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मंगलवार, 20 मार्च 2018

तो कहानी शुरू होती है.... ( इश्क वाली कहानी भाग -१ )

शहर बहुत आसान सा था । आमतौर पर शहर आसान ही होते हैं , मुश्किल तो रहने वाले लोग उसे बना देते हैं । पर इस शहर के लोग आसान से ही थे , तो शहर भी आसान सा हो पड़ा था । शहर में एक कॉलोनी थी , मोहल्ले जैसी नहीं । बेफ़िक्री थोड़ी कम थी लोगों में इसलिए मोहल्ला नहीं था । मोहल्ले में बेफ़िक्री कुछ ज़्यादा हो जाती है । यहाँ नहीं थी ।

कॉलोनी में घरों के डिज़ाइन एक जैसे ही थे , एक सिमिट्री थी । जैसे घरों के दरवाज़े आमने सामने , मिली हुई छतें । कमरे , उनकी खिड़कियाँ एक दूसरे को देखती हुईं । कालोनी ज़्यादा पुरानी नहीं तो लोग कम थे । टाइम भी कम ही हुआ था तो लोगों ने मॉडिफ़िकेशन कम कराए थे । काफ़ी सारे घर अभी भी ख़ाली पड़े थे । घरों में ताले थे , जो मकानमालिकों या किराएदारों के इंतज़ार में थे और इंतज़ार करने के विश्वकीर्तिमानों को ध्वस्त करने की फ़िराक़ में थे । 

ज़माना भी 90 के दशक का शुरुआती दौर था ,  तो इंटर्नेट पढ़ी जाने वाली मैगज़ीन में पाया जाता था । एफ़॰एम॰ का दौर भी अभी नहीं आया था । कुछ घरों में ही केबल कनेक्शन था और आम राय ये थी कि पढ़ने लिखने वाले बच्चों के घर में केबल टीवी नहीं होनी चाहिए ,  पढ़ाई ख़राब हो जाती है । ज़्यादातर घरों में सहारा सिर्फ़ दूरदर्शन का था । रेडियो पर मीडीयम वेव और शॉर्ट वेव का रुतबा था ।

हाँ , विडीओ गेम ने दस्तक दे दी थी । पर उसका असर गली में  क्रिकेट खेलने वालों पर कम हुआ था । कह सकते हैं वो सारा कुछ था जो उस बचपन की निशानी था , जो घर के अंदर और बाहर बराबर बीता करता था । रहने वाले परिवारों में हर उम्र के बच्चे थे , कुछ बचपन में थे , कुछ जवान , कुछ जवानी की दहलीज़ पर जो ना बच्चों में गिने जाते और ना बड़ों में । ऐसे ही तीन नमूने इस कहानी के मुख्य बालक / पुरुष पात्र हैं ।

पढ़ाई लिखाई वैसे तो अपने यहाँ काम मानी नहीं जाती बल्कि उसे ज़िंदगी जीने के बाद दूसरे नम्बर का धर्म माना जाता है ।इन तीनों का भी मुख्य काम यही  था , ऐसा विचार उनके पैरेंट्स का तो था ही कम से कम ।बाक़ी कॉलोनी वालों के विचार इतर  थे जो बेवजह नहीं थे । कारणों की चर्चा आएगी बाद में । फ़िलहाल पात्रों  पर आते हैं । तीनों में ऐसा कुछ नहीं की नोटिस किया जाए पर हरकतें ऐसी की इग्नोर भी नहीं कर सकते । चेहरे से अगर नूर नहीं बरसता तो हैवानियत भी नहीं टपकती थी । दोस्त तीनों इतने गहरे की काफ़ी का दाग़ उतना गहरा ना हो ।

बंद घरों में भूत होने की कहानियाँ बनाने-सुनाने की उम्र पार हो गयी थी । फ़िल्मी गानों को सुनकर तीनों को लगता था कि कन्या नामक एंटिटी का जीवन में प्रवेश ज़रूरी है पर ऐसा कुछ हो नहीं पा रहा था । अव्वल तीनों ब्वायज़ स्कूल में पढ़ते , दूसरा कॉलोनी  के अवेलेबल संसाधन इन्हें घर की मुर्ग़ी दाल बराबर लगते थे, तीसरा इन उपलब्ध पॉसिबल प्रॉस्पेक्ट में से काफ़ी ने इन्हें राखी के बंधन में बाँध लिया था । साथ ही दूसरे मोहल्ले और कॉलोनी के लड़कों से इनकी सुरक्षा का अनकहा ज़िम्मा भी इनके मज़बूत कंधों पर दे दिया गया था या इन्होंने ले रखा था । अब चूँकि इस तरह के ज़िम्मेदार अन्य मोहल्ले और कॉलोनी में भी  थे इसलिए और कहीं जहाँ भी इन्होंने दाल का कुकर चढ़ाया कोई ना  कोई सीटी निकाल भागा । 

दिल दुखता पर टूटता नहीं । किसी रोज़ विविध भारती पर गुलज़ार का गाना सुन लिया था , बस उस दिन से तीनो छत पर शाम को अक्सर यही गुनगुनाते पाए जाते :



सारी उम्मीद उन लटकते तालों पर थी अब ....


( दास्ताँ शुरू होना बाक़ी है ... )

— देवांशु 

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

चलो थोड़ा रूमानी हों जाएँ…


“टिंग टोंग"….दरवाज़े की  घंटी बजी…वो दौड़ती हुई अपने कमरे से निकली…और भाग के दरवाज़ा खोला..बाहर वो खड़ा था…
“तुम आ गए हो नूर आ गया है"…स्वागत कुछ शायराना हो गया
“चलो फिर तीनो बैठ के पिक्चर देखते हैं" …वो बोला …
“पी जे…और तुमसे कोई क्या एक्सपेक्ट कर सकता है" ..उसने चिढते हुए कहा…
“अंदर आने को नहीं बोलोगी'…
“अगर नहीं कहूँगी तों क्या नहीं आओगे"…
“शायद नहीं"
“तो फिर मत आओ"
“कौन है बेटा" अंदर से उसके पापा की आवाज़ आयी …
“कोई है जो आया तो है…पर आना नहीं चाहता"…
****
“कभी-कभी लगता है कि ये जो जिंदगी है ना, किसी कंपनी के नोटिस पीरिअड  की तरह होती  है…पैदा होते ही आप रिजाइन कर देते हो और सिर्फ रिलीज़ डेट का वेट करते रहते हो..अंतर है तो बस इतना कि कंपनी का नोटिस पीरिअड खत्म होने के बाद दूसरी कंपनी में जाते हैं और जिंदगी के बाद पाता नहीं कहाँ…कुछ लोग होते हैं तो इसे एन्जॉय करते हैं..और बाकी बस परेशान होते रहते हैं…."
***
राजेश की  जिंदगी में कुछ नया बहुत कम हो रहा था आजकल…जोइनिंग का वेट बहुत खराब होता है…जान निकाल लेता है…पिता सरकारी ऑफिस में बाबू..माँ एक गृहिणी..अकेली संतान…
शहर पहाड़ों का था और बहुत बड़ा नहीं था | राजेश को पेंटिंग का काफी शौक था …अकसर चला जाता था वादियों में कुछ बनाने, खुश रहता था…
एक दिन कहीं से घूम के लौट रहा था, हाथ में कुछ पोस्टर थे | सामने से किसी ने उसे जोर की  टक्कर मारी…वो गिरते गिरते बचा…वो पलट के कुछ बोलता इससे पहले ही किसी लडकी  की आवाज़  आयी…”देख के नहीं चल सकते"
और वो देखता रह गया…खुले बाल, सुन्दर चेहरा, नशीली आँखें, और होठों के पास एक छोटा सा तिल…
वो कुछ भी नहीं बोल सका..लडकी के हाथ में कुछ बुक्स थीं…वो गिर पडी थीं उसने उन्हें संभाला…और  वहाँ से चली गयी….
dream
राजेश को अभी भी होश नहीं आ पाया था…वो एक  टक उसे देखता रहा फिर आगे बढ़ने लगा…अचानक उसे ज़मीन पे पड़ा एक कागज दिखा…जो शायद उस लडकी की किताबों से गिरा था…उसने उसे उठा लिया..पर पढ़ पाने की  हिम्मत नहीं थी…उसे सब घूर घूर के देख रहे थे….वो घर की  ओर चल दिया…..
****
“मां मेरी जोइनिंग आ गयी है….५ अगस्त बंगलोर….” उसने घर में घुसते ही बोला…
“चल बढ़िया है..चाय बनाऊं??”…
“नहीं पापा को आ जाने दो..साथ में पियेंगे…”
“ठीक है …मैं पड़ोस में जा रही हूँ ज़रा …”
“ठीक है…”
वो भागते हुए अपने कमरे में पहुंचा…पिछले कई दिनों से बड़ा परेशान सा था…कई बार उस कागज के टुकड़े को पढ़ चुका था…पर कुछ समझ नहीं पाया था…वो सुईसाइड नोट था…जिसमे आज से ४ दिन पहले किसी ने मरने की  बात कही थी…उसने पुलिस को भी बता दिया था…
कुछ दूरी पर एक आदमी ने कूद के जान देने कि कोशिश की थी पर उसे बचा लिया गया था…और ये कागज तो लडकी के पास से मिला था और उसी ने मरने कि बात भी बोली थी शायद …तो ये लैटर  उस आदमी का नहीं था…
वो अक्सर उस सड़क से बार बार गुज़रा पर वो लडकी उसे दुबारा नहीं दिखी…
उसने एक बार फिर कागज पढना शुरू किया…
डिअर पापा एंड ममा,
मुझे आप लोगो से कोई शिकायत नहीं है…पर मुझे लगता है कि मै इस दुनिया पे बोझ सी हूँ…आप लोग मुझे डॉक्टर बनाना चाहते थे..मै बन ना सकी..यकीन मानिये मैंने कोशिश की थी…पर नहीं बन सकी…जीना बेकार सा लगने लगा है…मै मरना चाहती हूँ….और वही करने जा रही हूँ…
                                                                                         स्वीटी.
****
राजेश ने अपनी कम्पनी से रिजाइन कर दिया था…पूरे पांच साल से तो था यहाँ…कहीं और काम करने का मन कर रहा था…
अपने ऑफिस की पेडस्टल को वो खाली करने लगा…जब से इस कंपनी में है इसी डेस्क पे वो बैठता आया है…पता नहीं कब कब के कागज निकल रहे थे…कुछ पुराने रीमबर्समेंट के पेपर, कुछ मेंडेट्री पर बेकाम के सर्टीफिकेशन, कुछ बोरिंग काल्स को सुनते सुनते बनाये गए टेढ़े मेढे से स्केच….कुछ कागज जिनमे “राजेश” ३०-४० बार अलग अलग तरीके से लिखा है…
वो एक एक कर उनको पढता और फिर फाड़ के डस्टबिन में डालता जाता…तभी उसके हाथ वो चिट्ठी लग गयी…वो इसे अक्सर पढता था….स्वीटी नाम  की जितनी भी लडकियां उसे फेसबुक या ऑरकुट पे मिली थी सबको फ्रेंड रेकुएस्ट भेज चुका था…कुछ का जवाब भी आ गया था…कहीं वो उनमे से एक तो नहीं जिनका जवाब नहीं आया था….
उसने वो कागज अपने बैग में रख लिया….
****
“मिस्टर राजेश यू हैव बीन सेलेक्टेड बाई अवर टेक पैनल"….बाहर वेट करते हुए बैठे राजेश से एक आदमी ने बोला…
“देन व्हाट इज द नेक्स्ट प्रोसेस" राजेश ने पूंछा |
“अवर एच आर जेनेर्लिस्ट विल टॉक टू यू"….और उसने उसे दूसरी तरफ जाने का इशारा किया…
इस समय वो एक बरामदेनुमा एक कमरे में था…चारों ओर पारदर्शी कमरे थे…एक कमरे में एक लडकी बैठी हुई थी…चेहरा उसका बालों से ढका हुआ था…हलके नीले रंग की साड़ी…कुछ लिख रही थी…
“ये सारी खूबसूरत लडकियां एच आर में कहाँ से आ जाती हैं" उसने मन ही मन सोचा…
करीब १० मिनट बाद वो बाहर आयी…
“मिस्टर राजेश" कहते हुए उसने सर घुमाया…राजेश के पैर के नीचे से ज़मीन खिसक गयी…वही चेहरा…मन में आया बोल दे “स्वीटी????”
“अनु हेअर..लेट्स  हैव अवर डिस्कसन " वो हाथ मिलाते हुए बोली…वो ठिठक कर रुक गया ..उससे हाथ बड़ी मुश्किल से मिलाया गया…वो उसके पीछे पीछे चल दिया…
बातचीत कुछ आधे घंटे चली….चलते चलते आखिरी सवाल पूंछा उसने “ सो मिस्टर राजेश यू बिलोंग्स टू व्हिच सिटी?”..
“अल्मोड़ा"
“कूल…आई हैव बीन  देअर..नाईस प्लेस"…
उसका मन और पक्का हो गया .. मन किया पूंछ ही ले….पर पता नही क्यूँ वो फिर रुक गया…
“यू कैन वेट आउटसाइड…मीनव्हाइल आई विल शेयर माय फीडबैक एंड देन यू कैन गो फॉर नेक्स्ट राउंड”
उसे कुछ सुनायी नहीं दे रहा था…वो बाहर जाकर बैठ तो गया पर वो उसे ही देखता रहा…और कोई दूसरा कैंडिडेट नहीं था…वो उसे लगातार घूरे जा रहा था..थोड़ी देर बाद वो बाहर आयी|
“लगता है थोड़ा टाइम लगेगा…वान्ना हैव ए कप ऑफ कॉफी ?” उसने बोला…
“श्योर" राजेश में मुह से अचानक निकल गया…
****
“अच्छी जगह है ना जहाँ तुम्हारा घर है" …अनु बोली…
“हाँ" वो उसे बस घूरे जा रहा था…
“कुछ साल पहले वहाँ गयी थी…पहाड़ियां मुझे अच्छी लगती हैं…”
“हर किसी को लगती हैं…कुछ को लाइफ दिखती है…कुछ वहाँ से मरने की कोशिश करते हैं" ये उसकी एक और कोशिश थी कुछ और पता करने की…
"हाँ यार…इन्फैक्ट मैंने मरने का प्लान बना लिया था"….वो बोली…
अब उसके दिमाग में कोई कन्फ्यूजन नहीं रहा…
“स्वीटी" उसके मुह से निकल गया…
“तुम कैसे जानते हो ये नाम?”
उसने अपना बैग खोला और वो लैटर उसके सामने रख दिया…
****
मिलने की जगह एक कॉफी हॉउस तय हुई थी…दोनों लगभग एक टाइम पे ही पहुंचे थे…बातें शुरू हुईं…
“पता है मैं इतने सालों ये सोंचती रही कि शायद वो लैटर मोम डैड को मिल गया था..पर जब मै वापस आ गयी तो वो कुछ बोले नहीं"
“बस केवल ज़रा सी बात पे तुम मरना क्यूँ चाहती थी"
“पता नहीं यार..बस ऐसे ही"
“फिर इरादा क्यूँ बदल दिया?”
“मैं मरने गयी थी…एक पहाड़ी पे बैठी …वहाँ एक आदमी आया…उसे पैसों का बहुत नुक्सान हुआ था …सड़क पर आ गया था…वो भी मरने आया था…ये सब बताते ही वो वहाँ से कूद गया…पर वो एक पेड़ मे फंस गया ..वहाँ कुछ और लोग भी थे…जिनकी मदद से उसे निकाला…थोड़ी देर में उसके घर वाले वहाँ आ गए…वो रो रहे थे…मुझे अपने मोम डैड का ख्याल आ गया…मै वहाँ से भाग के होटल पहुंची…देखा तो वो लोग मेरा ही वेट कर रहे थे…मेरे से कुछ कहा नहीं गया…”
“तुम्हे क्या लगता है कि अगर उन्हें वो लैटर मिल गया होता तो वो तुम्हे ढूँढते नहीं"
“पता नहीं यार…मैंने बहुत ढूँढा पर लैटर मुझे मिला नहीं…तो मैंने भी जिक्र नहीं किया…”
“और अब बताया उन्हें??"
“हाँ कल बताया …तुम्हारे बारे में भी बताया…तुमसे मिलना चाहते हैं"
“क्यूँ"
और वो मुस्कुरा दी…
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“टिंग टोंग"….दरवाज़े की  घंटी बजी…वो दौड़ती हुई अपने कमरे से निकली…और भाग के दरवाज़ा खोला..बाहर वो खड़ा था…
“तुम आ गए हो नूर आ गया है"…स्वागत शायराना हो गया
“चलो फिर तीनो बैठ के पिक्चर देखते हैं" …वो बोला …
“पी जे…और तुमसे कोई क्या एक्सपेक्ट कर सकता है" ..उसने चिढते हुए कहा…
“अंदर आने को नहीं बोलोगी'…
“अगर नहीं कहूँगी तों क्या नहीं आओगे"…
“शायद नहीं"
“तो फिर मत आओ"
“कौन है बेटा" अंदर से उसके पापा की आवाज़ आयी …
“कोई है जो आया तो है…पर आना नहीं चाहता"…
“अंकल नमस्ते” कहता हुआ राजेश सोफे पे बैठ गया …
“आओ बेटा" किचन से निकलती हुई स्वीटी  की माँ ने बोला…
“सुना तुमने पुलिस को भी खबर कर दी थी" बैठते हुए स्वीटी के पापा बोले…
“हाँ ..थोड़ा डर गया था…पर जब अगले १०-१५ दिन तक कोई खबर नहीं मिली ऐसी तो मेरे को लगा या तो मै वाकई इसे बचा नहीं सकता हूँ या सुईसाइड का आईडिया ड्रॉप हो गया है"
सब हँस ही रहे थे  इस बीच वो अंदर से तैयार होकर आ गयी…
“पापा हम लोग थोड़ा बाहर घूम के आयें"…उसने बताया
****
“शादी क्यूँ नहीं की"…..स्वीटी ने पूंछा…
“पता नहीं…कभी कोई मिली नहीं शायद "…राजेश ने जवाब दिया….
“और तुमने….” राजेश ने भी पूंछ दिया…
“सेम हेअर"….और वो हंस दी
“तुम कितना कम बोलते हो ना?” अगला सवाल…
“सुना है जिनके होठों के पास तिल होता  है वो कुछ ज्यादा ही बोलते हैं…” उसने घूम के उसकी तरफ देखा…
“बोलते हैं…बहुत बोलते हैं…पर दिल में कुछ नहीं रखते"….और वो दूसरी तरफ देखने लगी…
कुछ देर का सन्नाटा हुआ….जैसे दोनों अलग अलग दुनिया में हों….
“विल यू मैरी मी" राजेश ने पता नहीं क्यूँ पूंछ लिया और आँखें बंद कर ली….
“आई थिंक पहले आई लव यू बोला जा सकता था” स्वीटी का जवाब आया और दोनों काफी देर तक हँसते रहे….
राजेश कि जिंदगी और नोटिस पीरिअड दोनों रंगीन हो गए….और स्वीटी ने भी रिलीज़ डेट मांगने से मना कर दिया…..
--देवांशु