शुक्रवार, 28 जून 2013

च से बन्नच और छ से पिच्चकल्ली

“मम्मी ये दादा को कुछ नहीं आता, सब गलत पढ़े बैठा है”
हमारे छोटे भ्राता श्री ने मम्मी को मेरी पढ़ाई के बारे में फीडबैक दे मारा |

छोटे भ्राता श्री
नाम : प्रतीक ( इस्कूल ), बब्बू ( घर ) | महल्ले में ये बचपन से कई नामों से जाने गए | सबसे पहले अपनी चुस्त-मांस रहित काया के लिए “पिद्दी" , फिर “बाबा बंटूनी” | बचपन से जितना इनकी हिन्दी वोकैब तंग थी, उतना ज्यादा लिखने का शौक था इन्हें | सबसे पहले डायरी ही लिखना शुरू किया इन्होने , इसके बारे में बाद में बताते हैं |

पहले अक्षर ज्ञान, तो बात ये रही की हम जाना शुरू कर दिए इस्कूल, ये साहब अभी घर में रहते थे | “हमहू बड़े हुई जाई, गाड़ी बिक्की से इस्कूल जाई” | ये उनके कुछ उदगार थे जिसमे इनके ज्ञान-पिपासु होने का संकेत सबसे पहले हमारे माताश्री और पिताश्री को मिला | इन्हें बोला गया कि दादा पढ़ता है, उसी कि किताब से तब तक पढ़ डालो , फिर जाना इस्कूल | इन्होने शब्द ज्ञान आरम्भ किया |

“च" से “बन्नच"
“छ" से “पिचकल्ली”
“ट" से “मिनाटर”

तो जब हमने इनको कहा कि तुम गलत पढ़ रहे हो तो इनका फीडबैक था शुरुआत में लिखा सेंटेंस , एक तुर्रे के साथ “ मम्मी ये दादा को कुछ नहीं आता, सब गलत पढ़े बैठा है, च से चम्मच कहता है, बन्नच नहीं कहता है”|

इससे कुछ दिनों पहले ही हम इनको सिखाए थे “बब्बू पता है कौन चे इच्कूल में पलते हैं , थल थथी थिथू मंदिल |”

खैर ये सब तो भाषा ज्ञान की शुरुआत थी  | धीरे-धीरे इनका शब्दों का पिटारा बढ़ निकला | जब ये स्कूल जाने लगे तो एक दिन पापा जी ने श्रुतलेख (इमला) लिखवाया | शब्द बोले गए “दुर्योधन" और “चंद्रमा"  | इन्होने लिखे “दउधन” और “चंडमा" | सूते गए |

फिर जब धीरे धीरे इनका ज्ञान और बढ़ा और एक दिन मम्मी टीवी पर कुछ इंग्लिश में लिखा पढ़ रही थी तो इनके मन में एक जिज्ञासा उठी और पूछ बैठे “मम्मी का आपौ पढ़ी-लिखी हो ??” | सूते गए |

पापा कभी-कभी इन्हें घुमाने नहीं ले जाते थे | एक दिन इन्होने अपना दर्द डायरी के हवाले किया :
“दादा रोज हर बार डगदर बाबू के यहाँ जाता है, हमको कभी नही जाने देता है |”
उसी पन्ने में नीचे इंग्लिश टू हिन्दी ट्रांसलेशन भी था |
“सर कमिनसर"
“मैं अचर जी से पुछता हू की मैं अनदर आ सकता हू |” ( यहाँ अचर जी से तात्पर्य आचार्य जी से है )

कुछ दिनों पहले इस डायरी को ढूँढने की कवायद की गयी | डायरी तो मिल गयी, पर ये पन्ना गायब था |

खैर मुद्दा ये नहीं है | मुद्दा ये है कि इनको हमारी दादी जी से कुछ ज्यादा लगाव था | “हमहू बड़े हुई जाई , दादी का बलब लिए  जाई और पान खाय के आई” | यहाँ से इनके “गुलकंड” वाले पान के प्रति असीम लगन का पता भी चला, जनता-जनार्दन को |

फिर एक दिन ये हुआ कि इनसे दादी की रसोई की चाय की पत्ती बिखर गयी | इनको लगा कि ये फिर सूते गए | ये घर से निकल लिए कि माहौल ठंडा हो जाए , फिर वापस आते हैं | काफी देर तक ये नहीं आये वापस तो माताश्री घर के बाहर ढूँढने गयीं | “पच्चासा" उस टाइम का सबसे क्रेज वाला गेम हुआ करता था | मम्मी को लगा कि ये वही खेल रहे होंगे | आवाज़ लगाई गयी | साहब का कोई अता पता नहीं |

महल्ले की एक खासियत है यहाँ हर टाइम कोई ना कोई घूमता टहलता मिल जाता है | गुड्डू उर्फ टोका मास्टर वहीँ घूम रहे थे | बोले “का बात भाभी, कहिका ढूंढ रही हउ” | “बब्बू पता नहीं कहाँ निकल गए हैं , आवाज़ लगा रहे, आ ही नहीं रहे |” शक गया कि दूसरे वाले गुड्डू और मोनू के साथ होंगे  | गुड्डू (दूसरे वाले)  के घर में ताला लगा था , मोनू भी घर पर नहीं थे | इस बीच राजाराम ज्ञान लेकर आ गए “यार गुड्डू  अबहीं एक सार बाबा आवा रहे, भीक मांगे वाला” | इसको सुनते ही मम्मी की हालत खराब |  युद्ध स्तर पर सर्च शुरू हुई | अब तक महल्ले के कुछ १५-२० लोग इकठ्ठा हो चुके थे | हर तरफ “बाबा बंटूनी”, “पिद्दी", “बब्बू" की आवाजें लग रही थीं |  आधा घंटा बीत गया , बब्बू दादा कि कोई खबर नहीं |

मम्मी ने कहा कि “तुम लोग यहाँ ढूंढो,  हम पुलिस में रिपोर्ट लिखा के आते हैं” | बब्बू दादा का एक खूबसूरत सा फोटो भी ढूंढ लिया गया |

इस बीच ढूँढने वालों में "दूसरे वाले गुड्डू" की अम्मा भी शामिल हो गयीं | वो किसी के यहाँ बर्तन धोने जा रहीं थीं , रास्ते में गाय ने धक्का दे दिया था तो कीचड़ में गिर गयीं थीं, अपनी धोती बदलने आयीं थी | वो उसी हालत में बब्बू दादा-सर्च अभियान में लग गयीं | इसी दौरान ये बात भी आयी की जब वो घर से निकल रही थीं तो बब्बू दादा उनसे कुछ बात कर रहे थे | अब तक मम्मी तैयार हो गयी थीं पुलिस स्टेशन रिपोर्ट लिखवाने जाने के लिए | गुड्डू की अम्मा बोली “ भाभी हमहू चलित है तनी धोती बदल लेई” |

और जैसे ही उन्होंने घर का दरवाज़ा खोला | एक आवाज़ उठी “अरे बंटूनी तो हियाँ बैठे” | बब्बू दादा उन्ही के घर में बंद हो गए थे |

सबसे पहले तो बब्बू दादा को मम्मी-दादी ने गले लगाया,  नहलाया-धुलाया ( साहब ज़मीन पर लेटे पाए गए थे ) | फिर सूते गए|  हर कोई बधाई देने आने लगा : “बंटूनी मिली गए" |

बाबा बंटूनी का एक संक्षिप्त साक्षात्कार लिया गया जिसमे उन्होंने चाय की पत्ती फ़ैलाने की बात स्वीकारी | उन्होंने ये भी बताया कि जब सब लोग आवाज़ लगा रहे थे तो वो दरवाज़ों के बीच से सब देख रहे थे | कुछ लोगो ने घर के अंदर आवाज़ भी लगाई, पर ये मारे डर के बोले नहीं कि कहीं बाहर निकाल के इन्हें और ना मारा जाए |

इस घटना के बाद से दो बातें हुईं, पहली तो बब्बू दादा महल्ले में और फेमस हो गए, हर कोई इन्हें जानने लगा, एक स्टार वाला रूतबा | दूसरा हम लोगो का घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया क्यूंकि घर का वही दरवाज़ा खुला रहता जिसपे या तो दादी का पहरा होता या माता श्री की पैनी निगाह |
उस दिन शाम को जब पापा ऑफिस से घर आये थे तो ये बात खुद बब्बू दादा ने डरते डरते पापा को बताई थी | “पापा आद अम को गए ते” | फिर ये अच्छे से सूते गए |
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-- देवांशु

मंगलवार, 18 जून 2013

इतिहास में डुबकी और बिजली का टोका !!!

१८७७ | साहब ऐसा लगता है जैसे इतिहास का कोई पावरफुल सन-वन है, जैसे ईसई सन में वास्कोडिगामा ने भारत खोजा हो, या महाराणा प्रताप ने किसी ओपची-तोपची को रगदा रगदा के मारा हो | पर डिराओ नहीं | कोई सन नहीं है | ये हमरे मोहल्ले का बड़ा इम्पोर्टेंट घर है | यहाँ हम रहते हैं |

पर अगर आप केवल १८७७ लिखने के बाद मोहल्ला-फोहल्ला का नाम लिख के शहर में चिट्ठी भेज दो तो कोई ज़रूरी नहीं कि वो हमारे ही घर पहुंचे | और वो इसलिए कि ये नम्बर हमारे मोहल्ले में कई घरों का है | दरसल जब प्लोटिंग की गयी थी , उस टाइम एक बहुत बड़े हिस्से का नंबर रखा गया १८७७ | उस हिस्से को आधा खरीदा हमारे परम-पूज्य दादाजी ने |

दादा जी
दादाजी को हमने क्या हमारी माता श्री ने नहीं देखा कभी | पापा की शादी से ५ साल पहले वो इस दुनिया को अलविदा कह गए | इसलिए उनके बारे में कुछ भी लिखने से पहले उनसे माफ़ी , यहाँ जो भी लिख रहे हैं सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है | तो दादाजी हमारे, अंग्रेजों के ज़माने में रजिस्ट्रार क़ानून-गो थे ,  हमारे शहर की तहसील में  | हमारा गाँव शहर से करीब ५० किमी दूर था | जब वो दसवीं में थे , तो फेल हो गए |उनके पिता जी ने उन्हें घर से पूरे सम्मान के साथ निकाल दिया | शहर आकर पहले तहसील में काम शुरू किया | हैण्ड-राइटिंग, खासकर उर्दू की , बहुत ज़बरदस्त थी उनकी , सालों से बंद कोठरी से निकले डायरी के पन्ने इसकी गवाही दे चुके हैं | तो लिखाई के कामों के लिए फेमस हो गए | फिर पढ़ाई भी किये तो बनते बनते एक दिन उसी तहसील में रजिस्ट्रार क़ानून-गो बन गए | हमारी दादी के कथ्य के अनुसार उनकी “तनखा" सन सैंतालीस में ५०० रूपया महीना थी |

ताऊ जी और पापा जी लोगो को उस ज़माने में जेब खर्च के लिए १-२ रुपये डेली मिलते थे | दादाजी ने बच्चन साहब की “लहू में पचहत्तर प्रतिशत हाला" वाली बात चरितार्थ की हुई थी सो शाम को अगर उन्हें आवाज़ लगाकर बुलाते सुना जाता तो , पापा और ताऊ जी चुपचाप लाकर उन्हें तखत पर लिटा देते | उस ज़माने में ना बैंकें थीं , और सरकार के नियम थोड़े कड़े भी थे तो पूरी जिंदगी की कमाई दादा जी ने चांदी के सिक्के में तब्दील करके एक “डेग” में ज़मीन में गाड़कर रख दी थी |

रिटायरमेंट के कुछ दिनों पहले उन्होंने ये प्लाट खरीदा था, १८७७ | तब वो आधा खाली था | तब केवल एक १८७७ था |

कुछ दिनों बाद खबर आयी कि वो सिक्कों वाली डेग चोरी हो गयी | घर की बाकी ज़मा पूंजी बुआ की शादी में लगा दी | ताऊ जी की शादी के लिए आधा प्लाट बेच दिया गया | अब तक बाकी आधे हिस्से के आधे हिस्से में एक “रस्तोगी जी “ ने घर ले लिया था , जो बाद में दशरथ के नाम से जाने गए क्यूंकि उन्ही के सुपुत्र का नाम था “राजाराम" | और जो बाकी का बचा आधा हिस्सा था उसमें दो और प्लाट निकाल दिए गए |

अब उस पूरे बड़े १८७७ के ५ हिस्से हो गए थे | तब तक अंग्रेजों को गए ज़माना गुजर  चुका था और उनके द्वारा छोड़ी गयी मशीनरी में जंग लग चुकी थी लिहाजा पाँचों घरों के मकान नंबर १८७७ हो गए थे |

“कुत्ता ढाल" से उतरने के बाद जो गलियों का आखिरी चौराहा आता है , उसको पार करते ही बाएं हाथ पर पहला घर निगम जी वाला १८७७ है | उससे लगा हुआ राजाराम वाला १८७७ , उसके बाद डेड-एंड | डेड-एंड पर एक गेट है | गेट के उस पार सतीश बाबू की कोठी का हाता | ऐसे तंग महल्ले में एक कोठी भी है |

राजाराम के ठीक सामने का घर शुकला हेड-मास्टर का है | ये उस बड़े प्लाट से अलग है , फिर भी इसका नंबर १८७७ ही है | इसका कारण आजतक नहीं मिला | शुकला हेड-मास्टर हमारे महल्ले के सबसे पढ़े-लिखों में आया करते थे |  रहते वो राजाराम के घर के सामने थे, पर अपने को कम्पेयर राजा दशरथ से करते | यहाँ इनके बारे में बताने का कोई फायदा नहीं है | उनके बारे में तसल्ली से बताया जाएगा कभी |

शुकला हेड-मास्टर से ठीक पहले और हमारे घर के सामने वाला घर है , गुड्डू उर्फ शत्रोहन लाल उर्फ “टोका मास्टर" का |

दादाजी की बात यहाँ बताना इसलिए ज़रूरी था क्यूंकि उन्होंने मोहल्ले के लिए दो काम किये थे | एक, सबसे पहला पक्का मकान बनाया था | दूसरा बिजली के खम्बों के लिए बिजली बिभाग में अर्जी दी थी और बिज़ली सुलभ हुई थी , महल्ले को |  और टोका मास्टर गुड्डू इसलिए ज़रूरी हैं उदधृत किये जाना काहे कि उन्हीं बिजली के खम्बों पर “कटिया-टोका" डालकर उन्होंने महल्ले में अपनी साख बनाई |

गुड्डू जिन्हें हम चाचा कहते थे, गुब्बारे-खिलौने बेचने का काम करते थे | पहले उनका  घर कच्चा बना हुआ था | तब वो गुब्बारे वाले के नाम से जाने जाते थे | फिर जब उनका घर भी पक्का बना और उनके घर का छज्जा ठीक बिजली के खम्बे के पास आकर रुका, उसके बाद से उन्हें “टोका मास्टर" की उपाधि से नवाज़ा गया |

गुड्डू कुल ६ भाई हैं | १ को छोड़ सबकी शादी हो चुकी है |  हैप्पीबड्डे-मुंडन-मड़चटना ये सब उबके यहाँ मासिक क्रियाकर्मों की तरह होते हैं | होली-दिवाली वार्षिक | पर एक काम जो सदियों से नहीं हुआ है वो है “बिजली के बिल का भरा जाना" | पर टोका मास्टर के घर में भीड़ है पर अँधेरा नहीं |  रात में जब लाईट बंद हो जाती है तो अगर उनके घर चोर घुसे तो निकलना तो छोड़िये साहब, आने का रास्ता भूल जाये | और इस बीच अगर किसी ज़मीन पर पड़ी वस्तु से टकरा जाए तो दोनों केस में ही सूता जाए , चाहे बर्तन से टकराए या किसी इंसान से |

खैर, “टोका" डालने की सिध्हस्त्ता के अलावा बिना बिल भरे बिजली जलाने में कोई अगर गुड्डू चाचा का सहायक था तो वो थे बिजली विभाग वाले वर्मा जी | उनके बारे में अफवाह ये थी कि उनकी चार बहुत सुन्दर लड़कियां हैं जिनकी शादी में होने वाले खर्चे के लिए उन्हें गुड्डू जैसे लोगों से मिलने वाले ५-१० रूपये , जो कालान्तर में २०० तक पहुंचे, का मुह ताकना पड़ता | चारों “बहुत सुन्दर" लड़कियों के दर्शन तो कभी नहीं हुए पर वर्मा जी के दर्शन कुछ सालों पहले बंद हो गए , जब वो रिटायर हो गए |

ये गुड्डू चाचा और वर्मा जी के खुले दिल का होने की महानता थी कि महल्ले में बिज़ली लाने की अर्जी का श्रेय लूटने वाले हमारे दादा जी के पोते और  दौड़-भाग-जुगाड़ लगाकर खम्बे लगवाने की वाहवाही लूटने वाले हमारे पापाजी के लड़के , अर्थात हम और हमारे छोटे भ्राता श्री जगहंसाई का पात्र बन गए थे | अकेले जो थे बिजली का बिल जमा करने वाले, पूरे महल्ले में |

राजाराम का कहना था कि टोका डालना तो उनके बाएं हाथ का खेल है | भरी बरसात में नंगे पैर डाल दें | करंट का ट तो दूर की बात है , क भी नहीं लग सकता | पर ना कभी गुड्डू चाचा ने उन्हें छत पर जाने दिया ना कभी हमें उसे दिव्य क्षण के दर्शन हुए |

वर्मा जी के रिटायर होते ही जो लौंडा आया ड्यूटी पर, गुड्डू चाचा की पहले दिन ही उनसे अनबन हो गयी | उन दिनों अन्ना-हजारे का आन्दोलन ज़ोरों पर था | टीवी पर लाइव आ रहा था | पर “ससुरे नए लौंडे" ने गुड्डू चाचा के घर का टोका कनेक्शन काट दिया और तार अपने कब्ज़े में कर लिया | चाचा घर से बाहर आ गए | पहले लौंडे का “सिस्टर-मदर डे” मनाया | अब चाचा की गालियों पर बुढ़ापा साफ़ झलकने लगा था | निहायत ही प्रेडिक्टेबल और पुरानेपन की झुर्रियों से लैस | लड़का नया खून था,  नए जोश से भरा हुआ | चाचा की एक ना चली |तार कब्ज़े में करके चल दिया | चाचा ने चाची को आदेश दिया “आइति है अबहीं” | कहके चप्पल चढ़ाई और लड़के के पीछे पीछे चल दिए |

थोड़ी देर में चाचा हाथ में तार मय मुंह में पान भरे वापस आये | चेहरे पर विजयी मुस्कान थी |  घर के ठीक नीचे चौराहे पर शुकला हेड मास्टर और राजाराम खड़े थे | सबसे पहले चाचा ने नाली में लाल मसौदा इन और काला मसौदा आउट किया “पच्च" की आवाज़ के साथ | फिर हेड-मास्टर साहब से आसीस लिया और राजाराम को छेड़ते हुए बोले “टोका डलिहो राजाराम" | “डाल तो हम देबे करी, इमा कोई गणित थोड़े है"  राजाराम बोले | चाचा ने आँख से इशारा किया “भक्क"  और बोले “ससुरा लड़का तार लिहे चला गवा , हम कहेन काहे ५० रुपिया केर तार खरीदी , दुई की चाय पिलावा ससुरेक , ५ केर एक पान , १० धरेन वहिकी जेब मा | १७ रुपियम काम बनिगा” | हेड-मास्टर साहब ने कहा “अउर का गुड्डू, लच्छमी जी ऐसे थोड़े ना जुड़ती हैं “ |

चाचा फलांगते हुए छत पर पहुंचे और कनेक्शन जोड़ दिया | अंदर टीवी फुल वोल्यूम पर चिल्लाया : “अन्ना ने अनशन खतम करने से मना किया” |

नीली छतरी के उस पार बैठे दादाजी की भी आँखों में आंसू आ गए होंगे !!!!!
                                                                                                                                                 --देवांशु

हमार महल्ला !!!

सर्दियों की बारिश मोहल्ले के लफड़ेबाज लड़कों की तरह होती है, एकदम कटकटुआ | बात पिछली सर्दियों की है , मारे बारिश के पूरी सड़क चहले ( कीचड़ ) से भरी थी | घर की गली से निकलने के बाद मैन-सड़क पर आते ही एक साढ़े-तिराहा पड़ता है | साढ़े तिराहा इसलिए क्यूंकि तीन सड़कें और एक गलियां एक जगह पर मिल जाती हैं | फिर भी चौराहा बोल देते पर दरसल गली “मीटिंग-पॉइंट" से करीब साढ़े चार फुट हट के है , इसलिए साढ़े तिराहा | इन साढ़े चार फुट का भी अपना “भौकाल" है | कहते हैं इन साढ़े-चार फुट में जिसने अपना ठेला ( चाट, पकौड़ी, समोसे, टिक्की इत्यादि का ) लगाया वो जल्दी ही पक्की दुकान का मालिक बन गया | धकम-पेल मची रहती है ठेला लगाने की यहाँ पर |

खैर, मुद्दा ये नहीं है | साढ़े-तिराहे के दो कोने भगवान जी के मंदिरों से सुसज्जित हैं | एक तरफ भोले बाबा पीपल के पेड़ के नीचे बैठे हैं तो दूसरी तरफ, पूरी भगवान मंडली है :  राम जी, सीता जी , हनुमान जी , लक्ष्मण जी , दुर्गाजी, भोले बाबा आदि  | दूसरे वाले मंदिर को थोड़ा एक्सटेंशन देकर धर्मशाला का भी जुगाड़ कर लिया गया है |

लेकिन मुद्दा ये भी नहीं है | मुद्दा ये है कि मैं वहीं कोने पर आँख बंद किये भगवान जी के सामने खड़ा हूँ | तभी कानों में आवाज़ पड़ती है “अऊर चटपटे , का हाल” |

चटपटे
बंगाल में लोगों के दो नाम होते हैं , डाक नाम ( मतलब जो डाक यानी चिट्ठी-पत्री के लिए यूज होता है, दूसरा भालो नाम, जो भलाई में लिया जाता है ) | हमारे महल्ले में लोगो के तीन नाम होते हैं : एक घर का ( भालो), एक इस्कूल का ( डाक) और एक मोहल्ले का ( असली नाम) |

घर का नाम छोटे, इस्कूल का घनश्याम | ५ साल की उम्र से आजतक वही, हल्का गुलाबी कुरता, सफ़ेद पायजामा लगाये घनश्याम बाबू को सड़क पर ( वही साढ़े-तिराहे की तीसरी सड़क जो ढाल बनके नदी तक जाती है ) पानी के “बशाते"  की दुकान लगाते देखा है | कुबिरिया टेम ( शाम का समय ) तवा टनटनाते घनश्याम ठेला लगाकर खड़े हो जाते हैं | रेसेशन का असर उनके “बशातों" पर नहीं पड़ा है | ५ ही देते हैं , बस पहले १ रूपये के देते थे, अब १० रुपयों के देते हैं | पर असली मजा तो उनके आलूओं में हैं , तीखे-मसालेदार एकदम चटपटे | इसी से उनका मोहल्ले का नाम है “चटपटे"  |

तो ठीक उस समय जब हम आँखें बंद कर भगवान जी से गुफ्तगू कर रहे थे, तब घनश्याम अपने बगल में थैला खोंसे बाजार जा रहे थे | उन्होंने इतनी ज़हमत भी नहीं उठायी कि देखें किसने पूछा है बस बोल दिए “सब ठीक, तुम सुनाओ" | और बिना कुछ सुने आगे बढ़ लिए | हमने आँखें खोली और घूम के देखा तो एक जानी पहचानी सी सूरत सामने खड़ी थी |  वो हमें नहीं पहचान पाए, पर हम पहचान गए | पर इससे पहले की हम पूछे कुछ भी , आधे जागे और पूरी तरह सोये दुकानदार ( जिनकी दुकान का नाम है “चेतनदास जनरल स्टोर”)   ने उनसे पूछ लिया “केक्के, अबे हियाँ” |

केक्के
घर का नाम “मोनू” , इस्कूल का “कृष्णकांत" , महल्ले का “केक्के" | हमारे बचपन के परम-मित्र | जब हमने पढ़ना शुरू किया था तब वो “बड़े इस्कूल मा जात रहे” | बड़े इस्कूल मतलब कक्षा ५ के पार | पर दोस्त पक्के |

हमारे घर का आँगन इतना बड़ा था के उसमे दो डेढ़-डेढ़ फुटिए  ( हम और हमारे छोटे भ्राता श्री ) क्रिकेट खेल लें, वो भी दो स्टंप लगाकर | आँगन पुराने ज़माने का ज़बर बना हुआ | करीब बीस फुट लंबा | लम्बाई के एक छोर पर “रसोई" और दूसरे छोर पर “गुसलखना” | मैदान के दो एंड थे , “किचेन एंड" से बालिंग और “गुसलखाना एंड" से बैटिंग | शाट मारने के बाद रन बनाने में दो चार कदम तो चलने ही पड़ते | पर “केक्के" शाट भी पिच के बीच से मारते और खड़े खड़े दोनों तरफ की क्रीज़ पर बैट रख कर ७-८ रन हर बाल पर पेल देते |

केक्के का और हमारा साथ बारहवीं क्लास तक रहा जो हम दोनों ने साथ पास की | उसके बाद “वै अपनी दुकान पर बैठे लगे"|

केक्के साहब दूसरे मोहल्ले में शिफ्ट हो गए थे | पर कभी कभी आते रहते | उस दिन भी वो घूमते हुए वहाँ आ गए थे | दुकानदार को उन्होंने जवाब दिया “मजे में , तुम भौंको का हाल” | इससे पहले की उनकी बात आगे बढ़ती हम बोले “अरे मोनू” |अब मोनू पहिचान गए हमें “अरे भईया तुम, कब आये ??” | और हमारे बिना बुलाये हमारे घर चल दिए | रास्ते में बहुत सारी बातें पूछ डाली उन्होंने | कब-कहाँ-कैसे-क्यूँ आये से लेकर कब जाओगे तक, सारे सवाल | सड़क से घर जाने की जो गली है, वो भी उतरती है , वो “कुत्ता ढाल” है | वहाँ से उतर रहे थे तो हमारे बचपन के एक और दोस्त भिंटा गए “गुड्डू" |

गुड्डू
इस नाम के कैरेक्टर हर जगह पाए जाते हैं | हमारे महल्ले में दो थे | एक पटवा के तीसरे लरिका , नाम -शत्रोहन लाल पटवा ( इस्कूल) , गुड्डू ( घर ), टोका मास्टर (महल्ला) , उनकी कहानी फिर कभी | हमको और केक्के को मिलने वाले गुड्डू दूसरे वाले थे |

इस्कूल का नाम “अजीत" , घर का “गुड्डू" और महल्ले का “महरिन के गुड्डू” | गुड्डू बचपन में चित्रहार थे | वो अपने माता-पिता के साथ , हमारे घर के डायगोनोली  अपोजिट घर में एक कमरे के किराये के मकान में रहते | रात में हमारे घर के चबूतरे में सो जाते | सोने से पहले  वो  दिन भर के सुने हुए सारे गानों को रिपीट करते | “कल कालेज बंद हो जाएगा तुम अपने घर को जाओगे" से लेकर “नफरत की दुनिया को छोड़कर प्यार की दुनिया में" सारे गाने गा डालते | जब कोई निकलता बाहर कुत्तों को खाना डालने के लिए,  तो उन्हें हड़का भी दिया करता  “सोय जाओ गुड्डू, कल सुनाय लियो चित्रहार" | अक्सर ये काम हमारी माता-श्री करती थीं |

गुड्डू आजकल रिक्शा चलाते हैं | उन्होंने हमको और केक्के को आते देख लिया | रिक्शा रोक कर बतियाने लगे |  पता चला कि महल्ले की सबसे फेमस हंस्ती “राजाराम” आज कुछ सामान खरीद कर लाये हैं अपने बड़े लड़के की शादी के लिए |

राजाराम 
ये महल्ले के अपवाद हैं काहे की इनका एक ही नाम है “राजाराम" | हर उम्र का इंसान , जो बोल सकता है , इनको इसी नाम से बुलाता है | इसीलिए ये “लादालाम” से लेकर “ससुरा राजाराम" तक कहलाये जाते हैं | “दुई पैडल मारिके घोड़ा चलाने” से लेकर  अपने घर की गिरी दीवार जोड़ना हो , या महंगी से महंगी शर्ट सिलने से लेकर बारात का खाना बनाना हो, उनसे बेहतर कोई कर नहीं सकता | हाँ चटपटे के आलू से वो हार मानते हैं | उनके द्वारा किया गया हर काम गारंटी के साथ ४-५ दिन तक लोगो को हँसा हँसाकर , खून बढ़ाता रहता है |

तो गुड्डू अपने रिक्शा पर राजाराम के बड़े लड़के की शादी का सामान खरीदवाकर वापस जा रहे थे | केक्के बोले “हमहूँ चलित है” | और जाते जाते हमें आर्डर दे गए कि अंटी याने की हमारी माताश्री को नमस्ते कह दिया जाए उनकी तरफ से और वो फिर आयेंगे |
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हम उन सबसे बिदा लेकर घर पहुंचे तो नीचे से ही फोन कर दिए की दरवाज़ा खोल दो | करीब १५ साल पहले हम लोग फर्स्ट फ्लोर पर शिफ्ट हो गए थे | हम दरवाजे पर खड़े थे तभी पीछे रहने वाले मास्टर  साहब निकले और हमसे बोले “भईया सब लोग ऊपर रहत हैं , घंटी बजाय देओ |”

मास्टर साहब  कोई अजनबी ही समझे थे मुझे | तब पता चला मेरा महल्ला , मुझे भूल चुका है | १२ साल से ज्यादा का वक्त वहाँ से बाहर बीत चुका है, पहले पढ़ाई फिर नौकरी के चलते | कभी गए भी तो दो-तीन दिन के लिए | किसी से मिलने, बात करने का भी टाइम नहीं रहता |

खैर, जब हम ऊपर पहुंचे तो राजाराम के लड़के की शादी के किस्से चल रहे थे और हमेशा की तरह लोगो हँस-हँसके बुरा हाल था |

आगे फिर कभी !!!!

*****
P.S. :  आज सुबह ना जाने कहाँ से “लपूझन्ना" का लिंक मिल गया, पूरे दिन बस वहीं पर पड़े पढ़ते रहे | एक दिन में पहली बार कोई ब्लॉग पूरा चाट डाला | कतई कतल जगह है लपूझन्ना, मूड एकदम हरा हो गया  है | रात का खाना खाते-खाते पंकज बाबू से बतियाते हुए ऊपर दिए कैरेक्टर्स की याद आ गयी , तो सोचा हमारा महल्ला क्यूँ पीछे रह जाए | बस ये सब ठेल दिए | देखा जायेगा जो होगा अब | फिर मिलेंगे टाटा !!!
--देवांशु
(लपूझन्ना से पूरी तरह इंस्पायर्ड)
(कहीं-कहीं पर कुछ जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल किया है, अगर किसी को बुरा लग जाए तो माफी एडवांस में मांग लेते हैं पर मंशा किसी को बुरा लगाने की नहीं है )

बुधवार, 12 जून 2013

दास्तान-ए-इस्तीफ़ा


पिछले कुछ दिनों से मार्केट में “इस्तीफों" की बड़ी चर्चा है |

एक “सज्जन" थे, उनसे कहा गया की आपके राज-काज में बड़े लफड़े लोचे हुए हैं | तौलिया रख-रख के लोगों ने बड़े-बड़े काण्ड कर दिए, आप इस्तीफ़ा दो | वो नहीं माने | इस चक्कर में कई और लोगों ने इस्तीफ़ा दे डाला | फिर मीटिंग बुलाई गयी |  मीटिंग में वो टाइम पर पहुंचे, और टाइमिंग की महिमा देखो, सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी |
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इस बीच एक दूसरे सज्जन इस्तीफ़ा दे बैठे | उनसे सबने कहा की वापस लो भाई ये इस्तीफ़ा, ऐसे नहीं चलेगा  | कई दिनों तक नहीं माने,  बाद में मान गए | बाद में पता चला की पिछले ८ सालों में उन्होंने ये इस्तीफे वाला काण्ड ३ बार किया है |

हमारे प्रधानमंत्री जबसे प्रधानमंत्री बने हैं तबसे इतने “गेट" निकले ( जैसे “कोलगेट" ) की लोगों ने उनसे भी हर दूसरे महीने इस्तीफ़ा मांगना जारी रखा है | हालत तो ये है की अगर उनके अपने घर की बत्ती भी चली जाए तो उन्हें डर लगने लगता है की कहीं उन्ही से इस्तीफ़ा ना मांग लिया जाए |

पर इनलोगों को आइडिया नहीं है की बेचारे “इस्तीफों" की क्या हालत होती होगी ? हम बताते हैं | इस्तीफों में भी जान होती है, हमारी तरफ सोचते-समझते-जानते-बूझते हैं | उनमे फीलिंग्स होती हैं | पर जनता का क्या है , वो समझ नहीं पाती |

इस्तीफों का जनम ज्यादातर ऑफर लेटर्स से होता है | आमतौर पर जब तक कोई दूसरा ऑफर ना हो, लोग इस्तीफ़ा नहीं देते |  कभी कभी इस्तीफ़ा देते ही नए ऑफर मिल जाते हैं | पर लोग ऑफर को एक्सेप्ट कर लेते हैं , इस्तीफों को भूल जाते हैं |इस्तीफे कई तरह के होते हैं :

आम इस्तीफे :
इस्तीफों की जनसँख्या में सबसे बड़ी संख्या उन इस्तीफों की है जो आम होते हैं और अक्सर चुपचाप दे दिए और स्वीकार किये जाते हैं | इनके लिए कोई हो हल्ला नहीं होता | ये आम लोगों की होते हैं | चुपचाप लिखे जाते हैं और चुपचाप दे दिए जाते हैं | इतिहास में इनका कोई नाम नहीं होता |

भावखाऊ इस्तीफे :
दूसरे टाइप के इस्तीफे थोड़े भावखाऊ होते हैं | इस तरह के इस्तीफे इसलिए लिखे जाते हैं की ये खुद के एक्सेप्ट होने से पहले भाव खाएं | आई-टी इंडस्ट्री में ऐसे भावखाऊ इस्तीफों की भरमार है | इधर इस टाइप का इस्तीफ़ा दिया गया, उधर बता दिया जाता है की कब ये एक्सेप्ट हो जायेगा, इस बीच में जितना भाव खाना है खा लो |  ऐसे इस्तीफे कभी कभी लालची भी होते हैं | कुछ ठीक ठाक सा दिखा झट वापस हो गए | पर वापस होने का प्रतिशत कम रहता है |

ढुलमुल इस्तीफे :
इस तरह के इस्तीफों का उपयोग पिछले दिनों एक पितामह ने किया है | इसमें होता क्या है की इस्तीफ़ा लिखे जाने से पहले जानता है की उसे वापस लिया ही लिया जाना है | इनका उपयोग ज्यादातर लोगो की भद्द पिटाने के लिए, उन्हें औकात पर लाने के लिए किया जाता है | हल्ला इनपर खूब मचता है | मीडिया के लिए तो दुधारू गाय होते हैं ये इस्तीफे |

ढीठ इस्तीफे :
तीसरे टाइप के इस्तीफे होते हैं ढीठ इस्तीफे, इनको पता होता है की इनको वापस लेने के लिए बहुत प्रेशर डाला जायेगा | पर ये गदहे की चमड़ी के बने होते हैं , टस से मस नहीं होते | इतिहास गवाह रहा है इस तरह के इस्तीफों ने कई राजा-महाराजा तक के लोगों को नेस्तनाबूत कर दिया है | इसको देने वाला भी कोई बहुत कड़े दिल का होता है | इतिहास इन्हें कई पीढ़ियों तक याद रखता है |

लाचार इस्तीफे :
मुझे सबसे ज्यादा दया इस टाइप के इस्तीफों पर आती है | ये कभी दिए जाने वाले के द्वारा नहीं लिखे जाते | जिसको इन्हें देना होता है उसके अलावा हर कोई इन्हें लिए घूमता है | हर दूसरा आदमी इस तरह के इस्तीफों की मांग करता है, पर जिसे देना होता है वो चुप्पी मार के बैठा रहता है | हमारे प्रधानमंत्री से मांगे जाने वाले इस्तीफे इसी श्रेणी में आते हैं |

मुंह पे दे मारू इस्तीफे :
मेरे हिसाब से इन इस्तीफों के लिए कोई “इस्तीफाधिकार आयोग” बनना चाहिए | इस टाइप के इस्तीफे “ओन द स्पॉट” लिखकर सामने वाले के मुंह पर दे मारे जाते हैं | सामने वाले से पूछा भी नहीं जाता की एक्सेप्ट करोगे या नहीं |  बस दे मारा जाता है | इन इस्तीफों को भी काफी चोट लगती होगी, इसलिए इनके अधिकारों की बातें जनता के सामने आनी चाहिए |

इन सब बातों को यहाँ लिखने के दो मकसद हैं : एक तो इस्तीफों के बारे में जनता की जागरूकता बढ़ाना और दूसरा आपका खून पीना | पहले की सफलता तो वक़्त बताएगा पर दूसरे की सफलता की पूरी गारंटी है |  इसमें एक्सपर्ट हैं हम |

खैर!!! अभी चलते हैं |  फिर मिलेंगे तब तक आप एंटरटेनमेंट नेटवर्क, जिन्हें “न्यूज़ चैनल" कहा जाता है चलती फिरती भाषा में, उनपर इस्तीफ़ा कांडों के मजे लीजिये |

टाटा !!!
--देवांशु
#बहुत दिन हुए बकवास किये हुए
(फोटो गूगल के साभार चुराया)

रविवार, 2 जून 2013

हैरी पॉटर की दुनिया !!!

पिछले कई महीनो से हैरी पॉटर के सारे उपन्यास और फिल्मे निपटाने में लगे हुए थे | कल फाइनली सब निपटा डाले | सही बताऊँ तो मज़ा आ गया | ऐसा लगता है कि किसी एक दुनिया के बारे में जानता ही नहीं था | बचपन में जादूगरों की कहानियां बहुत सुनी हैं |  अच्छी भी लगती थीं | हैरी पॉटर भी उसी तरह की एक कहानी है | बस इसकी रेंज बड़ी है , बहुत सारे कैरेक्टर्स हैं जो इसको बहुत इंटरेस्टिंग बना देते हैं |

कहानी :
कहानी का मुख्य नायक, हैरी पॉटर है | पर ये कह पाना मुश्किल है की वो नायक किस उम्र में बना | उसके माता-पिता जादूगर हैं | जब हैरी छोटा ही था तब उसके माता पिता को एक बुरा जादूगर, वोल्डेमोर्ट, मार देता है | जब वो हैरी को मारने की कोशिश करता है तो उसमें सफल नहीं होता, और अपना अस्तित्व ही खो देता है और जंगल में जाकर छुप जाता है |

और फिर एक स्कूल है जादूगरी का, होग्वार्ड्स | वहाँ के  हेड हैं , प्रोफ़ेसर एल्बस डम्बलडोर | डम्बलडोर दुनिया के सबसे बड़े जादूगर हैं और वोल्डेमोर्ट केवल उन्ही से डरता है | जब वोल्डेमोर्ट हैरी के माता-पिता को मार देता है तब  डम्बलडोर अपने साथियों की मदद से हैरी को उसकी मौसी के पास छोड़ आते हैं |

जब हैरी ११ साल का होता है, तब वो होग्वार्ड्स में दाखिल होता है | और यहाँ से शुरू होता है हैरी पॉटर का सफर | पूरे सात साल की कहानी , सात उपन्यासों में लिखी गयी है | हर साल हैरी को नए चैलेंजेस मिलते हैं | अपने दो दोस्तों रॅान और हरमोयनी के साथ मिलकर वो इनसे एक-एक करके निपटता है | और आखिर में जीत सच्चाई , दोस्ती और प्यार की होती है |


उपन्यास  :
उपन्यास फिक्शन और सस्पेंस की मिली जुली श्रेणी में आता है | इसके ७ भाग हैं:
१. हैरी पॉटर एंड फिलोसोफर्स स्टोन
२. हैरी पॉटर एंड चैम्बर ऑफ सीक्रेट्स
३. हैरी पॉटर एंड प्रिजनर ऑफ अज़क्बान
४. हैरी पॉटर एंड गोब्लेट ऑफ फायर
५. हैरी पॉटर एंड आर्डर ऑफ फीनिक्स
६. हैरी पॉटर एंड हाफ ब्लड प्रिंस
७. हैरी पॉटर एंड द डेथली हैलोस 

जे.के. रालिंग, जो इसकी लेखिका हैं, ने पूरी एक दुनिया गढ़ दी है | एक स्कूल, वहाँ की किताबें, पढ़ाए जाने वाले विषय , विषयों के कंटेंट, जादू की दुनिया, वहाँ के लोग,  लोगों के तौर तरीके,  उनकी सोसाइटी, उनकी सोच, ऊंचे जादूगर, नीचे जादूगर, वहाँ की मिनिस्ट्री, मंत्री  :  हर चीज़ का विस्तृत वर्णन है | पर कहीं पर भी बोरिंग नहीं | सबसे  महान इंसान भी कैसे गलती कर सकता है , गद्दी का लालच कैसे  हर इंसान की जान को दांव पर लगा देता है , मीडिया के भी सारे पहलू, सब कुछ मिलता है  |  एक फ्लो में बहता चला जाता है सब कुछ |  कहानी में जो कुछ भी घटता है उसका कोई न कोई कारण होता है और वो कारण वक्त आने पर पाठक के सामने खुलता जाता है | और शायद यही कारण है कि जैसे जैसे आप उपन्यास के अंदर जाते हो, आप खुद को इसके अंदर पाते हो | 

और हर उपन्यास के अंत में प्रो. डम्बलडोर हैरी को कुछ बातें बताते हैं , वैसे तो काफी फिलोसोफिकल होती हैं पर पढ़ने वाला कोई कम उम्र का है तो शायद बहुत ज़रूरी होती हैं उसके लिए | पर ऐसा नहीं है कि बड़ों के लिए उसमे कुछ नहीं | कभी कभी ज़िंदगी को समझने के लिए बच्चा बनना पड़ता है | बस यहीं पर हैरी पॉटर के सारे उपन्यास बड़ों के लिए भी पढ़ने वाले हो जाते हैं |

एक खासियत और है, सारे उपन्यासों की इस श्रंखला के :  सारे उपन्यासों की पूरी कहानी वोल्डेमोर्ट के द्वारा हैरी के माता-पिता की हत्या के इर्द-गिर्द है और हर उपन्यास उस घटना के बारे में कुछ नयी बातें उजागर करता है | और सबसे आखिरी हिस्से में आकर पूरी बात से पर्दा उठता है |

फिल्म :
७ उपन्यासों की कहानी को ८ फिल्मों में दिखाया गया है :

१. हैरी पॉटर एंड फिलोसोफर्स स्टोन ( अमेरिका और भारतीय उपमहाद्वीप में सोर्सर्स स्टोन के नाम से )
२. हैरी पॉटर एंड चैम्बर ऑफ सीक्रेट्स
३. हैरी पॉटर एंड प्रिजनर ऑफ अज़क्बान
४. हैरी पॉटर एंड गोब्लेट ऑफ फायर
५. हैरी पॉटर एंड आर्डर ऑफ फीनिक्स
६. हैरी पॉटर एंड हाफ ब्लड प्रिंस
७. हैरी पॉटर एंड द डेथली हैलोस पार्ट –१
८. हैरी पॉटर एंड द डेथली हैलोस पार्ट –२

पहली ६ फ़िल्में , ६ उपन्यासों पर हैं जबकी आखिरी उपन्यास को दो फिल्मों में तब्दील किया गया है  | हालांकि फ़िल्में उस डिटेल में नहीं जा पाती जिस डिटेल में उपन्यास है | बहुत से किरदार कम हो गए हैं फिल्म में | कुछ किरदारों को बहुत कम समय मिला है | इसलिए मुझे फ़िल्में देखने में ज्यादा मजा नहीं आया | हालांकि आप अगर सिर्फ फ़िल्में देखो तो भी कहानी का पूरा पता लग जायेगा | मुझे फिल्मों की तीसरी कड़ी, “प्रिजनर  ऑफ अज़क्बान ” अपने मूल उपन्यास के बहुत करीब लगी जबकी पांचवी कड़ी “आर्डर ऑफ फीनिक्स" सबसे दूर | बाकी सारी लगभग एक जैसी ही हैं |

सारे उपन्यास और फ़िल्में फ्लिप्कार्ट पर उपलब्ध हैं |
--देवांशु

गुरुवार, 23 मई 2013

बॉम्बे टाकीज़….

अनुराग कश्यप :

लगता है जैसे भदेस का चित्रण करना उनकी फितरत बन गयी है या उसे वो अपनी यू एस पी की तरह सेट कर देना चाहते हैं ( या कर भी चुके हैं ) | अगर नाम ना बताया जाता तो ये शक हो सकता था कि शायद विशाल भारद्वाज ने इसे डायरेक्ट किया हो| संगीत का जितना स्कोप बन सकता था, उससे भी बेहतर है : “बच्चन-बच्चन" और “मुरब्बा" दोनों इम्प्रेसिव | पर कथानक कहीं कहीं खींचा जाता दिखा | शायद छोटा हो सकता था | एक बार देखा भी जा सकता है, एन्जॉय भी किया जा सकता है | दुबारा देखूँगा तो सिर्फ और सिर्फ संवादों के लिए |

 

जोया अख्तर :

सब्जेक्ट क्या था ? एक लड़का जिसको डांस सीखना है और उसको लड़कियों के कपड़े पहनना अच्छा लगता है | दोनों में से बुरा क्या है ? डांस सीखने की ललक या लड़का होते हुए लड़कियों के कपड़े पहनना | समझ नहीं आया मुझे | हाँ, बस “शीला की जवानी" गाना हाल में देख लिया ( तीस मार खां देखने की हिम्मत तो टीवी पर भी नहीं है) | रणवीर शौरी वेस्ट किये गए, कुछ बेहतर कर सकते थे | बच्चे ने कुछ अच्छे सीन दिए | पर फिल्म डब्बा गोल टाइप ही लगी |

 

दिबाकर बनर्जी :

चारों में बेहतरीन , और शायद सैकड़ों-हजारों  फिल्मे जो पिछले १०० सालों में बनी हैं उनमे से ज्यादातर पर भारी | कुल मिलकर ८-१० फ्रेम में कथानक खत्म | जित्ता ज़रूरी उतना संगीत | और कहानी का सबसे अहम हिस्सा बिना किसी डायलोग के सिर्फ नवाज़ुद्दीन की एक्टिंग और बैकग्राउंड में बजती बांसुरी के साथ | पहला और आख़िरी फ्रेम भी लगभग एक सा, बस जो अंतर वही कहानी  | १०० सालों का सबसे बड़ा अचीवमेंट : नवाज़ुद्दीन जैसे एक्टर और उनके लिए दिबाकर जैसे डायरेक्टर |

 

करन जोहर :

मेलोड्रामा बनाने के बादशाह जो फ़िल्में लाल-पीले रंग , ग्लिसरीन के आंसूं और बैक-ग्राउंड में आलाप के साथ बनाते आये हैं, पहली बार ऐसी कहानी लाये जो उनके ज्यादातर फैन खुद ही रिजेक्ट कर दें और उन्हें पता नहीं क्या क्या कह के गाली दें | पर ये कहानी चारों में से सबसे बोल्ड है अपने सब्जेक्ट के लिए | सबने अपने हिसाब से रोल बढ़िया किया है | मदन मोहन जी के संगीत का बहुत बढ़िया प्रयोग | पर जिस समाज में एक लड़के और एक लड़की की शादी के बहुत कम ही कॉम्बिनेशन को मंजूरी मिली हो,  उसके लिए फिल्म में थूंकने के लिए काफी कुछ है | और अगर आप इस समाज से बगावत का तेवर रखते हैं तो ये आपको अच्छी लगेगी  ( और उसके लिए ज़रूरी नहीं आप वैसे हो, जैसे इसके किरदार दिखते  हैं)|

 

बॉम्बे टाकीज़….

मैं फिल्म को याद रखने या १०० साल के सोवेनियर की तरह सहेजने के कारण ढूँढने की कोशिश कर रहा हूँ | दिबाकर, नवाज़ुद्दीन , करन जोहर , अमित त्रिवेदी (फिल्म के संगीतकार) कुछ उम्मीद देते हैं, पर अंत में दिखाया गया गाना दिल तोड़ देता है | ये विडम्बना से बढ़कर कुछ नहीं कि फिल्म को चलाने के लिए ये गाना घुसेड़ा गया और वो  अपने पहले हाफ की एडिटिंग को छोड़कर कोई छाप नहीं छोड़ पाया | और यही भारतीय सिनेमा के १०० साल की सबसे बड़ी दुर्गति है |

 

५ में से (चारों के लिए अलग-अलग), अनुराग और जोया के खाते से २-२ और करन जोहर के खाते से १ अंक लेकर दिबाकर को १० |

--देवांशु

शनिवार, 4 मई 2013

नंदी हिल्स पर फ़तेह !!!

पहले २४ घंटे तो बढ़िया बीते बेंगलुरू में | शनिवार का दिन था | सुशांत और उनके रूम-मेट्स आज ऑफिस से जल्दी घर आ गए | प्लान था कि अगले दिन सुबह सुबह नंदी हिल्स चला जायेगा | खाना बनाए DSC01042जाने में जो एफर्ट लगता उसे बचाने के लिए पिज्जा आर्डर कर दिया गया | मौका देखकर टीटी के भी दो गेम खेल लिए गए | इस बीच आई-पी-एल के मैच में चेन्नई ने बेंगलुरू को धो दिया | हुड़दंग मची | और फिर माहौल शांत होने लगा | प्लान हुआ कि सुबह २ बजे नंदी हिल्स निकल लिया जायेगा | बाकी सब सोने चले गए | हमें फिर रोज़ की तरह नींद नहीं आ रही थी | सुशांत बाबू भी लैपटॉप पर खिट-पिट करते रहे | ये हुआ कि बाकी लोग सो लेते हैं, हम दोनों जागेंगे |२ बजे एक-एक कर सब जाग गए | रिक्वायरमेंट के हिसाब से किसी ने हाथ मुंह धोया, किसी ने मंजन भी कर डाला | हमने शेव कर डाली | सब लोग तैयार होकर करीब तीन बजे निकल लिए | कुल ५ लोग और ३ बाइक्स |
बेंगलुरू से काफी लोग नंदी हिल्स पर सूर्योदय देखने जाते हैं | ये शहर से लगभग ५० किमी दूर, बेंगलुरू-हैदराबाद नेशनल हाई वे ( NH – 7 ) पर है | इसी रस्ते पर बेंगलुरू इंटरनेशनल एअरपोर्ट भी है | हाई-वे से करीब १५ किमी अंदर जाना होता है | NH-7 पर तो दोनों ओर पहाड़ियां दिखती ही हैं | अंदर के १५ किमी में से ५ किमी का रास्ता पहाड़ी है | शार्प-बेंड और यू-टर्न से भरा हुआ |
DSC01078हमने अपने मोबाइल में पहली बार जी-पी-एस ऑन कर लिया |  घर से निकले तो सबसे पहले पेट्रोल पम्प पर जाकर टंकियां फुल की गयी | ये भी एक टास्क सा हो गया था क्यूंकि ज्यादातर पेट्रोल पम्प बंद थे | मैं और सुशांत एक बाइक पर थे | बाकी दोनों बाइक्स के सवारों ने एअरपोर्ट वाला कट ले लिया जो कि गलत था | हम दोनों ने कट पर ही वेट किया और उन लोगो को फोन करके वापस बुला लिया | कुछ आधे घंटे लग गए | अगला स्टॉप था चाय की दुकान | यहाँ तक बाइक चलाने का काम सुशांत बाबू कर रहे थे | इसके बाद से मोर्चा हमने संभाला | हेड-फोन पर रूट की जानकारी जी-पी-एस से मिलती रही | ८० किमी प्रति घंटे की स्पीड को भी टच किया | NH-7 से करीब चार किमी अंदर पर पहली पुलिस चेक-पोस्ट पड़ी | बहुत भीड़ थी | मसला ये था कि आगे जाना सुबह ६ बजे तक अलाउड नहीं था | पर तब तक सूरज चाचू जाग जाते | दरसल ये टाइम गर्मियों और सर्दियों दोनों में नहीं बदलता | पर गर्मियों में सूर्योदय जल्दी हो जाता है तो लोग जाने के लिए उतावले होते हैं | यहाँ पर “महात्मा गांधी" का रोल आता है | ५० रुपये प्रति बाइक देकर हम आगे बढ़े |
IMG_20130413_064553नंदी हिल्स से ५ किमी पहले एक और चेक-पोस्ट थी | वहाँ पर तो सुविधा-शुल्क भी काम नहीं आया | ६ बजे तक इन्तज़ार करना ही पड़ा | ६ बजने से कुछ पहले पोस्ट खोल दी गयी और सब लोग बहुत तेज़ी से भागे | यहाँ से रास्ता पूरी तरह से पहाड़ी हो गया था | अभी बाइक चलाने कि जिम्मेदारी सुशांत ने एक बार फिर संभाल ली थी | धीरे-धीरे उजाला हो रहा था | ठीक टाइम पर हम लोग गंतव्य तक पहुँच गए | सूर्योदय ठीक से नहीं देख पाए क्यूंकि कोहरा था | पर जब बीच बीच में सूरज निकलता तो दृश्य मनोरम हो जाता | खूब फोटो खिचवाये | हंसी-मजाक भी जम के हुआ |मौसम बहुत बढ़िया था | थोड़ी ठण्ड भी थी | जैकेट रख ले गए थे तो ज्यादा महसूस नहीं हुई |
DSC01030लौटते में हम फिर बाइक में पीछे थे | नींद के झोंके आने लगे जो सेफ बात नहीं थी | रस्ते में एक जगह पर मुंह धोने और चाय पीने के लिये रुके | वहाँ पर बोर्ड लगा था “देवनहल्ली का किला और टीपू सुल्तान का जन्म स्थान” | हमने बाइक उस तरह घुमा ली सोचा कि किला देखते हैं | किले का दरवाज़ा शानदार था | पर अंदर किले जैसा कुछ नहीं | थोड़ी दूर अंदर गए और जब कुछ ना मिला तो वापस आ गए | जन्म स्थान भी नहीं देख पाए | इसके बाद से बेंगलुरू शहर तक एक बार फिर बाइक हमने दौड़ाई | शहर में फिर से सुशांत बाबू ने कमान संभाली क्यूंकि रस्ते उन्हें ज्यादा बढ़िया तरीके से पता हैं |
IMG_20130413_064616 
घर पहुंचते ही सोने का प्रोग्राम चालू हो गया | ३-४ घंटे की पहली नींद के बाद उठकर मैगी खाई और फिर सोने चले गए | शाम को उठे | दाल-चावल खा कर फिर से सोने की तैयारी हो गयी |
अगले दिन मेरा भी ऑफिस था | जल्दी उठना था |
P.S. :  नंदी हिल्स जाने का प्रोग्राम मिस्टर प्रशांत प्रियदर्शी यानी कि पीडी बाबू का भी था | पर उनको थ्रोट इन्फेक्शन के साथ-साथ फीवर  भी आ गया तो वो नहीं जा पाए | उनसे मिलने का भी प्रोग्राम था नेक्स्ट डे !!!!
-- देवांशु

शुक्रवार, 3 मई 2013

…वापस बेंगलुरू की ओर…

बेंगलुरू (बंगलोर) जाने का प्रोग्राम तो पिछले साल करीब नवम्बर से बन रहा था, जब हमारे एक फ्रेंड ने चैलेंजिया दिया था “वहाँ जाकर दिखाओ, तो जाने” | पर फिर दिल्ली का मौसम सुहाना हो गया | बोले तो प्लीजेंट | तो कभी जाने का ना तो मन किया ना, ज़रूरत हुई |अब पिछले दिनों मौसम गर्म हो गया दिल्ली का | तो लगा कि चलते ही हैं बेंगलुरू | मौसम भी ठंडा होगा वहाँ | और शायद हमारे ज़हर-कहर से दिल्ली भी बच जाए Smile Smile |

 

पुणे ऑफिस के एक सीनियर को भी बोला कि आप भी आ जाओ | वो भी रेडी हो गए | अपने खर्चे पर ही सही एक ऑफिसियल ट्रिप की तैयारी हो गयी | इस बीच आइडिया ये भी आया दिमाग में कि जिन कामों के लिए गुड़गांव या दिल्ली आये थे , उसमे से ज्यादातर या तो निपट गए या फिर आगे कुछ करने/होने का स्कोपिच नहीं रहा , तो क्यूँ ना वापस अपनी बेस-लोकेशन बेंगलुरू ही निकल लिया जाए | मेरे मैनेजर भी कई बार बोल चुके हैं कि आ जाओ यहाँ | तो परमानेंट ट्रांसफर का भी सोचने लगे | फिर ये हुआ कि यहाँ आओ तब डिसाइड करेंगे |

 

इतने सारे कन्फ्यूजन के बीच, टिकट हम बुक करा लिए | पर पुणे वाले सीनियर का प्रोग्राम कैंसल हो गया | उनकी बेटी की तबियत खराब हो गयी | और ट्रिप में जितना कुछ ऑफिसियल था वो कट्टम-कट हो गया | फिर भी फिसल गए तो हर गंगा करते हुए चल ही दिए एक शुक्रवार, बेंगलुरू के लिए |

 

दिल्ली एअरपोर्ट पर सिक्यूरिटी चेक-इन पर ऑफिसर ने बोला कि आपके बैग में कैंची है ( जैसे आपके टूथपेस्ट में नमक है ) | हमने पूरा बैग छान मारा कहीं कैंची नहीं | शेविंग-किट में एक कैंची होती थी , उसे घर पर निकाल दिए थे | ऑफिसर ने हमारे बैग के स्कैन का फोटू फिर देखा और बोला शेविंग किट में ही है | किट-बैग की बाहर की पॉकेट में एक कैंची थी , जो बैग के साथ फ्री मिली थी शायद, मिलते ही बिछड़ गयी | ( किट-बैग हमने पिछले साल जून में खरीदा था)

 

आगे बिना किसी लफड़े लोचे के बेंगलुरू में लैंड कर गए | अपने पुराने सखा सुशांत को पहले ही फोन कर दिए थे कि आ रहे हैं | वो उस दिन जल्दी घर आ गए थे | उन्होंने बस की डिटेल बताई | हम चल दिए बस स्टैंड की ओर | हमारे आगे CISF के दो जवान दम्बूक लिए जा रहे थे | हमने एक को क्रोस किया, जल्दी में | दूसरे को क्रोस करने लगे तो पहले ने पीछे खींच लिया | तब ध्यान में आया कि हमने तो ध्यान ही नहीं दिया | हम अपन में इतना खोये हुए थे कि किसी नेता जी की सिक्यूरिटी में घुस गए थे | वो तो कहो धुने और सूते नहीं गए | बच गए |

 

बस से चल दिए मैजेस्टिक बस स्टैंड की ओर | बेंगलुरू का नया एअरपोर्ट शहर से बहुत दूर है | रस्ते में दोनों ओर पहाड़ी दिखाई देती हैं | पिछले कई सालों से अक्सर इस रस्ते से आना जाना हुआ है पर हर बार ये कुछ बदला सा लगता है | इतना बदलाव आता रहता है कि कोई भी जगह अगली बार पहचान ही नहीं मिलती | सुशांत ने बोला था जब मेकरी सर्कल पहुँच जाओ तब फोन कर देना | ना हम जान पाए कब वो आया , ना ही कंडक्टर ने बताया | सीधे मैजेस्टिक पहुँच के सुशांत को फोन किया | थोड़ी देर वेट करना पड़ा | फिर वो हमें बाइक से लेने आ गए और हम उनके घर पहुँच गए | उनके रूम-मेट्स से मुलाकात हुई और खाने में बैगन का भर्ता बनाया गया |

 

सुशांत से दोस्ती तब से है, जब मैं २००७ में कोलकाता से ट्रान्सफर होकर बंगलोर ( तब नाम बंगलोर ही था ) आया था | हम दोनों का एक कॉमन फ्रेंड था, वो सुशांत की कंपनी में था और मेरा कॉलेज फ्रेंड था | हम लोगो ने साथ ही घर लिया था | शुरुआत के दिन थे नौकरी के | साथ में खूब घूमे टहले | फिर एक-एक करके बाकी रूम मेट चले गए | बचे हम दोनो | बंगलोर में घर लेने के लिए १० महीने की सिक्यूरिटी , १ महीने का एडवांस और १ महीने का किराया ब्रोकर को देना होता था | उतने पैसे कुल मिला के दोनों के पास नहीं थे | जॉब करते अभी ६ महीने भी नहीं हुए थे | घर से पैसे मांगने का मन दोनों का नहीं था | फिर किसी तरह एक घर का जुगाड़ हुआ | १ साल उस छोटे से घर में गुजारने के बाद , एक बड़ा घर किराए पर लिया गया | कुछ दिनों बाद मैं अमरीका चला गया | वापस आकर जॉब स्विच करके गुड़गांव आ गया | सुशांत ने भी आई टी की नौकरी छोड़ दी | स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ज्वाइन की | उन्ही के फ्लैट में अड्डा जमाया गया है कुछ दिनों के लिए |

 

कुछ ३ साल रूम-मेट रहे हम दोनों | उसके बाद फोन पर भी अक्सर बात होती रहती थी | बीच-बीच में वो कभी घर जाने के लिए दिल्ली आया तो मुलाक़ात भी हुई | पर इस बार बड़े दिनों बाद फुरसत से बैठे | खाना खाने के बाद हम दोनों का फेवरेट था लंबी वाक पर जाना | रात २ बजे तक बाहर घूमते रहे | पिछले २-३ साल की बातें दोनों ने डिस्कस कीं | उसका नेक्स्ट डे ऑफिस था | वो सोने निकल लिए | मेरी इतनी जल्दी सोने की आदत रही नहीं है तो काफी देर तक किताब पढ़ता रहा | फिर लैपटॉप पर खटर-पटर की |

 

जब नींद खुली तो सुशांत और उसके रूम-मेट ऑफिस जा चुके थे | रेडी होकर हम भी बाहर घूमने निकले | सबसे पहले कॉफी पी गयी और मसाला बन खाया | ये फेवरेट नाश्ता रहा है हमेशा बंगलोर में | वापस आये तो फिर किताब में घुस गए | थोड़ी देर और सोया गया | अगले दिन सुबह जल्दी ही नंदी हिल्स के लिए निकलना था |

 

बस ऐसे ही गुज़ार दिए यहाँ पर पहले २४ घंटे | बाकी फिर कभी ,  तब तक हँसते रहिये - मुस्कियाते रहिये !!!!!

 

नमस्ते !!!

 

-- देवांशु

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

मुझे आपकी फिर से ज़रूरत है पापा !!!

आपको गए हुए कुछ एक साल गुजर गया है पापा | सही बताऊँ तो एक एक दिन बड़ी मुश्किल से बीता है | कभी कभी लगा कि काश वक्त  के पर होते  क्यूंकि काफी सारे लम्हे बहुत परेशान करके गुजर रहे थे | पिछले एक साल में इतना कुछ बदल गया | ना जाने कहाँ से कहाँ आ गए हम सब | कई ऐसे लम्हे आये जब हम सबने आपको बहुत मिस किया | बहुत ज्यादा |

दर-असल ज़िंदगी किसी की भी हो, पूरी तरह से उसकी अपनी नहीं होती | जिंदगी के कई हिस्से होते हैं और वो अलग-अलग लोगो के होते हैं | आप हम सभी कि ज़िंदगी का अहम हिस्सा हमेशा रहोगे जैसे हम आपकी ज़िंदगी के हिस्से थे | आपको खोने के साथ खोने का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जो ना जाने कहाँ जाकर रुके , पापा |

कभी-कभी सोचता हूँ कि शायद मैं दुनिया के कुछ ऐसे लड़कों में होऊंगा जो अपने पापा जैसा नहीं बनना चाहते | आप मेरे आइडियल भी नहीं थे | और इसका एक ये भी कारण है कि आपने कभी ऐसा नहीं चाहा | आप हमेशा हमें किसी और की तरह बनाने की कोशिश करते रहे | और हम किसी और में अपने आइडियल ढूंढते रहे |  पर ज़िंदगी में जब भी सबसे ज्यादा उदास हुआ , मैंने हमेशा आपको अपने पास पाया था | प्री-फ़ाइनल इयर में जब मेरी बैक आयी थी तो कॉलेज की हट पर फूट-फूट के रो रहा था | सबसे बात की पर रोना थमा तो आप से बातकर के | जब आपने कहा था “अबे फर्स्ट डिविज़न तो आ ही जाओगे, हम तो सेकंड के ऊपर कभी ना बढ़े” | अक्सर ये भी सोचता हूँ कि मुश्किल से मुश्किल बातों को हल्के से लेने की हिम्मत भी मुझे आप ही से आयी है |

पापा, आप कोई अन्ना हजारे नहीं थे | पर करप्शन को हैंडल करने का आपका अंदाज़ मुझे हमेशा इम्प्रेस करेगा | अपनी नौकरी के पहले ही दिन एक आदमी ने आपको २ रूपये रिश्वत देने की कोशिश की थी | आपने लेने से माना कर दिया | उस आदमी का काम नहीं हुआ | उसने कंप्लेंट कर दी कि कम रुपये दे रहे थे तो मेरा काम नहीं किया | उस दिन आपके साहब ने आपको समझाया था कि काम भले ही किसी का हो रुपये जो दे लेते चलो वरना, ऐसे ही कम्प्लेंट खाओगे | ये वो सरकारी दफ्तर है जहाँ पेशकार तक फाइल बढ़ाने के लिए उसपर “महात्मा गांधी" को रखना पड़ता है | और उसका हिस्सा ऊपर तक जाता है | आपने एक नयी स्टाइल निकाल दी | “जितनी रिश्वत लूँगा सारी मैं रखूंगा , किसी और को एक पैसा नहीं दूंगा| जब गाली मेरी तो पैसा भी मेरा |” शायद ही कोई ऑफिसर रहा होगा जो आपसे खुश होगा | अपने पूरे करियर का एक बड़ा हिस्सा आपने पूछ-ताछ कार्यालय में इसीलिए बिता दिया क्यूंकि वहाँ कोई स्कोप नहीं दिखता था किसी को  |  आप की अहमियत क्या थी ये आपके जाने के बाद आपके ऑफिस वालों को पता चल रही है | कितनो के एरियर्स अभी भी लटके हुए हैं | अक्सर जाता हूँ आपके ऑफिस , वहीं पर लोग बताते हैं | आप जिस सीट पर थे वहाँ पर बैठकर कितनो की पेंशन बंधने में आपने मदद की | उसी सीट पर विराजमान महाशय को मैं हजारों रूपए की “रिश्वत" दे चुका हूँ जिससे मम्मी की पेंशन चाहे कुछ टाइम बाद बंधे पर उन्हें दौड़ना ना पड़े | पर ऐसा पूरी तरह से हो भी नहीं रहा | हम सबकी पढ़ाई के लिए आपने जो मेहनत की वो हम सबसे छुपी नहीं है | रात-रात भर आप काम करते थे | कितने ही लोग अपने “नक़्शे" आप से बनवा के ले जाते थे | कईयों ने कहा है कि ना जाने कैसे होगा अब काम | पर ये वही ऑफिस है जहाँ के लोगो ने आपका २ साल पहले जबरदस्ती पड़ोस के एक गाँव में ट्रान्सफर कर दिया था | उसी दौड़ से आपकी हेल्थ बिगड़ी और फिर बिगड़ती ही गयी | मैंने आपसे कहा भी था कि ट्रान्सफर रुकवाने के लिए जो भी मांग रहे हों दे दो, पर आप नहीं माने थे |आप शायद पूरी तरह से ईमानदार भले नहीं थे, पर दूसरों की बेईमानी आप पर कभी हावी नहीं हो पायी |

कुछ “महा पोंगा” ज्योतिषियों ने कहा है कि मेरे और मेरे भाई की “कुंडली” में कुछ ऐसा है कि हमें पितृ-शोक होगा और इस वज़ह से आप नहीं रहे | इन “कमीने"  ज्योत्षियों को काश मैं खुले आम मार सकता | पहली बात तो मैं इन सबपे विश्वास नहीं करता | और अगर ये सब सही भी है तो आपकी अहमियत हम दोनों के लिए और बढ़ जाती है कि आपने पैदा होते ही हमें मार नहीं दिया | खुद भले ही नहीं रहे पर हमें जीने दिया |  वैसे आप इनसब पर बहुत विश्वास करते थे | घर आये एक ऐसे ही कैरेक्टर ने आपकी उम्र की भविष्यवाणी की थी ८३ साल | पर आप तो ५८ साल ही जिए | पिछले कई बार से उसे ढूंढ रहा हूँ लखीमपुर में , पूरे २५ साल का हिसाब मांगना है कमीने से |

पापा आपको जाते-जाते भी नहीं देख पाया | आखिरी बार आपको लखीमपुर के रेलवे स्टेशन पर देखा था , आप मुझे छोड़ने आये थे | तब लगता था कि आपसे फिर मिलूँगा |मैंने आपको कई बार बीमार पड़ते देखा और आप हमेशा ठीक होकर बाहर आ गए | इस बार भी लग रहा था कि आप ठीक हो जाओगे | पर शायद ये होना तय था | आपको आखिरी वक्त ना देख पाने का दुःख मुझे हमेशा रहेगा |

एक बात और है जो आपको कभी नहीं बता पाऊंगा  | आपके जाने के कुछ घंटों बाद मैं न्यूयार्क एअरपोर्ट पर अपनी फ्लाईट का वेट कर रहा था | मैं अकेला था वहाँ | पर एक आवाज़ थी मेरे साथ | उसको मैंने पहले कभी देखा नहीं था | उसने मुझे बाँध कर रखा था वरना टूट कर बिखर गया होता | उस आवाज़ की रोशनी धुंधली हो रही है पापा |  मुझे आपकी फिर से ज़रूरत है पापा उसको बचा के रखने के लिए| कहीं से आ जाओ ना पापा !!!!

अपने जाने के बाद आप बहुत सारी जिम्मेदारियां छोड़कर गए हो | पता नहीं उनमे से कितनी पूरी कर पाऊंगा | पर कोशिश करूँगा जितनी भी निभा पाऊँ, ढंग से निभाऊं | कहते हैं ऊपर हर कोई मिलता है एक दूसरे से | कोशिश करूँगा जब आप से मिलूँ तो आपसे नज़रें मिला सकूं और कह सकूं कि देखिये आपके जाने के बाद भी मैंने कुछ बिगड़ने नहीं दिया , सब संभाल लिया मैंने |  बस जहाँ भी हो मुझे हेल्प करते रहना पापा |

I miss you a lot Papa!!!!
 ****

“You think the dead we have loved ever truly leave us? You think that we don’t recall them more clearly than ever in times of great trouble? Your father is alive in you , Harry, and shows himself most plainly when you have need of him” – J.K. Rowling in “Harry Potter and the Prisoner of Azkaban”

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

बाइक की सवारी, गाँव घुम्मकड़ी और बाबा गुप्तिनाथ के दर्शन !!!

पिछले दिनों घर जाना हुआ | एक शाम पंकज के पापा घर पर मिलने आये | उनसे बात करते करते पता चला कि अगले दिन वो अपने गाँव जाने का प्रोग्राम बना चुके हैं | पंकज और हमारा गाँव भी एक ही है |  हमने भी जाने का प्रोग्राम बना लिया | भाई को भी तैयार कर लिए |

अगले दिन का पहला टास्क था, बाइक की सफाई | पापा के जाने के बाद से वो कमरे में पड़ी धूल खाती रहती है | झाड़-पोंछ के रेडी की गयी | काम भर का पेट्रोल भी डाला गया जिससे पेट्रोल पम्प तक पहुंचा जा सके | फिर बाइक के कागज़ ढूंढें गए जिससे कोई लफड़ा-लोचा हो तो निपटा जा सके | आजकल गुस्सा काफी आने लगा है सो एक दो बार चिल्लाये भी सबपर कि कोई भी सामान ठीक से नहीं रखता है | स्टेटमेंट की रेंज में हम भी आते थे तो सबने सारी जिम्मेदारी हमपर भी डाली और हमारा गुस्सा अपने आप शांत हो गया |

DSC_0889फिर हेलमेट पहन के एक दम तैनात हो गए | छोटे भाई ने पीछे की सीट का कार्यभार संभाल लिया | घर से निकलते ही फोटू खिचवाये | हेलमेट पहनकर और बाइक पर बैठकर | उसके बाद आगे बढे |

जब यात्रा शुरू हुई तो पहला पड़ाव था , पेट्रोल पम्प | जाकर पेट्रोल भरवाया गया | थोड़ी दूर गाड़ी चली तो “कड़-कड़" की आवाज़ के साथ बंद हो गयी | तब पता चला कि इंजन-आयल भी खतम हो गया है | अगले पेट्रोल पम्प तक कोई तरह पहुंचे फिर इंजन-आयल भी डलवाया | फिर थोड़ी बहुत परेशानी देते हुए चलती ही रही बाइक |

मेरा शहर , उत्तर-प्रदेश के तराई एरिया में आता है , जिसे गांजर भी कहते हैं | इसका कारण वो तमाम छोटी-छोटी नदियाँ हैं, जो वहाँ पर जाल की तरह फैली हुई हैं | दो मुख्य नदियाँ घाघरा और शारदा हैं |साथ में गोमती और सरयू नदी भी हैं |  घाघरा नेपाल से बह कर आती है | शारदा नदी का उद्गम पूर्णागिरी की पहाड़ियों में हैं | उस अंचल में पूर्णागिरी माता की महत्ता वैष्णों देवी जैसी ही है | बचपन में एक बार वहाँ भी जाने का मौका मिला है | बड़ी अच्छी जगह है | घाघरा नदी का बहाव बहुत तेज है और शारदा नदी से वो थोड़ा ऊँचाई पर बहती है | लखीमपुर के बाहर निकलने के थोड़ी दूर पर ही ( शायद बहराइच जिले में) ये दोनों नदियाँ मिल जाती हैं | इस वजह से घाघरा का ढलान वाला बहाव है और वो बहुत तबाही मचाती है | तबाही मचाने के मामले में शारदा नदी घाघरा से भी आगे है | छोटे भाई ने बताया कि उत्तर-प्रदेश में शारदा नदी सबसे ज्यादा तबाही मचाती है | लखीमपुर जिला इसकी बहुत मार झेलता है | शारदा  की कई सहायक नदियाँ भी है जिसमे कंडवा और उल्ल नदी प्रमुख हैं | इन नदियों के बारे में ज्यादा कुछ मिलता नहीं | उल्ल नदी का एक घाट मेरे घर से १ किमी की दूरी पर ही है |


इन्ही नदियों के पास कई सारे छोटे-बड़े मंदिर भी हैं | जिसमे से एक “लिलौटीनाथ” बहुत प्रसिद्द हैं | ये उल्ल नदी के तट पर बना है | एक किवदंती के अनुसार अमर योद्धा “आल्हा" और “ऊदल" आजकल इसी क्षेत्र में रहते हैं , छुपकर | बरसात के मौसम में यहाँ आल्हा भी गाया जाता है | आल्हा “जगनिक" के द्वारा लिखा गया एक आदिकालीन काव्य “आल्ह-खंड" के हिस्से हैं | यहाँ इसे ढोलक की थाप पर गया जाता है |  एक हिस्सा जो मुझे याद है :

जाकर बिटिया क्यारही देखीं, ताघर जाय धरें तलवार | औ नौ मन सेंदुर गर्दा ह्वैगा, तब चुटकी भर चढा लिलार |

संगीत की जानकारी बहुत तो नहीं है पर फिल्म “मंगल पांडे” का गीत “मंगल-मंगल"  की धुन भी कुछ-कुछ इसी तरह की लगती है मुझे | बचपन में एक कहानी ये भी सुनी थी कि लिलौटीनाथ के दर्शन किसी भी समय करने जाओ,  वहाँ पर हमेशा ताज़े फूल ही चढ़े मिलते हैं | पर इस तरह कि किवदंतियां लगभग हर जगह से सुनने को मिलती  हैं |


पंकज के पापा भी शारदा नदी के किनारे बने एक मंदिर बाबा गुप्तिनाथ के यहाँ यज्ञ में जा रहे थे | “गुप्तिनाथ"  शंकर जी हैं और एक पीपल के पेड़ की जड़ में निवास करते हैं | गुप्त तरीके से | इसीलिए उनका ये नाम है | एक केले के पेड़ की नाली बनाकर बाबा पर जल चढ़ाया जाता है | आसपास के लोगो में इनकी काफी महत्ता है | मंदिर तो हालांकि काफी पुराना है पर उसकी एक इंटरेस्टिंग बात वहाँ के कुछ लोगो ने हमें बताई:
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दो साल पहले शारदा में बहुत भयंकर बाढ़ आयी थी | कई गाँव बह गए थे | बढ़ते बढ़ते नदी मंदिर की तरफ भी आ गयी थी | मंदिर के पास एक दुमंजिला धर्मशाला भी बना हुआ था | नदी का पानी उसके चारों ओर भर गया और वो ज़मीन के अंदर धंस गयी | उसका कोइ नाम-ओ-निशान नहीं दिखता वहाँ पर | पर नदी जब मंदिर की ओर बढ़ी तो बस मंदिर को छू कर वापस लौट गयी |  मानो बाबा के पैर छूने आई हो और वापस लौट गयी हो |तबसे मंदिर की बहुत महत्ता बढ़ गयी |

DSC_0898किसी की धार्मिक भावना को ठेस न पहुचाते हुए और किसी भगवान का अनादर ना करते हुए , एरिया के आस-पास देखने से मुझे ऐसा लगा कि नदी के पानी के वापस लौटने का एक कारण उस पीपल के पेड़ की जड़ें भी रही होंगी जिसकी वजह से ज़मीन का कटान रुक गया होगा |  भगवान के साथ-साथ पीपल की पूजा भी की ही जाती है |आजकल नदी में पानी कम है | करीब डेढ़ किमी पीछे खिसक गयी है | उसकी एक छोटी सी धारा वहाँ से बहती है आजकल , इसे वहाँ “सुतिया" बोलते हैं | वहीँ चाय-नाश्ता किया गया | बाद में भंडारा हुआ तो खाना भी खाया | मंदिर की, पेड़ की , पत्तियों की फोटू भी ली | सुतिया की भी फोटो ली गयी थोड़ी दूर से |

मंदिर पर लोग मन्नतें माँगते हैं | पूरी हो जाने पर घंटी बाँध जाते हैं | हमने भी कुछ मांग लिया | बताएँगे नहीं अभी की क्या माँगा , क्यूंकि ऐसा करने से माना किया जाता है | पूरी हो गयी तो घंटी बांधने जायेंगे तो इस पोस्ट का पार्ट-२ लिखा जायेगा | Smile Smile 

उसके बाद हम अपने गाँव की ओर चल दिए |

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हमारा गाँव शारदा नदी के किनारे बसा हुआ है | काफी समय तक तो ज़मीन नदी के अंदर ही थी | कुछ सालों पहले नदी ने दिशा बदली तो ज़मीन बाहर आयी है | तब से खेती होती है | मुख्य रूप से गन्ना ( शुगर-केन) और गेंहू की खेती होती है | हमारे खेत में गन्ना बोया गया था , जो काटा जा चुका है | मिल को भेजा जा चुका है | मिल मालिकों ने अभी भुगतान नहीं किया है | पड़ोस के खेत में गेंहू बोया गया है | खेत गाँव से कुछ २ किमी की दूरी पर था | रास्ता बालू से भरा हुआ था | सुतिया भी पड़ती है | तो हमें खेत ले गए पापा के दोस्त “देशराज" , अपनी बाइक पर | हम तो अपनी से ना जा पाते |  पता नहीं इतने एक जैसे दिखते खेतों के बीच वो अपने खेत को कैसे पहचान पाये |  पड़ोस के खेत से एक गेंहू की बाली तोड़ी और हाथ पर रगड़ कर उससे गेंहू के दाने निकाले | दाने बहुत पतले थे | वो सूखकर और पतले हो जायेंगे | इस प्रकार इस बार इस बार गेंहू की फसल के अच्छा ना होने की बात भी बताई उन्होंने |
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गन्ने का एक पेड़ दो बार फसल देता है | दूसरी बार फसल काटने के बाद खेतों में आग लगा दी जाती है , फिर एक साल के लिए खेत बेकार हो जाता है |  गन्ने के पौधों को पानी भी बहुत चाहिए होता है | १० दिन में पानी लगाना होता है | घंटों लग जाते हैं पानी देने में | पर ज़रा सी लापरवाही से हुई पानी लगाने में देरी पूरी फसल चौपट कर देती है | पिछले साल गर्मी बहुत पड़ी थी | करीब ७-१० बार पानी लगाना पड़ा था किसानों को अपने खेतों में |


ये सब पता कर हम अपने गाँव वापस आ गए | तब तक पंकज के पापा भी गाँव के कई लोगो से मिलकर वापस आ गए थे | दोपहर के ढाई बज रहे थे | ५ बजे हमारी भी ट्रेन थी तो फटाफट वहाँ से निकला गया | एक घंटे के अंदर घर भी वापस पहुँच गए | रास्ते में पेड़ों की छाँव ने गर्मी से हमें बचाए रखा |  कुछ और फोटो नीचे हैं :

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इस फोटो में वही सुतिया है | अपने टाइम पर तो ना जाने कितनो को बहा ले जाती है | आजकल औकात थोड़ी कम है | इसे बाइक से  या पैदल भी पार किया जा सकता है | ये दूसरी फोटो में छोटे भाई साहब हेलमेट के साथ फोटो खिचवा रहे हैं | पीछे है नदी का वो हिस्सा जिसने दो साल पहले तबाही मचाई थी |  और भी कई फोटो लिए गए | घर पहुँच के पता चला कि ना तो हमने अपना कोई फोटो लिया रस्ते में लिया और ना ही अंकल ( पंकज के पापा) का | कुछ और भी चीज़ें पार्ट-२ के लिए छोड़ देते हैं | Smile Smile 
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तो बस ऐसे ही बीत गयी ये फटाफट वाली यात्रा , फिर गए तो फिर बताएँगे | तब तक खुश रहिये आबाद रहिये , चाहे गुडगाँव रहिये या इलाहाबाद रहिये !!!! ( ये लास्ट वाली लाइन पंकज के लिए ) Smile Smile 

नमस्ते !!!!!
--देवांशु

सोमवार, 25 मार्च 2013

पं. पोंगादीन लप्पाचार्य से विस्फोटक बातचीत


कल भारत ने ऑस्ट्रेलिया को जम के धोया |  ४ मैचों की सीरीज ४-० से हरा डाली | जगह जगह विश्लेषक अपनी राय दे रहे हैं | पर तहलका मचाया हुआ है पं. पोंगादीन लप्पाचार्य ने, उन्होंने कहा की इसकी भविष्यवाणी उन्होंने पहले ही कर दी थी | सो हम आज सुबह-सुबह उनका साक्षात्कार करने चले गए | प्रस्तुत है उनसे बातचीत के मुख्य अंश :
मैं : नमस्कार पांडी जी |
पंपोल (पं. पोंगादीन लप्पाचार्य ) : नमस्ते बालक, कैसे हो |

मैं : जी बस बढ़िया, आप सुनाएँ |

पंपोल : बस सब प्रभु की किरपा है , कहो कैसे आना हुआ |

मैं : पांडी जी , बस अभी बाहर सुना की आपने भारत के ४-० से जीतने की भविष्यवाणी की थी, तो सोचा जरा आपसे थोड़ा बातचीत कर ली जाए |

पंपोल : अच्छा किया बालक, बड़ा अच्छा लगता है जब तुम्हारे जैसे युवा, हमारे ज्ञान की कद्र करते हो | वर्ना ज्यादातर तो मजाक उड़ाते हैं | अरे भाई सदियों से चला आ रहा है ये सब , कोई समझता ही नहीं | खैर ये सब किनारे धरो , तुम बताओ का पूछना चाहते हो |

मैं : पहला सवाल तो यही की आपकी भविष्यवाणी के बारे में सीरीज ख़त्म होने के बाद ही पता चला , पहले कुछ सुना नहीं ऐसा ?

पंपोल : भाई ये भी एक तरीका है लड़कों ( क्रिकेट खिलाडियों) से प्रदर्शन कराने का | पहले बोल देते तो लड़के कुछ करते नहीं | लेजी हो जाते | सो हमने कहा बाद में बताएँगे |

मैं : अच्छा , मतलब आपने ऐसा जान-बूझकर किया ?

पंपोल : हाँ , बचपन से ही हम ब्लैकबोर्ड पर चाक फेंकते और जहाँ पर निशान बन जाता उसके चारों ओर गोला खींच देते हैं | जनता को लगता है की हमने गोला बाद में बनाया पर असल बात तो ये है की हम निशाना वहीं मरना चाहते थे | ये गूढ़ बातें हैं , मूढ़ जनता क्या जाने |

मैं : वो तो है पांडी जी |  धोनी के बारे में बताएं कुछ , क्या राज़ है उनकी सफलता का ?

पंपोल : देखो बालक , इन्सान दो तरह से जीतता है , एक जब उसकी कुण्डली में जीत का योग हो , दूसरा विरोधी की कुंडली में हार का |

मैं : पर वो तो पिछले कई साल से जीत रहे हैं , तो क्या ..

पंपोल ( बीच में बात काटते हुए ) : सबकी साढ़े-साती चल रही है , धोनी के अलावा |

मैं : पर ऑस्ट्रेलिया में तो हम ०-४ से हारे थे |

पंपोल : भैया मेरे , ऑस्ट्रेलिया में सब उल्टा है , जब अपने यहाँ कटकटाऊ ठण्ड पड़ती है तो वहां गरमी , इसीलिए वहां सब उल्टा हो जाता है |

मैं : पर हम तो इंग्लैंड में भी हारे , वहां तो सब ठीक रहता है |

पंपोल ( चेहरा लाल करते हुए ) : यही तो तुम लोगो की बात समझ नहीं आती, बहुत जबान लड़ाते हो | बस केवल मजाक बनाना है हमारी विद्या का |

मैं : अरे शांत हो जाइए पांडी जी , ये बताइये क्या धोनी की कप्तानी में अगला विश्वकप हम जीतेंगे ?

पंपोल : ये हम विश्वकप के बाद बताएँगे |

मैं : अरे क्यूँ ?

पंपोल : बोला ना, परफोर्मेंस पर असर पड़ता है , समझते नहीं हो यार तुम |

मैं : पांडी जी , आप तो भड़क गए | अच्छा सर जडेजा के परफोर्मेंस के बारे में भी सुना आपने भविष्यवाणी की थी | उसका क्या राज है |

पंपोल : दरसल उसकी कुण्डली के किसी भी घर में कोई गृह नहीं है , इसलिए उसके बारे में समझ पाना बहुत मुश्किल है और यही उसकी सफलता का राज़ है | वो इसीलिए सफल है की उसके बारे में कोई कुछ समझ नहीं पाता |

मैं : ह्म्म्म, अच्छा सचिन के बारे में बताइए , उन्हें कब तक खेलना चाहिए |

पंपोल : उसकी कुण्डली में सारे योग हैं, पर रिटायर्मेंट का योग नहीं है |

मैं : पर फिर भी , कभी तो रिटायरमेंट लेना होगा |

पंपोल : मुझे पता तो है की वो कब लेंगे रिटायरमेंट, पर मेरे बयान से उनके आखिरी मैच में सिक्यूरिटी की समस्या खड़ी हो जायेगी , इसलिए सरकार ने हमें चुप रहने के लिए बोला है |

मैं :  तो आप सरकार में भी दखल रखते हैं?

पंपोल : और नहीं तो क्या, हमारी सलाह के बिना तो नेता लोग सदन में नहीं जाते, प्रधानमंत्री भी !!

मैं : हमें नहीं लगता ऐसे पढ़े लिखे प्रधानमंत्री ऐसी बातें मानते होंगे |

पंपोल : अरे भूल गए , उन्ही ने तो कहा था की उनकी मौत के लिए विपक्ष ने यज्ञ कराया था | ये इन्फोर्मेशन भी हम ही ने दी थी |

मैं : आप तो काफी पावरफुल आदमी लगते हैं | आप सबका भविष्य जानते हैं | तो अपना भी जानते होंगे ?

पंपोल : हाँ बिलकुल |

मैं : तब तो आप बीमार भी नहीं पड़ते होंगे |

पंपोल ( मुस्कियाते हुए) : मालूम था की तुम्हारे मन में ये शंका आएगी | देखो बालक , राम , कृष्ण ये सब भगवान् के अवतार थे पर इन्होने कभी किसी को आइडिया नहीं लगने दिया के आगे क्या होने वाला है | इसैई लिए हम भी सब नार्मल चलने देते हैं |

मैं : तो बीमार पड़ते हैं  लेकिन  आप इलाज भी नहीं करवाते होंगे ? आपको तो पता ही होगा की आप ठीक हो जायेंगे ?

पंपोल : नहीं , कराते हैं | डाक्टर लोग दवाई देते हैं | लोग सब दवाई की एक्सपायरी देखते हैं , हम  मैनूफैक्चरिंग डेट देखकर उसकी कुण्डली बनाते हैं और फिर देखते हैं की हमें फायदा करेगी या नहीं |

मैं : तो आप बिना एक्सपायरी देखे दवाई खाते हैं ?

पंपोल :  यहीं तो हमारी विद्या और तुम्हारे विज्ञान में अंतर है , हमें अपनी एक्सपायरी डेट पता है |

मैं : धन्य हैं आप तो |

पंपोल : हाँ वो तो हैं |

मैं : एक बार फिर क्रिकेट पर आते हैं , फ्लेचर कब तक रहेंगे अपने कोच ?

पंपोल : कौन ??

मैं : डंकन फ्लेचर |

पंपोल : मैंने उनके बारे में नहीं सुना | इन्फोर्मेशन है कुछ उसके बारे में , जैसे कब और कहाँ पैदा हुए ?
मैंने अपने फोन से क्रिकइन्फो से फ्लेचर साहब का डाटा उन्हें थमाया | उन्होंने एक कागज पर कुछ चौखाने खिंचे |

पंपोल : कब से हैं कोच ये ?

मैं : काफी टाइम हो गया , जाने वाले थे , एक्सटेंशन मिल गया |

पंपोल ( कागज पर घूरते हुए ) : जड़ता का योग है | जहाँ जाएगा कुण्डली मार कर बैठ जायेगा , हिलाए ना हिलेगा | पर मुस्कुराते हुए बोले पर जहाँ रहेगा फल अच्छे देगा |

मैं : पर पहले तो ये इंग्लैंड के कोच थे , जब तक रहे बुरी तरह हारी इंग्लैंड |
पंपोल बगलें झांकने लगे | उँगलियों पर कुछ गिने | २-३ किताबें निकाल के  कुछ पढ़े | और बोले :
“इनका टाइम अब शुरू हुआ है, अब अच्छे रिजल्ट आयेंगे”

मैं : मतलब हम साउथ अफ्रीका में जीतेंगे ?

पंपोल ( मुस्कुराते हुए ) : ये तो मैं …

मैं : “साउथ अफ्रीका सीरीज के बाद बताऊंगा” | 

पंपोल भड़क गए मेरे ऊपर | बोले की मेरा दिमाग खराब हो गया है | और मैं उनकी विद्या का मजाक उड़ा रहा हूँ | और मेरी जन्मतिथि और जगह मांग बैठे | मैंने भी उनको डाटा दे डाला | फिर उन्होंने कागज़ में कुछ खींचा और बोले :
“कुण्डली देख के कोई भी कह दे की करेक्टरलेस हो तुम,  ये जो दो गृह एक ही घर में हैं ना , तुम्हे छिछोरा बता रहे हैं | हज़ार तो तुम्हारे लफड़े रहेंगे | एक लड़की पर टिक नहीं पाओगे”

मैं : अरे पांडी जी, क्या बता रहे हो, मेरा तो कभी कोई लफड़ा नहीं रहा |

पंपोल : अब होगा ना छिछोरे |

मैं समझ गया | मैंने २ पांच सौ के निकाल कर उनके चरण कमलों में रखे | और बोला की फिर से देखें |

पंपोल : जो बात बोली वो तो ठीक है | पर इसमे से जो एक गृह है वो  काट कर रहा है , फेमस हो जाओगे , अच्छा है सब |

मैं : अच्छा शादी कब होगी पांडी जी मेरी ?

पंपोल : ये हम ..

मैं : “…तुम्हारी शादी के बाद बताएँगे”

और इससे पहले की वो अपने वज़न के चलते उठकर हमें दौड़ा पाते | हम वहां से खिसक लिए और जाते जाते एक ५०० का पत्ता भी उठा लिए और चिल्लाकर बोले :

“कीप द चेंज प्लीज़”

--देवांशु
(चित्र गूगल इमेज से)