कि कोई भी सामान ठीक से नहीं रखता है | स्टेटमेंट की रेंज में हम भी आते थे तो सबने सारी जिम्मेदारी हमपर भी डाली और हमारा गुस्सा अपने आप शांत हो गया |

DSC_0889फिर हेलमेट पहन के एक दम तैनात हो गए | छोटे भाई ने पीछे की सीट का कार्यभार संभाल लिया | घर से निकलते ही फोटू खिचवाये | हेलमेट पहनकर और बाइक पर बैठकर | उसके बाद आगे बढे |

जब यात्रा शुरू हुई तो पहला पड़ाव था , पेट्रोल पम्प | जाकर पेट्रोल भरवाया गया | थोड़ी दूर गाड़ी चली तो “कड़-कड़" की आवाज़ के साथ बंद हो गयी | तब पता चला कि इंजन-आयल भी खतम हो गया है | अगले पेट्रोल पम्प तक कोई तरह पहुंचे फिर इंजन-आयल भी डलवाया | फिर थोड़ी बहुत परेशानी देते हुए चलती ही रही बाइक |

मेरा शहर , उत्तर-प्रदेश के तराई एरिया में आता है , जिसे गांजर भी कहते हैं | इसका कारण वो तमाम छोटी-छोटी नदियाँ हैं, जो वहाँ पर जाल की तरह फैली हुई हैं | दो मुख्य नदियाँ घाघरा और शारदा हैं |साथ में गोमती और सरयू नदी भी हैं |  घाघरा नेपाल से बह कर आती है | शारदा नदी का उद्गम पूर्णागिरी की पहाड़ियों में हैं | उस अंचल में पूर्णागिरी माता की महत्ता वैष्णों देवी जैसी ही है | बचपन में एक बार वहाँ भी जाने का मौका मिला है | बड़ी अच्छी जगह है | घाघरा नदी का बहाव बहुत तेज है और शारदा नदी से वो थोड़ा ऊँचाई पर बहती है | लखीमपुर के बाहर निकलने के थोड़ी दूर पर ही ( शायद बहराइच जिले में) ये दोनों नदियाँ मिल जाती हैं | इस वजह से घाघरा का ढलान वाला बहाव है और वो बहुत तबाही मचाती है | तबाही मचाने के मामले में शारदा नदी घाघरा से भी आगे है | छोटे भाई ने बताया कि उत्तर-प्रदेश में शारदा नदी सबसे ज्यादा तबाही मचाती है | लखीमपुर जिला इसकी बहुत मार झेलता है | शारदा  की कई सहायक नदियाँ भी है जिसमे कंडवा और उल्ल नदी प्रमुख हैं | इन नदियों के बारे में ज्यादा कुछ मिलता नहीं | उल्ल नदी का एक घाट मेरे घर से १ किमी की दूरी पर ही है |


इन्ही नदियों के पास कई सारे छोटे-बड़े मंदिर भी हैं | जिसमे से एक “लिलौटीनाथ” बहुत प्रसिद्द हैं | ये उल्ल नदी के तट पर बना है | एक किवदंती के अनुसार अमर योद्धा “आल्हा" और “ऊदल" आजकल इसी क्षेत्र में रहते हैं , छुपकर | बरसात के मौसम में यहाँ आल्हा भी गाया जाता है | आल्हा “जगनिक" के द्वारा लिखा गया एक आदिकालीन काव्य “आल्ह-खंड" के हिस्से हैं | यहाँ इसे ढोलक की थाप पर गया जाता है |  एक हिस्सा जो मुझे याद है :

जाकर बिटिया क्यारही देखीं, ताघर जाय धरें तलवार | औ नौ मन सेंदुर गर्दा ह्वैगा, तब चुटकी भर चढा लिलार |

संगीत की जानकारी बहुत तो नहीं है पर फिल्म “मंगल पांडे” का गीत “मंगल-मंगल"  की धुन भी कुछ-कुछ इसी तरह की लगती है मुझे | बचपन में एक कहानी ये भी सुनी थी कि लिलौटीनाथ के दर्शन किसी भी समय करने जाओ,  वहाँ पर हमेशा ताज़े फूल ही चढ़े मिलते हैं | पर इस तरह कि किवदंतियां लगभग हर जगह से सुनने को मिलती  हैं |


पंकज के पापा भी शारदा नदी के किनारे बने एक मंदिर बाबा गुप्तिनाथ के यहाँ यज्ञ में जा रहे थे | “गुप्तिनाथ"  शंकर जी हैं और एक पीपल के पेड़ की जड़ में निवास करते हैं | गुप्त तरीके से | इसीलिए उनका ये नाम है | एक केले के पेड़ की नाली बनाकर बाबा पर जल चढ़ाया जाता है | आसपास के लोगो में इनकी काफी महत्ता है | मंदिर तो हालांकि काफी पुराना है पर उसकी एक इंटरेस्टिंग बात वहाँ के कुछ लोगो ने हमें बताई:
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दो साल पहले शारदा में बहुत भयंकर बाढ़ आयी थी | कई गाँव बह गए थे | बढ़ते बढ़ते नदी मंदिर की तरफ भी आ गयी थी | मंदिर के पास एक दुमंजिला धर्मशाला भी बना हुआ था | नदी का पानी उसके चारों ओर भर गया और वो ज़मीन के अंदर धंस गयी | उसका कोइ नाम-ओ-निशान नहीं दिखता वहाँ पर | पर नदी जब मंदिर की ओर बढ़ी तो बस मंदिर को छू कर वापस लौट गयी |  मानो बाबा के पैर छूने आई हो और वापस लौट गयी हो |तबसे मंदिर की बहुत महत्ता बढ़ गयी |

DSC_0898किसी की धार्मिक भावना को ठेस न पहुचाते हुए और किसी भगवान का अनादर ना करते हुए , एरिया के आस-पास देखने से मुझे ऐसा लगा कि नदी के पानी के वापस लौटने का एक कारण उस पीपल के पेड़ की जड़ें भी रही होंगी जिसकी वजह से ज़मीन का कटान रुक गया होगा |  भगवान के साथ-साथ पीपल की पूजा भी की ही जाती है |आजकल नदी में पानी कम है | करीब डेढ़ किमी पीछे खिसक गयी है | उसकी एक छोटी सी धारा वहाँ से बहती है आजकल , इसे वहाँ “सुतिया" बोलते हैं | वहीँ चाय-नाश्ता किया गया | बाद में भंडारा हुआ तो खाना भी खाया | मंदिर की, पेड़ की , पत्तियों की फोटू भी ली | सुतिया की भी फोटो ली गयी थोड़ी दूर से |

मंदिर पर लोग मन्नतें माँगते हैं | पूरी हो जाने पर घंटी बाँध जाते हैं | हमने भी कुछ मांग लिया | बताएँगे नहीं अभी की क्या माँगा , क्यूंकि ऐसा करने से माना किया जाता है | पूरी हो गयी तो घंटी बांधने जायेंगे तो इस पोस्ट का पार्ट-२ लिखा जायेगा | Smile Smile 

उसके बाद हम अपने गाँव की ओर चल दिए |

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हमारा गाँव शारदा नदी के किनारे बसा हुआ है | काफी समय तक तो ज़मीन नदी के अंदर ही थी | कुछ सालों पहले नदी ने दिशा बदली तो ज़मीन बाहर आयी है | तब से खेती होती है | मुख्य रूप से गन्ना ( शुगर-केन) और गेंहू की खेती होती है | हमारे खेत में गन्ना बोया गया था , जो काटा जा चुका है | मिल को भेजा जा चुका है | मिल मालिकों ने अभी भुगतान नहीं किया है | पड़ोस के खेत में गेंहू बोया गया है | खेत गाँव से कुछ २ किमी की दूरी पर था | रास्ता बालू से भरा हुआ था | सुतिया भी पड़ती है | तो हमें खेत ले गए पापा के दोस्त “देशराज" , अपनी बाइक पर | हम तो अपनी से ना जा पाते |  पता नहीं इतने एक जैसे दिखते खेतों के बीच वो अपने खेत को कैसे पहचान पाये |  पड़ोस के खेत से एक गेंहू की बाली तोड़ी और हाथ पर रगड़ कर उससे गेंहू के दाने निकाले | दाने बहुत पतले थे | वो सूखकर और पतले हो जायेंगे | इस प्रकार इस बार इस बार गेंहू की फसल के अच्छा ना होने की बात भी बताई उन्होंने |
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गन्ने का एक पेड़ दो बार फसल देता है | दूसरी बार फसल काटने के बाद खेतों में आग लगा दी जाती है , फिर एक साल के लिए खेत बेकार हो जाता है |  गन्ने के पौधों को पानी भी बहुत चाहिए होता है | १० दिन में पानी लगाना होता है | घंटों लग जाते हैं पानी देने में | पर ज़रा सी लापरवाही से हुई पानी लगाने में देरी पूरी फसल चौपट कर देती है | पिछले साल गर्मी बहुत पड़ी थी | करीब ७-१० बार पानी लगाना पड़ा था किसानों को अपने खेतों में |


ये सब पता कर हम अपने गाँव वापस आ गए | तब तक पंकज के पापा भी गाँव के कई लोगो से मिलकर वापस आ गए थे | दोपहर के ढाई बज रहे थे | ५ बजे हमारी भी ट्रेन थी तो फटाफट वहाँ से निकला गया | एक घंटे के अंदर घर भी वापस पहुँच गए | रास्ते में पेड़ों की छाँव ने गर्मी से हमें बचाए रखा |  कुछ और फोटो नीचे हैं :

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इस फोटो में वही सुतिया है | अपने टाइम पर तो ना जाने कितनो को बहा ले जाती है | आजकल औकात थोड़ी कम है | इसे बाइक से  या पैदल भी पार किया जा सकता है | ये दूसरी फोटो में छोटे भाई साहब हेलमेट के साथ फोटो खिचवा रहे हैं | पीछे है नदी का वो हिस्सा जिसने दो साल पहले तबाही मचाई थी |  और भी कई फोटो लिए गए | घर पहुँच के पता चला कि ना तो हमने अपना कोई फोटो लिया रस्ते में लिया और ना ही अंकल ( पंकज के पापा) का | कुछ और भी चीज़ें पार्ट-२ के लिए छोड़ देते हैं | Smile Smile 
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तो बस ऐसे ही बीत गयी ये फटाफट वाली यात्रा , फिर गए तो फिर बताएँगे | तब तक खुश रहिये आबाद रहिये , चाहे गुडगाँव रहिये या इलाहाबाद रहिये !!!! ( ये लास्ट वाली लाइन पंकज के लिए ) Smile Smile 

नमस्ते !!!!!
--देवांशु

सोमवार, 25 मार्च 2013

पं. पोंगादीन लप्पाचार्य से विस्फोटक बातचीत


कल भारत ने ऑस्ट्रेलिया को जम के धोया |  ४ मैचों की सीरीज ४-० से हरा डाली | जगह जगह विश्लेषक अपनी राय दे रहे हैं | पर तहलका मचाया हुआ है पं. पोंगादीन लप्पाचार्य ने, उन्होंने कहा की इसकी भविष्यवाणी उन्होंने पहले ही कर दी थी | सो हम आज सुबह-सुबह उनका साक्षात्कार करने चले गए | प्रस्तुत है उनसे बातचीत के मुख्य अंश :
मैं : नमस्कार पांडी जी |
पंपोल (पं. पोंगादीन लप्पाचार्य ) : नमस्ते बालक, कैसे हो |

मैं : जी बस बढ़िया, आप सुनाएँ |

पंपोल : बस सब प्रभु की किरपा है , कहो कैसे आना हुआ |

मैं : पांडी जी , बस अभी बाहर सुना की आपने भारत के ४-० से जीतने की भविष्यवाणी की थी, तो सोचा जरा आपसे थोड़ा बातचीत कर ली जाए |

पंपोल : अच्छा किया बालक, बड़ा अच्छा लगता है जब तुम्हारे जैसे युवा, हमारे ज्ञान की कद्र करते हो | वर्ना ज्यादातर तो मजाक उड़ाते हैं | अरे भाई सदियों से चला आ रहा है ये सब , कोई समझता ही नहीं | खैर ये सब किनारे धरो , तुम बताओ का पूछना चाहते हो |

मैं : पहला सवाल तो यही की आपकी भविष्यवाणी के बारे में सीरीज ख़त्म होने के बाद ही पता चला , पहले कुछ सुना नहीं ऐसा ?

पंपोल : भाई ये भी एक तरीका है लड़कों ( क्रिकेट खिलाडियों) से प्रदर्शन कराने का | पहले बोल देते तो लड़के कुछ करते नहीं | लेजी हो जाते | सो हमने कहा बाद में बताएँगे |

मैं : अच्छा , मतलब आपने ऐसा जान-बूझकर किया ?

पंपोल : हाँ , बचपन से ही हम ब्लैकबोर्ड पर चाक फेंकते और जहाँ पर निशान बन जाता उसके चारों ओर गोला खींच देते हैं | जनता को लगता है की हमने गोला बाद में बनाया पर असल बात तो ये है की हम निशाना वहीं मरना चाहते थे | ये गूढ़ बातें हैं , मूढ़ जनता क्या जाने |

मैं : वो तो है पांडी जी |  धोनी के बारे में बताएं कुछ , क्या राज़ है उनकी सफलता का ?

पंपोल : देखो बालक , इन्सान दो तरह से जीतता है , एक जब उसकी कुण्डली में जीत का योग हो , दूसरा विरोधी की कुंडली में हार का |

मैं : पर वो तो पिछले कई साल से जीत रहे हैं , तो क्या ..

पंपोल ( बीच में बात काटते हुए ) : सबकी साढ़े-साती चल रही है , धोनी के अलावा |

मैं : पर ऑस्ट्रेलिया में तो हम ०-४ से हारे थे |

पंपोल : भैया मेरे , ऑस्ट्रेलिया में सब उल्टा है , जब अपने यहाँ कटकटाऊ ठण्ड पड़ती है तो वहां गरमी , इसीलिए वहां सब उल्टा हो जाता है |

मैं : पर हम तो इंग्लैंड में भी हारे , वहां तो सब ठीक रहता है |

पंपोल ( चेहरा लाल करते हुए ) : यही तो तुम लोगो की बात समझ नहीं आती, बहुत जबान लड़ाते हो | बस केवल मजाक बनाना है हमारी विद्या का |

मैं : अरे शांत हो जाइए पांडी जी , ये बताइये क्या धोनी की कप्तानी में अगला विश्वकप हम जीतेंगे ?

पंपोल : ये हम विश्वकप के बाद बताएँगे |

मैं : अरे क्यूँ ?

पंपोल : बोला ना, परफोर्मेंस पर असर पड़ता है , समझते नहीं हो यार तुम |

मैं : पांडी जी , आप तो भड़क गए | अच्छा सर जडेजा के परफोर्मेंस के बारे में भी सुना आपने भविष्यवाणी की थी | उसका क्या राज है |

पंपोल : दरसल उसकी कुण्डली के किसी भी घर में कोई गृह नहीं है , इसलिए उसके बारे में समझ पाना बहुत मुश्किल है और यही उसकी सफलता का राज़ है | वो इसीलिए सफल है की उसके बारे में कोई कुछ समझ नहीं पाता |

मैं : ह्म्म्म, अच्छा सचिन के बारे में बताइए , उन्हें कब तक खेलना चाहिए |

पंपोल : उसकी कुण्डली में सारे योग हैं, पर रिटायर्मेंट का योग नहीं है |

मैं : पर फिर भी , कभी तो रिटायरमेंट लेना होगा |

पंपोल : मुझे पता तो है की वो कब लेंगे रिटायरमेंट, पर मेरे बयान से उनके आखिरी मैच में सिक्यूरिटी की समस्या खड़ी हो जायेगी , इसलिए सरकार ने हमें चुप रहने के लिए बोला है |

मैं :  तो आप सरकार में भी दखल रखते हैं?

पंपोल : और नहीं तो क्या, हमारी सलाह के बिना तो नेता लोग सदन में नहीं जाते, प्रधानमंत्री भी !!

मैं : हमें नहीं लगता ऐसे पढ़े लिखे प्रधानमंत्री ऐसी बातें मानते होंगे |

पंपोल : अरे भूल गए , उन्ही ने तो कहा था की उनकी मौत के लिए विपक्ष ने यज्ञ कराया था | ये इन्फोर्मेशन भी हम ही ने दी थी |

मैं : आप तो काफी पावरफुल आदमी लगते हैं | आप सबका भविष्य जानते हैं | तो अपना भी जानते होंगे ?

पंपोल : हाँ बिलकुल |

मैं : तब तो आप बीमार भी नहीं पड़ते होंगे |

पंपोल ( मुस्कियाते हुए) : मालूम था की तुम्हारे मन में ये शंका आएगी | देखो बालक , राम , कृष्ण ये सब भगवान् के अवतार थे पर इन्होने कभी किसी को आइडिया नहीं लगने दिया के आगे क्या होने वाला है | इसैई लिए हम भी सब नार्मल चलने देते हैं |

मैं : तो बीमार पड़ते हैं  लेकिन  आप इलाज भी नहीं करवाते होंगे ? आपको तो पता ही होगा की आप ठीक हो जायेंगे ?

पंपोल : नहीं , कराते हैं | डाक्टर लोग दवाई देते हैं | लोग सब दवाई की एक्सपायरी देखते हैं , हम  मैनूफैक्चरिंग डेट देखकर उसकी कुण्डली बनाते हैं और फिर देखते हैं की हमें फायदा करेगी या नहीं |

मैं : तो आप बिना एक्सपायरी देखे दवाई खाते हैं ?

पंपोल :  यहीं तो हमारी विद्या और तुम्हारे विज्ञान में अंतर है , हमें अपनी एक्सपायरी डेट पता है |

मैं : धन्य हैं आप तो |

पंपोल : हाँ वो तो हैं |

मैं : एक बार फिर क्रिकेट पर आते हैं , फ्लेचर कब तक रहेंगे अपने कोच ?

पंपोल : कौन ??

मैं : डंकन फ्लेचर |

पंपोल : मैंने उनके बारे में नहीं सुना | इन्फोर्मेशन है कुछ उसके बारे में , जैसे कब और कहाँ पैदा हुए ?
मैंने अपने फोन से क्रिकइन्फो से फ्लेचर साहब का डाटा उन्हें थमाया | उन्होंने एक कागज पर कुछ चौखाने खिंचे |

पंपोल : कब से हैं कोच ये ?

मैं : काफी टाइम हो गया , जाने वाले थे , एक्सटेंशन मिल गया |

पंपोल ( कागज पर घूरते हुए ) : जड़ता का योग है | जहाँ जाएगा कुण्डली मार कर बैठ जायेगा , हिलाए ना हिलेगा | पर मुस्कुराते हुए बोले पर जहाँ रहेगा फल अच्छे देगा |

मैं : पर पहले तो ये इंग्लैंड के कोच थे , जब तक रहे बुरी तरह हारी इंग्लैंड |
पंपोल बगलें झांकने लगे | उँगलियों पर कुछ गिने | २-३ किताबें निकाल के  कुछ पढ़े | और बोले :
“इनका टाइम अब शुरू हुआ है, अब अच्छे रिजल्ट आयेंगे”

मैं : मतलब हम साउथ अफ्रीका में जीतेंगे ?

पंपोल ( मुस्कुराते हुए ) : ये तो मैं …

मैं : “साउथ अफ्रीका सीरीज के बाद बताऊंगा” | 

पंपोल भड़क गए मेरे ऊपर | बोले की मेरा दिमाग खराब हो गया है | और मैं उनकी विद्या का मजाक उड़ा रहा हूँ | और मेरी जन्मतिथि और जगह मांग बैठे | मैंने भी उनको डाटा दे डाला | फिर उन्होंने कागज़ में कुछ खींचा और बोले :
“कुण्डली देख के कोई भी कह दे की करेक्टरलेस हो तुम,  ये जो दो गृह एक ही घर में हैं ना , तुम्हे छिछोरा बता रहे हैं | हज़ार तो तुम्हारे लफड़े रहेंगे | एक लड़की पर टिक नहीं पाओगे”

मैं : अरे पांडी जी, क्या बता रहे हो, मेरा तो कभी कोई लफड़ा नहीं रहा |

पंपोल : अब होगा ना छिछोरे |

मैं समझ गया | मैंने २ पांच सौ के निकाल कर उनके चरण कमलों में रखे | और बोला की फिर से देखें |

पंपोल : जो बात बोली वो तो ठीक है | पर इसमे से जो एक गृह है वो  काट कर रहा है , फेमस हो जाओगे , अच्छा है सब |

मैं : अच्छा शादी कब होगी पांडी जी मेरी ?

पंपोल : ये हम ..

मैं : “…तुम्हारी शादी के बाद बताएँगे”

और इससे पहले की वो अपने वज़न के चलते उठकर हमें दौड़ा पाते | हम वहां से खिसक लिए और जाते जाते एक ५०० का पत्ता भी उठा लिए और चिल्लाकर बोले :

“कीप द चेंज प्लीज़”

--देवांशु
(चित्र गूगल इमेज से)

मंगलवार, 19 मार्च 2013

ज़हरखुरानी के २ साल !!!

इन दिनों अपने “कट्टा कानपुरी” उर्फ फुरसतिया जी फेसबुक पर अपने असलहों ( स्टेट्स अपडेटस) के साथ छाये हुए हैं | पिछले साल उनकी एक पोस्ट पढ़ी थी जिसमे उन्होंने “कट्टा कानपुरी” के प्रादुर्भाव के बारे में बताया था | पर लिंक कहीं खो गया हमसे | फुरसतिया जी को हम ऑनलाइन धर दबोचे, कि लिंक देओ हमें पढ़ने का मन है | उन्होंने हमें लिंक्स  दिए | हमने पढ़े | वो पोस्ट फुरसतिया जी ने अपने ब्लोगिंग में ७ साल पूरे होने पर लिखी थी | हमने अपनी पहली पोस्ट को देखा तो पाया , २ साल तो हमें भी हो गए | हम बताये अनूप जी को तो वो बोले इस पर पोस्ट लिख मारो, “दुशाला" पोस्ट  | आइडिया हमें भी बढ़िया लगा |

 

वैसे देखें तो दो साल में दो चीज़ें बड़ी कोंसटेंट रहीं | पहला हमारे कंटेंट का लेवल ( पहली बात तो ज्यादातर रहा नहीं, और जो रहा उसका लेवल इतना गिरा हुआ था कि उससे ज्यादा क्या गिरता), और दूसरा हमारा परिचय ( अबाउट मी सेक्शन), २ साल से दिखा रहा है “फिर कभी लिखूंगा आज तो बस इतना ही कि कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ...”|

 

तो सोचा कि इस बार कुछ अपने बारे में लिखा जाए:

 

बचपन में पढ़ाई लैम्प-लालटेन के भरोसे की ( इसलिए नहीं कि बड़े होकर महान बनना था, बल्कि इसलिए कि लाईट नहीं आती है हमारे शहर में शाम के बाद) | मैथ्स और फिजिक्स , पसंदीदा सब्जेक्ट थे | पढ़ने का शौक था पर वो कोर्स की किताब मिलते ही उसे खत्म कर देने तक ही सीमित था | कक्षा ९ में पहली बार प्रेमचंद्र की कहानी “मन्त्र" पढ़ी , उससे पहले भी एक पढ़ी थी उनकी कहानी, पर “मन्त्र" ने बहुत इम्प्रेस किया | उनकी और भी कहानियां पढीं | फिर दसवीं में हिंदी के टीचर, जो खुद भी कविता लिखते थे, उनके संपर्क में आया , और पहली देशभक्ति की कविता लिखी | सेंटी कवितायेँ लिखने का चस्का “आनंद" फिल्म की “मौत तू एक कविता है”  नज़्म सुनकर लगा | गुलज़ार के बारे में तो तब इतना पता नहीं था, पर जगजीत सिंह सुनने की उम्र आ गयी थी | फिर रस्किन की कहानियां पढीं | उनकी कहानियों में जो परिवेश दिखता था वो मुझे अपने शहर से थोड़ा बाहर निकलते ही पड़ने वाले जंगलों सा लगता | डायरी लिखने की भी आदत पड़ गयी जब इंजीनियरिंग एंट्रेंस की तैयारी के लिए देहरादून में था|  ये सिलसिला कॉलेज में भी जारी रहा |  जॉब ज्वाइन करने के बाद भी पढ़ने का स्कोप कम ही रहा और लिखना भी कम ही हो गया ( इन्फैक्ट कुछो नहीं लिखे) |

 

ब्लॉग की दुनिया में पंकज बाबू हमें लेकर आये | हालांकि पंकज हमारे ही शहर से हैं, पर उनसे पहली मुलाक़ात कोलकाता में हुई | फिर वो मुंबई चले गए और मैं बंगलोर | पंकज के दो कॉलेज फ्रेंड मेरे साथ मेरे ही प्रोजेक्ट में थे | उनमें से एक पवन बाबू से पता चला कि पंकज साहब भी कॉलेज के पहले से  लिखते आये थे | उनकी एक डायरी थी जिसे कॉलेज में “ज़हर की पोटली"  कहा जाता और पंकज जैसे ही उसे लेकर आते बोला जाता “आओ डसो" | इसलिए हम अपनी डायरी की बात दबा ले गए | फिर पंकज बाबू कभी कभी कुछ फेसबुक पर शेयर करते और हम चाह कर भी तारीफ़ ना कर पाते क्यूंकि “लखीमपुर में सब कविता लिखते हैं का???' जैसे उदगार मिलने का डर था ( जो बाद में मिला) |कॉलेज में जब कोई बहुत बेसुरा गाता था तो उससे कहते थे कि “यार बहुत अच्छा गाते हो, स्टेज पर ट्राई करो” | फिर वो पूछता कि क्या बहुत अच्छा गा रहा हूँ ? हम जवाब देते नहीं यार, वो अकेले मैं कितना मारूंगा तुम्हें और लोग भी होने चाहिए ना  | गुडगाँव में जब पंकज के साथ शिफ्ट हुए तो पंकज ने भी कहा “ब्लॉग पर लिखो बे”  जब पंकज को अपनी डायरी से कुछ सुनाया | कुछ कुच्छ बेसुरा गाने वाले सी फीलिंग आ गयी | जब ब्लॉग लिखा तो पंकज के उन्ही दोस्त का कहना था कि पंकज ने हमें भी डस लिया |

 

ये तो था कुछ अपने बारे में | एक पोस्ट नोर्मल टाइप का परिचय लिखने के बाद शुरुआत कविताओं से की , ज्यादातर कवितायेँ कॉलेज टाइम की लिखी हुई थी | पुराना माल ही डाले पड़े थे | फिर धीरे धीरे और लोगो को पढ़ना शुरू किया ब्लॉग पर |इस बीच हृषिकेश गए तो लौटकर रस्ते में हुई खुराफातों को लिखना चाहा | सोचा कि कविताओं से इसको मिक्स ना किया जाए | उस समय मनोहर श्याम जोशी की  "कुरु कुरु स्वाहा” रूम में पढ़ी जा रही थी | कुछ-कुछ उसी से इम्प्रेस होकर नए ब्लॉग का नाम रखा “अगड़म बगड़म स्वाहा" | शुरुआत में ऊंचा कंटेंट लिखने कि कोशिश की , पर जल्दी ही पता चल गया कि अपन का लेवल उतना है नहीं , औकात पर आ गए |

 

फिर एक बार अनूप जी ने “चिट्ठा चर्चा” पर हमारे ब्लॉग की चर्चा की, हम तो खुश हो गए | उस समय अमरीका में थे, कार ड्राईविंग सीख रहे थे, इंस्ट्रक्शन परमिट पर ही कार चलाते हुए दोस्तों को आइसक्रीम पार्टी पर ले गए | पूजा ने भी अपने ब्लॉग पर हमारे बारे में लिखकर ज़हर फैलाने के उत्साहित किये रखा | बीते दो सालों में जिंदगी ने बड़े उतार चढाव लिए , मूड बदलता रहा , और उसका असर लिखी गयी पोस्टों पर भी पड़ा | अच्छी बात ये रही कि जब अच्छा लिखा ( अगर किसी को लग गया तो, वैसे स्कोप तो कम ही रहा) तो लोगों में जम के पीठ ठोंकी, और जब औकात से भी नीचे गए तो बहुत गरियाये भी गए |

 

पर ये ब्लॉग की दुनिया है अपने आप में  बड़ी इंटरेस्टिंग | कितने लोग हैं जिनका लिखा, पढ़ा है केवल, फोन पर कभी कभी बात हुई है | बहुत कम लोगो से मिले हैं | दरअसल मेरे प्रोजेक्ट टीम भी ज्यादातर बंगलोर और पुणे में है तो इस समय  चाहे वो ऑफिस के लोग हों या ब्लॉग दुनिया के , सबसे एक वर्चुअल दुनिया में ही मिलना हो रहा है , काम भी वैसे ही होता है ,खाली टाइम भी वैसे ही बीतता है|

 

पहली बार अनूप जी को पढ़े तो हँसते हँसते पगलाय गए थे | सबसे पहले उनकी पोस्ट पढ़ी थी “शंकर जी अंग्रेजी सीख रहे है" | उस समय क्यूबिकल में आशीष भाई साथ में बैठते थे , उनको भी पढाये | दोनों फैन हो गए फुरसतिया के | फिर तो दोनों ढूंढ ढूंढ के उनकी पोस्ट पढ़ते | ऑफिस में भी काम कम था तो दोनों वहीँ पढ़ पढ़ के हंसते | पिछले दिनों अनूप जी जब दिल्ली आये तो उनसे मिलना हुआ| बड़ा अच्छा लगा | वहीं से व्हाट्स एप पर आशीष को मेसेज कर बताये अनूप जी के साथ हैं | वो भी खुश हो गये और बोले “बढ़िया है” | वहीं पर विनीत कुमार से भी मिलना हुआ | बड़े खतरनाक मनई हैं वो भी | बहुत कम टाइम के लिए शिव जी से भी मिले |

 

अनूप जी के अलावा प्रशांत (पीडी) और अभिषेक से भी एक -दो बार मुलाकात हुई | अभिषेक से तो पुस्तक मेले में भी मिले | पिछले साल शिखा जी भारत आयी | तो उनके साथ सोनल और अनु जी से भी मिलना हुआ | शिखा जी ने अपनी किताब “स्मृतियों में रूस" गिफ्ट की हमें, अपने आटोग्राफ के साथ | पीडी के साथ ही आराधना से भी मिलना हुआ था पिछले साल |

 

कुछ लोगो को तो फोन पर भी बहुत पकाया है , जिसमे अभिषेक बाबू और मोनाली  मेन  हैं |  बस ऐसे ही टाइम कट रहा है | ऐसे ही कटता रहे तो मजा आता रहे |

 

बाकी उधार का एक डायलोग ये भी है कि “यार अगर रूम-मेट ब्लॉगर हो तो बड़ा मुश्किल है जीना” | समझ जाओ कौन कहेगा Smile Smile Smile|

 

P.S. : पिछले दो सालों में अगर किसी से मिला या उसे फोन पर पकाया हो, और उसका नाम छूट गया हो तो इसे मेरी गलती समझा जाए | ऐसा नहीं है कि  मैं आपको भूल गया और अब नहीं पकाऊंगा, वो क्या है ना कि मिस्टेक भी गलती से एक ही बार करते हैं |

 

बाकी तो ई पब्लिक है, सबै कुछ जानती है | नीचे कुछ  फोटू हैं , खच्चाक …

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--देवांशु

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

वो दिन कैसा होगा !!!!

 

ठीक उस रोज़,

जब सुबह-सुबह, सूरज चादर तान सो जायेगा ,

चाँद जम्हाई लेकर उठ खड़ा होगा |

जब चिड़ियों के नवजात वापस अण्डों में कैद हो जायेंगे,

पानी बाल्टी से नल में वापस चला जायेगा ,

जब गिरा हुआ सेब फिर पेड़ में लग जायेगा,

नदियाँ पहाड़ पर वापस बहने लगेंगी,

शेर उलटे पैर भाग रहा होगा,

उसको दौड़ा होगा एक हिरन वो भी उलटे पाँव,

जब छत पर लटका पंखा रुका रहेगा, पूरा कमरा घूम रहा होगा,

खबरें छप पहले जायेंगी, घटेंगी बाद में ,

संगीत वापस गिटार में समा रहा होगा,

मलेरिया होगा मच्छर के काटने से पहले |

और इस पोस्ट पर कमेन्ट पहले आ जायेंगे और ये पोस्ट मैं बाद में करूंगा |

 

बस ठीक उसी रोज़ , हम दोनों अपने अपने जाम से ,

पानी से शराब अलग कर  बोतल में वापस डाल,

गटक जायेंगे पूरी बोतल,

बॉटम्स अप !!!

 

#यारों मुझे मुआफ रखो, मैं नशे में हूँ !!!

--देवांशु

 

सोमवार, 7 जनवरी 2013

मारे डर के हालत खराब, और लोग बोलते डर नहीं लगता !!!!

१६ दिसंबर को इंसानियत की एक बार फिर धुर्रियाँ उड़ जाने के बावजूद और लोगो के भर भर के स्वागत करने के बाद भी, जब २१ दिसंबर को क़यामत नहीं आयी तो लोगो ने इसका जश्न १ जनवरी को हंगामा मचा के किया | इन सब बातों को लेकर सबने खूब अपने विचार व्यक्त किये | वैसे तो अपन टीवी देखना करीब डेढ़ साल से छोड़ चुके हैं, पर फिर भी नेट पर लाइव टीवी पर कुछ खबरें देखनी की कोशिश की गयी | किसी तरह अटक अटक के देख भी लिए | इतनी धर-पटक के बीच हमारे चहेते खिलाड़ी तेंदुलकर साहब ने एक-दिवसीय क्रिकेट को टाटा कह दिया | और हमारी क्रिकेट टीम दौड़ दौड़ के हारी | हारने के मामले में हमने इंग्लैण्ड और पाकिस्तान में कोई अंतर नहीं समझा | कुछ दिन तो लाइव बफरिंग करके मैच देखने की कोशिश की,  पर जब ना जीते तो हम देखना ही छोड़ दिए |

जब जब राष्ट्र पर कोई विपदा आयी है, तो हमारे देश के नेतृत्व ने जनता को कोई न कोई नारा देकर उत्साहित किया है | नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा" | शास्त्री जी ने “जय जवान , जय किसान” का नारा दिया | बाजपेयी जी ने “जय विज्ञान " भी जोड़ दिया |  १६ दिसंबर की घटना के बाद लोगो में गुस्सा था ही, प्रधानमंत्री जी ने कहा “ठीक है"| अब इस टाइम वो और क्या उत्साह दिलाते | ठीक ही तो है |

इस बीच शिखा जी ने  कहा की लोगो में डर नहीं रह गया इसलिए ये सब हो रहा है | हमें एक बार को तो लगा कि बात एकदम सही है | फिर हमने अपने घुटनों पर बहुत जोर देकर सोचा तो पाया बात तो उनकी एकदम गलत है | कौन कहता है हमें डर नहीं है | मारे डर के हालत खराब है | जाड़े के डर से काँप रहे हैं | कांपेंगे नहीं तो जाड़ा पकड़ लेगा |

सुबह जल्दी उठ जाते हैं, नहीं तो माताश्री से डांट खाने का डर बना रहता है | इसी डर के चलते डेली नहा भी डालते हैं | अमरीका में थे तो सड़क पर कार चलाते टाइम डर लगता था कि कहीं गाड़ी तेज ना चल जाए | यहाँ तो पैदल चलते हैं तो डरते हैं कि कहीं साइड से कोई ठोंक ना जाए | आफिस टाइम पर पहुंचते हैं कि मनेजर ना हड़का दे, इसी बात का डर है | किसी से कोई लफड़ा नहीं करने के अलावा किसी लफड़े में भी नहीं पड़ते , पुलिस का भी काफी डर है | मम्मी कहती हैं, इनसे दोस्ती भी बुरी, दुश्मनी तो खैर !!!कोर्ट-कचहरी का आतंक तो बचपन से देखे हैं , पिताजी कोर्ट में ही थे | वहाँ तबसे जाने में घबड़ाते थे | मारे डर के रेंट-एग्रीमेंट बनवाने तहसील भी नहीं गए पहले, इस बार गए तो सहमे हुए  थे|

एक बार वोट डालने गए थे| पता चला हमारा वोट कोई और डाल गया था  | हमने शोर मचाना शुरू कर दिया कि ये तो गलत बात है  | पड़ोस के ही एक भईया ,जो चुनाव में खड़े थे और जिन्हें लगता था कि हम उन्हें ही वोट देंगे, ये देखकर आगे आये और बोले हाँ हाँ बिलकुल तुम्हारा वोट तो पड़ना चाहिए | वहाँ के पीठासीन अधिकारी साहब को “डर" के मारे पसीना आ गया, काहे की हम आई डी के तौर पर पासपोर्ट ले गए थे, उन्हें लगा कोई लफड़े में पड़ गए वो, बड़े प्यार से बोले, आप किसी और के नाम पर वोट डाल लीजिए | हम मना कर दिए कि "ना, हम तो अपना वोट डालेंगे"| इतनी देर में एक होमगार्ड आ गया | पूरा मामला ध्यान पूर्वक सुनने के बाद उन्होंने लाठी लेकर हमें दौड़ाया और बड़े प्यार से कहा “भाग जाओ, वरना इतना मारेंगे कि सही हो जाओगे, फर्जी वोट डालते हो|” उसी इलेक्शन में मोहल्ले के एक वकील साहब भी खड़े हुए थे | हम उनके पास गए और सब बताये | उन्होंने एक कुटिल मुस्कान को पहना और बोले “अब वोट पड़ गया सो पड़ गया, हमें पता होता कि आप यहीं हो नहीं तो सबेरे ही बुला लेते आपको” | बाद में वही वकील साहब जीते चुनाव | तबसे वोट डालने जाने में भी डर लगने लगा |Photo

कहीं फेल ना हो जाएँ, इस डर से हमेशा पढ़ते रहे | फिर जब पास होने लगे तो खराब मार्क्स ना आ जाएँ इस डर से पढ़ते रहे | जो कुछ समझ पाए समझ लिए , बाकी घोट के रट्टा मार गए, मारे डर के | किसी लड़की के साथ दिख जाने पर घर में कूटे जाने का डर था, तो किसी कन्या से बात करने में डरते रहे  | फिर जब से ये सब डर भागे तो और भी डर आ गए  | फिलहाल शादी-शुदा लोगो की हालत देख, शादी से भी डर लग रहा है Smile Smile Smile | एक अलग टाइप के डर का बयां तो ये तस्वीर भी कर रही है(इन चार लोगो का डर भी काफी है )

आजकल तो खुद से इतना डरते हैं कि मारे डर के अकेले में खुद से भी नहीं मिलते | भगवान जी से डर लगता है वो अलग |

डर की कहानी बहुत लंबी है | २१ दिसम्बर को जो होने वाला था, उससे सब डरे हुए थे | इसी सन्दर्भ में  एक पोस्ट  में , समययात्री ने  “डर" के पुरातात्विक प्रमाण दिए हैं :

“प्रलय या विनाश से आधुनिक से लेकर प्राचीन सभ्यतायें भी डरतीं रहीं हैं और इस डर का इस्तेमाल समय समय पर सत्ता और अन्य प्रभावशाली गुट अपने हितों के लिये करते रहे हैं। प्राचीन सभ्यताओं में तूफ़ान, बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से डर कर मानव ने अपने अपने ईश्वरों की परिकल्पना की। प्राकृतिक आपदाओं से बचाने वाले ईश्वरों के अस्तित्व का प्रमाण लगभग हर सभ्यता में मिलता है, क्योंकि उस समय यही बाढ़ और तूफ़ान जैसी आपदायें भी भारी नुकसान का कारण बनतीं थीं। फिर समय के साथ इन ईश्वरों की शक्ति लगातार बढती गयी। उस समय के ईश्वर सिर्फ़ तूफ़ान से बचाते थे और आज के नाभिकीय हमले से भी बचाने की कुव्वत रखते हैं।”

पोस्ट की निष्पत्ति कुछ इस प्रकार है:

“यह अफ़वाहें मस्तिष्क में डर पैदा करती हैं और आज “डर” बेचना सबसे आसान काम बन चुका है। सपनों,प्यार, सेक्स आदि को बेचने के बाद “डर” एक बेहतरीन विक्रय बढाने वाली दवा के रुप में उभर कर सामने आया है।”

कह तो रहें हैं , बहुत डर भरा है अंदर| मारे डर के रस्ते में पड़े तड़पते-कराहते इंसान की मदद हम नहीं करते | किसी के साथ कोई कुछ गलत कर रहा हो तो भी हम नहीं बोलते | हाँ अगर दो लोग एक दूसरे  का हाथ पकड़ कर चल रहे हों, तो अपनी नज़रें टेढ़ी ज़रूर करते हैं, उसमे “डर” का कोई स्कोप नहीं होता,  उलटे समर्थन मिल जाता है |

खैर, चलते हैं अभी, भगवान हम सबके अंदर का डर ऐसे ही बनाये रखे | जबतक ये डर है तब-तक सब ठीक-ठाक है , जिस दिन ये डर चला जाएगा, और इंसानियत का डर आएगा , उस दिन कौन पूछेगा पुलिस को, नेता-फेता, बाबा-टाबा  किसको अपने उलटे सीधे बयानों में फसयेंगे ? कौन जायेगा तहसील-कोर्ट-कचहरी ?? कोई खबर ही नहीं होगी तो न्यूज़-पेपर नहीं छपेंगे, न्यूज़-चैनल्स का क्या होगा ?

तब-तक, “डरने" से मत डरो, उसके आदी बनो, ग़ालिब कई और भी डर हैं दुनिया में डराने को Smile Smile Smile |
****

डाक्टर्स की दिन रात की कोशिश और करोड़ों लोगो की दुआ भी उस मासूम को तो ना बचा सकी, पर जाते-जाते वो बहादुर, हम सबको सोचने पर ज़रूर मजबूर कर गयी | २ दिन पहले पंकज ने ये विडियो शेयर किया, आप भी ज़रूर सुनें | शायद जो-कुछ हम सबको अपने अंदर बदलना है उसकी एक झलक है इसमें :


--देवांशु

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

किरदार ???

मैं सोते से अचानक जग गया | नींद खुल गयी और दुबारा नहीं आ रही थी |  वैसे तो सब मना करते हैं की सपने साझा करने से पूरे नहीं होते, पर जिस सपने से नींद टूटी वो मैं पूरा होने भी नहीं देना चाहता | चलो इसी बहाने ही सही शेयर करने की सोची |

सपना क्या था बस एक पहेली ही थी | ऐसा नहीं की ऐसा सपना पहले कभी किसी को नहीं आया, ज़रूर आया होगा | मुझे भी इस टाइप के सपने अक्सर आते हैं, पर डर पहली बार लगा |

दरअसल सपने में एक लाईट हाउस दिख रहा था |  मुझे लगा कि अभी अभी एक किताब पढी है जिसमे लाईट हाउस की बात है, इस वज़ह से दिख रहा है | पर केवल लाईट हाउस नहीं था | एक नदी भी थी , मेरे और लाईट हाउस के बीच में | मुझे लाईट हाउस तक जाना ही नहीं था , दिख गया तो दिख गया | पर उस चेहरे को कैसे भूलता जो मुझे वहां दिख रहा था , लाईट हॉउस के ठीक नीचे |

वही चेहरा, जिसे मैं भूल नहीं सकता, वही चेहरा |  धुंधला सा ही दिख रहा था वो चेहरा, ऐसा लग रहा था की जैसे अरसे बाद देख रहा हूँ (पर अरसे बाद दिखने पर चेहरे धुंधले नहीं दिखाई देते, पर हो तो ऐसा ही कुछ रहा था)  | मुझे उस तक जाना था |

पर नदी ?? उसका क्या करूं? शुक्र है तैरना आता था, पार कर गया | पर उस किनारे पहुंचा तो लगा की जैसे मेरे पैरों में कीचड़ लग गया है | ध्यान से देखा तो खुद को एक दलदल में पाया | इंसान बहते पानी से तो तैर के निकल जाए पर दलदल से कैसे निकले? और दलदल भी कोई इतना ख़ास नहीं की मुझे खुद में खींचकर मार दे, बस इतना कि ना जीने दे ना मरने दे | मैं बुरी तरह उस तक भागने की कोशिश करता रहा | और तभी नींद खुल गयी!!!!

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पूरे एक घंटे बाद नींद आयी होगी | दूसरा सपना दिखाई दिया | इस बार मैंने खुद को एक पुराने से खंडहर में पाया | फिर वही चेहरा , पर इस बार दोनों के बीच एक दीवार और और उसमे एक झरोखा | मैंने बोला की मैं तुम्हे मिलना चाहता हूँ , कहाँ मिलोगी | जवाब मिला उसी लाईट हाउस पर | मैंने कहा दलदल मुझे लाईट हाउस तक पहुँचने नहीं देता | जवाब था दलदल का मैं कुछ नहीं कर सकती, वो मेरे अपनों ने मेरी हिफाज़त के लिए बनाया है | मैंने पूछा तो तुम तक कैसे पहुंचू ? जवाब में उसने एक किताब दी और साथ में ये बोला की मैं अभी कुछ नहीं बता सकती , इसके बाद तो मैं तुम्हे दिखूंगी भी नहीं , हाँ अगर कभी मेरी ज़रुरत हो तो पेज नंबर १६ खोलना,  वहां एक खिड़की है, उसमे  मेरी आवाज़ सुनायी देगी |  मैं कई बार तक  उस खिड़की से बात करता रहा,  कभी जवाब तुरंत मिला, कभी देर से मिला | फिर एक दिन जवाब आया की अब कुछ भी हो सकता है, मेरी उम्मीद छोड़ दो |

एक अजीब से डर से घिर गया मैं| डर  से बचने के लिए अपने पास एक चाकू रखने लगा, सुना था ऐसा करने से डर नहीं लगता  | पर जैसे जैसे वक़्त बीतता गया, डर  बढ़ता गया | वो चेहरा फिर ना दिखा कभी | मैं खुद को कई बार उस लाईट हाउस तक ले गया | पर हर बार उस दलदल ने मुझे रोक दिया | काफी देर तक उसी एक चेहरे को देखने के लिए नदी के उस पार खड़ा रहा, पर कुछ भी ना हुआ |

फिर वही चाकू मैंने खुद को मार लिया, | उसके बाद  कोई सपना नहीं आया मुझे | ना कोई लाईट हॉउस, न कोई दलदल , न कोई किताब | सब ख़त्म | और क्यूंकि ये सब एक सपने में हुआ था तो उसके बाद मैं फिर कभी नहीं जगा |

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#ये किस्से कहानियों का देश है |  असल बात को घुमा-फिरा के कहने की आदत है हमें !!!!
-- देवांशु

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

रोते हुए आते हैं सब !!!

बहुतै फेमस गाना !!!  एक  दम हिट कि रोते हुए आते हैं सब, हँसता हुआ जो जायेगा, वो फलाने का ढीमाका कहलायेगा | समझे | 

अपने यहाँ रोना बहुत बुरा माना जाता है | अरे बाहर भी माना जाता है | लोग बहुत कोशिश करते हैं कि ना रोये | और रोके फायदा भी क्या? रोने से कुछ होता है भला? 

पर सोचो अगर रोने के पैसे मिलते तो ?आइडिया शानदार है |

लोग-बाग मौका ढूँढते कि कब रोया जाये | किसी ने आपके बारे में कड़वा बोलना तो दूर, जरा सा सोचा भर की आप घडों रो लेते | खुशी के आंसू निकलते तो भी कहते कि भईया हम रो ही रहे हैं | 

मुस्कुराना “टाइम वेस्ट" करने जैसा होता | “हाहा-ठीठी बनाये खराब, रोना धोना बनाये नवाब" | घरवाले डांटते “बाहर खड़े खड़े पता नहीं का कर रहे हैं , ये नहीं घर के अंदर आ जाएँ, थोड़ा रो ही लें” |

फिर किसी को भूखे सोना नहीं पड़ता | ५ मिनट रोये रोटी का जुगाड़, ५ मिनट और रोये सब्जी भी हो गयी | ये सब देख के बीवी की आँख में आंसू आ गए | सलाद भी रेडी है जी |

पढाई-लिखाई तो वैसे भी अपने यहाँ हेलमेट की तरह है, ज़रूरी है पर मजबूरी समझी जाती है | पर अगर रोने के पैसे मिलते तो धड़ाधड़ रोने के कॉलेज खुल जाते | डिग्री डिप्लोमा होने लगते | डिग्री वाले कहते डिप्लोमा वाले रोते हैं पर वो क्वालिटी नहीं है | डिप्लोमा वाले समझाते “बेट्टा कह कुछ भी लो, ग्राउंड रियलटी तो हम डिप्लोमा वाले ही जानते हैं” | इस लड़ाई-झगड़े में अगर रोना गाना हो जाता तो उसके पैसे भी सबमें बराबर बांटे जाते |

रोने के साथ साथ रुलाने वालों का भी बोलबाला हो जाता | फलाने मास्टर साहब बड़ी आसानी से रोना सिखाते हैं | पर रोने पर मिली कमाई का तीन चौथाई रख लेते हैं | लालची हैं | मास्टर कहते आप तो अपने बच्चों को कहीं बड़ी जगह पर रोने भेज देंगे हमारे बच्चे क्या करेंगे | पता चला उन्ही मास्टर साहब का बेटा दिल खोल के हँसता | दुनिया कहती चिराग तले अँधेरा |
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रोना सोसाइटी में स्टैण्डर्ड समझा जाता | लोग संयुक्त परिवार की तरफ बढ़ते | घर में जितने बर्तन उतना ही बजेंगे | खूब मार-कुटाई होती | खूब आंसू बहते | खूब पैसा आता | कोई तीज-त्यौहार होता, तो बड़े-बड़े परिवारों के लोग आपस में ही रो लेते | न कोई बाहर से आये ना किसी से रूपया बांटना पड़े | “भईया उन केर घर केरी बात अलग आय , इत्ते जने हैं , सब आपसय मा रोय लेत हैं, काहे लगावे लगे बाहेर वालन का”|

तब कवियों का भी उद्धार हो जाता | जो जित्ती रुआंसी कविता लिखता, उसकी डिमांड उत्ती बढ़ जाती | पी बी शेली ने कहा था “our sweetest songs are those, those have the saddest thought” ,तब जमाना इस बात को और अच्छी तरीके से समझता | सेंटी पद्य लिखने वाले भी खूब पूछे जाते | जिसको पढ़ के जितना रोना आये , किताब उतनी महंगी बिकती |

तब न, कॉमेडी फ़िल्में नहीं बना करती | न कोई जॉनी वाकर होता, न जॉनी लीवर | राजू श्रीवास्तव भी ना आये होते | उदय चोपड़ा, उपेन पटेल, फरदीन खान, तुषार कपूर जैसे लोगो का बोलबाला होता | “अंदाज़ अपना अपना” कोई ना पूछता | “टशन", “झूम बराबर झूम", “जोकर" जैसी फिल्मे चल जाती | राजेश खन्ना भी तब कहते “पुष्पा!!!! आई लव टियर्स रे !!!!”

गाने कैसे बनते :
“थोड़े आंसू तू हमका उधर दइ दे , और बदले में यूपी बिहार लई ले” ,
“रोना, रोना, भर भर के रोना , जब भी टूट जाए कोई खिलौना , लल् ला”

सटायरबाजों और कार्टूनिस्टों की हालत तब भी अब के जैसी ही रहती | जनता उन्हें ठोकने पर उतारू रहती | कार्टून बनाने पर जेल भेज देना तब भी आम बात होती |

पंकज बाबू के हिसाब से सोचना “इंटलेक्चुअल" प्रोपर्टी है | मेरे हिसाब से “रोना" ही “एक्चुअल" प्रोपर्टी होती  Smile Smile Smile  | तब औरत और मर्द के रोने में भी कोई अंतर ना समझा जाता और शिखा जी को एक पोस्ट नहीं लिखनी पड़ती Smile Smile Smile|

पर हाँ , कोई किसी को फलते - फूलते तब भी न देख सकता | पम्मी आंटी, गुप्ता आंटी को शर्मा आंटी की केवल अच्छी बात ही बताती , कहीं गुप्ता आंटी रो न दें, इस डर से |  मेहता साहब के बारे में लोग कहते “मन ही मन तो रोता होगा लेकिन दिखायेगा कि जैसे मनों खुस है , दिल में चोर है उसके” |

लेकिन कुछ भी कहो अगर रोने के पैसे मिलते तो रोना दूभर हो जाता और हर तरफ खुशी ही खुशी फ़ैल जाती !!! है की नहीं ???

खैर, फिलहाल आपको इतना ही रुलाते हैं,  फिर कभी खून पियेंगे आपका , तब तक रोते रहिये-रुलाते रहिये , आई मीन खुश रहिये, आबाद रहिये, दिल्ली रहिये या इलाहाबाद रहिये !!!!

खुदा-हाफ़िज़ !!!!!


P.S. : अगर आपको ये सब पढ़ के रोना आ गया हो ( अगर क्या, पक्का आ गया होगा , सेल्फ कांफिडेंस ) तो जो पैसे इकठ्ठा हुए हों उसका हिस्सा हमें भी मिलना चाहिए | पोस्ट का आइडिया तभी आया , जब हम मोनाली की टांग खीच रहे थे कि उसकी पोस्ट बहुत रुलाती हैं | और देखिये उसने कसम खाकर एक हंसती-गुदगुदाती पोस्ट लिख मारी कि कहीं लोग अमीर न हो जाएँ Smile Smile Smile |


--देवांशु

बुधवार, 28 नवंबर 2012

कहानी कोफ्ते की !!!

आज सुबह माताश्री ने कल के बचे कोफ्ते के मटीरियल से फिर से कोफ्ते बनाये और हमने दबा-दबा के खाए | कोफ्ते का शेप चिकन नगेट्स की तरह दिखा…हमें लगा की कोफ्ते को अंग्रेज़ी में नगेट्स कहते होंगे, सोचा विद्वजनों से भी पूछ लिया जाए, सटा दिए फेसबुक पर :

“कोफ्ते को अंग्रेजी में का कहते हैं भाई ??? Nuggets ???”

विद्वजनों ने अपने विचार भी रखे :

अतुल जी ने इंकार कर दिया की उन्हें नहीं पता, उलटे उन्होंने “कोफ़्त" की अंग्रेजी पूछ मारी | हमें बड़ी “कोफ़्त" हुई |

आराधना जी का कहना था की नगेट्स “मुन्गौडी” को कहते हैं | दो दिन पहले ही आलू-मुन्गौडी की सब्जी खाई गयी थी | मन किया समर्थन कर दिया जाए |

मोनाली ने चैट में और शिवम् भाई ने स्टेटस पर कोफ्ते का विकी पेज शेयर कर दिया | अंग्रेजी नाम वहां भी नहीं मिला | मोनाली का ये भी कहना था की कोफ्ते को “कटलेट” या “वेजिटेबल बाल्स” कहते हैं, कुछ भी बताया जा सकता है | ४ लोगो ने इसे लाइक भी किया |

पंकज साहब का अमरीका से कहना था की “कोफ्ता आलू की तरह मसाला नहीं होता” इस लिए उसकी अंग्रेजी नहीं होती | पर मटर की तरह कोफ्ता एक सब्जी होती है इसलिए अंग्रेजी तो बनती है भाई इसकी, पंकज बाबू आप चाहे मानो या ना मानो | 

गुडगाँव से सोनल जी का कहना था की वो अंग्रेजी तब बतायेंगी जब हम उन्हें कोफ्ते खिलाएंगे |

इन्ही बातों के बीच में पंकज और सोनल जी के बीच हुए वार्तालाप से ये भी पता चला की बिंगो को अंग्रेज़ी में “ओ तेरी" कहते हैं |

मोनाली की ही तरह शिखा जी का लन्दन से ये कहना था की इसे “बाल्स" कह सकते हैं |  हमने उन्हें चैट पर पूछा “कोफ्ते बोले तो बाल्स , बाल्स बोले तो गेंद, माने की कोफ्ते से क्रिकेट खेला जा सकता है |”

उन्होंने बोला , हाँ और वैसे भी हमारी टीम यही तो खेल रही है आजकल |

आइडिया बढ़िया लगा हमें , कोफ्ते से क्रिकेट | भाईसाहब | सोचो कमेंट्री कैसी होती :

- ज़हीर खान को नया कोफ्ता सौंपा गया है | एक लम्बे रन-अप के साथ वो कोफ्ता लेकर चले | साईट-स्क्रीन में कुछ प्रॉब्लम | अम्पायर ने उन्हें कोफ्ता फेंकने से रोका | ( ऐसा लगता अम्पायर को कोफ्ता पसंद है और वो खा जाने के मूड में है)

- जैसे जैसे कोफ्ता पुराना होता जायेगा, वो घूमेगा |

- प्रज्ञान ओझा ने बहुत बढ़िया कोफ्ता फेंका | (इतना बढ़िया कोफ्ता था तो फेंका क्यूँ??? }

अब तो कमेंट्री भी हिंदी में आ रही है टीवी पर | इस तरह की कमेंट्री और भी मजेदार लगती | सिद्धू पाजी बोलते : “कोफ्ता हवा में उछल कर इतना ऊपर गया गुरु की ऊपर बैठी एयर-होस्टेस की प्लेट में गिरा, और उसने अपने हाथों से वापस फेंका, खटैक”

अरुण लाल कहते “जी हाँ मनिंदर, मुझे भी समझ नहीं आता धोनी इस समय नया कोफ्ता क्यूँ नहीं ले रहे हैं, पुराना इस्तेमाल करते हुए ८० ओवर से ज्यादा हो गए हैं”

कुछ शब्दों के मीनिंग कैसे हो जाते :

नो बाल : नही कोफ्ता

वैलिड बाल : हाँ!!! कोफ्ता!!!

डेड बाल : मर्तुला कोफ्ता

वाइड बाल : चौड़ा कोफ्ता

बाल टेम्परिंग : कोफ्ते के साथ छेड़-छाड़ बोले तो “ईव-टीजिंग”

इंग्लैंड टीम के कप्तान का नाम भी तब ठीक लगता “कुक" | “कुक ने अगला ओवर फेंकने के लिए स्वान को कोफ्ता थमाया ( और स्वान कोफ्ता खा गया ) |

शाहिद अफरीदी को कोफ्ते खाने के चक्कर में दो मैचों का प्रतिबन्ध झेलना पड़ता |

ना केवल क्रिकेट , बल्कि और भी खेलों में कोफ्तों का इंतज़ाम रहता | फुटबाल के कोफ्ते बड़े बड़े होते | लातिआये भी जाते | स्नूकर के कोफ्ते रंग-बिरंगे होते | टेनिस के कोफ्ते स्पोंजी होते |

वैसे अगर कोफ्तो को गेंद बोलते तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ता | “लौकी की गेंद” , “मलाई की गेंद" | ठीक ही रहता |

क्रिकेट से ध्यान आया कि अपनी टीम की हालत काफी पतली हो गयी | इंग्लैण्ड ने घर पर आके हमें धोया है |  हमारी टीम के लिए पिच घूम रही थी (ऐसा तो १०-१२ पेग के बाद होता है ), और अँगरेज़ टीम के “कोफ्ते" घूम रहे थे | सारा खेल घूमने का है |

क्रिकेट के भगवान कहलाने वाले सांसद सचिन तेंदुलकर साहब भी आजकल सवालों के कटघरे में है | उनकी फॉर्म चली गयी है | लोगो का कहना है की रेफ्लेक्सेस भी काम नहीं कर रहे हैं | उन्हें अब रिटायर हो जाना चाहिए | ऐसा ही कुछ पोंटिंग साहब के लिए भी कहा जा रहा है जिनकी नाक में दम साउथ अफ्रीका के “कोफ्ता"बाजों ने कर रखा है |

खैर वो सब बड़े लोग हैं, अपने हिसाब से देखेंगे, हमारी थोड़े ही सुनेंगे |

इस बीच खबर ये भी आयी है की अपने अनूप शुक्ला जी जिन्हें फुरसतिया के नाम से जाना जाता है ने क्रिकेट का बल्ला थाम लिया | अरे बा-कायदा फोटो भी लगा दी उन्होंने | उनसे परमीशन लेकर यहाँ चिपका दे रहे हैं , आप भी देखो :

image यहाँ दो बातें गौर करने वाली हैं | एक तो अनूप जी ने सचिन को खुल के “चैलेंजिया" दिया है | की अब हम मैदान में आ गए हैं , फॉर्म संभालो वर्ना प्रोपर रिप्लेसमेंट रेडी है | हम ये बात बोले तो अनूप जी लाइक कर के चले गए कुछ बोले नहीं |

और दूसरी बात ये है की भारतीय टीम की जीत के लिए एक नया तरीका भी बता दिया है इस फोटो में , ४ स्टम्प्स का विकेट | शायद अब तो हमारे “कोफ्ते" विकेट पर लग जाएँ |

हमारे कैप्टन कूल को इस सुपर कूल तरकीब की तरफ ध्यान देना चाहिए | शायद जीत जाएँ |

बस यही सब चल रहा है आजकल | बाकी सब भी चलता रहेगा , अब हम भी चलते हैं | खाना-वाना खा लिया जाए |

आप भी मौज करते रहिये ….

नमस्ते !!!!

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

राम भरोसे की चाय भरोसे !!!!


जबसे  जाड़ा  शुरू हुआ है, बवाल मचा हुआ है |  सही बताऊँ तो पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में ठण्ड दिख जादा रही है, लग कम रही है |  धुंध छाई है पर ना दांत कटकट कर रहे हैं , ना खुद की सांस दिख रही है | पुरानी रस्मों के चलते गरम पानी से नहाना शुरू कर दिया है बस |
ऐसा कहा जा रहा है की पड़ोसी राज्यों में लोग पुराने पत्ते, कूड़ा-कबाड़ जला रहे हैं इस वजह से धुंध छाई हुई है | पर साथ में ये भी कहा जा रहा है की दिल्ली के वाहनों के प्रदूषण का इससे कुछ लेना देना नहीं है | काफी सटीक पता लगाया है कारणों का |
पर ठण्ड के चलते और भी चीज़ें नोट की गयी हैं | अपने यहाँ सुबह सोना कितना मुश्किल है |
कल सुबह-सुबह अर्ली मोर्निंग, ६ बजे लगा की हमारी खिड़की पर हमला हो गया | “धाड़" से कुछ लड़ा आकर | हमने कहा कल रात तक तो सीमा पर सब ठीक था , ये अचानक से दिल्ली में गोला-बारी|  पर लगा की देखना चाहिए | या तो शहीद होंगे , नहीं तो बहादुर कहलायेंगे | निद्रा-त्याग कर खिड़की खोली तो पता चला “न्यूज़ पेपर” वाला था | पहले उसने पेपर फेंका था फिर खुद आ गया था “बिल" लेकर | मतलब पहले कवर फायर किया था , फिर घुसपैठ की थी | बिल लिया और हम फिर सो गए ये कहकर कि कल ले जाना आके रुपये | अब सुबह सुबह इतने सारे कपड़ो के बीच वालेट कौन ढूंढें !!!
फिर सोये तो घन्टी बजा दी किसी ने | “केन्य केन्य” | एक तो पता नहीं ई कौन टाईप की घंटी है | फिर उठे , दरवाज़ा खोला | देखा तो कूड़े वाला था | चिल्ला के बोला “कूड़ा है” | मन किया बोल दूं “अबे मैं क्या कूड़े में रहता हूँ , रोज़ सुबह आ जाता है , कूड़ा है |” पर  मैंने कहा “नहीं है , हमारा घर साफ़ सुथरा है” | कमरे के अन्दर वापस आये तो रियलाइज़ हुआ की सुबह सुबह झूठ भी बोल दिया | :) :)
फिर सोये तो दरवाजे पर दस्तक हुई | “ख़ट-ख़ट" | फिर उठे | तो काम वाली , सफाई करने आयी थी |  बोली सफाई करनी है | फिर मन में ख़याल आया की घर मेरा है तो मैं इसके कहने पर सफाई क्यूँ कराऊँ , पर तब तक उसने दूसरा कमरा साफ़ कर दिया था | मैंने भी फटाफट लैपटॉप , टीवी सबके वायर सही किये और झाडू लगाव डाली | पोछा लगाने से मना कर दिया नहीं तो फिर वो पंखा चला के चली जाती |
इतनी बार नींद टूट गयी कि दुबारा नींद नहीं आयी |  तो समझ में आया की यहाँ तो मैंने सिस्टम उल्टा कर रखा है | सबसे पहले सफाई करवानी चाहिए , फिर कूड़े वाले को कूड़ा देना चाहिए , फिर पेपर वाले से पेपर लेकर पढ़ना चाहिए | वाकई में अपने यहाँ सारा काम उल्टा होता है |
अब नींद टूट गयी थी | अब सोचे की रेगुलर नींद तो आएगी नहीं , पॉवर नैप ले लेते हैं | लेटे तो ख्याल आया की पता किया जाये की फेसबुक पर क्या चल रहा है | और एक बार फेसबुक पर गए तो फिर कहाँ नींद | पूरे ५५ मिनट तक “अब सोते हैं” का प्लान करते रहे , फिर ध्यान आया  की प्लान तो हमने ३० मिनट ही सोने का किया था | एक दोस्त को फोन किया तो पता चला की साहब चाय पी रहे हैं , हमने कहा यार थोड़ी यहाँ दे जाओ तो जवाब आया खुद बना लो | दिव्य-ज्ञान मिल गया “बिना मरे भले स्वर्ग मिल जाए, पर सर्दी में बिना बनाये चाय नहीं मिल सकती”|image

 घड़ी देखी तो ऑफिस का टाइम हो गया था | अपनी मनोदशा फेसबुक पर डाली और तैयार होने निकल लिए | सोने का प्रोग्राम ऑफिस तक मुल्तवी कर दिया |

 ऑफिस पहुचे तो देखा भर भर के काम था | फिर लगा की सो ही लेना चाहिए था | काम में लग गये | बड़ी नींद आ रही थी इसलिए  दिन भर चाय पी पी कर काम किया  | फिर लगा की अपने यहाँ कितने सारे काम तो चाय भरोसे चलते हैं | एक चाय वाले को जनता हूँ उसका नाम है “राम भरोसे” |  मन में ख्याल आया “राम भरोसे की चाय भरोसे” ही सारा काम चल रहा है | लाइन मारू लगी | सोचे जब दबंग-२ आ सकती है तो काहे नहीं , कालजयी कविता पार्ट -२ लिखी जाए | तो बस लो झेलो ( अब आ गए हो तो पढ़ ही लो) :

 Disclaimer :  ये कविता पूर्णतया तुकबंदी का काम है और अगर इसमे किसी लाइन का कोई मतलब निकल आये तो इसे मात्र एक संयोग कहा जायेगा |
तीन रुपये की मट्ठी खाओ, पांच रुपये के समोसे,
राम भरोसे की चाय भरोसे, राम भरोसे की चाय भरोसे |

बुढिया की खटिया बाढ़ में बह गयी , बैठी बरखा को कोसे,
राम भरोसे की चाय भरोसे, राम भरोसे की चाय भरोसे |

बोया बीज पोपिंस का, चाकलेट पाओगे कैसे ?
राम भरोसे की चाय भरोसे, राम भरोसे की चाय भरोसे |

नाम रखे हैं कर्म-राज, पड़े आलसियों जैसे,
राम भरोसे की चाय भरोसे, राम भरोसे की चाय भरोसे |

घर जाने का वक़्त आ गया, रिज़र्वेशन को फिर से तरसे,
राम भरोसे की चाय भरोसे, राम भरोसे की चाय भरोसे |

तीन रुपये की मट्ठी खाओ, पांच रुपये के समोसे,
राम भरोसे की चाय भरोसे, राम भरोसे की चाय भरोसे |


अरे बस बस !!! अब गरिआओ नहीं | इतनी ही लिखी है | बाकी फिर कभी सुनायेंगे | अभी चलते हैं | कुछ काम कर लिया जाए |
तब तक मौका मिले तो आप भी “नैपियाते" रहिये | :) :) :)
नमस्ते
--देवांशु
(चित्र गूगल इमेजेस से)

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

हैप्पी बड्डे टू मी !!!!

इससे पहले कि कोई और ये सौभाग्य छीनता, रात के १२ बजते ही हमने सबसे पहले खुद को बड्डे विश करने का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने की सोची, पर एस एम एस भेज के एक परम मित्र ये बाज़ी मार ले गए | लेकिन कभी-कभी बाज़ी हारने में भी सुख ही मिलता है, वैसा ही हुआ  | हमारे रूम-मेट साहब को भी शायद आईडिया नहीं था कि इस महापुरुष का आज ही जन्मदिन है, वो कुछ देर पहले ही सोने खिसक लिए थे !!!!

पर काफी देर तक जब किसी का फ़ोन नहीं आया तो लगा कि जनता अपना टाइम ले रही है | फिर थोड़ी देर और हुई तो हमसे ना रहा गया, भला बिना बधाई के भी कोई जन्मदिन होता है भला, लोगो को हम खुदई फोन लगा दिए | काफी देर बातचीत भी किये| खून पिए, बधाई भी मिल गयी साथ में :) :)

सुबह उठे तो सबसे पहले एक शर्ट निकालकर "इस्त्री" की | तब समझ में आया कि इसे "इस्त्री" क्यूँ कहते हैं | इसी टाइम किसी "स्त्री" की कमी काफी महसूस होती है | :)  :)

सबसे पहले हम माताश्री को फोन किये | उन्होंने आशीर्वाद दिया तो हम खुश हो गए | फिर काफी लोगो से बात हुई,  फोने  पर  | बाद में फेसबुक पर बधाई सन्देश देखे | हमारे एक स्कूल के समय के दोस्त ने हमें बड्डे का केक फेसबुक पर भेज दिया | उन्हें शायद हमारी उम्र का कुछ खास  आईडिया नहीं होगा | केक में उम्र की मोब्बती में उन्होंने २ लगा दिया और बाकी फोटो को एडिट कर हटा दिया | दोस्त!!! इस बार तो तुम सही निकले, पर अगली बार ये ट्राई किया तो गलत साबित होगे :) :)

ऑफिस  में एक दिन पहले ही टीम मीटिंग में बता दिया गया था कि महाशय कल जन्मदिन मना रहे हैं, हम सुबह से डरे सहमे बैठे रहे , पर कोई पार्टी के लिए भी नहीं आया | फिर लंच पर गए तो क्यूबिकल के साथी ने एक फाइव-स्टार चॉकलेट गिफ्ट की , हम तो सुपर-स्टार हो गए |

हमारे एक घने दोस्त हैं, हम सब उन्हें बड़े मालिक बोलते हैं, उनकी बेटर-हाफ ने हमें बोला कि घर आ जाओ यहीं बड्डे मनाते हैं तुम्हारा | पर काम के कारण जाना संभव ना हो सका | तभी बड़े मालिक ने फोन किया और इस तरह एक्टिंग करने लगे कि घर में किसी काम कि वजह से पार्टी आज संभव नहीं है | पर ये भी पूंछ लिया कि शाम को कहीं जा तो नहीं रहे हो | हम समझ गए हम कहीं याएं या न जाएँ पर ये ज़रूर आने वाले हैं, हम तैयार हो गए कि आज रात तो हुड़दंग हो कर ही रहेगी |

शाम को हम पंकज, वही हमारे रूम-मेट,  को ऑफिस से सीधे चाय की टपरी पर बुला लिए | वो हाथ में एक थैला लेकर आ रहे थे, हम मन ही मन खुश हुए की चलो इन्हें पता चल गया, हमारे लिए गिफ्ट लेकर आये हैं | मिलते ही बोले “लो मालिक, तुम्हारे लिए” | हमने कन्फर्म करने के लिए पूछा “अरे ये किसलिए?” | वो उवाचे “अरे यार कुछ गिफ्ट कूपन पड़े थे, सोचा कुछ खरीद लिया जाये, छेने और बिस्कुट हैं |” हमने कहा धत्त तेरे की | फिर हमने उन्हें कहा चलो यार आज कहीं बाहर खाते हैं, शानदार डिनर किया जाये | वो तब भी नहीं पूछे कि काहे बे, कौन ख़ुशी ??

तभी हमारे एक और दोस्त का फोन आया, उनसे बात करते टाइम , पंकज बाबु कुछ ताड़ गए | “मालिक कुछ ख़ास है क्या,  आज ?” | “फेसबुक पर जाओगे नहीं और ना याददाश्त को भी तुम्हारी याद है कि लास्ट टाइम कब ठीक से चली थी?” हमने कहा | “अरे मालिक , हमें लग रहा था , तुम लिब्रन हो, होना तो बड्डे इधर ही चाहिए, कोई नहीं देखो तुम्हारे लिए छेने तो ले ही आये हैं|” उन्होंने माहौल संभालने की कोशिश की |  फिसल पड़े तो हर गंगे|

खाना खा के घर पहुंचे ही थे कि बड़े मालिक का फोन आ गया “हरियाणा डेरी” पर खड़े हैं तुम्हारे सेक्टर की , फटाफट आ जाओ” | उनको लेने गए | साथ में तीन और दोस्त आ गए थे | सबके लिए खाना खरीदा गया | फिर छत पर गए | वहाँ पार्टी का जुगाड़ किया गया | केक काटा , वो भी ठीक १२ बजे के बाद | मालिक का कहना था “यार बड्डे तो पूरा वीक चलता है, कोई नहीं"| केक खाए जाने से ज्यादा मूह पर लपेटे जाने की प्रथा है | हमारा मेक-अप कायदे से किया गया |

फिर सुबह ४ बजे तक गप्प-गोष्ठी चलती रही | गाने भी सुने गए खूब सारे | खाना खाया गया | मालिक ने बहुत सारा ज्ञान दिया | डेली सोप्स की खिल्ली उड़ाई बड़े मालिक और हमारे दूसरे शादी-शुदा मित्र ने | इससे समझ में आया कि ये भी “स्त्री-इफेक्ट" है |  :)  :)

*****

बचपन में पापा,मम्मी, भाई और बहन के साथ मंदिर जाकर मनाते थे ये दिन |  घर पर मम्मी मेरी पसंद की कोई चीज़ बनाती थी | बड़ा मजा आता | घर से बाहर निकले हुए भी १० साल से भी ऊपर का वक़्त हो गया | तबसे कभी मनाया ये दिन, कभी नहीं भी मनाया | पर हर बार सबसे बात करके मन लेते थे ये दिन |

पापा जी के जाने के बाद ये पहला जन्मदिन था |  थोड़ा सा मन उदास सा था पर लगा कि उदास रहना शायद उन्हें भी ना पसंद आता | तो और ख़ुशी ख़ुशी मनाया ये दिन | लगभग सारे दोस्तों, फैमिली के लोगो से बातें की | शाम तक आते-आते मन एक बार फिर खुश हो उठा | दरसअल ज़िंदगी बड़ी उठा-पटक करती रहती है | गए दिनों और भी बहुत सारी बातें चलती रही लाइफ में | इस बार बात करते समय दोस्तों से उन बातों का गाहे-बगाहे ज़िक्र आता रहा | बहुत सी बातें सुनी-समझी-जानी | जो सबसे महत्वपूर्ण बात समझ आये वो कुछ यूँ थी :

“जिन्दगी में जिद और लक्ष्य दोनों ज़रूरी हैं, पर जब लक्ष्य न मिलता दिख रहा हो तो हौंसला मत छोड़ना और जब जिद ना पूरी हो रही हो तो दिल मत तोड़ना”

बात बहुत सोलिड टाइप लगी | फेसबुक पर शेयर भी कर दिए |

कुल मिलाके एक बढ़िया बड्डे बीता |

और हाँ अमिताभ बच्चन साहब को हम बड्डे विश नहीं कर पाए , का करते दिन भर फोन जो बिजी रहा | कोई बात नहीं बिग बी “बेटर लक नेक्स्ट टाइम” |  :)  :)  :)

नमस्ते !!!!

-- देवांशु