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बुधवार, 22 जुलाई 2015

कुत्ता ढाल और मुन्ह्नोचवा आई गवा !!!


कुत्ता ढाल के बारे में संक्षिप्त वर्णन पहले बताये रहे |  कुत्ता ढाल, जैसे की नाम से लगता है एक कुत्ते से रिलेटेड है | दरसल “साढ़े तिराहे” से जौन ( जो ) सड़क नदी “वार” ( ओर )  जात ( जाती ) है , उसमें से पहला लेफ्ट टर्न १८७७ को जाता है | 

जैसे “गली आगे मुडती है” या “गली उतरती हैं” वैसे ही ये गली इस ढाल से सीधे लुढ़कती है | ढाल है न , इहै खातिर ( इसीलिए) |  ढाल से सटा हुआ एक बिना छज्जे वाला मकान है | इसी मकान में एक कुत्ता रहता था ( बाकी लोग भी रहते थे ) जब हम पांचवी या छठी क्लास में रहे होंगे और सुदर्शन साहब की तरह साइकिल की सवारी करने की कोशिश कर रहे थे | एक थी २० इंची नीले कलर की हीरो जेट हमारे पास |  उसकी इम्पोर्टेंस तो आज की कार से भी ज्यादा है , ऊ अलग बात है |

जब साइकल चलाते हुए इस ढाल से गुजरा जाता तो साइकिल गुज़रने की आवाज़ करती और  कुत्ता महाशय जो हमेशा सर्विलेंस ड्यूटी पर रहते थे , भयंकर गर्ज़ना और चीत्कार करते हुए छत से भागते हुए बाहर गली में आ जाते | उस घर का दरवाज़ा मानव रहित रेलवे क्रासिंग था | कोई कभी कैसे भी आ-जा सकता था | कुत्ता महाशय को कभी आने जाने की कोई दिक्कत नहीं हुई |

इसी परम महाशय “कुत्ता” महाराज की वजह से ही ढाल का नाम कुत्ता ढाल पड़ा |खैर,  इस सबसे इम्पोर्टेन्ट बात कुछ और है | 

बात उस समय की है जब अपन कॉलेज में थे और सेमेस्टर ब्रेक में घर आये हुए थे | गर्मी के दिन थे ( और रात भी ) |  अतिशयोक्ति अलंकार का उपयोग ना करें तो कहा जायेगा की  बिजली आती कम और जाती ज्यादा |  तब शहर में ना तो FM था , ना कंप्यूटर घर घर पहुंचे थे |  गाने, रेडियो कमेन्ट्री , समाचार सबका एक मात्र भरोसेमंद सहारा था हमारा फिलिप्स का ट्रांजिस्टर |  उसी पर विविध भारती, आल इंडिया रेडियो (लखनऊ) और उसके बाद सीधे बीबीसी  लन्दन  सुना जाता | ( अगर आप इससे अपन की ऐज का आईडिया लेने की कोशिश कर रहे हों तो बता दिया जाए ये सब सन २००० लगने के बाद की बात है ) |

जैसा की बताया गर्मी के दिन-रात थे, तो लोग ज्यादातर  अपनी अपनी छतों पर सोते थे |  रात ८ बजे के बाद घना घुप्प  अँधेरा ( सांय सांय करने वाला )| पर छतों पर हर तरफ बोलते लोगों की बातों से महफ़िल जमी रहती |

पर एक रोज़ भूचाल आ गया |

मुन्ह्नोचवा (मुंह नोच लेने वाला विचित्र प्राणी ) के आगमन की खबर पेपर में आ चुकी थी | हालंकि उनके हमार मोहल्ले में पदार्पण की कोई सूचना नहीं थी | पर उसी कुत्ता ढाल वाले मकान में रहने वाले एक शख्श ने एक दिन एलान  किया की कल उनको मुन्ह्नोचवा ने दर्शन दिए और “काट खाईस” (काट खाया)| 

मोहल्ले में हडकंप मच गया |  उस दिन से मुन्ह्नोचवा की कम से कम एक नयी बात ज़रूर पता चलती |

कटिया मास्टर गुड्डू चचा का कहना था की “सबै लोग अपने पास एक एक लट्ठ रखो, जहां आय सार रग्दाय के हौंको ( सब लोग अपने-अपने साथ एक डंडा रखो और जैसे ही उनके बीवी के भाई, मुन्ह्नोचवा जी आयें उनको दौड़ा के मारा जाए ) | 

डंडों के दाम में अचानक से बढ़ोत्तरी देखी गयी | साथ ही सर्वसम्मति से दो लोगों ने ( जिसमें राजाराम और टोका मास्टर दो ही थे ) ये फैसला भी लिया की रात भर बिजली आये ऐसी गुहार शर्मा जी से लगाई जाये | शर्मा जी का ओहदा किसी मंत्री से कम ना था | और कम हो भी क्यूँ भला , उसी रात से लाइट आने लगी | अब इसमें शर्मा जी का कितना रोल था इस पर तो जांच हो सकती है और CBI से नीचे की एजेंसी नहीं चलेगी |

खैर, सिवाय हमारे घर के, पूरे मोहल्ले में छतों पर बल्ब टंग गए | अब चूंकि राजाराम के यहाँ टोका कनेक्शन भी नहीं था और उनका घर हमारे घर से सटा हुआ था , उन्होंने ऑफिस जाते हुए हमारे पिताश्री को रोका और कहा “ निगम जी , अपनेओ छत पर एक बलब लगवाय देओ” ( श्रीमान निगम जी आप अपनी छत पर एक बल्ब लगवा दें )  | पिताश्री ने सरकारी विभाग में काम करने की अपनी सिद्धहस्तता को दर्शाया और मामला शाम तक मुल्तवी कर दिया जो अगली कई सुबहों और फिर कई और शामों के लिए मुल्तवी होता रहा |

अब हर शाम कहीं न कहीं से एक शोर उठता “आई गवा" ( आ गया ) | मोहल्ले भर से लट्ठ पीटने की आवाज़ आती | एक दिन एक खोजी ने बताया “वहिके गलेमा एक डिस्को लाइट जईस कुछ बंधा आय” | ( उसके गले में डिस्को लाइट , मिथुन दा के फिल्म वाली , जैसा कुछ बंधा है ) | साथ में ये भी बताया गया ये यंत्र “सेल" से चलता है | 

इसके बाद लोगों ने “सेल" पर पानी के प्रभाव के कारण लट्ठ के साथ एक बाल्टी पानी रखना भी अनिवार्य कर दिया |

इस बीच “विदेशी ताकतों" के हाथ की न्यूज़ आयी | बताया गया की ये पक्षी रिमोट से चलते हैं और उनका कण्ट्रोल सूनसान इलाके में किसी कार से किया जाता है | सुनने में ये भी आया की इस चक्कर में दो कारें जला दी गयीं |खबर ये भी आई की राज्य की तत्कालीन मुख्मंत्री ने आईआईटी के “टीचरों" की एक टीम बनाई है जो इस पर रिसर्च करेगी | पता नहीं वो टीम बनी की नहीं बनी और अगर बनी तो क्या रिपोर्ट आयी | खैर |

मुन्ह्नोचवा की रेंज बढ़ रही थी | अड़ोस पड़ोस के गावों से भी खबरें आ रही थी |  “वहिके तो भैया चिपटि गवा, जान लैकेहे छोड़िस” ( किसी को पकड़ लिया और तब तक नहीं छोड़ा जब तक मर नहीं गया ) |  दहशत बढ़ने लगी | लोगों ने रात में घरों से निकलना छोड़ दिया |  जाते भी तो ग्रुप में | सिनेमाघरों के रात के शो ठन्डे पड़ गए | शुक्ला मास्टर ने अपने दिव्य ज्ञान का हवाला देते हुए इसे प्रकृति का प्रकोप डिक्लेअर कर दिया |

ये तो ठीक से याद नहीं की इस दहशत की तिलांजलि कैसे हुई पर एक दिन किसी ने बताया की सारे मुन्ह्नोचवा नेपाल चले गए हैं | माहौल शांत होने लगा |

एक बात ये भी हुई की बारिश शुरू हुई और टोका मास्टर गुड्डू चचा का कहना था “अब सेल कैसे चलिहे , ससुरे भाग गए” ( अब बारिश में सेल भीग गए , इसलिए उनकी बीवी के पिताजी अर्थात मुन्ह्नोचवा जी भाग गए ) |
*****
कुछ सालों बाद फिर एक खबर उड़ी थी की ३१ दिसम्बर के दिन जो सोयेगा वो पत्थर का हो जाएगा |
-देवांशु

सोमवार, 5 अगस्त 2013

लिफाफे में सादा कागज़ निकलने से हड़कंप

नई दिल्ली | प्रधानमंत्री कार्यालय को मिले एक पत्र के लिफाफे में सादा कागज़ निकलने से हडकंप मच गया है | सारे नौकर और अफसर शाह आदतानुसार बगले झांकने लगे है |

दरसल ये घटना सत्ता धारी गठबंधन की अध्यक्षा द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे पत्र से खड़ी हो गयी | पिछले दिनों झुमरीतल्लैया  ( जिसको असली में कोडरमा के नाम से जाना जाता है ) से कुछ लोग माननीया से मिलने आये थे | उनका कहना था की विविध भारती पर प्रकाशित होने वाले कार्यक्रम “आप की फरमाइश" में पिछले करीब १५ सालों से उनके परिवार के कुत्ते का नाम बार-बार लिया जा रहा है | १५ साल पहले जब उन्होंने रक्षाबंधन के त्यौहार पर “बहना ने भाई की कलाई पर प्यार बाँधा है” वाला गान सुनने के लिए चिट्ठी लिखी थी तो उन्होंने अपने कुत्ते का नाम “शेरू" भी लिख दिया था | पर वो ये लिखना भूल गए थे की ये उनके कुत्ते का नाम है |

शेरू की मौत करीब १० साल पहले हो चुकी है |  पर हर साल रक्षाबंधन पर विविध भारती वाले उसका नाम ले लेते हैं उसी चिट्ठी का हवाला देकर, जिससे परिवार आहत हो जाता है |  फिर वैसे भी अब कुत्ते का मरना राष्ट्रीय आपदा है | उन्होंने इस आशय के कई पत्र विविध भारती और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को लिखे पर कोई कार्यवाही नहीं हुई | इस लिए अब वो सीधे माननीया के पास अर्जी लेकर आये हैं | अर्जी लेकर आये लोगो में मोनू , सोनू, बंटी , राजू और उनके सभी दोस्त शामिल थे |

मुलाकात के बाद जब शाम को प्रधानमंत्री ने अपनी रेगुलर परमिशन कॉल की माननीया को, तो उन्होंने इस घटना का संज्ञान लेते हुए कहा की वो इसके बारे में कल एक पत्र भेजेंगी जिसके बाद प्रधानमंत्री इस पर कोई त्वरित एक्शन लेने का एलान करेंगे | प्रधानमंत्री ने अपना पसंदीदा डायलोग दाग दिया "ठीक है" |

प्रधानमंत्री ने इस घटना के बारे में तुरंत एक्शन की घोषणा सुबह सुबह कर दी |  इसे माननीया के द्वारा भेजे गए पत्र के लिए  उठाया  गया कदम बताया और शाम को इसके बारे में विस्तृत जानकारी देने के लिए प्रेस-कांफ्रेंस बुला ली |  पर दोपहर में प्रधानमंत्री कार्यालय से खबर आ गयी की पत्र के लिए जो लिफाफा भेजा गया उसमे सिर्फ सादा कागज था | ये बात प्रधानमंत्री तक नहीं पहुँच पायी और वो सीधे प्रेस-कोंफ्रेंस में पहुच गए |

उन्होंने  उठाये गए क़दमों को पहले तो  युवराज की पहल और माननीया की देश के प्रति चिंता बताया फिर पहले से निर्धारित प्रश्नों के जवाब दिए | तभी एक खुराफाती पत्रकार ने ये सवाल दाग दिया की सादे कागज पर ही एक्शन कैसे ले लिए तो प्रधानमंत्री के पीए  असमंजस में आ गए | किसी को कुछ समझ नही आया की क्या कहें और क्या करें |  कुछ लोगो ने इसे हल्की सी गलती बताया जिसपे भारी हंगामा हो गया | कांफ्रेंस संसद भवन में तब्दील हो गयी | कुछ पत्रकार पक्ष में आ गए कुछ विपक्ष में | शब्द बाण चलने लगे |

माहौल बिगड़ता देख प्रधानमंत्री ने अपनी शायरी के ज्ञान के चलते एक लाइन में बात निपटाई :
“हम वो हैं जो लिफाफे का रंग देख ख़त का मज़मून जान लेते हैं” |
तब जाकर मामला शांत हुआ |

इस बीच नाम ना लिए जाने की शर्त पर प्रधानमन्त्री कार्यालय के एक उच्चपदासीन अधिकारी ने बताया है की दरसल वो सादा कागज़ प्रधानमंत्री कार्यालय को पिछले बयान के चलते दी गयी क्लीन चिट थी जो गलती से गलत लिफाफे में चली गयी | इस घटना के बाद से प्रधानमंत्री के द्वारा  आने वाले स्वतंत्रता दिवस के लिए बोली जाने स्पीच के लिफाफे की ट्रेकिंग पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है |

अभी तक पीड़ित परिवार से कोई संपर्क नहीं हो पाया है |
--देवांशु
(फोटू के लिए गूगल बाबा की जय हो )

सोमवार, 8 जुलाई 2013

तुमि तो ठेहेरे परदेसी , साथि क्या निभावोगे…

“यार ज़िंदगी से कलर चला गया |”

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नौसिखिया दारूबाजों को दारू के अलावा दो और चीज़ों की सख्त आवश्यकता होती है : घर से दूरी और एकांत | बड़े शहरों में एकांत के बिना भी काम चल जाता है, पर छोटे शहरों में इसकी आवश्यकता ऐसी है जैसे सरकार को सीबीआई की | और अगर इन दोनो के साथ ताज़ा-ताज़ा दिल टूटा हो तो क्या कहना, सोने पर सुहागा | 

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बात तब की है जब हम कॉलेज में नए-नए शिफ्ट हुए थे, और बात-बेबात मौका निकाल कर घर जाया करते थे | महल्ले में उस समय प्यार का रोग भर भर के चढा था, हर कोई इश्क में बावरा हुआ पड़ा था | हमारे एक बचपन के दोस्त थे जो पांचवी क्लास तक हमारे साथ पढ़े थे और हमारे घर से ३ गली छोड़ कर रहते थे , नमन |


नमन

घर  का नाम : बड़कन्ने, इस्कूल का : नमन त्रिवेदी | वो अपनी हृष्ट-पुष्ट काया से सिर्फ बब्बू दादा को ही टक्कर दे सकते थे | बचपने में ही महल्ले के ही किसी जीव-वैज्ञानिक ने खबर उड़ा दी थी, “केंचुआ" आगे पीछे दोनों तरफ से एक जैसा चल सकता है और नमन का नाम भी आगे-पीछे से एक जैसा था तो महाशय का महल्ले का नाम रख दिया गया , “केंचुआ" | उनकी बाडी भी नाम को पूरा समर्थन देती थी | लचर गर्दन, जो बोलते बोलते किसी भी तरफ झुक सकती थी, जैसे थाली पर के बैंगन | मिमियाती आवाज़, बकरी को भी मत दे दे और बहती नाक, जिसके कुछ कतरे गालों के अंत तक पाए जाते थे |


पर बड़े होकर ऐसा कुछ ना रहा | हमारे बी टेक का पहला साल था, श्रीमान केंचुआ जी , बी ए - दूसरे साल में थे | अब तक उनका बाकी शरीर तो जस का तस रहा था, तोंद ने बोरे का रूप लेना शुरू कर दिया था |


हमरे शहर में एक मैनरोड है, जो एक पंचराहे से शुरू होकर रेलवे क्रोसिंग तक जाती है | वहाँ अभी तो ओवरब्रिज बन रहा है ( जिसका जिक्र फिल्म साहब बीवी और गैंगस्टर में आया है) , उस समय नहीं बन रहा था | केंचुआ अपने एक दोस्त के साथ , करीब शाम को सात बजे मैनरोड पर ही भिंटा गए | अब चूँकि वो हमारे इस्कूल के दोस्त थे तो उनका संबोधन वैसा ही रहा “अरे भईया दिवान्सू, कब आयेओ” | हमने बताया कल ही आये हैं, १ हफ्ता रुकेंगे |


उन्होंने कुछ इशारा किया अपने दोस्त को और बोले “आज बड़े सही दिन मिले हो भईया तुम, चलो आज हमरे साथ चलो” | अपनी बाइक में ट्रिपलिंग करते हुए वो हमें उठा के चल दिए | रेलवे क्रोस्सिंग से उनकी बाइक पटरी के सहारे-सहारे बाएं मुड़ ली और करीब आधे किलोमीटर दूर जाकर रुकी | सबसे पहले हम कूदे, बाद में उनके दोस्त फिर केंचुआ महाशय |


वहाँ पास में एक छोटा खँडहर था , रेलवे का ही कोई “परित्यक्त" केबिन | एकांत आ गया था | उसके अंदर “टोर्च" वाले मोबाइल का इस्तेमाल करके रोशनी की गयी | इसके बाद उनके दोस्त ने बैग से “रायल स्टैग" का खम्भा निकाल लिया , साथ में प्लास्टिक के गिलास और एक थैली  जिसमें सूखे मेवे भरे हुए थे  | पानी की बोतलें भी थीं | उस समय हम “मैं कोलेज पढ़ने आया हूँ, सिर्फ पढ़ने" के सिद्धांत का पालन करते थे तो केवल दो पेग बने | फटाफट केंचुआ और उनके दोस्त ने दो दो पेग अंदर ढकोले | इसके बाद इंट्रो शुरू हुआ |


“अरे हम तो बतैबे नहीं किये,  ई हमार दोस्त है , चिलगोजा , ससुरे की बाप की सूखे मेवा की दुकान है , यही लिए सारेक् ई नाम पड़ा" अपने दोस्त को इंट्रोड्यूस करते हुए केंचुआ महाशय बोले |
“और ई हैं हमरे दोस्त दिवान्सू, इनका पढेक बड़ी खुजली है बचपन सेने, अबहीं दिल्ली में पढ़ी रहे हैं, सार ना जाने का करिहें पढ़ी के” हमारा इंट्रोडकशन भी दे दिया गया |


अब बारी चिलगोजा जी के बोलने की थी “भईया, आप तो दिल्ली मा कालेज मा पढ़त हो , वहन तो बहुतै सही कन्यायें पढ़े आती हुइहें” | हम बस केवल मुस्किया दिए | वो आगे बढ़े  “कोई पटाय पायेओ की नाहीं" | अब बारी हमारे शर्माने की थी | एक इसी मैदान में तो चारों खाने चित्त थे हम |


“अरे ई ससुरे सीधे लरिका हैं" | तीसरे पेग के बाद आयी झुमाई के साथ केंचुआ बोले |

“पर ई सार केंचुआ, यहु नाय माना, तुम्हरे महल्ले की एक लड़की का प्रपोज़ मार दिहिस"  चिलगोजा ने हिकारत भरी नज़रों से केंचुआ को देखते हुए हमें संबोधित किया | अब ये खबर थी | महल्ले की सारी कंडीडेट लड़कियों की तस्वीरें ज़हन में घूमने लगीं , गेस करने लगे कौन होगी वो बदनसीब, हालांकि डाटा पुराना था हमारा  | अब तक केंचुआ की सुबकाई शुरू हो गयी थी | एक और पेग अंदर गया |  और बोले “यार दुई गली छोड़ के पहले  मकान वाली, मास्टर की छोटी बिटिया” |  


चिलगोजे ने बड़े ओर का ठहाका लगाया | हम फोटो याद करने में लगे थे , बहुत मेहनत से भी नहीं याद आयी |
श्रीमान केंचुआ जी अब दहाड़ मार कर रोने लगे थे | बोले : “यार ज़िंदगी से कलर चला गया |”


“तौ कलर हम लाये देइत है” ये कहते हुए चिलगोजा ने अपने बैग से एल चाइनीज़ पोर्टेबल कैसेट प्लयेर निकाला और ऑन किया | ऑन करते ही सबसे पहले , उसमे हर तरफ लाल-नीली बत्तियाँ जलीं और पलक झपकते ही खँडहर डिस्कोथेक में बदल गया |  साथ में  अल्ताफ राजा की आवाज़ गूंजी “तुम तो ठहरे परदेसी, साथ क्या निभाओगे" | अल्ताफ राजा के गानों के ज़हर की तीव्रता उनके द्वारा बीच बीच में छोड़े गए शेरों से और बढ़ जाती है | वही हुआ , मेरा केंचुआ की स्टोरी में कोई इंटरेस्ट नहीं बचा |


“यार, बहुतै मतलब वाला गाना है" केंचुआ जी ने जिव्हा खोली और हमारी तरफ देखा | हम फटाफट कट लेने वाले मोड में थे | बोले “तुम नाय समझियो" | हम चिलगोजा भाई की तरफ इशारा करके पूछे कि माजरा क्या है | उन्होंने बताया |


“इन्हैक किलास मा पढ़त है मास्टर केर बिटिया, ई गधऊ, लब-लेटर लिख दिहिन और वहिकी कापी मा रखि दिहिन | ऊ देखिस नाही, वहिकी कापी वहिकी अम्मा ठीक से लगाती रहें की इनका परचा गिरि परा |”

केंचुआ ने गम-गलत करने के मकसद से एक पेग और अंदर किया और कराहे “हाए"|


“अम्मा तो ब्लैक लेटर बफैलो हैं, चिट्ठी पढ़े वहिके बड़े भईया  | पहले तो वहे सुजाय दी गयीं | फिर जब पता चला उधर से कुछ नाय है तब ई पकरे गए |”


“अबे तो कैसे पता चला कि लेटर इन्होने लिखा है” हमने समझने की कोशिश की | केंचुआ की एक और आह निकली | चिलगोजा आगे बढ़े |


“इ ससुर लेटर के आखिरी मा हिन्दी के बिद्वान बनी गए रहे लिखी दिहिन , तुम्हें नमन करता है तुम्हारा नमन | वहिके बाद इनकी पहिले हुई ढंुढाइ , फिर हुई धुनाई |


अल्ताफ राजा कोई एक शेर पढके आगे बढ़े | केंचुआ का रोना अब थम गया था बोले “ऊ शुकला मास्टर , वहू शाम का चठिया लगाये ब्रह्मा-विष्नू कर रहा रहे , मारे वाले ५-७ और बढ़ी गए | और तो और पापाओ का बताय दिहिस | वहो मारिन |”


इस बीच खम्बा खतम हो चुका था | मामला समिट रहा था | हमने घावों को कुरेदते हुए पता किया “ फिर कन्या ने जवाब दिया?” | केंचुआ तमतमा गए बोले “अगलिहे दिन से वहिके दोनों भाई ऊका कालेज ले-छोड़े आये लगे, अभी उसका जवाब आना बाकी है” |


माहौल में दर्द बढ़ गया था | हमने बोला इस हालत में घर कैसे जाओगे | तो पता चला चिलगोजे के घर में सब लोग बाहर गए हैं , केंचुआ आज उसी के यहाँ रुकेंगे, अकेले चिलगोजे को डर ना लगे कहीं | हमने चिलगोजे का मुआयना किया और पाया कि इससे वीभत्स प्राणी मैंने शायद ही कहीं देखा हैं, इसे किस्से डर लगेगा | खैर हमने दोनों को उनके घर छोड़ा और वापस अपने घर की ओर चल दिए | पीछे से उन दोनों के रेंकने की आवाज़ आ रही थी …

तुमि तो ठेहेरे परदेसी , साथि क्या निभावोगे…
(हालांकि मास्टर और उनका पूरा खानदान, कम से कम पिछले ३० साल से महल्ले में रह रहा था )

#जाके पैर ना फटी बिवाई, सो का जाने पीर पराई |

-- देवांशु

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

ज़िन्दगी की एक शाम और मुक़र्रर मौत का इंतज़ार


कभी हुआ है यूँ , की बस पता हो की फलाने दिन , फलाने वक़्त पर मौत मुक़र्रर है |  और मौत भी कोई ऐसी नहीं, जिस्म  ख़त्म होना तो दूर की बात है, एक खरोंच भी नहीं आनी है | और उस मौत के बाद जिंदा रहने के लिए अगर कुछ मारना है तो खुद की रूह को |
एक बड़े दार्शनिक की तरह हर आने वाले दिन को ख़ुशी-ख़ुशी जीते चलो पर मुकर्रर दिन ठीक एक दिन पहले की रात को एक कंपकंपी उठे, दिल ज़ोरों से धड़कने लगे , आँखों के सामने अँधेरा छा जाए | ज़िंदगी के नूर की एक-एक बूँद के लिए प्यास बढ़ने लगे |
और फिर एक आस,  की कुछ वक़्त को ही सही, वो नूर दिखेगा तुम्हे कल | तृप्त कर लेना अपनी आत्मा को, आँखों में बसा लेना उस नूर को और लौट जाना | कुछ पलों के लिए ही सही, मौत का दर्द कम होता लगे |  गिने-चुने लम्हों के लिए नींद अपनी बाहों में सुला ले |
जब आँख खुले तो सबसे पहले वो  आस टूट जाए | और फिर पता चले की इस आखिरी दिन भी मोक्ष मिलना मुमकिन नहीं | साँसे भारी हो जाएं | इसके बाद बची ज़िन्दगी भी क्या ख़ाक ज़िन्दगी है ??
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बाहर आसमान में पिछले कई दिनों से बादल लटके हैं,  ना उड़ जा रहे हैं , ना बरस रहे हैं | शाम का वक़्त है | ऑफिस की खिड़की से बाहर उन्ही बादलों को देख रहा हूँ |  सामने सड़क है | दौडती गाड़ियाँ ना जाने किस मकाम को जाना चाहती हैं |

ज़िन्दगी की सबसे मुश्किल शाम है ये , मुक़र्रर वक़्त में कुछ आधे घंटे से भी कम का वक़्त रह गया है |  सोच रहा हूँ क्या करूँ ? मन करता है की सारे दरवाज़े तोड़ दूं, और आज़ाद कर दूं इस रूह को | पर कायर हूँ , ये नहीं कर सकता |  या रोक लूं उस नूर को आँखों से ओझल होने से , पर वो अब नहीं हो सकता , इसे मजबूरी कहूं या एक बार फिर खुद को कायर , ज्यादा फर्क नहीं है दोनों में ही |
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कल दोस्त ने सेलिन डियोन का ये गाना सुनने को बोला था , सुबह से लगातार सुने जा रहा हूँ…

When life is empty with no tomorrow
And loneliness starts to call
Baby, don't worry, forget your sorrow
'Cause love's gonna conquer it all, all

When you want it the most there's no easy way out
When you're ready to go and your heart's left in doubt
Don't give up on your faith
Love comes to those who believe it
And that's the way it is

-- देवांशु