मंगलवार, 18 जून 2013
इतिहास में डुबकी और बिजली का टोका !!!
हमार महल्ला !!!
हम उन सबसे बिदा लेकर घर पहुंचे तो नीचे से ही फोन कर दिए की दरवाज़ा खोल दो | करीब १५ साल पहले हम लोग फर्स्ट फ्लोर पर शिफ्ट हो गए थे | हम दरवाजे पर खड़े थे तभी पीछे रहने वाले मास्टर साहब निकले और हमसे बोले “भईया सब लोग ऊपर रहत हैं , घंटी बजाय देओ |”
बुधवार, 12 जून 2013
दास्तान-ए-इस्तीफ़ा
पिछले कुछ दिनों से मार्केट में “इस्तीफों" की बड़ी चर्चा है |
एक “सज्जन" थे, उनसे कहा गया की आपके राज-काज में बड़े लफड़े लोचे हुए हैं | तौलिया रख-रख के लोगों ने बड़े-बड़े काण्ड कर दिए, आप इस्तीफ़ा दो | वो नहीं माने | इस चक्कर में कई और लोगों ने इस्तीफ़ा दे डाला | फिर मीटिंग बुलाई गयी | मीटिंग में वो टाइम पर पहुंचे, और टाइमिंग की महिमा देखो, सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी |
इस बीच एक दूसरे सज्जन इस्तीफ़ा दे बैठे | उनसे सबने कहा की वापस लो भाई ये इस्तीफ़ा, ऐसे नहीं चलेगा | कई दिनों तक नहीं माने, बाद में मान गए | बाद में पता चला की पिछले ८ सालों में उन्होंने ये इस्तीफे वाला काण्ड ३ बार किया है |
हमारे प्रधानमंत्री जबसे प्रधानमंत्री बने हैं तबसे इतने “गेट" निकले ( जैसे “कोलगेट" ) की लोगों ने उनसे भी हर दूसरे महीने इस्तीफ़ा मांगना जारी रखा है | हालत तो ये है की अगर उनके अपने घर की बत्ती भी चली जाए तो उन्हें डर लगने लगता है की कहीं उन्ही से इस्तीफ़ा ना मांग लिया जाए |
पर इनलोगों को आइडिया नहीं है की बेचारे “इस्तीफों" की क्या हालत होती होगी ? हम बताते हैं | इस्तीफों में भी जान होती है, हमारी तरफ सोचते-समझते-जानते-बूझते हैं | उनमे फीलिंग्स होती हैं | पर जनता का क्या है , वो समझ नहीं पाती |
इस्तीफों का जनम ज्यादातर ऑफर लेटर्स से होता है | आमतौर पर जब तक कोई दूसरा ऑफर ना हो, लोग इस्तीफ़ा नहीं देते | कभी कभी इस्तीफ़ा देते ही नए ऑफर मिल जाते हैं | पर लोग ऑफर को एक्सेप्ट कर लेते हैं , इस्तीफों को भूल जाते हैं |इस्तीफे कई तरह के होते हैं :
आम इस्तीफे :
भावखाऊ इस्तीफे :
ढुलमुल इस्तीफे :
ढीठ इस्तीफे :
खैर!!! अभी चलते हैं | फिर मिलेंगे तब तक आप एंटरटेनमेंट नेटवर्क, जिन्हें “न्यूज़ चैनल" कहा जाता है चलती फिरती भाषा में, उनपर इस्तीफ़ा कांडों के मजे लीजिये |
टाटा !!!
रविवार, 2 जून 2013
हैरी पॉटर की दुनिया !!!
कहानी :
कहानी का मुख्य नायक, हैरी पॉटर है | पर ये कह पाना मुश्किल है की वो नायक किस उम्र में बना | उसके माता-पिता जादूगर हैं | जब हैरी छोटा ही था तब उसके माता पिता को एक बुरा जादूगर, वोल्डेमोर्ट, मार देता है | जब वो हैरी को मारने की कोशिश करता है तो उसमें सफल नहीं होता, और अपना अस्तित्व ही खो देता है और जंगल में जाकर छुप जाता है |
और फिर एक स्कूल है जादूगरी का, होग्वार्ड्स | वहाँ के हेड हैं , प्रोफ़ेसर एल्बस डम्बलडोर | डम्बलडोर दुनिया के सबसे बड़े जादूगर हैं और वोल्डेमोर्ट केवल उन्ही से डरता है | जब वोल्डेमोर्ट हैरी के माता-पिता को मार देता है तब डम्बलडोर अपने साथियों की मदद से हैरी को उसकी मौसी के पास छोड़ आते हैं |
जब हैरी ११ साल का होता है, तब वो होग्वार्ड्स में दाखिल होता है | और यहाँ से शुरू होता है हैरी पॉटर का सफर | पूरे सात साल की कहानी , सात उपन्यासों में लिखी गयी है | हर साल हैरी को नए चैलेंजेस मिलते हैं | अपने दो दोस्तों रॅान और हरमोयनी के साथ मिलकर वो इनसे एक-एक करके निपटता है | और आखिर में जीत सच्चाई , दोस्ती और प्यार की होती है |
उपन्यास :
उपन्यास फिक्शन और सस्पेंस की मिली जुली श्रेणी में आता है | इसके ७ भाग हैं:
१. हैरी पॉटर एंड फिलोसोफर्स स्टोन
२. हैरी पॉटर एंड चैम्बर ऑफ सीक्रेट्स
३. हैरी पॉटर एंड प्रिजनर ऑफ अज़क्बान
४. हैरी पॉटर एंड गोब्लेट ऑफ फायर
५. हैरी पॉटर एंड आर्डर ऑफ फीनिक्स
६. हैरी पॉटर एंड हाफ ब्लड प्रिंस
७. हैरी पॉटर एंड द डेथली हैलोस
जे.के. रालिंग, जो इसकी लेखिका हैं, ने पूरी एक दुनिया गढ़ दी है | एक स्कूल, वहाँ की किताबें, पढ़ाए जाने वाले विषय , विषयों के कंटेंट, जादू की दुनिया, वहाँ के लोग, लोगों के तौर तरीके, उनकी सोसाइटी, उनकी सोच, ऊंचे जादूगर, नीचे जादूगर, वहाँ की मिनिस्ट्री, मंत्री : हर चीज़ का विस्तृत वर्णन है | पर कहीं पर भी बोरिंग नहीं | सबसे महान इंसान भी कैसे गलती कर सकता है , गद्दी का लालच कैसे हर इंसान की जान को दांव पर लगा देता है , मीडिया के भी सारे पहलू, सब कुछ मिलता है | एक फ्लो में बहता चला जाता है सब कुछ | कहानी में जो कुछ भी घटता है उसका कोई न कोई कारण होता है और वो कारण वक्त आने पर पाठक के सामने खुलता जाता है | और शायद यही कारण है कि जैसे जैसे आप उपन्यास के अंदर जाते हो, आप खुद को इसके अंदर पाते हो |
और हर उपन्यास के अंत में प्रो. डम्बलडोर हैरी को कुछ बातें बताते हैं , वैसे तो काफी फिलोसोफिकल होती हैं पर पढ़ने वाला कोई कम उम्र का है तो शायद बहुत ज़रूरी होती हैं उसके लिए | पर ऐसा नहीं है कि बड़ों के लिए उसमे कुछ नहीं | कभी कभी ज़िंदगी को समझने के लिए बच्चा बनना पड़ता है | बस यहीं पर हैरी पॉटर के सारे उपन्यास बड़ों के लिए भी पढ़ने वाले हो जाते हैं |
एक खासियत और है, सारे उपन्यासों की इस श्रंखला के : सारे उपन्यासों की पूरी कहानी वोल्डेमोर्ट के द्वारा हैरी के माता-पिता की हत्या के इर्द-गिर्द है और हर उपन्यास उस घटना के बारे में कुछ नयी बातें उजागर करता है | और सबसे आखिरी हिस्से में आकर पूरी बात से पर्दा उठता है |
फिल्म :
७ उपन्यासों की कहानी को ८ फिल्मों में दिखाया गया है :
१. हैरी पॉटर एंड फिलोसोफर्स स्टोन ( अमेरिका और भारतीय उपमहाद्वीप में सोर्सर्स स्टोन के नाम से )
२. हैरी पॉटर एंड चैम्बर ऑफ सीक्रेट्स
३. हैरी पॉटर एंड प्रिजनर ऑफ अज़क्बान
४. हैरी पॉटर एंड गोब्लेट ऑफ फायर
५. हैरी पॉटर एंड आर्डर ऑफ फीनिक्स
६. हैरी पॉटर एंड हाफ ब्लड प्रिंस
७. हैरी पॉटर एंड द डेथली हैलोस पार्ट –१
८. हैरी पॉटर एंड द डेथली हैलोस पार्ट –२
पहली ६ फ़िल्में , ६ उपन्यासों पर हैं जबकी आखिरी उपन्यास को दो फिल्मों में तब्दील किया गया है | हालांकि फ़िल्में उस डिटेल में नहीं जा पाती जिस डिटेल में उपन्यास है | बहुत से किरदार कम हो गए हैं फिल्म में | कुछ किरदारों को बहुत कम समय मिला है | इसलिए मुझे फ़िल्में देखने में ज्यादा मजा नहीं आया | हालांकि आप अगर सिर्फ फ़िल्में देखो तो भी कहानी का पूरा पता लग जायेगा | मुझे फिल्मों की तीसरी कड़ी, “प्रिजनर ऑफ अज़क्बान ” अपने मूल उपन्यास के बहुत करीब लगी जबकी पांचवी कड़ी “आर्डर ऑफ फीनिक्स" सबसे दूर | बाकी सारी लगभग एक जैसी ही हैं |
सारे उपन्यास और फ़िल्में फ्लिप्कार्ट पर उपलब्ध हैं |
गुरुवार, 23 मई 2013
बॉम्बे टाकीज़….
अनुराग कश्यप :
लगता है जैसे भदेस का चित्रण करना उनकी फितरत बन गयी है या उसे वो अपनी यू एस पी की तरह सेट कर देना चाहते हैं ( या कर भी चुके हैं ) | अगर नाम ना बताया जाता तो ये शक हो सकता था कि शायद विशाल भारद्वाज ने इसे डायरेक्ट किया हो| संगीत का जितना स्कोप बन सकता था, उससे भी बेहतर है : “बच्चन-बच्चन" और “मुरब्बा" दोनों इम्प्रेसिव | पर कथानक कहीं कहीं खींचा जाता दिखा | शायद छोटा हो सकता था | एक बार देखा भी जा सकता है, एन्जॉय भी किया जा सकता है | दुबारा देखूँगा तो सिर्फ और सिर्फ संवादों के लिए |
जोया अख्तर :
सब्जेक्ट क्या था ? एक लड़का जिसको डांस सीखना है और उसको लड़कियों के कपड़े पहनना अच्छा लगता है | दोनों में से बुरा क्या है ? डांस सीखने की ललक या लड़का होते हुए लड़कियों के कपड़े पहनना | समझ नहीं आया मुझे | हाँ, बस “शीला की जवानी" गाना हाल में देख लिया ( तीस मार खां देखने की हिम्मत तो टीवी पर भी नहीं है) | रणवीर शौरी वेस्ट किये गए, कुछ बेहतर कर सकते थे | बच्चे ने कुछ अच्छे सीन दिए | पर फिल्म डब्बा गोल टाइप ही लगी |
दिबाकर बनर्जी :
चारों में बेहतरीन , और शायद सैकड़ों-हजारों फिल्मे जो पिछले १०० सालों में बनी हैं उनमे से ज्यादातर पर भारी | कुल मिलकर ८-१० फ्रेम में कथानक खत्म | जित्ता ज़रूरी उतना संगीत | और कहानी का सबसे अहम हिस्सा बिना किसी डायलोग के सिर्फ नवाज़ुद्दीन की एक्टिंग और बैकग्राउंड में बजती बांसुरी के साथ | पहला और आख़िरी फ्रेम भी लगभग एक सा, बस जो अंतर वही कहानी | १०० सालों का सबसे बड़ा अचीवमेंट : नवाज़ुद्दीन जैसे एक्टर और उनके लिए दिबाकर जैसे डायरेक्टर |
करन जोहर :
मेलोड्रामा बनाने के बादशाह जो फ़िल्में लाल-पीले रंग , ग्लिसरीन के आंसूं और बैक-ग्राउंड में आलाप के साथ बनाते आये हैं, पहली बार ऐसी कहानी लाये जो उनके ज्यादातर फैन खुद ही रिजेक्ट कर दें और उन्हें पता नहीं क्या क्या कह के गाली दें | पर ये कहानी चारों में से सबसे बोल्ड है अपने सब्जेक्ट के लिए | सबने अपने हिसाब से रोल बढ़िया किया है | मदन मोहन जी के संगीत का बहुत बढ़िया प्रयोग | पर जिस समाज में एक लड़के और एक लड़की की शादी के बहुत कम ही कॉम्बिनेशन को मंजूरी मिली हो, उसके लिए फिल्म में थूंकने के लिए काफी कुछ है | और अगर आप इस समाज से बगावत का तेवर रखते हैं तो ये आपको अच्छी लगेगी ( और उसके लिए ज़रूरी नहीं आप वैसे हो, जैसे इसके किरदार दिखते हैं)|
बॉम्बे टाकीज़….
मैं फिल्म को याद रखने या १०० साल के सोवेनियर की तरह सहेजने के कारण ढूँढने की कोशिश कर रहा हूँ | दिबाकर, नवाज़ुद्दीन , करन जोहर , अमित त्रिवेदी (फिल्म के संगीतकार) कुछ उम्मीद देते हैं, पर अंत में दिखाया गया गाना दिल तोड़ देता है | ये विडम्बना से बढ़कर कुछ नहीं कि फिल्म को चलाने के लिए ये गाना घुसेड़ा गया और वो अपने पहले हाफ की एडिटिंग को छोड़कर कोई छाप नहीं छोड़ पाया | और यही भारतीय सिनेमा के १०० साल की सबसे बड़ी दुर्गति है |
५ में से (चारों के लिए अलग-अलग), अनुराग और जोया के खाते से २-२ और करन जोहर के खाते से १ अंक लेकर दिबाकर को १० |
--देवांशु
शनिवार, 4 मई 2013
नंदी हिल्स पर फ़तेह !!!
शुक्रवार, 3 मई 2013
…वापस बेंगलुरू की ओर…
बेंगलुरू (बंगलोर) जाने का प्रोग्राम तो पिछले साल करीब नवम्बर से बन रहा था, जब हमारे एक फ्रेंड ने चैलेंजिया दिया था “वहाँ जाकर दिखाओ, तो जाने” | पर फिर दिल्ली का मौसम सुहाना हो गया | बोले तो प्लीजेंट | तो कभी जाने का ना तो मन किया ना, ज़रूरत हुई |अब पिछले दिनों मौसम गर्म हो गया दिल्ली का | तो लगा कि चलते ही हैं बेंगलुरू | मौसम भी ठंडा होगा वहाँ | और शायद हमारे ज़हर-कहर से दिल्ली भी बच जाए
|
पुणे ऑफिस के एक सीनियर को भी बोला कि आप भी आ जाओ | वो भी रेडी हो गए | अपने खर्चे पर ही सही एक ऑफिसियल ट्रिप की तैयारी हो गयी | इस बीच आइडिया ये भी आया दिमाग में कि जिन कामों के लिए गुड़गांव या दिल्ली आये थे , उसमे से ज्यादातर या तो निपट गए या फिर आगे कुछ करने/होने का स्कोपिच नहीं रहा , तो क्यूँ ना वापस अपनी बेस-लोकेशन बेंगलुरू ही निकल लिया जाए | मेरे मैनेजर भी कई बार बोल चुके हैं कि आ जाओ यहाँ | तो परमानेंट ट्रांसफर का भी सोचने लगे | फिर ये हुआ कि यहाँ आओ तब डिसाइड करेंगे |
इतने सारे कन्फ्यूजन के बीच, टिकट हम बुक करा लिए | पर पुणे वाले सीनियर का प्रोग्राम कैंसल हो गया | उनकी बेटी की तबियत खराब हो गयी | और ट्रिप में जितना कुछ ऑफिसियल था वो कट्टम-कट हो गया | फिर भी फिसल गए तो हर गंगा करते हुए चल ही दिए एक शुक्रवार, बेंगलुरू के लिए |
दिल्ली एअरपोर्ट पर सिक्यूरिटी चेक-इन पर ऑफिसर ने बोला कि आपके बैग में कैंची है ( जैसे आपके टूथपेस्ट में नमक है ) | हमने पूरा बैग छान मारा कहीं कैंची नहीं | शेविंग-किट में एक कैंची होती थी , उसे घर पर निकाल दिए थे | ऑफिसर ने हमारे बैग के स्कैन का फोटू फिर देखा और बोला शेविंग किट में ही है | किट-बैग की बाहर की पॉकेट में एक कैंची थी , जो बैग के साथ फ्री मिली थी शायद, मिलते ही बिछड़ गयी | ( किट-बैग हमने पिछले साल जून में खरीदा था)
आगे बिना किसी लफड़े लोचे के बेंगलुरू में लैंड कर गए | अपने पुराने सखा सुशांत को पहले ही फोन कर दिए थे कि आ रहे हैं | वो उस दिन जल्दी घर आ गए थे | उन्होंने बस की डिटेल बताई | हम चल दिए बस स्टैंड की ओर | हमारे आगे CISF के दो जवान दम्बूक लिए जा रहे थे | हमने एक को क्रोस किया, जल्दी में | दूसरे को क्रोस करने लगे तो पहले ने पीछे खींच लिया | तब ध्यान में आया कि हमने तो ध्यान ही नहीं दिया | हम अपन में इतना खोये हुए थे कि किसी नेता जी की सिक्यूरिटी में घुस गए थे | वो तो कहो धुने और सूते नहीं गए | बच गए |
बस से चल दिए मैजेस्टिक बस स्टैंड की ओर | बेंगलुरू का नया एअरपोर्ट शहर से बहुत दूर है | रस्ते में दोनों ओर पहाड़ी दिखाई देती हैं | पिछले कई सालों से अक्सर इस रस्ते से आना जाना हुआ है पर हर बार ये कुछ बदला सा लगता है | इतना बदलाव आता रहता है कि कोई भी जगह अगली बार पहचान ही नहीं मिलती | सुशांत ने बोला था जब मेकरी सर्कल पहुँच जाओ तब फोन कर देना | ना हम जान पाए कब वो आया , ना ही कंडक्टर ने बताया | सीधे मैजेस्टिक पहुँच के सुशांत को फोन किया | थोड़ी देर वेट करना पड़ा | फिर वो हमें बाइक से लेने आ गए और हम उनके घर पहुँच गए | उनके रूम-मेट्स से मुलाकात हुई और खाने में बैगन का भर्ता बनाया गया |
सुशांत से दोस्ती तब से है, जब मैं २००७ में कोलकाता से ट्रान्सफर होकर बंगलोर ( तब नाम बंगलोर ही था ) आया था | हम दोनों का एक कॉमन फ्रेंड था, वो सुशांत की कंपनी में था और मेरा कॉलेज फ्रेंड था | हम लोगो ने साथ ही घर लिया था | शुरुआत के दिन थे नौकरी के | साथ में खूब घूमे टहले | फिर एक-एक करके बाकी रूम मेट चले गए | बचे हम दोनो | बंगलोर में घर लेने के लिए १० महीने की सिक्यूरिटी , १ महीने का एडवांस और १ महीने का किराया ब्रोकर को देना होता था | उतने पैसे कुल मिला के दोनों के पास नहीं थे | जॉब करते अभी ६ महीने भी नहीं हुए थे | घर से पैसे मांगने का मन दोनों का नहीं था | फिर किसी तरह एक घर का जुगाड़ हुआ | १ साल उस छोटे से घर में गुजारने के बाद , एक बड़ा घर किराए पर लिया गया | कुछ दिनों बाद मैं अमरीका चला गया | वापस आकर जॉब स्विच करके गुड़गांव आ गया | सुशांत ने भी आई टी की नौकरी छोड़ दी | स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ज्वाइन की | उन्ही के फ्लैट में अड्डा जमाया गया है कुछ दिनों के लिए |
कुछ ३ साल रूम-मेट रहे हम दोनों | उसके बाद फोन पर भी अक्सर बात होती रहती थी | बीच-बीच में वो कभी घर जाने के लिए दिल्ली आया तो मुलाक़ात भी हुई | पर इस बार बड़े दिनों बाद फुरसत से बैठे | खाना खाने के बाद हम दोनों का फेवरेट था लंबी वाक पर जाना | रात २ बजे तक बाहर घूमते रहे | पिछले २-३ साल की बातें दोनों ने डिस्कस कीं | उसका नेक्स्ट डे ऑफिस था | वो सोने निकल लिए | मेरी इतनी जल्दी सोने की आदत रही नहीं है तो काफी देर तक किताब पढ़ता रहा | फिर लैपटॉप पर खटर-पटर की |
जब नींद खुली तो सुशांत और उसके रूम-मेट ऑफिस जा चुके थे | रेडी होकर हम भी बाहर घूमने निकले | सबसे पहले कॉफी पी गयी और मसाला बन खाया | ये फेवरेट नाश्ता रहा है हमेशा बंगलोर में | वापस आये तो फिर किताब में घुस गए | थोड़ी देर और सोया गया | अगले दिन सुबह जल्दी ही नंदी हिल्स के लिए निकलना था |
बस ऐसे ही गुज़ार दिए यहाँ पर पहले २४ घंटे | बाकी फिर कभी , तब तक हँसते रहिये - मुस्कियाते रहिये !!!!!
नमस्ते !!!
-- देवांशु
बुधवार, 10 अप्रैल 2013
मुझे आपकी फिर से ज़रूरत है पापा !!!
दर-असल ज़िंदगी किसी की भी हो, पूरी तरह से उसकी अपनी नहीं होती | जिंदगी के कई हिस्से होते हैं और वो अलग-अलग लोगो के होते हैं | आप हम सभी कि ज़िंदगी का अहम हिस्सा हमेशा रहोगे जैसे हम आपकी ज़िंदगी के हिस्से थे | आपको खोने के साथ खोने का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जो ना जाने कहाँ जाकर रुके , पापा |
कभी-कभी सोचता हूँ कि शायद मैं दुनिया के कुछ ऐसे लड़कों में होऊंगा जो अपने पापा जैसा नहीं बनना चाहते | आप मेरे आइडियल भी नहीं थे | और इसका एक ये भी कारण है कि आपने कभी ऐसा नहीं चाहा | आप हमेशा हमें किसी और की तरह बनाने की कोशिश करते रहे | और हम किसी और में अपने आइडियल ढूंढते रहे | पर ज़िंदगी में जब भी सबसे ज्यादा उदास हुआ , मैंने हमेशा आपको अपने पास पाया था | प्री-फ़ाइनल इयर में जब मेरी बैक आयी थी तो कॉलेज की हट पर फूट-फूट के रो रहा था | सबसे बात की पर रोना थमा तो आप से बातकर के | जब आपने कहा था “अबे फर्स्ट डिविज़न तो आ ही जाओगे, हम तो सेकंड के ऊपर कभी ना बढ़े” | अक्सर ये भी सोचता हूँ कि मुश्किल से मुश्किल बातों को हल्के से लेने की हिम्मत भी मुझे आप ही से आयी है |
पापा, आप कोई अन्ना हजारे नहीं थे | पर करप्शन को हैंडल करने का आपका अंदाज़ मुझे हमेशा इम्प्रेस करेगा | अपनी नौकरी के पहले ही दिन एक आदमी ने आपको २ रूपये रिश्वत देने की कोशिश की थी | आपने लेने से माना कर दिया | उस आदमी का काम नहीं हुआ | उसने कंप्लेंट कर दी कि कम रुपये दे रहे थे तो मेरा काम नहीं किया | उस दिन आपके साहब ने आपको समझाया था कि काम भले ही किसी का हो रुपये जो दे लेते चलो वरना, ऐसे ही कम्प्लेंट खाओगे | ये वो सरकारी दफ्तर है जहाँ पेशकार तक फाइल बढ़ाने के लिए उसपर “महात्मा गांधी" को रखना पड़ता है | और उसका हिस्सा ऊपर तक जाता है | आपने एक नयी स्टाइल निकाल दी | “जितनी रिश्वत लूँगा सारी मैं रखूंगा , किसी और को एक पैसा नहीं दूंगा| जब गाली मेरी तो पैसा भी मेरा |” शायद ही कोई ऑफिसर रहा होगा जो आपसे खुश होगा | अपने पूरे करियर का एक बड़ा हिस्सा आपने पूछ-ताछ कार्यालय में इसीलिए बिता दिया क्यूंकि वहाँ कोई स्कोप नहीं दिखता था किसी को | आप की अहमियत क्या थी ये आपके जाने के बाद आपके ऑफिस वालों को पता चल रही है | कितनो के एरियर्स अभी भी लटके हुए हैं | अक्सर जाता हूँ आपके ऑफिस , वहीं पर लोग बताते हैं | आप जिस सीट पर थे वहाँ पर बैठकर कितनो की पेंशन बंधने में आपने मदद की | उसी सीट पर विराजमान महाशय को मैं हजारों रूपए की “रिश्वत" दे चुका हूँ जिससे मम्मी की पेंशन चाहे कुछ टाइम बाद बंधे पर उन्हें दौड़ना ना पड़े | पर ऐसा पूरी तरह से हो भी नहीं रहा | हम सबकी पढ़ाई के लिए आपने जो मेहनत की वो हम सबसे छुपी नहीं है | रात-रात भर आप काम करते थे | कितने ही लोग अपने “नक़्शे" आप से बनवा के ले जाते थे | कईयों ने कहा है कि ना जाने कैसे होगा अब काम | पर ये वही ऑफिस है जहाँ के लोगो ने आपका २ साल पहले जबरदस्ती पड़ोस के एक गाँव में ट्रान्सफर कर दिया था | उसी दौड़ से आपकी हेल्थ बिगड़ी और फिर बिगड़ती ही गयी | मैंने आपसे कहा भी था कि ट्रान्सफर रुकवाने के लिए जो भी मांग रहे हों दे दो, पर आप नहीं माने थे |आप शायद पूरी तरह से ईमानदार भले नहीं थे, पर दूसरों की बेईमानी आप पर कभी हावी नहीं हो पायी |
कुछ “महा पोंगा” ज्योतिषियों ने कहा है कि मेरे और मेरे भाई की “कुंडली” में कुछ ऐसा है कि हमें पितृ-शोक होगा और इस वज़ह से आप नहीं रहे | इन “कमीने" ज्योत्षियों को काश मैं खुले आम मार सकता | पहली बात तो मैं इन सबपे विश्वास नहीं करता | और अगर ये सब सही भी है तो आपकी अहमियत हम दोनों के लिए और बढ़ जाती है कि आपने पैदा होते ही हमें मार नहीं दिया | खुद भले ही नहीं रहे पर हमें जीने दिया | वैसे आप इनसब पर बहुत विश्वास करते थे | घर आये एक ऐसे ही कैरेक्टर ने आपकी उम्र की भविष्यवाणी की थी ८३ साल | पर आप तो ५८ साल ही जिए | पिछले कई बार से उसे ढूंढ रहा हूँ लखीमपुर में , पूरे २५ साल का हिसाब मांगना है कमीने से |
पापा आपको जाते-जाते भी नहीं देख पाया | आखिरी बार आपको लखीमपुर के रेलवे स्टेशन पर देखा था , आप मुझे छोड़ने आये थे | तब लगता था कि आपसे फिर मिलूँगा |मैंने आपको कई बार बीमार पड़ते देखा और आप हमेशा ठीक होकर बाहर आ गए | इस बार भी लग रहा था कि आप ठीक हो जाओगे | पर शायद ये होना तय था | आपको आखिरी वक्त ना देख पाने का दुःख मुझे हमेशा रहेगा |
एक बात और है जो आपको कभी नहीं बता पाऊंगा | आपके जाने के कुछ घंटों बाद मैं न्यूयार्क एअरपोर्ट पर अपनी फ्लाईट का वेट कर रहा था | मैं अकेला था वहाँ | पर एक आवाज़ थी मेरे साथ | उसको मैंने पहले कभी देखा नहीं था | उसने मुझे बाँध कर रखा था वरना टूट कर बिखर गया होता | उस आवाज़ की रोशनी धुंधली हो रही है पापा | मुझे आपकी फिर से ज़रूरत है पापा उसको बचा के रखने के लिए| कहीं से आ जाओ ना पापा !!!!
अपने जाने के बाद आप बहुत सारी जिम्मेदारियां छोड़कर गए हो | पता नहीं उनमे से कितनी पूरी कर पाऊंगा | पर कोशिश करूँगा जितनी भी निभा पाऊँ, ढंग से निभाऊं | कहते हैं ऊपर हर कोई मिलता है एक दूसरे से | कोशिश करूँगा जब आप से मिलूँ तो आपसे नज़रें मिला सकूं और कह सकूं कि देखिये आपके जाने के बाद भी मैंने कुछ बिगड़ने नहीं दिया , सब संभाल लिया मैंने | बस जहाँ भी हो मुझे हेल्प करते रहना पापा |
I miss you a lot Papa!!!!
“You think the dead we have loved ever truly leave us? You think that we don’t recall them more clearly than ever in times of great trouble? Your father is alive in you , Harry, and shows himself most plainly when you have need of him” – J.K. Rowling in “Harry Potter and the Prisoner of Azkaban”
मंगलवार, 9 अप्रैल 2013
बाइक की सवारी, गाँव घुम्मकड़ी और बाबा गुप्तिनाथ के दर्शन !!!
अगले दिन का पहला टास्क था, बाइक की सफाई | पापा के जाने के बाद से वो कमरे में पड़ी धूल खाती रहती है | झाड़-पोंछ के रेडी की गयी | काम भर का पेट्रोल भी डाला गया जिससे पेट्रोल पम्प तक पहुंचा जा सके | फिर बाइक के कागज़ ढूंढें गए जिससे कोई लफड़ा-लोचा हो तो निपटा जा सके | आजकल गुस्सा काफी आने लगा है सो एक दो बार चिल्लाये भी सबपर कि कोई भी सामान ठीक से नहीं रखता है | स्टेटमेंट की रेंज में हम भी आते थे तो सबने सारी जिम्मेदारी हमपर भी डाली और हमारा गुस्सा अपने आप शांत हो गया |
जब यात्रा शुरू हुई तो पहला पड़ाव था , पेट्रोल पम्प | जाकर पेट्रोल भरवाया गया | थोड़ी दूर गाड़ी चली तो “कड़-कड़" की आवाज़ के साथ बंद हो गयी | तब पता चला कि इंजन-आयल भी खतम हो गया है | अगले पेट्रोल पम्प तक कोई तरह पहुंचे फिर इंजन-आयल भी डलवाया | फिर थोड़ी बहुत परेशानी देते हुए चलती ही रही बाइक |
मेरा शहर , उत्तर-प्रदेश के तराई एरिया में आता है , जिसे गांजर भी कहते हैं | इसका कारण वो तमाम छोटी-छोटी नदियाँ हैं, जो वहाँ पर जाल की तरह फैली हुई हैं | दो मुख्य नदियाँ घाघरा और शारदा हैं |साथ में गोमती और सरयू नदी भी हैं | घाघरा नेपाल से बह कर आती है | शारदा नदी का उद्गम पूर्णागिरी की पहाड़ियों में हैं | उस अंचल में पूर्णागिरी माता की महत्ता वैष्णों देवी जैसी ही है | बचपन में एक बार वहाँ भी जाने का मौका मिला है | बड़ी अच्छी जगह है | घाघरा नदी का बहाव बहुत तेज है और शारदा नदी से वो थोड़ा ऊँचाई पर बहती है | लखीमपुर के बाहर निकलने के थोड़ी दूर पर ही ( शायद बहराइच जिले में) ये दोनों नदियाँ मिल जाती हैं | इस वजह से घाघरा का ढलान वाला बहाव है और वो बहुत तबाही मचाती है | तबाही मचाने के मामले में शारदा नदी घाघरा से भी आगे है | छोटे भाई ने बताया कि उत्तर-प्रदेश में शारदा नदी सबसे ज्यादा तबाही मचाती है | लखीमपुर जिला इसकी बहुत मार झेलता है | शारदा की कई सहायक नदियाँ भी है जिसमे कंडवा और उल्ल नदी प्रमुख हैं | इन नदियों के बारे में ज्यादा कुछ मिलता नहीं | उल्ल नदी का एक घाट मेरे घर से १ किमी की दूरी पर ही है |
इन्ही नदियों के पास कई सारे छोटे-बड़े मंदिर भी हैं | जिसमे से एक “लिलौटीनाथ” बहुत प्रसिद्द हैं | ये उल्ल नदी के तट पर बना है | एक किवदंती के अनुसार अमर योद्धा “आल्हा" और “ऊदल" आजकल इसी क्षेत्र में रहते हैं , छुपकर | बरसात के मौसम में यहाँ आल्हा भी गाया जाता है | आल्हा “जगनिक" के द्वारा लिखा गया एक आदिकालीन काव्य “आल्ह-खंड" के हिस्से हैं | यहाँ इसे ढोलक की थाप पर गया जाता है | एक हिस्सा जो मुझे याद है :
सोमवार, 25 मार्च 2013
पं. पोंगादीन लप्पाचार्य से विस्फोटक बातचीत
मैं : जी बस बढ़िया, आप सुनाएँ |
पंपोल : बस सब प्रभु की किरपा है , कहो कैसे आना हुआ |
मैं : पांडी जी , बस अभी बाहर सुना की आपने भारत के ४-० से जीतने की भविष्यवाणी की थी, तो सोचा जरा आपसे थोड़ा बातचीत कर ली जाए |
पंपोल : अच्छा किया बालक, बड़ा अच्छा लगता है जब तुम्हारे जैसे युवा, हमारे ज्ञान की कद्र करते हो | वर्ना ज्यादातर तो मजाक उड़ाते हैं | अरे भाई सदियों से चला आ रहा है ये सब , कोई समझता ही नहीं | खैर ये सब किनारे धरो , तुम बताओ का पूछना चाहते हो |
मैं : पहला सवाल तो यही की आपकी भविष्यवाणी के बारे में सीरीज ख़त्म होने के बाद ही पता चला , पहले कुछ सुना नहीं ऐसा ?
पंपोल : भाई ये भी एक तरीका है लड़कों ( क्रिकेट खिलाडियों) से प्रदर्शन कराने का | पहले बोल देते तो लड़के कुछ करते नहीं | लेजी हो जाते | सो हमने कहा बाद में बताएँगे |
मैं : अच्छा , मतलब आपने ऐसा जान-बूझकर किया ?
पंपोल : हाँ , बचपन से ही हम ब्लैकबोर्ड पर चाक फेंकते और जहाँ पर निशान बन जाता उसके चारों ओर गोला खींच देते हैं | जनता को लगता है की हमने गोला बाद में बनाया पर असल बात तो ये है की हम निशाना वहीं मरना चाहते थे | ये गूढ़ बातें हैं , मूढ़ जनता क्या जाने |
मैं : वो तो है पांडी जी | धोनी के बारे में बताएं कुछ , क्या राज़ है उनकी सफलता का ?
पंपोल : देखो बालक , इन्सान दो तरह से जीतता है , एक जब उसकी कुण्डली में जीत का योग हो , दूसरा विरोधी की कुंडली में हार का |
मैं : पर वो तो पिछले कई साल से जीत रहे हैं , तो क्या ..
पंपोल ( बीच में बात काटते हुए ) : सबकी साढ़े-साती चल रही है , धोनी के अलावा |
मैं : पर ऑस्ट्रेलिया में तो हम ०-४ से हारे थे |
पंपोल : भैया मेरे , ऑस्ट्रेलिया में सब उल्टा है , जब अपने यहाँ कटकटाऊ ठण्ड पड़ती है तो वहां गरमी , इसीलिए वहां सब उल्टा हो जाता है |
मैं : पर हम तो इंग्लैंड में भी हारे , वहां तो सब ठीक रहता है |
पंपोल ( चेहरा लाल करते हुए ) : यही तो तुम लोगो की बात समझ नहीं आती, बहुत जबान लड़ाते हो | बस केवल मजाक बनाना है हमारी विद्या का |
मैं : अरे शांत हो जाइए पांडी जी , ये बताइये क्या धोनी की कप्तानी में अगला विश्वकप हम जीतेंगे ?
पंपोल : ये हम विश्वकप के बाद बताएँगे |
मैं : अरे क्यूँ ?
पंपोल : बोला ना, परफोर्मेंस पर असर पड़ता है , समझते नहीं हो यार तुम |
मैं : पांडी जी , आप तो भड़क गए | अच्छा सर जडेजा के परफोर्मेंस के बारे में भी सुना आपने भविष्यवाणी की थी | उसका क्या राज है |
पंपोल : दरसल उसकी कुण्डली के किसी भी घर में कोई गृह नहीं है , इसलिए उसके बारे में समझ पाना बहुत मुश्किल है और यही उसकी सफलता का राज़ है | वो इसीलिए सफल है की उसके बारे में कोई कुछ समझ नहीं पाता |
मैं : ह्म्म्म, अच्छा सचिन के बारे में बताइए , उन्हें कब तक खेलना चाहिए |
पंपोल : उसकी कुण्डली में सारे योग हैं, पर रिटायर्मेंट का योग नहीं है |
मैं : पर फिर भी , कभी तो रिटायरमेंट लेना होगा |
पंपोल : मुझे पता तो है की वो कब लेंगे रिटायरमेंट, पर मेरे बयान से उनके आखिरी मैच में सिक्यूरिटी की समस्या खड़ी हो जायेगी , इसलिए सरकार ने हमें चुप रहने के लिए बोला है |
मैं : तो आप सरकार में भी दखल रखते हैं?
पंपोल : और नहीं तो क्या, हमारी सलाह के बिना तो नेता लोग सदन में नहीं जाते, प्रधानमंत्री भी !!
मैं : हमें नहीं लगता ऐसे पढ़े लिखे प्रधानमंत्री ऐसी बातें मानते होंगे |
पंपोल : अरे भूल गए , उन्ही ने तो कहा था की उनकी मौत के लिए विपक्ष ने यज्ञ कराया था | ये इन्फोर्मेशन भी हम ही ने दी थी |
मैं : आप तो काफी पावरफुल आदमी लगते हैं | आप सबका भविष्य जानते हैं | तो अपना भी जानते होंगे ?
पंपोल : हाँ बिलकुल |
मैं : तब तो आप बीमार भी नहीं पड़ते होंगे |
पंपोल ( मुस्कियाते हुए) : मालूम था की तुम्हारे मन में ये शंका आएगी | देखो बालक , राम , कृष्ण ये सब भगवान् के अवतार थे पर इन्होने कभी किसी को आइडिया नहीं लगने दिया के आगे क्या होने वाला है | इसैई लिए हम भी सब नार्मल चलने देते हैं |
मैं : तो बीमार पड़ते हैं लेकिन आप इलाज भी नहीं करवाते होंगे ? आपको तो पता ही होगा की आप ठीक हो जायेंगे ?
पंपोल : नहीं , कराते हैं | डाक्टर लोग दवाई देते हैं | लोग सब दवाई की एक्सपायरी देखते हैं , हम मैनूफैक्चरिंग डेट देखकर उसकी कुण्डली बनाते हैं और फिर देखते हैं की हमें फायदा करेगी या नहीं |
मैं : तो आप बिना एक्सपायरी देखे दवाई खाते हैं ?
पंपोल : यहीं तो हमारी विद्या और तुम्हारे विज्ञान में अंतर है , हमें अपनी एक्सपायरी डेट पता है |
मैं : धन्य हैं आप तो |
पंपोल : हाँ वो तो हैं |
मैं : एक बार फिर क्रिकेट पर आते हैं , फ्लेचर कब तक रहेंगे अपने कोच ?
पंपोल : कौन ??
मैं : डंकन फ्लेचर |
पंपोल : मैंने उनके बारे में नहीं सुना | इन्फोर्मेशन है कुछ उसके बारे में , जैसे कब और कहाँ पैदा हुए ?
पंपोल : कब से हैं कोच ये ?
मैं : काफी टाइम हो गया , जाने वाले थे , एक्सटेंशन मिल गया |
पंपोल ( कागज पर घूरते हुए ) : जड़ता का योग है | जहाँ जाएगा कुण्डली मार कर बैठ जायेगा , हिलाए ना हिलेगा | पर मुस्कुराते हुए बोले पर जहाँ रहेगा फल अच्छे देगा |
मैं : पर पहले तो ये इंग्लैंड के कोच थे , जब तक रहे बुरी तरह हारी इंग्लैंड |
मैं : मतलब हम साउथ अफ्रीका में जीतेंगे ?
पंपोल ( मुस्कुराते हुए ) : ये तो मैं …
मैं : “साउथ अफ्रीका सीरीज के बाद बताऊंगा” |
पंपोल भड़क गए मेरे ऊपर | बोले की मेरा दिमाग खराब हो गया है | और मैं उनकी विद्या का मजाक उड़ा रहा हूँ | और मेरी जन्मतिथि और जगह मांग बैठे | मैंने भी उनको डाटा दे डाला | फिर उन्होंने कागज़ में कुछ खींचा और बोले :
मैं : अरे पांडी जी, क्या बता रहे हो, मेरा तो कभी कोई लफड़ा नहीं रहा |
पंपोल : अब होगा ना छिछोरे |
मैं समझ गया | मैंने २ पांच सौ के निकाल कर उनके चरण कमलों में रखे | और बोला की फिर से देखें |
पंपोल : जो बात बोली वो तो ठीक है | पर इसमे से जो एक गृह है वो काट कर रहा है , फेमस हो जाओगे , अच्छा है सब |
मैं : अच्छा शादी कब होगी पांडी जी मेरी ?
पंपोल : ये हम ..
मैं : “…तुम्हारी शादी के बाद बताएँगे”
और इससे पहले की वो अपने वज़न के चलते उठकर हमें दौड़ा पाते | हम वहां से खिसक लिए और जाते जाते एक ५०० का पत्ता भी उठा लिए और चिल्लाकर बोले :
“कीप द चेंज प्लीज़”
मंगलवार, 19 मार्च 2013
ज़हरखुरानी के २ साल !!!
इन दिनों अपने “कट्टा कानपुरी” उर्फ फुरसतिया जी फेसबुक पर अपने असलहों ( स्टेट्स अपडेटस) के साथ छाये हुए हैं | पिछले साल उनकी एक पोस्ट पढ़ी थी जिसमे उन्होंने “कट्टा कानपुरी” के प्रादुर्भाव के बारे में बताया था | पर लिंक कहीं खो गया हमसे | फुरसतिया जी को हम ऑनलाइन धर दबोचे, कि लिंक देओ हमें पढ़ने का मन है | उन्होंने हमें लिंक्स दिए | हमने पढ़े | वो पोस्ट फुरसतिया जी ने अपने ब्लोगिंग में ७ साल पूरे होने पर लिखी थी | हमने अपनी पहली पोस्ट को देखा तो पाया , २ साल तो हमें भी हो गए | हम बताये अनूप जी को तो वो बोले इस पर पोस्ट लिख मारो, “दुशाला" पोस्ट | आइडिया हमें भी बढ़िया लगा |
वैसे देखें तो दो साल में दो चीज़ें बड़ी कोंसटेंट रहीं | पहला हमारे कंटेंट का लेवल ( पहली बात तो ज्यादातर रहा नहीं, और जो रहा उसका लेवल इतना गिरा हुआ था कि उससे ज्यादा क्या गिरता), और दूसरा हमारा परिचय ( अबाउट मी सेक्शन), २ साल से दिखा रहा है “फिर कभी लिखूंगा आज तो बस इतना ही कि कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ...”|
तो सोचा कि इस बार कुछ अपने बारे में लिखा जाए:
बचपन में पढ़ाई लैम्प-लालटेन के भरोसे की ( इसलिए नहीं कि बड़े होकर महान बनना था, बल्कि इसलिए कि लाईट नहीं आती है हमारे शहर में शाम के बाद) | मैथ्स और फिजिक्स , पसंदीदा सब्जेक्ट थे | पढ़ने का शौक था पर वो कोर्स की किताब मिलते ही उसे खत्म कर देने तक ही सीमित था | कक्षा ९ में पहली बार प्रेमचंद्र की कहानी “मन्त्र" पढ़ी , उससे पहले भी एक पढ़ी थी उनकी कहानी, पर “मन्त्र" ने बहुत इम्प्रेस किया | उनकी और भी कहानियां पढीं | फिर दसवीं में हिंदी के टीचर, जो खुद भी कविता लिखते थे, उनके संपर्क में आया , और पहली देशभक्ति की कविता लिखी | सेंटी कवितायेँ लिखने का चस्का “आनंद" फिल्म की “मौत तू एक कविता है” नज़्म सुनकर लगा | गुलज़ार के बारे में तो तब इतना पता नहीं था, पर जगजीत सिंह सुनने की उम्र आ गयी थी | फिर रस्किन की कहानियां पढीं | उनकी कहानियों में जो परिवेश दिखता था वो मुझे अपने शहर से थोड़ा बाहर निकलते ही पड़ने वाले जंगलों सा लगता | डायरी लिखने की भी आदत पड़ गयी जब इंजीनियरिंग एंट्रेंस की तैयारी के लिए देहरादून में था| ये सिलसिला कॉलेज में भी जारी रहा | जॉब ज्वाइन करने के बाद भी पढ़ने का स्कोप कम ही रहा और लिखना भी कम ही हो गया ( इन्फैक्ट कुछो नहीं लिखे) |
ब्लॉग की दुनिया में पंकज बाबू हमें लेकर आये | हालांकि पंकज हमारे ही शहर से हैं, पर उनसे पहली मुलाक़ात कोलकाता में हुई | फिर वो मुंबई चले गए और मैं बंगलोर | पंकज के दो कॉलेज फ्रेंड मेरे साथ मेरे ही प्रोजेक्ट में थे | उनमें से एक पवन बाबू से पता चला कि पंकज साहब भी कॉलेज के पहले से लिखते आये थे | उनकी एक डायरी थी जिसे कॉलेज में “ज़हर की पोटली" कहा जाता और पंकज जैसे ही उसे लेकर आते बोला जाता “आओ डसो" | इसलिए हम अपनी डायरी की बात दबा ले गए | फिर पंकज बाबू कभी कभी कुछ फेसबुक पर शेयर करते और हम चाह कर भी तारीफ़ ना कर पाते क्यूंकि “लखीमपुर में सब कविता लिखते हैं का???' जैसे उदगार मिलने का डर था ( जो बाद में मिला) |कॉलेज में जब कोई बहुत बेसुरा गाता था तो उससे कहते थे कि “यार बहुत अच्छा गाते हो, स्टेज पर ट्राई करो” | फिर वो पूछता कि क्या बहुत अच्छा गा रहा हूँ ? हम जवाब देते नहीं यार, वो अकेले मैं कितना मारूंगा तुम्हें और लोग भी होने चाहिए ना | गुडगाँव में जब पंकज के साथ शिफ्ट हुए तो पंकज ने भी कहा “ब्लॉग पर लिखो बे” जब पंकज को अपनी डायरी से कुछ सुनाया | कुछ कुच्छ बेसुरा गाने वाले सी फीलिंग आ गयी | जब ब्लॉग लिखा तो पंकज के उन्ही दोस्त का कहना था कि पंकज ने हमें भी डस लिया |
ये तो था कुछ अपने बारे में | एक पोस्ट नोर्मल टाइप का परिचय लिखने के बाद शुरुआत कविताओं से की , ज्यादातर कवितायेँ कॉलेज टाइम की लिखी हुई थी | पुराना माल ही डाले पड़े थे | फिर धीरे धीरे और लोगो को पढ़ना शुरू किया ब्लॉग पर |इस बीच हृषिकेश गए तो लौटकर रस्ते में हुई खुराफातों को लिखना चाहा | सोचा कि कविताओं से इसको मिक्स ना किया जाए | उस समय मनोहर श्याम जोशी की "कुरु कुरु स्वाहा” रूम में पढ़ी जा रही थी | कुछ-कुछ उसी से इम्प्रेस होकर नए ब्लॉग का नाम रखा “अगड़म बगड़म स्वाहा" | शुरुआत में ऊंचा कंटेंट लिखने कि कोशिश की , पर जल्दी ही पता चल गया कि अपन का लेवल उतना है नहीं , औकात पर आ गए |
फिर एक बार अनूप जी ने “चिट्ठा चर्चा” पर हमारे ब्लॉग की चर्चा की, हम तो खुश हो गए | उस समय अमरीका में थे, कार ड्राईविंग सीख रहे थे, इंस्ट्रक्शन परमिट पर ही कार चलाते हुए दोस्तों को आइसक्रीम पार्टी पर ले गए | पूजा ने भी अपने ब्लॉग पर हमारे बारे में लिखकर ज़हर फैलाने के उत्साहित किये रखा | बीते दो सालों में जिंदगी ने बड़े उतार चढाव लिए , मूड बदलता रहा , और उसका असर लिखी गयी पोस्टों पर भी पड़ा | अच्छी बात ये रही कि जब अच्छा लिखा ( अगर किसी को लग गया तो, वैसे स्कोप तो कम ही रहा) तो लोगों में जम के पीठ ठोंकी, और जब औकात से भी नीचे गए तो बहुत गरियाये भी गए |
पर ये ब्लॉग की दुनिया है अपने आप में बड़ी इंटरेस्टिंग | कितने लोग हैं जिनका लिखा, पढ़ा है केवल, फोन पर कभी कभी बात हुई है | बहुत कम लोगो से मिले हैं | दरअसल मेरे प्रोजेक्ट टीम भी ज्यादातर बंगलोर और पुणे में है तो इस समय चाहे वो ऑफिस के लोग हों या ब्लॉग दुनिया के , सबसे एक वर्चुअल दुनिया में ही मिलना हो रहा है , काम भी वैसे ही होता है ,खाली टाइम भी वैसे ही बीतता है|
पहली बार अनूप जी को पढ़े तो हँसते हँसते पगलाय गए थे | सबसे पहले उनकी पोस्ट पढ़ी थी “शंकर जी अंग्रेजी सीख रहे है" | उस समय क्यूबिकल में आशीष भाई साथ में बैठते थे , उनको भी पढाये | दोनों फैन हो गए फुरसतिया के | फिर तो दोनों ढूंढ ढूंढ के उनकी पोस्ट पढ़ते | ऑफिस में भी काम कम था तो दोनों वहीँ पढ़ पढ़ के हंसते | पिछले दिनों अनूप जी जब दिल्ली आये तो उनसे मिलना हुआ| बड़ा अच्छा लगा | वहीं से व्हाट्स एप पर आशीष को मेसेज कर बताये अनूप जी के साथ हैं | वो भी खुश हो गये और बोले “बढ़िया है” | वहीं पर विनीत कुमार से भी मिलना हुआ | बड़े खतरनाक मनई हैं वो भी | बहुत कम टाइम के लिए शिव जी से भी मिले |
अनूप जी के अलावा प्रशांत (पीडी) और अभिषेक से भी एक -दो बार मुलाकात हुई | अभिषेक से तो पुस्तक मेले में भी मिले | पिछले साल शिखा जी भारत आयी | तो उनके साथ सोनल और अनु जी से भी मिलना हुआ | शिखा जी ने अपनी किताब “स्मृतियों में रूस" गिफ्ट की हमें, अपने आटोग्राफ के साथ | पीडी के साथ ही आराधना से भी मिलना हुआ था पिछले साल |
कुछ लोगो को तो फोन पर भी बहुत पकाया है , जिसमे अभिषेक बाबू और मोनाली मेन हैं | बस ऐसे ही टाइम कट रहा है | ऐसे ही कटता रहे तो मजा आता रहे |
बाकी उधार का एक डायलोग ये भी है कि “यार अगर रूम-मेट ब्लॉगर हो तो बड़ा मुश्किल है जीना” | समझ जाओ कौन कहेगा
|
P.S. : पिछले दो सालों में अगर किसी से मिला या उसे फोन पर पकाया हो, और उसका नाम छूट गया हो तो इसे मेरी गलती समझा जाए | ऐसा नहीं है कि मैं आपको भूल गया और अब नहीं पकाऊंगा, वो क्या है ना कि मिस्टेक भी गलती से एक ही बार करते हैं |
बाकी तो ई पब्लिक है, सबै कुछ जानती है | नीचे कुछ फोटू हैं , खच्चाक …
--देवांशु