सोमवार, 26 मार्च 2012

आलू कोई मसाला नहीं होता….

पिछले दिनों हम बीमार पड़े…अरे हाँ वाकई में बीमार पड़े, एक दम धाँसू टाइप बीमार | पूरा बदन भट्टी की तरह गरमा गया | खुद ही आइडिया लगा लिए कि १०४ से कम क्या होगा | वैसे १०४ का आंकड़ा है बड़ा “ज़बर”| सुनते ही लोगो की “खटिया खड़ी और बिस्तरा गुल हो जाता है” |

बचपन में बीमार पड़ना बड़ा सुकून भरा होता था | ना सुबह उठके कोई नहाने को कहता, ना स्कूल जाने का बवाल , ना पढ़ने का टेंशन | कोई लफड़ा-लोचा ही नहीं लाइफ में | मम्मी देखभाल भी एकदम बढ़िया करती, छोटे भाई-बहन से भी दवाई का बहाना बना के चाय-पानी मंगाते रहते!!!!पर अब ज़माना बदल गया है | मम्मी-पापा इंडिया में है| उनको तो बता भी नहीं सकते, बता दो तो माता श्री घबड़ा जाती हैं, उन्ही को बुखार आ जाये ऐसी हालत में तो  |

हाँ तो बीमार पड़े, किसी से कुछ ना बोले | चुप-चाप चादर ताने सोते रहे | २-४ दोस्तों का फोन-फान आया उन्हें भी बता दिए “थोड़ा वीक फील कर रहे हैं बाद में कालियाते हैं" |

रूम-मेट्स ताड़ गए कि हम बीमारी का  बहाना बनाकर  लंबा सोने के चक्कर में हैं, फटाफट धाँसू सा सूप बना के गटकवा दिया, हालत थोड़ी दुरुस्त हुई | नींद बढ़िया आयी | 2011-12-09 20.12.47शाम को “आशीष” अपनी  धर्म-पत्नी के साथ  आये| साथ में नीम्बू की शिकंजी भी एक नयी “बोतल" में बैठ के आ गयी | शिकंजी निपटा डाली | ताश भी खेला | “नयी बोतल" हमने बड़े “एहसान" के साथ अपने पास रख ली | तबियत हो गयी “टनाटन” |  और निष्कर्ष ये निकला “पहले ताश खेल लेते तो दिनभर बीमार रहने से तो बच जाते” |

खैर कोई नहीं | रात हुई | बीमारी से उठते ही  हम किचेन में जा धमके | रूम-मेट्स खाना बना रहे थे और मसाले के साथ आलू भून रहे थे | मन में एक आइडिया आया कि आलू कोई मसाला तो नहीं होता| फिर इसे काहे मसाले में मिक्स किया जाये |

हम किचेन से भाग के अपनी डायरी उठा लिए | इतनी धाँसू लाइन मिलते ही एक “कालजयी" कविता लिखने की शुरुआत कर दी | और जैसा कि आपको पता ही है कि हम सारी पोस्ट बेकार में लिखते हैं | एक मात्र उद्देश्य होता है कि लोगो का खून  पिया जाये, तो हम ये अपनी कविता भी आपको पढने पर मजबूर कर रहे हैं| कविता के बोल वही हैं, “मटर एक सब्जी होती है , आलू कोई मसाला नहीं होता" | (मटर हमारी पसंदीदा है , हर सब्जी में घुसेड़ देने का स्कोप देखते रहते हैं, कविता में भी मौका देख के घुसेड़ दे रहे हैं, आखिर स्वाद का मामला है) .. हाँ तो सुनिए “कालजयी" कविता… और कविता कि हर लाइन का एक उद्देश्य भी है वो भी बताये बिना हम नहीं मानेंगे…

सबसे पहले घोटाला-फ़ोटाला के लिए :
क्यूँ गरियाते हो अपनी “करेंट" “गवर्मेंट”को, किस सरकार में घोटाला नहीं होता |
मटर एक सब्जी होती है, आलू कोई मसाला नहीं होता |   (वाह वाह)


शोपिंग मॉल की शौपिंग से परेशान पति-देव की करुण आवाज़ में:
क्यूँ जाती हो लुटने शोपिंग मॉल में , पैसे बचाने में कोई गड़बड़-झाला नहीं होता|
मटर एक सब्जी होती है, आलू कोई मसाला नहीं होता | (फिर से वाह वाह)


और जो लोग कोई काम करने से पहले बहुत सोचते हैं, कि सही क्या है गलत क्या , उनके लिए:
फूंको कम, कदम रखो ज्यादा, छुपा हुआ हर कहीं गहरा नाला नहीं होता|
मटर एक सब्जी होती है, आलू कोई मसाला नहीं होता | (वाह वाह वाह वाह)



और जो लोग इस बात से खुश हैं कि मेरे यहाँ बिल ना भरने कि वजह से बत्ती गुल है |  बिजली की कटौती हुई तो हम सब बराबर होंगे, उनके लिए :
खुश मत हो कि मेरे यहाँ बत्ती गुल है,  बिन ढिबरी शाम तुम्हारे यहाँ भी उजाला नहीं होता|
मटर एक सब्जी होती है, आलू कोई मसाला नहीं होता | (केवल वाह वाह)


अब एक सटायर:
गरीब कभी कौर को “बाईट” नहीं कहते, अमीरों का कौर कभी “निवाला” नहीं होता|
मटर एक सब्जी होती है, आलू कोई मसाला नहीं होता |  (सटायर कन्फ्यूज है, नो वाह वाह)


सब बोलते हैं दीवाली में आजकल मजा नहीं आता, कारण यहाँ है :
होली जो मनाते खुशी के रंग से , तो दिवाली में किसी का दिवाला नहीं होता |
मटर एक सब्जी होती है, आलू कोई मसाला नहीं होता | (वाह वाह रिटर्न्स)


सारे कवि जो हैं चाँद को प्यार का सूचक मनाते हैं, सूरज को पूंछ ही नहीं रहा:
सूरज को चाहे बिलकुल ना पूंछो, चाँद में बिन उसके उजाला नहीं होता |
मटर एक सब्जी होती है, आलू कोई मसाला नहीं होता | (सुभान-अल्लाह)


और अपनी इसी “कालजयी" कविता के बारे में:
ये कविता पढ़ना माना एक जुर्म है, पर इस जुर्म में किसी का मुंह काला नहीं होता | (डोंट वरी)
मटर एक सब्जी होती है, आलू कोई मसाला नहीं होता | (हाय बस जान ही ले लो अब तो )


****

हाँ तो ये तो थी हमारी “कालजयी” कविता | आप तो बोलोगे नहीं इसीलिए खुद ही वाह वाह कर लिए | कविता को कालजयी नाम देने का आइडिया हमें अपने पसंदीदा लेखक  अनूप शुक्ला जी की एक पोस्ट से आया |  कविता लिखने के बाद हमने अपने २-४ ब्लॉगर दोस्तों को ऑनलाइन पकड़ा और विडियो चैट में उन्हें इसका काव्यपाठ भी सुनाया, अपनी “मधुर" आवाज़ में | नाम ना बताने कि  शर्त  पे उन सबने इस कविता की बहुत तारीफ़ की, और हमें पोस्ट करने के लिए प्रेरित भी किया |

देखा जाये तो लाइन बड़ी मौजू टाइप है “आलू कोई मसाला नहीं होता” , आप भी मेरी तरह कोई एक शानदार कविता लिख सकते हो…हमें ज़रूर सुनाना |
मैंने इस कविता को राग-मल्हार में गाया, लोगों की आँखों से आंसुओं की बारिश हो गयी  | वैसे आप क्या कहते हो की किस राग में इसे गाना चाहिए!!!!
बोलो बोलो टेल टेल….
(फोटो में दिखाए गए पकोड़ो में आलू भी है, इसलिए उसे बे-फालतू ना समझा जाये )
--देवांशु

सोमवार, 12 मार्च 2012

हाँ!!!वही देश, जहाँ गंगा बहा करती थी…


बचपन में देखी थी ये फिल्म, “जिस देश में गंगा बहती है", तब इतना समझ नहीं आया था कुछ | ५-६ साल पहले एक बार और देखी | फिल्म की कहानी तब समझ आयी |

फिल्म का नायक “राजू" एक सीधा, सादा और सच्चा इंसान है| एक दिन डाकू उसे पुलिसवाला समझ के उठा ले गए हैं, पर जल्द ही उन्हें अपनी गलती का पता चलता है | इस बीच राजू अपने व्यवहार से पूरे गिरोह को प्रभावित करता है| और एक दिन बड़े उतार चढाव के बाद पूरा गिरोह आत्मसमर्पण कर देता है पुलिस के सामने|

१९६० में आयी ये फिल्म काफ़ी पसंद की गयी थी| राजकपूर ने अक्सर इस तरह के किरदार किये हैं जिसमे एक आम आदमी की छाप दिखाई देती है | imageफिल्म उनके अभिनय के लिए भी याद की जाती है और संगीत का पक्ष भी कॉफी मजबूत है |

और फिर आती है २०१२ की “पान सिंह तोमर" | जब “जिस देश में गंगा बहती है” प्रदर्शित हुई होगी उस वक्त "पान सिंह” राष्ट्रीय खेलों में प्रतिभाग कर रहा था और नेशनल रिकार्ड बना रहा था |पर उसकी ज़िंदगी भी उस फिल्म के किरदारों के बीच से होकर गुज़री , बस उसका अंत कुछ अलग हुआ | या ये कहें कि उसका अंत वही हुआ जो हो सकता था|

पान सिंह तोमर" फिल्म की पृष्ठभूमि लगभग वही है जो “जिस देश में गंगा बहती है” की है | पर नायकत्व में फर्क है, उसकी परिस्थितियों में फर्क है |  हालाँकि सोचने का तरीका बहुत अलग नहीं है, एक  सा ही है कमोबेश|

राजू सबसे शांति से रहने की बात करता है, पान सिंह वही कोशिश अपनी ज़िंदगी में करता है | पर लाख कोशिश करने के बाद भी  हार जाता है | जिस पुलिस के सामने राजू पूरे गिरोह के हथियार डलवाता है वही पुलिस “पान सिंह"  को हथियार उठाने पर मजबूर कर देती है |

राजू गैंग के सरगना की मदद करता है तो सरगना उसे अपने सर आँखों पर बिठाता है | वहीं दूसरी ओर देश के लिए खेलने वाले “पान सिंह", अपने बेटे पर हुए अत्याचार की रिपोर्ट भी नहीं लिखवा पाता | उसे पहले तो ये साबित करना पड़ता है कि वो खिलाड़ी है, देश के लिए खेला है | और फिर उसके मेडल बहार फेंक दिए जाते हैं|

पान सिंह के दिल में एक वक्त इस देश के लिए मर जाने का जज्बा था, पर एक दिन वो इसी देश के रक्षकों से अपनी रक्षा के लिए गिड़गिड़ाता दिखाई देता है | पर उसकी कोई नहीं सुनता | हार के वो बागी बन जाता है | अपना बदला लेता है| पर सब यहाँ खत्म नहीं हो पाता | कदम कदम पे धोखे मिलते हैं, अपने भी साथ छोड़ते हैं |

पान सिंह वक्त का मारा लगता तो है,  पर है नहीं | उसमे अगर सच्चाई है , सादगी है तो अपने ऊपर उठे हाथ को imageकाटने की ताकत भी | वो एक गाल पे पड़े चांटे का जवाब दूसरा गाल आगे करके देता है पर जब कोई उसके दूसरे गाल पे भी चांटा मारता है तो वो उसको जान से मार देने का माद्दा भी रखता है |

और शायद यही वो मोड़ है जब वो हमारे “सभ्य और सहिष्णु" समाज में बुरा बन जाता है | लोग ये नहीं पूछते कि क्यूँ उसने ५००० मीटर की रेस छोड़ी और क्यूँ बाधा दौड़ में दौड़ा | कितनी आसानी से बात मान ली थी उसने | पर जब एक बार वो बन्दूक उठा लेता है तो हर किसी से अपनी बात बोलने के बाद बोलता है “कहो हाँ"| डर के ही सही पर दुनिया मानती है उसकी बात |

ये दिल का कमल सबसे सुन्दर, मेहनत का फल सबसे मीठा” कहने वाला राजू सबको सदभाव का पाठ पढाता है | पान सिंह उसे समझता भी है शायद | पर उसकी ज़िंदगी “सिनेमा" से इतर हो जाती है| दोनों कथानक एक से होते हुए भी बहुत अलग हैं इसी वजह से |

मैं दोनों फिल्मों कि तुलना नहीं करना चाहता हूँ| राजकपूर या इरफ़ान खान दोनों मंझे हुए अभिनेता है और दोनों मेरे पसंदीदा भी | पर दोनों फिल्मों की अप्रोच मुझे सोचने पर मजबूर करती है | “जिस देश में गंगा बहती है” जहाँ से शुरू होती है , “पान सिंह तोमर" उससे पहले कहीं शुरू हो चुकी होती है| पर “पान सिंह तोमर"  का कोई अंत नहीं है | क्यूंकि वो कोई कहानी नहीं, एक आपबीती है | “पान सिंह" आजादी के बाद हर पल मरता आ रहा है | हाँ रूप रंग बदलता रहता है उसके खत्म होने का | कभी वो ज़हर खा लेता है, कभी उसकी लाश पेड़ से टंगी पायी जाती है , कभी मुठभेड़ में मारा जाता है | कभी कभी वो नहीं भी खत्म होता , पूरी ज़िंदगी अपना ही बोझ ढोता रहता है |

कहते हैं “जिस देश में गंगा बहती है” तत्कालीन प्रधानमत्री जी के आग्रह पे बनाई गयी थी | उस समय डकैतों का कॉफी दखल था आम ज़िंदगी में | ये भी सुना है कि काफ़ी गिरोहों ने हथियार भी डाले थे उस फिल्म को देखकर | पर वो फिल्म या तो हमारे हुकुमरानों ने  देखी नहीं या देख के भी नज़रंदाज़ कर दी | वरना “पान सिंह तोमर" शायद केवल एक अच्छे खिलाड़ी की तरह ही याद किया जाता|

जब तक हम ये नहीं जानेंगे कि हर शख्श हमारी तरह सांस लेता है, उसके सीने में भी दिल धड़कता है | उसे भी दर्द होता है , उसके भी कोई अपने हैं | वो भी सर उठा के जीना चाहता है | उसे भी उसी ऊपर वाले ने बनाया है जिसने हमें बनाया है |तब तक “पान सिंह तोमर" बनते रहेंगे और बार बार आकर वही सवाल खड़ा करते रहेंगे तो “पान सिंह तोमर ” ने किया |

नहीं जानता कि कौन ज्यादा  सही है “राजू" या “पान सिंह तोमर" | पर हाँ पान सिंह से शायद ज़ुल्म सहा नहीं गया | किसी को मारना गुनाह है, पर अपने ऊपर हुए अन्याय को झेलना और चुप रहना उससे भी बड़ा गुनाह | पान सिंह शायद इन्ही दो गुनाहों के बीच दब गया |

--देवांशु

शनिवार, 10 मार्च 2012

चित्रकारी

कलाकारी बहुत ज़रूरी चीज़ है | अब देखो जो कलाकार है वही “भाउक” हो सकता है| इन चलचित्रों पे गौर फरमाएं :

१. दिल चाहता है
२. तारे ज़मीन पर
३. जाने तू या जाने ना
४. धोबी घाट

इन सबमे कलाकारी , बोले तो “चित्रकारी" की महत्ता का विषद वर्णन किया गया है | एक में तीन खुराफाती दोस्तों में सबसे शांत धीर-गंभीर वो था जो पेंटिंग करता था| दूसरी के बारे में तो आप से क्या कहें, उसमे तो हर कोई पेंटिंग करता था| तीसरी में नायिका अपने भाई के बारे में तब तक नहीं जान पाती जब तक वो उसका पेंटिंग से भरा कमरा नहीं देख लेती |  यही हालत चौथी में भी है | मतलब कुल मिलाके पेंटिंग का बोल बाला है हर तरफ | और दीगर बात ये भी है की इन सबमे कहीं ना कहीं आमिर साहब इन्वोल्व्ड हैं|

वैसे उन्होंने चित्रकारी गजनी में भी की थी, पर वहाँ “चित्रकारी" की “कल्पना” अलग थी|  चित्रकार तो मिया मजनू भी थे फिल्म वेलकम में और साथ ही चित्रकार जिनेलिया भी थी फिल्म लाइफ पार्टनर में | वैसे लाइफ पार्टनर में जिनेलिया एक गायिका और लेखिका भी थी| पर यहाँ मुद्दा चित्रकारी का है तो उसी की बात करते हैं|
तो किसी भी टाइप की चित्रकारी करने से इंसान की वैलू बढ़ जाती है | तो हमने भी सोचा क्यूँ ना चित्रकारी पे अपने हाथ आज़माए जाएँ…और पिछले साल नवंबर के महीने में अपने आई टी इंडस्ट्री करियर के ५ साल पूरे होने की खुशी में, इन ५ सालों में हमारी दुःख-दुःख imageकी साथी काफ़ी के मग पे हमने अपनी चित्रकारी का नमूना बना डाला…गौर फरमाएं…

फिर ध्यान आया की ये चित्रकारी का शौक तो हमें बचपन से है| हम इतने होनहार रहे चित्रकारी में की पूंछो मत | मारे डर के चित्रकला की क्लास से भगे रहे | बोले की उद्यान विभाग में हैं, पेड़ों को पानी देना है (ये क्लास ४ या ५ की बात है) टीचर ये नहीं समझ पाए कि ऐसा कौन सा पौधा है जिसे शाम को ठीक तीन बजे पानी देना होता है ? और वो भी रोज, वो आज भी यही कहते होंगे कि लड़का पेड़ पौधों से लगाव रखता है|

चित्रकारी बड़ी फेमस है हमारी, हमारे घर में, हमको छोड़ के सब का हाथ ठीक ठाक है | पापा जी का और भाई का तो सुपर-डुपर एक दम | तो लताड़े भी बहुत गए हैं| ड्राइंग का पेपर हमें दुनिया के सबसे घृणित पेपर्स में से एक लगता था | उसकी एक दम कदर नहीं करते थे | एक दिन ऐसे ही पहुँच गए पेपर देने | सवाल आया “एक अमरुद का चित्र बनायें और उसे उचित रंगों से सजाएँ" | अब हम तो एक पेन्सिल ढंग से ना ले गए थे | बस ये पता था अमरुद गोल होता है और मेरे दोस्त का कड़ा भी गोल है | उससे पेन्सिल भी मांगे और कड़ा भी | बना दिए एक दम गोल गोल , ताज़ा-फ्रेश अमरुद | अब आयी बात उसे “उचित" रंगों से सजाने की तो ये काम हम कैसे कर सकते थे, रंग लाना तो हम ऐसे ही भूल गए थे | बगल में मेरा एक सीनियर बड़े मन से ड्राइंग बना रहा था | उसे हमने बोला कि हमें भी स्केच दे दो हम भूल गए हैं | उसने बोला दे तो देंगे पर वही देंगे जो खाली होगा सब नहीं दे पाएंगे | अंधा क्या चाहे दो आँखें | हमने हामी भर दी | बस सवाल थोड़ा सा बदल के समझना पड़ा “एक अमरुद का चित्र बनायें और उसे उपलब्ध रंगों से सजाएँ"| अब वो पेज तो मेरे पास नहीं है पर यही तो कलाकार की सबसे बड़ी खासियत है कि वो उसे दुबारा भी बना देता है | ये लीजिए हमने अपनी शानदार पेंटिंग फिर बना डाली एम एस पेंट पे…image

रूम से बहार निकल कर जब अपने बैग में संभाल के अपना पेपर रखने लगे तो दिखा मम्मी ने कलर का डिब्बा रख कर दिया था पर हमें इन चीज़ों से कहाँ वास्ता था | खैर घर आये किसी को कुछ नहीं बताये | कुछ दिनों बाद जब घर पे दिखाने के लिए कॉपी मिली तो बड़ा सा क्रोस बना हुआ था | नंबर मिले थे १० में से ० और लिखा था “क्या अमरुद इस रंग का होता है” | बहुत लताड़े गए |  भाई के ड्राइंग में फोड़ू नंबर आते थे | तो और लताड़े गए |

खैर इतना अपमान सहने के बाद बारी आयी पोस्टर बनाने की | विषय मिला “व्यायाम करो" | एक फोटो बनाये , एक लड़का वेट लिफ्टिंग के वेट्स उठाये ऊपर में तन के खड़ा है | बस खुपड़िया बनाने की जगह नहीं बची | हमने “एड्जस्टिंग नेचर” का परिचय देते हुए हलकी सी टेढ़ी बना दी, बाईं तरफ झुकी हुई| स्कूल में टीचर ने और घर में पापा ने फिर हड़काया | “ऐसे गर्दन बनती है?”| अब उन्हें कौन बताये जब वेट ज्यादा हो जाता है तो उसे ऊपर उठाने के लिए गर्दन टेढी करनी ही पड़ती है| खैर वो सब लोग तो नासमझ हैं, एक अकेला मैं ही समझदार हूँ |

ऐसा नहीं है कि मै अकेला इंसान हूँ इस टाइप का, मेरे सबसे जिगरी दोस्त, शुशांत भाई भी चित्रकारी के पारखी हैं | एक बार उनके ड्राइंग में अच्छे नंबर आ गए तो घर वाले दौड़ के गए ये देखने कि ड्राइंग में कैसे आ गए नंबर | हुआ यूँ कि सवाल आया था निम्न में से कोई एक चित्र बनाये | भाई ने उठाया राजहंस | उस ज़माने में पेन्सिल से शेड देने का चस्का सबको चढा हुआ था | उन्होंने भी दे डाला | पर जब कॉपी चेक हुई तो टीचर ने उन्हें पूरे नम्बर दे दिए क्यूंकि दूसरा ऑप्शन कौवा बनाने का था | आजतक वो ये सोच के खुश हैं कि उन्होंने लिखा नहीं था कि ये राजहंस है|

खैर कहानियाँ तो और भी हैं, एक बार हमने एक फूल का फोटो बनाया, उसे उचित रंगों से सजाया और जब वो अनुचित बन गया तो किसी बड़े आर्टिस्ट कि तरह उसपे अपने नाम की जगह अपनी सिस्टर का नाम डाल दिया |

अभी लेटेस्ट एक और चित्रकारी किये हैं, आप भी देखो …image
आपको क्या लगता है कि इस फोटो को मैं अगर कांटेस्ट के लिए भेजूं तो मुझे अर्थशास्त्र का ऑस्कर पुरस्कार मिल सकता है क्या??
(ये लास्ट लाइन का आइडिया हमें अभिषेक बाबू के लव लेटर से आया है )

नमस्ते  !!!!
--देवांशु

मंगलवार, 6 मार्च 2012

अथ श्री “कार” माहत्म्य पार्ट-२


कार की महानता अपरम्पार है, मैंने बताया भी था पहले…आशीष भाई दिल पे ले गए इस बात को| आव देखा ना ताव ला के एक सफ़ेद चमचमाती कार खड़ी कर दी कि “लो बेट्टा, बहुत बोल रहे थे, देखो ला दिए कार, अब बोलो" | हमने माहौल संभाला और बोला “अरे भाई बधाई हो, बहुत बहुत बधाई हो” |

लेकिन वो इतने से नहीं माने और बोले कि “अबे मेरे पास तो कार भी है और उसको चलाने का लाइसेंस भी, तुम्हारे पास क्या है ???” अब क्या जवाब देते हम | “शांत गदाधारी भीम शांत" ये मन ही मन सोच के खुद को शांत किया और बड़े प्यार से लजाते हुए बोले

“यार कार तो मेरे पास भी है,शेयरिंग में है तो क्या हुआ"|

“हाँ तो, का करोगे ऐसी कार का जब चलाना ना आये| और सुनो तब तक अपना मुंह मत दिखाना जब तक हाथ में लाइसेंस ना हो, पता नहीं कहाँ कहाँ से चले आते हैं लोग" ये बोलकर वो चले गए|

मार्केट में अपनी  इतनी बेज्जती कभी नहीं हुई थी | थोड़ी बहुत हुई थी, दैट आई मैनेज्ड | पूरे १५ मिनट इस समस्या पे विचार किया | फिर मोटी चमड़ी ओढ़ के सो गए |

२ घंटे बाद आशीष बाबू का ही फोन आया और बोले:

“घूमने चलोगे”

“कहाँ" हमने सवाल किया |

“जहाँ हम चाहेंगे वहाँ, जिनको कार चलाना नहीं आता वो चुपचाप पीछे बैठे, बेगर्स कांट बी चूज़र्स” हड़काते हुए बोले |

फिर बेज्जती | पिछली बार से ज्यादा | अब ठान लिया कि कुछ भी हो जाये कार “हांकना" सीखना ही है | और लाइसेंस भी लेना है काहे कि जब तक डिग्री ना हो तब तक बिक्री नहीं होती मार्केट में ना  |

****

यहाँ लाइसेंस लेने के लिए पहले एक ठो लिखित परीक्षा पास करनी पड़ती है | वो हम पहले ही पास कर चुके थे | फिर किसी ड्राइविंग स्कूल से कम से कम ६ घंटे का कोर्स करना पड़ता है और उसके बाद लाइसेंस के लिए आप जो है योग्य हो जाते हो| हम भी पहुंचे एक स्कूल में, पहले ही दिन इंस्ट्रक्टर ने बताया :

“देखो, आगे वाली कार से ३ सेकण्ड की दूरी पे रहो, कोई खम्बा या साइन बोर्ड जब वो पार करे तो गिनो १००१, १००२, १००३, १००४ और तब तुम्हारी कार निकलनी चाहिए उस खम्बे या बोर्ड के पास से| अगर इससे कम हो तो स्पीड कम कर लो”

image
मन में आया बोल दूं कि इससे कम होगी तो स्पीड बढ़ा ना लूं, उससे आगे निकल जाऊंगा फिर वो गिनेगा १००१, १००२, १००३ , १००४ | पर बोलने में डर लगा |

इसके बाद एक नयी बात बताई इंस्ट्रक्टर ने
“अगर कार चलाते टाइम कभी नींद आने लगे तो कार की स्पीड कम करो, किसी रेस्ट एरिया में जाओ और थोड़ा सो लो, फिर आगे बढ़ो"
मन में आया क्यूँ ना स्पीड बढ़ा लूं और जल्दी घर पहुँच जाऊं और फिर सो जाऊं आराम से | लेकिन मैंने अपने विचारों को एक बार और  काबू किया |

३ दिन में ६ घंटे की क्लासेस करके और क्लास पूरी तरह से करने का प्रमाण पत्र लेकर हम पहुंचे लाइसेंस लेने | सबने बताया कि एक बार क्लासेस कर लो तो ज्यादातर लाइसेंस बिना टेस्ट दिए मिल जाता है | पर लाइसेंस देने के लिए जो कन्या बैठी हुई थी उसे मेरी भोली सूरत पे तरस आ गया और टेस्ट देने का फरमान जारी कर दिया | जोश में हम भी टेस्ट के लिए रेडी हो गए | पूरे एक घंटे बाद नंबर आया मेरा | और १५ मिनट टेस्ट लेने के बाद परीक्षक ने लाइसेंस देने से मना कर दिया | बोले कि “तुम कार घुमा नहीं पाते ठीक से, कुछ ज्यादा ही वेट करते हो चौराहे पे और सबसे बड़ी बात पूरे रस्ते ओवर स्पीडिंग करते रहे तुम, जाओ फिर से प्रैक्टिस करो” |

मुझे रिजेक्ट होने का उतना दुःख नहीं था जितना मुझे आशीष कि हंसी से लग रहा था जो वो पेट पकड़ पकड़ के हंसने जा रहा था | खैर रोनी सी सूरत बना के पहुंचे हम|

“अरे बड़ा बुरा हुआ यार ये तो , मैंने तो टेस्ट भी नहीं दिया था फिर भी मिल गया था , वैसे सीरत की बात होती है देखो ये तो , मैंने दिया भी होता तो क्लियर हो जाता, कोई नहीं, थोड़ी और मेहनत करो, बेटर लक नेक्स्ट टाइम” अंदाज़ तो उनका हौसला बढ़ाने वाला था पर असलियत तो मैं जानता हूँ|

पूरे १ घंटे और तैयारी की | दुबारा टेस्ट दिया | इस बार परीक्षक का कमेन्ट था “तुमने पूरे रस्ते गाड़ी ५ मील प्रति घंटा धीरे चलायी”| मन किया कि बोलूँ “रुक अभी तेरे को गाड़ी के पीछे बांधता हूँ, फिर दौड़ा दूंगा कार तब बताना कि तेज चल रही है या धीमे,  कभी बोलते हो तेज चलायी, कभी बोलते हो धीमे चलायी, एक बात पे रहो, थाली पर के बैगन कहीं के”

पर ये सब कहना नहीं पड़ा क्यूंकि उसने इस हिदायत के साथ की मैं अपनी स्पीड बरोबर रखूंगा लाइसेंस दे दिया|  भागता हुआ मैं आशीष बाबू के पास पहुंचा|

“पता था मुझे तुम ये कर सकते हो" ये कहकर उन्होंने सारा क्रेडिट खुद रख लिया| खैर अच्छा दोस्त है हमने भी माफ कर दिया |


****

फिर मैंने थोड़ी रिसर्च की कि कितना पैसा फूँक डाला इस लाइसेंस के चक्कर में | हिसाब लगाया तो पता चला कि अपने हिंदुस्तान के १५००० रुपये लगभग लगा दिए |  बड़ा दुःख हुआ | बाद में पता चला कि कंपनी ये पैसे वापस कर देगी अगर क्लेम करो तो | हमने क्लेम किया |  करीबन ५००० रुपये टैक्स कट गया क्लेम के लफड़े में | खुशी हुई कि केवल ५००० गए बाकी तो बचे  | पार्टी देने का मन कर गया |

थोड़ा और सोचा कि अगर मैंने १००० रुपये सुविधा शुल्क के दिए होते तो घर बैठे लाइसेंस मिल जाता अपने मुल्क में | खर्चा भी कम , आराम भी ज्यादा | तभी मैं स्ट्रोंग लोकपाल बिल के अगेंस्ट हूँ|

****

खैर ये सब बात निपटी, लफड़ा लोचा निपटा | लाइसेंस भी आ गया | कार भी हांकने लगे | आशीष भाई का भी शुक्रिया किया हमने कि उन्होंने हमें ये सब करने के लिए प्रेरित किया | वो वाकई में बड़े खुश हुए| 

हमारे एक और दोस्त हैं, उनको लेकर हम लोग घूमने निकले, "कार" से | पूरे दिन घूमने के बाद उन्होंने हमारी ड्राइविंग स्किल पे अपना फीडबैक दे मारा:

“यार तुम चलाते तो बढ़िया हो पर अभी वो बात नहीं आयी, टर्निंग पे स्पीड ज्यादा होती है, ब्रेक प्रोपर नहीं लगाते, साथ बैठने में अभी थोड़ा डर लगता है, थोड़ी और मेहनत करो"

आशीष भाई को इसका तोड़ पता था तुरंत उनसे बोले “अरे तुम्हारा लाइसेंस आ गया??"

बुरी तरह झेंपते हुए उन्होंने बोला “कहाँ यार, जाना है, ड्राइविंग में कॉन्फिडेंस नहीं आ रहा अभी"

इसके बाद मैं चाह के भी नहीं हंस पाया|
--देवांशु

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

बस एक दिन….

              ( इस कहानी के सभी पात्र कमीने और घटनाएँ सच्ची हैं)
सीन-१

( १९ अप्रैल २००६, शाम का वक्त, मैं अपने रूममेट आशीष के साथ एक डिस्कशन में)
मैं : कल आखिरी दिन है यार कॉलेज का, कुछ करना चाहिए…
आशीष (आँखों में एक चमक आयी उनकी) : कल हंगामा काटते हैं, सब लोग एक सा रंग पहनते हैं, ड्रेस कोड..क्या कहते हो ?
मैं : डन, नीला रंग रखें?
आशीष : कूल, पक्का , लाओ अपना फोन दो सबको मेसेज करते हैं|
मैं: मेरा क्यूँ? तुम अपने से करो मैं अपने से करता हूँ|
आशीष : अबे तुम्हारे सेल से करेंगे तो वजन बढ़ जायेगा, पढ़ाकू इमेज है तुम्हारी | एक बार मेसेज मार्केट में आ गया तो अपने आप फॉरवर्ड होगा | वैसे भी तुम्हारे १५०० में १००० तो बेकार ही जाते हैं |

और इसके बाद एक बड़ा “सेंटी" सा मेसेज लिखा गया कि “कल हमारा आखिरी दिन है कॉलेज का , बहुत बढ़िया गुजरे पिछले ४ साल, कल सेलिब्रेट करते हैं , सब लोग नीले रंग में कॉलेज आओ |” मेसेज को १५-२० लोगो में फॉरवर्ड कर दिया हम तीनों ने क्यूंकि तब तक कौशिक बाबू भी डिसकशन का हिस्सा बन गए थे|

हमें लगा कि कुछ लोगो तक जायेगा मेसेज , वैसे भी रात  हो रही है क्या पता किसी तक ना भी पहुंचे| जो लोग अपने अपने घरों में रहते हैं वो तो बिलकुल नहीं जान पाएंगे | पर जो भी हो हम तो नीले रंग में ही जायेंगे |

पर होता वही है जो सोचा ना हो, हमारा लिखा-भेजा मेसेज हमारे पास ही घूम घूम के आने लगा | मुझे अब भी याद है कि आखिरी मेसेज कुछ रात में २ बजे आया था | हट (जो कोलेज का नोटिस बोर्ड थी) वहाँ भी हलचल मच गयी |  पर डाउट अभी भी था कि कितने आयेंगे ड्रेस कोड में, कई सारे छोटे छोटे ग्रुप थे हमारी क्लास में, कहीं कोई ये ना बोल दे कि नीले के अलावा कोई भी रंग पहनो”|

****
सीन २
 
( २० अप्रैल २००६, सुबह का समय, कोई ८ बजे होंगे , हमारे चौथे रूममेट जो हमारे साथ रहते नहीं थे पर पाए हमेशा जाते थे “मानस" ने घर में इंटर किया )

मानस (अपने दायें हाथ कि उंगली को नाक पे रखने के बाद उसे अपनी ही दायीं आँख के सामने से ऊपर ले जाते हुए ) : यार के डी (कौशिक दास), कोई नीली शर्ट हो तो दो यार, आज तो नीला ही पहनेंगे | हम सब चौंक गए दुनिया में मानस ही ऐसा बन्दा लगता था जो किसी भी बात पे सेंटी नहीं हो सकता और वही इतना तैयार था आज के लिए |

खैर उनको शर्ट दी गयी | फिर हम सब चल दिए कॉलेज | यकीन नहीं हो रहा था , जो भी हमें हमारी क्लास का मिला , सबने नीली ड्रेस पहन रखी थी | माहौल ही नीला हो गया | क्लास में हर कोई नीले रंग में|

तभी इंट्री हुई हमारे बड़े मालिक, अर्पित निगम कानपूर वाले, की | जनाब हमारे काफी अच्छे दोस्तों में शुमार हैं | लाल उनका पसंदीदा रंग है | डार्क लाल रंग की शर्ट में दाखिल हुए क्लास में | बहाना “यार मुझे लाल ड्रेस पहनने का मेसेज आया था" | फिर नजर उनकी गयी खुद उनके रूममेट राजीव पे जिन्होंने नीला पहना हुआ था | “मर्जी है , लाल पहन लिया तो पहन लिया” मालिक ने बोला | ये उनका पहला कारनामा नहीं था | ४ साल से वो ऐसी हरकतें हर हफ्ते बिना नागा करते ही रहते थे |

क्लास शुरू हुई , टीचर भी आये और साथ में पीछे से एक आवाज़ , “अब आखिरी दिन भी पढेंगे क्या???” | मैं खड़ा हुआ और टीचर से बोल दिया “भाई माफ करो बहुत तुमने पढ़ा लिया चार साल अब बस , आज का दिन हमारा” (हाँ हाँ मुझे याद है मैं ही था)

बस उसके बाद रोल नंबर का पहली बार पालन हुआ , सब एक एक करके आते गए , अपने बारे में बताते गए , मैं एंकर का काम कर रहा था , तो कुछ लोगो को मेरी तारीफ़ भी करनी पड़ी | कुछ अंग्रेजी में बोले , कुछ हिन्दी में | कुछ ने पहले दिन की बात की तो कुछ ने आने वाली लाइफ की | फोटो का सिलसिला चल रहा था बदस्तूर |
Photu(205)

पूरे कॉलेज में धमा चौकड़ी मचाई | हुल्लड़ काटा |  लाइब्रेरी में जाके fire extinguisher उखाड़ डाला | हल्ला मचाया | एच ओ डी से डांट भी खाई |  कैंटीन भी गए, भूचाल आ गया वहाँ पे | लोग डरे हुए थे कि हुआ क्या है? पर जोश कम नहीं हो रहा था | मैदान पे गए गो़ल पोस्ट पे लटक गए | 

धीरे धीरे शाम हुई , पूरा दिन ज़बरदस्त बीता |  शाम को फोटो कलेक्ट किये गए | ऑरकुट कम्युनिटीज़ पे जाके बहुत पोस्ट किये गए | और पढाई शुरू हो गयी , एग्ज़ाम आ गए थे सर पे |

*****
सीन ३

जून २००६ की कोई दोपहर, केतन , मेरे भाई के सबसे अज़ीज़ दोस्तों में से एक ,  उसी के घर में हम सब बैठे हुए थे , मैं अपनी ज्वाइनिंग का वेट कर रहा था उन दिनों | केतन बहुत खुराफाती किस्म के इंसान हैं, पता नहीं क्या क्या धाँसू टाइप बना के रखे थे अपने कंप्यूटर पे |  वहीं मनिपाल मेडिकल इंस्टिट्यूट का एड देखा , जिसमे समर ऑफ सिक्सटी नाइन का हिंदी वर्जन मिला | गाना सुनते सुनते पूरा कॉलेज नहीं , बस वही एक दिन याद आया | तय किया कि कल उसका एक विडियो बना डालूँगा | अगले दिन केतन की हेल्प से पूरे २ घंटे से कुछ ज्यादा टाइम में बन गया विडियो , और सेव हो गया सी डी में |

****
सीन ४

२९  जनवरी २०१२, मैं सुबह सोकर उठा और तुरंत फेसबुक पहुंचा , बड़े मालिक का मेसेज पड़ा हुआ था , “वो विडियो मेल कर दो कॉलेज वाला" | सोचा केवल मालिक को क्यूँ सभी से शेयर किया जाए | कर दिया | उसके बाद तो बस मजा आ गया, काफ़ी पुराने दोस्त उस विडियो से वापस कनेक्ट हो गए | 

सबसे इंटरेस्टिंग कमेन्ट आया डीके (देवेन्द्र कुमार) का , उनका कहना था कि ये मैंने उनसे कभी शेयर क्यूँ नहीं किया | दरसल डीके और मैं एग्ज़ाम में आगे पीछे बैठते थे , रोल नंबर के साथी | पर कॉलेज के बाद हम दोनों कुल ३-४ बार मिले और ज्यादा बात भी फोन पे या ऑरकुट पे और अब फेसबुक पे होती है | यकीन नहीं होता ४ साल के सबसे अच्छे दोस्तों में था और ६ साल कॉलेज खतम होने को आये पूरे ६ बार भी नहीं मिले| कोई नहीं डी के “दिज़” वन “इज” ओनली फार यू बडी | हम सबके प्यारे “टाम क्रूज”…..


और जाते जाते …..

बड़ी सेल्फ ओब्सेस्ड टाइप की पोस्ट लिख मारी है, ठीक अपने चारों तरफ| दरसल उस एक दिन हम सब अपने हीरो थे , जो कुछ घट रहा था , हमारे चारों ओर घट रहा था, कोई और भी लिखेगा तो यूँ ही लिखेगा  | यकीन नहीं होता ६ साल लगभग गुजर गए हैं | बहुतों की शादी हो गयी, कुछ की होने वाली है , कुछ वेटिंग में हैं |
“कुछ कॉलेज के बाद कभी नहीं मिले, कुछ कई बार मिले, कुछ ज़िंदगी के साथ चल रहे हैं और कुछ के बिना ज़िंदगी अधूरी है |”
खुद की लिखी कुछ पंक्तियाँ भी छाप दूंगा (अजी ऐसा मौका फिर कहाँ मिलेगा)
कल का सूरज अपना होगा,
पूरा हर आँखों का सपना होगा,
हर कोई याद करेगा कल,
ये तेरे पल, ये मेरे पल ||

ज़िंदगी के ये पल,
हमें मिले थे कल,
अब यादें रहेंगी बस इनकी,
ये तेरे पल, ये मेरे पल ||

(ये कविता मैंने उसी दिन के लिए लिखी थी, अपनी टर्न आने पे पढ़ी भी थी, मेरी वो नोटबुक खो गयी जिसमे ये मैंने लिखी थी, कल विडियो देख के इतनी याद आ गयी फिर से)
दोस्त कमीने ही होते हैं | कभी हम कमीने निकलते हैं कभी वो कमीने | पर किसी ने सही कहा है रौनक भी इन्ही से होती है…. Missing all of you….
-- देवांशु

शनिवार, 21 जनवरी 2012

अथ श्री "कार" महात्म्य!!!

जैसे बिना इज्ज़त, बे-इज्ज़त, बिना गैरत, बे-गैरत, वैसे ही बिना कार, इंसान बे-कार | एक  बड़े पहुंचे हुए कवि हुए हैं , काका हाथरसी, उन्होंने बड़े पते की बात बताई है:
काका दाढ़ी राखिये, बिनु दाढ़ी सब सून|
ज्यों मंसूरी के बिना, व्यर्थ देहरादून|
व्यर्थ देहरादून, इसी से नर की शोभा,
इसी को रख के प्रगति कर गए संत विनोबा|
कह काका जैसे नारी सोहे साड़ी से,
उसी भांति नर कि शोभा होती दाढ़ी से …

काका पुराने ख्यालों के थे, यू नो दीज ओल्ड फैशन्ड पीपल | पर आज का जमाना नया है | आज दाढ़ी-वाढी कुछ नहीं, कार से शोभा बढ़ती है | जित्ती बड़ी कार उत्ती बड़ी हैसियत | नैनो होने पे आपकी हैसियत भी नैनो  (10−9) हो जाती है |  आजकल तो स्कूटर वाले भी कार बना रहे हैं, हमारा बजाज का ज़माना गया !!!!

कार खरीदने के साथ-साथ उसे चलाना आना बहुत ज़रूरी है| कार चलाने के लिए लाइसेंस लेना होता है | लाइसेंस लेना बड़ी मेहनत का काम है | और मेहनत से बचने के लिए कार होती है |

कार कुछ लोगो का चुनाव निशान भी होती है | इसीलिए लोग कार को कवर पहना के रखते हैं | कुछ विद्वानों का मानना है कि मूर्तियों को ढकने का “आइडिया" , पार्किंग में ढक के रखी कार देख के आया होगा| “कार" से देश को चलाने वाले बड़े बड़े फैसले लिए जाते हैं |

कार पेट्रोल से भी चलती है और डीज़ल से भी | कोई भेदभाव, मनमुटाव नहीं | इस तरह हर किसी का तेल चूस लेने के कारण कार सामाजिक समरसता का प्रतीक है |

कार, दहेज जैसी कुप्रथा की विनाशक भी है | दहेज लेना सामाजिक बुराई है, इसको खतम करने का काम कोई नहीं कर पाया, बड़े-बड़े तोपची भी नहीं, कार ने झट कर दिया | आजकल लोग दहेज नहीं लेते, कार लेते हैं |

कार कई रंगों में आती है, लाल, नीली, हरी, पीली, काली, सफ़ेद | महंगाई और आर्थिक मंदी के चलते लोगो की  जिंदगी में जो रंग बरकरार हैं, वो कार के चलते ही तो हैं | तभी तो ३० रुपये किलो आटा महंगा है, १ लाख की कार सस्ती | और जी क्या रंग लोगे आप लाइफ में |

कार से लोग पहचाने भी जाते हैं | “एम्बेसडर" नेता जी की सवारी है | दिखते ही दिल से सम्मान जाग जाता है | “मारुती ओमनी" किडनैपर्स की पसंदीदा है |

“कार एक खोज" के मिशन पे आजकल हमारे आशीष भाई भी निकले हुए हैं | उनका कहना है कि नौकरी और छोकरी से ज्यादा मुश्किल है कार ढूँढना | बात दरसल ये है कि यहाँ पे कार की हिस्ट्री वैसे ही ट्रैक होती है जैसे अपने यहाँ कैरेक्टर की | ज़माना एक दम उल्टा है, अपने यहाँ कैरेक्टर का एक्सीडेंट नहीं पचता, यहाँ कार का | बड़ी दुविधा है कार भी बचाओ कैरेक्टर भी |

कार दो प्र”कार” की होती हैं: सस्ती कार और महंगी कार |  इनके बीच का जो अंतर है वो बैंक बैलेंस से डिसाइड होता है | कोई कार किसी के लिए सस्ती होती है तो वही कार किसी के लिए महंगी | कार का सस्ता या महंगा लगना आपके स्टेटस को रिप्रजेंट कर देता है, फटाफट|

कुछ लोगो के पास अपनी कार होती है, कुछ लोग कार किराये पे भी लाते हैं | अपनी कार की सेवा पालतू जानवरों के जैसे की जाती है जबकि किराये की कार को ट्रीटमेंट गली के सो काल्ड आवारा कुत्तों वाला मिलता है | हर कोई बेरहमी से किराये की कार को दौड़ाता है, वो सबके काम आती है , पर जिंदा वो रहमो करम पे ही रहती है |  अपनी कार का नाम भी होता है और रूतबा भी
image

मुझे लगता है कि कारें भी शो-रूम में जाने से पहले  बाटलीवाला, पेगवाला टाइप किसी ज्योतिषी को अपने टायर दिखा के भविष्य पूंछती होंगी कि बाबा बताओ मैं पर्सनल प्रोपर्टी बनूंगी या किराये की ? बाबा उन्हें यज्ञ , हवन, माला, अंगूठी टाइप चीजों का आइडिया देते होंगे | कहते होंगे नाम में १०-१२ ई , १५-२० ए घुसेड़ लो , मनचाहा मालिक या मालकिन मिलेगी | हफ्ते में किसी एक दिन अपने अपने इष्ट देव के मंदिर भी जाते होंगी ये सब कार|

मम्मी कार अपनी बेटी कार से कहती होगी “बेटी १६ रविवार का फास्ट रखो, बिना डीज़ल पेट्रोल, हो सके तो हवा भी अवाइड करो, मनचाहा मालिक मिलेगा"| कुछ मनचली कार भी होती होंगी जो किसी की नहीं सुनती होंगी | पूरे कार-समाज को उनसे परेशान रहने की एक्टिंग करनी पड़ती होगी|

दादी कार अपनी पोती कार को आशीर्वाद देती होगी “नज़र ना लग जाये, ऊपर वाला तुझे किसी फिल्म स्टार की कार बनाये, तेरी फोटो खिचे, लोग तुझपे फूल बरसाएं" | वहीं जब दो कारों में लड़ाई होती होगी तो एक कार दूसरी कार से कहती होगी “भगवान करे तू किसी सॉफ्टवेयर इंजिनियर के हाथ पड़े, अपने मैनेजर का गुस्सा तुझपे निकाले आके वो

खैर कार तो कार है | इसकी महिमा अपरम्पार है | लोगो को इससे डर भी लगता है | मसलन किसी मंत्री संत्री से बोल दीजिए “सर“कार” चली गयी” अपनी कुर्सी से गिर पड़ेगा| धड़ाम ....
--देवांशु

शनिवार, 7 जनवरी 2012

वो “सात” दिन : मुख्य अंश और एक “एक्सक्लूजिव” साक्षात्कार…


आप साहबान ने बहुत से महापुरुषों, लेखकों, खिलाडियों की डायरियां पढीं होंगी |  उससे उनके जीवन का “आइडिया" लगता है |  जिस तरह से किसी “सिस्टम” को बनाने की दो “अप्रोच” होती हैं ..”बॉटम अप” और “टॉप डाउन" ..उसी तरह डायरी लिखने की भी यही दो अप्रोच होती हैं…

बॉटम अप अप्रोच में कोई भी इंसान पहले जिंदगी से फाईट करता है, रोज आके उन “फाईट सीन" को डायरी के सुपुर्द करता है | फिर एक दिन वो  महान बन जाता है |  उसकी डायरी तलाशी जाती है | फिर उस डायरी को छापा जाता है | लोग उसे हाथों हाथ खरीद लेते हैं, ड्राइंग रूम में सजाते हैं, किताबों के कलेक्शन में रखते हैं|


टॉप डाउन अप्रोच में आदमी सबसे पहले “फेमस" होता है,  फिर वो डायरी खरीदता है, फिर अपने “संघर्ष" के दिन याद करके उसमे डालता जाता है |  डायरी खरीदने से लिखने तक काफी लोग उनके आगे पीछे लगे रहते हैं| लिखते ही धर के छपती है किताब| बाकी सब ऊपर वाली अप्रोच के मुताबिक होता है|

कुछ सालों पहले तक डायरियां झमाझम बिकती थीं | फिर अचानक से महापुरुषों की बाढ़ आ गयी| साथ में डायरियां भी काफी आ गयी मार्केट में| जनता तो उतनी ही रही | सप्लाई बढ़ गयी डिमांड कम हो गयी | 

काफी लोगो की डायरियां फिर भी  खूब बिकीं, असली थी और “ये पब्लिक है सब जानती है"| खैर वो लोग तो खुश रहे |

कुछ लोग जो “जेनुइन” थे पर बढ़िया मार्केटिंग ना होने के चक्कर में उनकी डायरी नहीं बिकीं | पर वो संतोष कर गए | “संतोषं परमं सुखम” | इसको उन्होंने चरितार्थ किया|  कुछ लोगो की कीमत संसार को बहुत बाद में पता चलती है|

पर “महापुरुषों" की इसी बाढ़ में कुछ ऐसे भी थे, जिन्हें लगा की वो महापुरुष तो हैं पर जनता को पता नहीं हैं |  वो भी डायरी लिख मारे | ऐसे लोगो की डायरी की पब्लिसिटी तगड़े से की जाती है | जैसे कुछ हिस्से छपने से पहले लीक किये जाते हैं, किसी विवादास्पद घटना (जो कम से कम १० साल से ३० साल पुरानी हो, लोगो को धुंधली याद हो बस ) पे उनके “हटके" विचार लिखे होते हैं|  किसी बड़ी हस्ती को पानी पी पी के गाली दे देते हैं |  अपने पुराने किसी लफड़े-राड़े के बारे में बताया जाता है|  किसी और के संबंधों के बारे में भी लिख देते हैं|  बिक ही जाती है किताब इसके बाद |


खैर!!!! मुद्दा ये नहीं है, आज मैं आपको एक महापुरुष की डायरी के कुछ अंश बताता हूँ, पूरी डायरी आपको जब भी मौका लगे पढ़ लेना |

महापुरुष किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं | एक ज़माने में साधारण से इंसान थे , नलके बनाने का काम करते थे, पाइप फिट करते थे , फिर एक दिन उन्होंने एक महल में कैद एक राजकुमारी को आज़ाद कराया | उनकी ये “प्रेम कहानी” गली मोहल्लों तक में फेमस हुई | उसके बाद से ये भी  काफी “फेमस" हुए | जी हाँ सही पहचाना मैं बात कर रहा हूँ हर दिल अज़ीज़ “मारियो" भाई की , जिन्हें हम “सुपर मारियो" के नाम से भी जानते हैं|mario-1890

उनकी डायरी उन दिनो  की है जब वे राजकुमारी ढूंढ रहे थे, अपने संघर्षों और अनुभवों को उन्होंने कलमबद्ध किया है इस कृति में… नाम है “दोज सेवेन डेज़" , उसका हिंदी रूपान्तरण भी छपा है “वो सात दिन"…

पहले दिन के बारे में वो लिखते हैं…

“शुरुआत करते हुए बड़ा डर लगा , ना जाने कहाँ होगी राजकुमारी , पता नहीं कैसे हाल में होगी| पर भगवान का नाम लेकर शुरुआत कर दी है | शुरुआत में ही एक बिलौटा सामने  से आता दिखा , डर के मारे मैं उछल पड़ा, मेरा सर दीवार से टकराया उससे एक मशरूम निकला, मैंने लपक के उसे खाया, लगा जैसे ताकत बढ़ गयी, बिलौटे से डट के मुकाबला किया"

आगे उन्होंने पाइप में छुपे एक खतरनाक पौधे का वर्णन किया है

“देखने में तो साधारण पाइप दिख रहा था, मैं उसपे चढ खड़ा हुआ , पर उसके अंदर एक छुपा हुआ कटखैया पौधा था, भला हो मशरूम का वरना जान से मरहूम होना पड़ता, लेकिन तभी दिमाग की घंटी बजी की अगर ये नीचे जा रहा है तो नीचे कुछ ना कुछ होगा ही, नीचे गया तो देखा सिक्के ही सिक्के फैले हैं, चूंकि मेरी मशरूमी ताकत तो पौधा खा चुका था इसलिए मैं ज्यादा जोर लगा के उछला , सिक्के बटोरे और आगे बढ़ चला”

एक विशेष फूल के बारे में बताते हुए वो लिखते हैं…

“रस्ते में कुछ अजीब तरफ के फूल मिले, वो कुछ-कुछ सूरजमुखी जैसे लगते थे, उनको मैंने खा तो लिया पर लगा कहीं उल्टी ना हो जाए मेरे को, पर देखा तो मेरे अंदर से गोलियाँ निकल रही थीं…”

पहले दिन के चार पहरों में हर पहर में उन्होंने कोई ना कोई “झंडा" फतह किया, आगे के रस्ते भी मिलते गए, चौथे पहर आके वो एक महल में पहुँच गए | उसके बाहर एक ड्रैगन भाई खड़े थे उनसे मुक्का-लात हुई| किसी तरह आगे बढे| महल में पहुंचे वहाँ उनके नाम एक संदेश रखा हुआ था कि बहुत-बहुत शुक्रिया यहाँ आने के लिए लेकिन राजकुमारी किसी और महल में हैं | उनका दिल टूट गया…

“हताशा बढ़ गयी  सन्देश पढ़ के, जीवन कोरा भ्रम लगने लगा है | रात वहीँ गुजर करने का मन बनाया है , शुक्र है अपना ए एम रेडियो साथ रख लिया था | उसे चलाया तो विविधभारती स्टेशन लग गया , उसपे हवामहल प्रोग्राम आ रहा था, अंदाज़ा लगाया की रात के साढ़े आठ बजे होंगे|”

दूसरे दिन से लेकर सातवें दिन की डायरी का हाल चाल लगभग एक सा दिखता है, कठिनाइयाँ उनके जीवन का हिस्सा बनती सी दिखती हैं, हर रोज के चौथे पहर बाद वो अपनी डायरी लिखते रहे| दूसरे दिन के चौथे हिस्से का वर्णन उन्होंने कुछ यूं किया है…

“मुझे दो दिन से ये चौथा हिस्सा पार करना बड़ा मुश्किल लग रहा है, एक तो अँधेरा होने लगता है और ठीक महल के दरवाजे पे खड़ा ड्रैगन, साथ में कल-कल कर बहती नदी का पुल, बड़ा मुश्किल हो जाता है| शुक्र है की फ्लड लाईट लगी हुई हैं और बत्ती बराबर आ रही  है| पर महल के अंदर अँधेरा सा है| मुझे मोहम्मद रफ़ी का गाना याद आता है “चराग दिल का जलाओ, बहुत अँधेरा है”, महल के अंदर मै उसी  चरागे में सोने जा रहा हूँ, इस उम्मीद में की कल तो मुझे राजकुमारी मिल जायेगी|”

तीसरा दिन भी ऐसे ही बीत जाता हुआ दिखा है | चौथे दिन के हिस्से ऐसे दिख पड़े हैं…

“तंग आ गया हूँ मैं, इन बिलौटों, बतखों से लड़ते हुए, रोज का वही लफड़ा, कहाँ तक लडूं इस जालिम दुनिया, बेरहम समाज से, कोई इंसान भी तो सामने नहीं आता, जानवर भेजे पे भेजे जा रहा है, कुछ एक बार में मर रहे हैं, कुछ दो बार में, कुछ को खाई में फेंकना पड़ रहा है, इतने पाप करने पड़ रहे हैं| पाप का घड़ा भरने को है, पता नहीं राजकुमारी से मिलने से पहले फूट ना जाए| यमराज की भी टेंशन बराबर बनी रहती है|”

यहाँ तक आते आते राजकुमारी से मिलने की बेताबी भी साफ़ झलकने लगी…

“तुम पता नहीं कैसी होगी, दिखती कैसी होगी, क्या तुम मुझे देखते ही मुझसे प्यार करने लगोगी? तुम्हारे लिए कोई भेंट भी तो नहीं ला पाया, जल्दी में था और सोमवार को दुकाने भी कम खुलती हैं, उसपर भारत-पकिस्तान का मैच चल रहा था, जनता खाना तो खा नहीं रही थी, दुकान क्या खोलती | उम्मीद है की तुम मुझे माफ कर दोगी | मेरे सच्चे प्यार को ही तोहफा समझना | तुमसे मिलने की बेकरारी बढती जा रही है |”

पांचवे दिन मुश्किलों के और बढ़ जाने की बात लिखी है उन्होंने|  छटा दिन भी ऐसे ही बीता | दो दिन से गोलियों , बंदरों का भी मुकाबला करने की बात लिखी है| सातवें दिन के एंड में वो लिखते हैं…

“मेरे सब्र का बाँध टूट गया है, ऐसी कौन सी मुश्किल है जो मैंने नहीं झेली | ऊपर वाला मेरे सब्र का इम्तेहान ले रहा है | सब्र का फल मीठा होता है और ज्यादा मीठा खाने से  डाइबिटीज़  रोग हो जाता है | इसलिए ज्यादा ये मिठाई नहीं खाऊंगा | एक-दो दिन और देखता हूँ नहीं तो फिर किसी मैट्रीमोनी साईट पे अपनी प्रोफाइल बना दूंगा, किसी से भी शादी कर लूँगा| राजकुमारी से प्यार महंगा ना पड़ जाए"

यहीं पे किताब खतम होती है | किताब के अंत में प्रकाशक का एक नोट है..

“इस तरह मुश्किलों से जूझते हुए मारियो ने अपनी राजकुमारी को पा लिया, आप भी मेरे साथ उन दोनों के उज्जवल भविष्य की कामना करें, पुस्तक पढ़ने पर बधाई और अगर आपने ये किताब खरीद के पढ़ी है तो शुक्रिया भी|”

****

किताब पढ़े हुए मुझे काफी टाइम हो गया, कुछ सवालात थे , मैंने प्रकाशक से संपर्क करने की कोशिश की तो वहाँ से कोई जवाब नहीं आया | फिर एक दिन एक शौपिंग मॉल में घूमते हुए (उछलते हुए पढ़ें) मारियो खुद ही दिख गए…मैंने नमस्ते की तो मुझे एक बार में पहचान गए | हमने कॉफी के लिए आमंत्रित किया तो वो मान गए| इस मौके पे मैंने कुछ सवाल दागे| वो यहाँ हैं:

मैं: नमस्ते मारियो जी, कैसे हैं, आज यहाँ मॉल में क्या कर रहे हैं?
मारियो जी : नमस्ते , बढ़िया हैं एकदम, आज जरा सोचा की मैडम को थोड़ी शौपिंग करा दी जाये , इसलिए आ गए|

मैं: अच्छा, ये तो बढ़िया सोचा आपने, इसी बहाने मुलाकात भी हो गयी|
मारियो जी : दरसल पिछले ३-४ महीने से बहाने बना रहे थे, कभी कोई त्यौहार का बहाना, कभी इंडिया की हार का बहाना, शौपिंग “अवाइड" कर रहे थे, पर आज मैडम बोलीं की अगर शौपिंग नहीं कराओगे तो खाना पानी बंद |  अब “रेसेशन" के टाइम में मैडम से पंगा कौन ले | कड़की चल रही है | तो सोचा की शौपिंग करा देते हैं, शायद सस्ती पड़े |

मैं (हँसते हुए) : शौपिंग और सस्ती?
मारियो :  अरे नहीं, अब आप तो घर के आदमी हो आपसे क्या छुपाना, मैंने उन्हें अपना क्रेडिट कार्ड दिया है, उसकी लिमिट ही इतनी कम रखी है, कितना भी करो शौपिंग पैसा तो उतना ही जायेगा जितना हम चाहेंगे |

मैं : मान गए आपको, मैंने आपकी डायरी “वो सात दिन" पढ़ी है ?
मारियो (चौंकते हुए) : आपने पढ़ी????

मैं : जी हाँ, आप मेरे हीरो रहे हैं, इंस्पिरेशन, कुछ सवाल है पूंछना चाहूँगा?
मारियो :  दागो

मैं :  आपको राजकुमारी को ढूँढने में आठ दिन लगे, पर कहानी केवल सात दिन की, ऐसा क्यूँ?
मारियो : अब आप की शादी तो हुई नहीं है अभी तक | आप नहीं समझोगे |  यार वो आठवे दिन ही पकड़ के शादी हो गयी | पूरी रात मेहमान लोगो ने खिला खिला के मार डाला | दूसरे दिन से घर में अपने झगड़े शुरू | जहाँ दो बर्तन होते हैं खनकते ही हैं| बस इन्ही बर्तनों को संभालने में जिंदगी कट रही है | डायरी कहाँ से लिखें ? आखिरी का नोट भी किसी और से लिखवाना पड़ा प्रकाशक को|

मैं: ओह तो ये बात है , अच्छा ये बताइए पहले दिन तो आपने बताया आप रेडियो सुन रहे थे, उसके बाद नहीं सुना क्या, उसकी बात कहीं और नहीं की आपने ?
मारियो : “ कैसे सुनते, उसी रात हमने फरमाइशी गीतों का प्रोग्राम लगाया, फरमाइश करने वालों के नाम सुनते सुनते आ गयी हमें नींद, जब जागे तब तक सेल का सत्यानाश हो चुका था| रेडियो पहले महल में ही तोड़ना पड़ा|

मैं : तोड़ना क्यूँ?
मारियो : अरे वही जैसे जंग में लोग गोली खतम हो जाने पे अपनी बन्दूक तोड़ देते हैं|

मैं : हम्म | आप तो जापान के रहने वाले हैं , फिर आकाशवाणी कैसे सुनते हैं?
मारियो : असल में मेरी माँ भारतीय मूल की हैं, उन्हें हिंदी गाने बड़े पसंद हैं, वहीं से आदत पड़ी|  और अब तो हिन्दुस्तान में रह भी रहे हैं, जापान में तो बड़े भूकंप आते हैं इसलिए | किशोर कुमार मेरे फेवरेट हैं|

मैं : वो तो हर प्यार करने वाले के फेवरेट हैं, प्यार की बात करते हैं, आपको कैसे प्यार हुआ राजकुमारी से?
मारियो : ये भी अंदर की बात है, सिचुएशन मरता क्या ना करता वाली थी, हालत अपनी पतली थी, कई बड़े घर की लड़कियों पे चांस मारा, सब जगह से दुत्कारे गए| फिर महल में बंद राजकुमारी का पता चला, बस|

मैं : तब तो दिन मजे में कट रहे होंगे अब ?
मारियो : अजी ख़ाक कट रहे मजे में, मुद्दे की बात तो किसी को पता नहीं है, इनका नाम केवल राजकुमारी निकला, और महल एक खंडहर | इन्हें कोई छिपाया नहीं गया था, एक बार पड़ोसी के बगीचे से अमरुद चुरा के भागी तो खंडहर में कहीं खो गयी| ऊपर से ये न्यूज़ चैनल वाले, गड्ढे में गिरने से लेकर महल में खोने तक की न्यूज़ ऐसे दिखाते हैं और सरकार भी भर भर  के पैसे लुटाती है , इन्ही सब लफड़ों में पड़ गए| जैसे इन्हें ढूँढा, जनता वाह-वाही करती आ गयी, एक-दो मंत्री-संत्री भी आये, होटल वालों ने अपनी तरफ से रियायती दर पे डिनर करवाया| नेताओं ने लंबी चौड़ी घोषणाएँ कर दी | तब से सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहा हूँ उन्हीं पैसों के लिए | उन आठ दिनों में जिन जानवरों से सामना हुआ वो अच्छे लगने लगे हैं| जो जमा पूंजी थी और जो सिक्के उन गुफाओं में मिले वो होटल वाले ले गए | जो बचे वो नेता लोग अपनी पार्टी के चंदे के रूप में उठा ले गए | फिर से नलका बना के, टोंटी लगा के काम चला रहे हैं| वो तो कहो इस लाइन में ठीक ठीक पैसा मिल जाता है तो ज़िंदगी चल रही है|

मैं (इससे पहले की वो हमसे ना पूंछ लें की कैसी हालत है तुम्हारी, हम तपाक से बोल पड़े): आजकल हर किसी की हालत पतली है|
मारियो : सही कह रहे हैं|

मैं : अच्छा आपका एक भाई का , लूगी, वो कहाँ है आजकल?
मारियो :  ये सब अफवाह है, मेरा इस नाम का कोई भाई नहीं है और ना ही मैं इस नाम के किसी इंसान को जानता हूँ | मैंने पहले ही इस बाबत एक इश्तेहार अखबार में छपवाया है कि इस नाम के किसी व्यक्ति से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है|

इसी बीच वो थोड़ा हडबड़ाते हुए दिखे | राजकुमारी जी ने उन्हें हाथ से अपनी शॉप के अंदर आने का इशारा किया |  वो ऐसे दौड़े की जैसे उन्हें पता ही ना हो कि क्या हो रहा है| हमने भी नज़रों से उनका पीछा किया|

वो क्रेडिट कार्ड को मुंह से फूंकते, कपड़े से साफ़ करते दिख रहे थे…….
****
और जाते जाते मारियो साहब के जीवन पे बनी एक डॉक्यूमेंट्री आपको दिखा देते हैं…
सुपर मारियो : एक अनूठी प्रेम-संघर्ष-कथा

नमस्ते!!!!!

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

प्यार, इश्क, मोहब्बत और लफड़े…

जहाँ प्यार है, वहाँ इश्क है, जहाँ इश्क है वहाँ मोहब्बत है, और जहाँ ये तीनो है (बराबर मात्रा में), वहाँ लफड़े हैं | जैसे बिन बादल बारिश नहीं होती वैसे बिना लफड़े-बवंडर के प्यार नहीं होता|
दुनिया में सभी लोग, कभी ना कभी “पहला” प्यार करते हैं, कुछ पहला प्यार एक बार करते हैं, कुछ कई बार करते हैं|पर प्यार पहला ही रहता है | इस बाबत आदरणीय राहुल जी का बयान देख लीजिए ..

“हम जीते एक बार हैं, मरते एक बार हैं और प्यार भी एक बार होता है”|

(बस यहाँ प्यार से पहले अगर “हर किसी से" लगा देते तो बयान का दायरा बढ़ जाता, काफी “ग्लोबल” हो जाता | खैर कोई नहीं| जब हम समझ लिए तो बाकी भी समझ गए होंगे|)

प्यार, इश्क, मोहब्बत| ये सब उस उड़ती हुई चिड़िया के वो पर हैं, जिनको गिनने की कोशिश हर इंसान ज़िंदगी में कभी ना कभी तो करता है, कुछ “सक्सेसफुल" रहते हैं, बाकी दूसरी चिड़िया “टारगेट" करते हैं|

प्यार हो जाना बड़ी आम बात है, ज्यादातर लड़कों को अपनी इंग्लिश वाली और लड़कियों को मैथ्स वाले टीचर से पहला प्यार हो जाता है|  ये प्यार साल दर साल बढ़ता रहता है| और ज्यादातर लोग इसे बहुत जल्दी भूल जाते हैं| और ये सबको  तब याद आता है जब वो “ट्रुथ & डेयर” खेलते हैं| Who was your first crush?

लाइफ का दूसरा इम्पोर्टेंट प्यार, हमें अपने साथ पढ़ने वाले किसी बंदे या बंदी से होता है, जिसे "क्लासमेट" कहते हैं |  इस मामले में की गयी एक रिसर्च के बाद कुछ तथ्य सामने आये हैं :
  • लाइफ का ये प्यार , ज्यादातर एकतरफ़ा होता है|
  • सुंदरता बांटने में भगवान ज्यादा पक्षपात नहीं करते, हर उम्र के लोगो के वर्ग में कुछ सुन्दर (सभ्य, सुशील भी पढ़ें) लोग होते हैं | एसी “सुन्दर" कन्याओं के मोहल्ले का चक्कर हर दूसरा लड़का , सुबह शाम लगाता रहता है| और ऐसे ही “हैंडसम" लड़कों के नाम काफी लड़कियों की नोटबुक के पीछे के पन्नों में पाए जाते हैं|
  • इसके अलावा बाकी जनता सपोर्टिंग रोल में होते हुए भी अपने आप को मुख्य नायक या नायिका समझती रहती है|
  • इस तरह के इश्क ज्यादातर क्लास में, ट्यूशन में , समोसे की दुकानों में परवान चढते हैं, और इनकी परिणति गिफ्ट्स की दुकानों में हो जाती है|
इस तरह के बहुत तथ्य हैं, जगह की कमी के कारण नहीं लिख पा रहे हैं|

लाइफ का तीसरा इम्पोर्टेंट प्यार होता है कॉलेज में |  ये खतरनाक होता है |यही वो लाइफ का पहला प्यार होता है, जिसमे रातों की नींद , दिन का चैन एक साथ खो जाता है | यही प्यार पहली बार चार-दीवारी का “रूल” तोड़ता है, खुले बागों में गाना गाता है |  पहले प्रेम-पत्र भी लिखे जाते थे, आजकल ज़माना सोशल नेट्वर्किंग का है |  ये प्यार “जनम – जनम”  के साथ वाले प्यार से ठीक एक कदम पीछे वाला होता है, वो इस जीवन में “बिलीव" करता है | कवितायेँ लिखने की शुरुआ़त भी यहीं से होती है|

इसके बाद भी लाइफ में बहुत से प्यार होते रहते हैं |  मेरे एक मित्र ने अपनी पत्नी को देखते हुए कहा “हमारी तुम्हारी आपस में “अंडरस्टैंडिंग" को देखते हुए ऐसा लगता है कि अब बस ये हमारा तुम्हारा साथ साथ सातवाँ जनम ही है”|  नज़र ना लगे ऐसे प्यार को…
.
अब प्यार की कहानी तो इतनी लंबी है, कहाँ तक लिखें| लफड़ों की बात करते हैं, तो जनाब ये जो लफड़े हैं ना, ये एक अकेली चीज़ हैं जो जीवन भर होने वाले प्यार में आप के साथ खड़े रहते हैं| ज्यादातर लफड़े प्यार खतम करने का काम करते हैं, प्यार के पर्यायवाची होते हुए, विलोम का काम करने लगते हैं |  उन्ही को नीचे “लिस्टिया” रहे हैं:

प्यार का सच्चा होना :  ये बात एक बार मेरे एक परम मित्र (नाम नहीं लूँगा, मना किया गया है)  के साथ एक गहन डिस्कशन के बाद निकल के आयी| एक्चुअली प्यार का कुछ ज्यादा सच्चा हो जाना उसके पूरे ना होने का मुख्य कारण है | वैसे ही जैसे सोच गहरी हो जाये तो फैसले कमज़ोर हो जाया करते हैं|  हर सच्चे प्यार करने वाले को लगता है कि उसके प्यार की खबर सामने वाले को पहुँच जायेगी , अपनेआप | कहीं उसके बताने पे सामने वाले को बुरा ना लग जाये, आखिर सच्चा प्यार है, ये तो नहीं होना चाहिए| बस इसी वक्त भैंस, जो है चली जाती है पानी में| एक इस तरफ टुकड़ों में जीते रहते हैं और उम्मीद करते हैं कि सामने वाला भी टुकड़ों में दूसरी तरफ जी रहा होगाआखिर प्यार सच्चा जो है |

दोस्तों का होना :  एक बार एक बात बताई थी किसी महापुरुष ने “Fastest way of communication “tell a woman” and to make it even more fast tell her not to tell anyone else” | बाकी का तो पता नहीं पर प्यार के मामले में लड़के भी इससे पीछे नहीं| अगर आप ने अपने किसी सबसे अच्छे दोस्त को बता दिया “कि देखो वो जो है ना, पीला दुपट्टा नीले सूट में, तुम्हारी भाभी है, और देखो अभी मामला नया है, अपने तक ही रखना, वक्त आने पे पार्टी होगी" | पर क्या मजाल सामने वाला मान जाये| देवर होने के सारे फ़र्ज़ निभाने शुरू :

पहला डायलोग (खुद आपसे): “भाई, भाभी तो बताया?? नहीं?? तो ये काम मैं कर दूं??, अपना लक्ष्मण और हनुमान दोनों मेरे को ही समझो"

दूसरा डायलोग (उस “दूसरे" लड़के से जो उसी लड़की पे फ़िदा है )  : “ओए लल्लू-पंजू, जो भी हो तुम , आजसे इसके आसपास दिखे तो, इतना धोयेंगे कि सर्फ़ एक्स्केल का प्रचार करने वाली सफ़ेद कमीज़ बन जाओगे , समझे, कट लो, भाभी है अपनी ”  ( लड़की को तो अभी तक नहीं पता चला आपके प्यार का, और अभी तो सीन में आप भी नहीं हैं)

तीसरा डायलोग (वो “देवर" जी अपने दोस्तों में जब आप नहीं हैं वहाँ पे) : “देख वो जो है ना, हाँ वही जिसे पटाखा बोलते थे हम सब, आज से कोई कुछ नही बोलेगा, भाभी हो गयी है अपनी, भाई का दिल आ गया है, समझे|” इसी बीच किसी ने बोला “अपन तो सब भाई हैं, कौन से भाई का दिल आया है ये तो क्लीयर करो" वो जवाब देंगे “वही साइंटिस्ट , अपना आइन्स्टाइन,  अबे उसके सामने मत बोलना, सेंटी आदमी है , बुरा मान जायेगा" | देखा उन्होंने किसी को नहीं बताया|

अब ऐसे लोग अपनी हरकतों से भी बाज़ नहीं आते, किसी दिन मान लीजिए उसी लड़की से किसी बात पे उलझ गए, काफी गालियाँ सुननी पड़ गयी उन्हें, तो लड़की को ही जवाब दे देंगे “वो तो  ***** (यहाँ पे आपका नाम भी हो सकता है) भाई का लिहाज़ कर रहे हैं, वरना तुम जैसियों को सुधारने में हमें टाइम ही कितना लगता है” | आपको इतनी इज्ज़त कब चाहिए थी भला?? आपके एक तरफ़ा प्यार का ऐसा कचूमर निकलेगा| इसके बाद आप नज़रें नहीं मिला पाओगे, छुपे छुपे घूमोगे| कालेज में टॉप भी कर लो तो भी घूर के देखा जायेगा |

एक और लफड़ा नया आ गया है मार्केट में , अब जैसे ही आपने बताया कि आपको फलां कन्या से प्यार हो गया है, तुरंत आपके दोस्त बोलेंगे “फेसबुक पे स्टेटस कमिटेड करो बे” | 


शाहरुख खान :  एक तो भाई ये शाहरुख खान,  इतना बिगाड़े हैं जनता को,  हर कोई खुद को "राज" समझता है, और एक अदद "सिमरन" की तलाश में लगा रहता है, राज को तो पिट-कुट के सिमरन मिल गयी पर असलियत में कितने लोग कुटे , सिमरन तो क्या उसकी झलक ना मिली| कुछ को तो लड़की के पिता जी ने हड़काया, कुछ को लड़कियों के भाइयों ने दौड़ाया, मोहल्ले के बाकी लड़कों ने कूटा | और इनको लगता रहा इनकी सिमरन अपनी माँ के साथ भागते हुए आएगी| पिटते-पिटते काफी देर वेट किया, और बाद में तो खुद जा भी नहीं पाए, ले जाए गए|

दरअसल प्यार में “कुछ तुम सोचो, कुछ हम सोचे” की जगह “कुछ तुम बदलो, कुछ हम सुधरे” का लोजिक चलता है| पर शाहरुख भाई की इन कुछ फिल्मों पे गौर फरमाएं:
इन सारी फिल्मों में बदलने सुधरने का जिम्मा  पैरेंट्स  पे रहता है| मतलब “हम ना बदलब, सुधरिहे संसारा"
और प्यार इनके लफड़े में पड़ के बस पड़ा रह जाता है, ना “पैरेंट्स” बदलते हैं ना हम सुधरते  हैं| अब तक तो काम चल रहा था ई सब पिक्चरें देख के, पर अब इनको झेलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी हो गया है |


डर : “ना” सुनने का डर , एक तो ये ससुरा बड़ा खूंखार लफड़ा है, “वो ना कह देगी या कह देगा तो क्या होगा" | इस चक्कर में भी बहुत लफड़ा-लोचा हुआ है| ज्यादातर प्यार इसी के चलते एक तरफ़ा रह के कब्र-नशीं हो गया , सुपुर्द-ए-ख़ाक हो गया, शहर-ए-खामोशा पहुँच गया | पर ये डर युग युग से चलता आया, और आगे भी जारी रहने की भी उतनी ही संभवनाएं हैं|

एक बात बड़ी खास है इसके साथ, कित्ताओ समझा लो जनता को, कि आगे बढ़ो, क्या होगा, ना बोलेगी तो क्या होगा, कुछ नहीं होगा, फिकर नॉट| पर ना कोई ना समझा | (मैं भी नहीं )|

एक और डर है, सोसाइटी में नाम खराब होने का, जिसके बाद आप अपने घर में भी पीटे जा सकते हो, इससे डर के भी बहुत लोग डरते रहते हैं, उनको “स्प्राईट” पीनी चाहिए| “डर" के आगे “जीत" है | (घटिया डायलोग, पर झेलो)


कविता : इस नाम की कोई भी कन्या ना घबराए, मैं उनके बारे में कुछ नहीं लिखने जा रहा| दरसल ये मेरा पर्सनल लफड़ा है| कविता लिख के प्यार जताना बहुत रिस्की हो जाता है| एक कहानी सुनाऊं, सुनोगे


तो हुआ यूं की मेरे मेरे एक दोस्त फ़िदा थे एक मैडम पे, वो कवितायेँ लिखती थीं| और हम भी अपने दोस्तों में बदनाम थे तुकबंदी के लिए| मैडम की एक सहेली थी, उनपे हम फ़िदा थे | एक प्लेट ब्रेड-पकोड़े और एक कप चाय की एवज में मेरे "उन्ही" दोस्त ने मुझसे एक कविता लिखवा ली …
“हर वक्त तुम्हारा चेहरा आँखों के सामने रहता है,
एक तुम हो की कभी पास भी नहीं आतीं|
अपने दिल की धडकनों को मै समझाऊं कैसे,
इनसे तुम्हारी याद कभी दूर ही नहीं जाती||”

मित्र महोदय लेके पहुंचे कविता मैडम के पास, उनके साथ हम भी हो लिए थे की हमारा भी कल्याण हो जायेगा| अब वो अकेले तो आयेंगी नहीं| मैडम ने कविता की ओर एक नज़र देखा, और उसे अपनी “उसी" सहेली को पकड़ा के आगे बढ़ लीं | उनकी सहेली ने कविता थामी,  पढ़ी और मेरे दोस्त को बोला “इतनी अच्छी कविता, तुमने लिखी?", मेरे दोस्त का ह्रदय बहुत बड़ा था,बोले  “हाँ मैंने ही लिखी" | मैडम की सहेली ने जवाब दिया “पर वो हिंदी में कविता नहीं लिखती, इन फैक्ट उसे ठीक से हिंदी पढनी ही नहीं आती, पर काश कोई मेरे लिए ऐसी कविता लिखता" | ये कह के वो भी चली गयी| मै और मेरा दोस्त एक दूसरे को घूरते रहे| कुछ दिनों बाद पता चला, इसी कविता के चलते मेरे दोस्त की सेटिंग उनकी मैडम की सहेली से हो गयी|  पूरी कॉलेज की लाइफ वो मैडम उधर अंग्रेजी में और मै इधर हिंदी में कविता लिखते रहे…

इसलिए पहले तो कविता लिखो नहीं प्यार में, लिखो तो अपने लिए लिखो| 

“पुस्तक में लिखी विद्या, दूसरों के हाथ में गया धन और किसी और के प्यार के लिए लिखी गयी कविता, तीनो वक्त पड़ने पे कभी काम न आये हैं, ना आयेंगे"

जीवन का लक्ष्य: प्यार के बीच में ये लक्ष्य हर बार आते रहे हैं, कभी कभी ये प्यार को पाने में मदद करते हैं, वरना आम तौर पे ये खतम ही करते हैं सब कुछ..इस श्रेणी में आने वाले कुछ वाक्य निम्नलिखित हैं:
  • मैं यहाँ पढ़ने आया हूँ| (कॉलेज वालों का पसंदीदा)|
  • पहले पढ़-लिख के बड़ा आदमी बन जाऊं|
  • पहला एम नौकरी, बाद में आये छोकरी|
  • अभी पढाई का टाइम है, प्यार के लिए तो ज़िंदगी पडी है|
इस तरह के जीवन के लक्ष्यों के चलते प्यार की काफी बेकदरी हो गयी है| इनसे बचना चाहिए!!!!

****

लफड़े और भी हैं|  जितने मुझे पता थे मैंने बता दिए, अब बारी आपकी, खुल के बताओ….ये सब नेक सलाहों की तरह हैं| आपके द्वारा दी गयी कोई भी एक सलाह ना जाने कितने लोगो के जीवन में उजाला ला सकती है….
“सलाह दान से करो कल्यान”

सभी को नववर्ष की शुभकामनायें!!!भगवान आपके जीवन में प्यार, इश्क, मोहब्बत की सप्लाई बनाये रखें और लफड़ों से खुद ही निपट लें….

नमस्ते!!!!

रविवार, 25 दिसंबर 2011

रिसर्च-ए-पियक्कड़ी

एक तो मै बड़ा परेशान हूँ इन रिसर्च करने वालों से, पता नहीं किस किस बात पे रिसर्च किया करते हैं| मैंने अपने एक अपने बड़े काबिल दोस्त से पूंछा…"यार ये रिसर्च क्या होती है बे"…तो उनका जवाब आया.."अबे देखो, दुनिया में बहुत सी चीज़ें जो हैं ना, सब सरची जा चुकी हैं, सरची समझते हो ना बे, मतलब खोजी |  हैं, तो, समझे | और जब लोगो कि जादा भुजाएं फड़फड़ाने लगती हैं और चैन नहीं आता है तो वो फिर से उन्हें सरचियाने लगते हैं, इसी को रि-सर्च बोलते हैं|"

हम थोड़ा नाराज़ हो लिए, हमें तो खुद रिसर्चियाने की आदत बचपन से रही है |  हम बोले “नहीं मालिक! ऐसा नहीं है, अगर दुनिया में रिसर्च ना हो तो काम नहीं चलेगा, देखो जैसे लोग आइंस्टाइन पे रिसर्च कर रहे हैं, कि उनके पास इतना दिमाग कैसे आया, इससे बहुत लाभ होगा|”

जवाब मिला “अबे आइंस्टाइन को तो हम भी सर्च कर रहे हैं, पता नहीं का का लिख के कट लिए, कुछ करना है तो समाज के लिए, देश के लिए करो, रिसर्च-फिसर्च से कुछ नहीं होगा, समझे बे”

बात के बढ़ जाने पर पिटने का डर था, इसलिए हमने उनको प्रणाम किया और बोले “खैर गुरु कोई बात नहीं, बाद में डिसकसियायेंगे इस मुद्दे पे, अभी चलते हैं|”

मालिक ने हमें आशीर्वाद दिया और रास्ते में जाते किसी अपने चेले को, जो साइकिल से कहीं जा रहा था, रुकने का आदेश दिया और बोले “हमें घर तक छोड़ दो"| और वो निकल लिए|

****

इसके बाद हमारी रिसर्च करने की इच्छा और बढ़ गयी, मुद्दा ढूँढने निकल पड़े, कि कोई तो मुद्दा मिले |  पर सारे मुद्दे पे तो कोई ना कोई रिसर्च कर रहा है,  कविता से लेकर बढ़ती महंगाई , राजनेता से लेकर अभिनेता, सब पर कोई ना कोई लगा हुआ है|  दुनिया भर के मार्केट डूब रहे हैं, रिसर्च का मार्केट तरक्की पे है| 

फिर अपने काबिल दोस्त की बात याद आयी “कुछ करना है तो समाज के लिए, देश के लिए करो" | बस हम पता करने लगे  कोई उबलता हुआ सामाजिक मुद्दा |  बड़े-बड़े अक्षरों में ज्ञान की कुछ बातें लिखी रहती हैं जगह जगह , हमारी नज़र में एक आ गयी:

“शराब एक समाजिक बुराई है"

मिल गया मुद्दा, सोचा कि शराब पे कौन रिसर्च करेगा | हम कर लेते हैं |  पर बाद में पता चला, इसपे भी रिसर्च हो गयी है | इसी गम में सोचा थोड़ी पी ली जाय, कुछ राहत मिले शायद|  ठीक उसी समय एक आइडिया आया कि क्यूँ ना “पियक्कड़ी" पे रिसर्च की जाय, मामला जम गया और हम लग लिए रिसर्च पे, १५-२० की एक दम दम-निकालू मेहनत के बाद पियक्कड़ी पे हमारा शोध पत्र तैयार हो गया है, छाप रहे हैं उसके कुछ मुख्य-अंश|

****

पीना, क्या है पीना?
“पीना" कोई आसान काम नहीं है…बड़ी वैज्ञानिक प्रक्रिया है…पीना कई तरीके का होता है| पीने के कुछ मुख्य प्रकार निम्नलिखित है :
१. पानी पीना
२. खून पीना
३. सिर्फ “पीना"

पानी पीना एक ऐसी बेफजूल की प्रक्रिया है जिसके लफड़े में पड़ के इंसान रात को जाग-जाग कर, काम करने के बीच भाग-भाग कर, पानी के जग, गिलास आदि तक जाता है, पानी पीता है, और वापस आ जाता है|  जीवन की नीरसता को बढाने में इसी पानी पीने का मुख्य योगदान है|  पानी पीने के साथ और भी बड़ी समस्याएं हैं| जैसे : पीने का पानी साफ़ ही होना चाहिए|  आदि आदि|

खून पीना, एक “बौद्धिक" प्रक्रिया है, इसमें खून का कोई आदान-प्रदान नहीं होता, ना आपको “ड्रैकुला" बनने की  ज़रूरत है,  बस जब भी, जहाँ भी मौका मिले, किसी ऑब्जेक्ट को पकड़िये और उसे ज्ञान देने लगिये, चाहे वो सुने ना सुने | थोड़ी देर में वो खुद ही बोल देगा “आगे बढ़ो, काहे खून पी रहे हो"| बस यही वो क्षण होगा जब आप खून पीने में एक्सपर्ट होने की तरफ कदम बढ़ा दोगे |  (जैसे मै इस पोस्ट के साथ आपका खून पी रहा हूँ)

सिर्फ"पीना" ही है जो असली पीना है | इस कैटेगरी में व्हिस्की, वोडका, रम आदि पीना आता है| इन्हें पीने पर ही आदमी पीने वाला या पियक्कड़ कहलाता है|  इसके बारे में और जानकारी नीचे के हिस्सों में है|

पियक्कड़ क्या होता है?
ये शब्द अक्सर सुनने में मिलता है कि फलां आदमी बड़ा पियक्कड़ है, पर इसकी कोई सोलिड डेफिनिशन ढूँढने पे भी नहीं मिलती| पीते बहुत लोग हैं, पर कोई एक विशेष व्यक्ति पियक्कड़ कैसे कहलाता है? इस बात पे बहुत लोगो के विचार लिए| कोई एक भी विचार पूरी तरह से पूरा नहीं निकला| हार के हम अपने उन्ही काबिल दोस्त के पास पहुँच गए, सवाल दागा | जवाब भी गोली की तरह आया|

“देखो, पीना एक सुपर-सेट है, सुपर-सेट पढ़े हो?”

हम बोले हाँ पढ़े हैं| वो आगे बोले “तो हाँ पीना एक सुपर सेट है, और पियक्कड़ होना सब-सेट, समझे, अब तुम पूंछोगे कैसे, तो बात ये है कि जब आदमी पी के निम्न बातों का पालन करे तो समझ लो वो पियक्कड़ है अन्यथा बस पीने वाला :
  • अपने घर से दो गली दूर से ही दरवाजा खोलने की आवाज लगाना|
  • रस्ते पे बैठे कुत्तों को प्यार करना, कि तुम ही मेरे सच्चे दोस्त हो|
  • बार बार चीख चीख के कहना कि मैंने पी नहीं रखी है|
  • पहले तो लड़खड़ाते हुए गिरना नहीं, और गिरना भी तो सीधे नाली में गिरना|

हमने कहा ये तो काफी “आम" आदमी वाली बातें हो गयी, बड़े लोग भी तो पीते हैं, उनमे कोई पियक्कड़ नहीं होता क्या? जवाब मिला “देखो जो पकड़ा जाये वही चोर होता है, बड़े लोग पीते नहीं, शराब को अनुग्रहित करते हैं, और जो पीता नहीं वो पियक्कड़ कैसे हो सकता है| देवदास भी घर छोड़ने के बाद ही पियक्कड़ कहलाया ” हमें अपने सवाल का जवाब मिल गया|

पियक्कड़ होने के मुख्य कारण क्या है?
आदमी पियक्कड़ सिर्फ गम में होता है, खुशी में पीने वाला सिर्फ पीने वाला होता है |  गम के तीन अंग होते हैं:
१. क्या
२. क्यूँ
३. किसका

“क्या" से मतलब ये है कि गम किस टाइप का है, प्यार में धोका, काम का झोंका इसके मुख्य दोषी होते हैं| बात बात पे गम हो जाना आम बात है, पर कोई गम “क्यूँ" बड़ा हो जाता है, जिसके कई कारक हो सकते हैं| कारकों का अध्ययन इस विषय सीमा के बाहर है (जैसे  भाषणों में मुद्दे की बातें गायब होती हैं)| बस यही “क्यूँ" इंसान को पीने पे मजबूर कर देता है|

“किसका" गम, इसमे मुख्यतया दो ही जवाबदेह वस्तुएँ होती हैं…”नौकरी" और “छोकरी" | जिनके बारे में आपलोगों को बताना वैसा ही है जैसे “सूरज" को “दिया" दिखाना| समझदार लोग हो आप|

जब इंसान इन तीनो कारणों के चक्कर में १-१ पेग लगा लेता है तो उसके बाद ३-४ पेग और लग जाते हैं, बस यहीं आकर वो “पियक्कड़" बन जाता है|

ऐसा क्यूँ कहा जाता है कि “कलयुग में दारू मिली सोच समझ के पी”?
ये सब भ्रम पैदा हुआ कुछ ट्रकों और ऑटो के पीछे लिखे एक मशहूर दोहे के वजह से (इसके रचयिता पे भी रिसर्च होनी चाहिए)
सतयुग में अमृत मिला, द्वापर युग में घी| कलयुग में दारू मिली सोच समझ के पी|

मामला “मार्केटिंग" से जुड़ा हुआ है| दरअसल बाकी युगों में “दारू" के सेल्समैन थोड़े कमजोर थे| सतयुग में देवता लोग समुद्र-मंथन के बाद अमृत के पीछे पड़ गए| लड़ाई में बड़े बड़े लोगो को आना पड़ा, दारू दब गयी इस लफड़े में |  द्वापर में तो कृष्ण जी सबकुछ थे, और चूँकि वो खुद गाय प्रेमी थे तो एडबाजी घी की हुई, शराब फिर कहीं कोने में अपना अस्तित्व संभालती रही| कलियुग में बड़े बड़े लोग इसकी मार्केटिंग में कूद पड़े, तो बाकी सब पीछे हो गए|

फिर भी पीना एक सामाजिक बुराई कहलाता है, ऐसा क्यूँ?
ये सब किया धरा है उनलोगों का जो खुद नहीं पीते, अब जब खुद नहीं पीते तो औरों को पीते नहीं देख सकते| और किसी तरह तो  पीने वालों या पियक्कड़ों का विरोध हो नहीं सकता था, इसलिए इसे सामाजिक बुराई बता के इसका विरोध करते हैं|  पीने को समाजविरोधी बोलना ठीक वैसा है जैसे अंगूर ना मिलने पे कहना कि अंगूर खट्टे हैं|

तो पीना बुरा है या भला?
नो कमेन्ट|
****

पूरी रिसर्च  स्थान के आभाव (टाइपिंग के आलस) के चलते यहाँ प्रकाशित नहीं की गयी है| जल्द ही देश के अग्रणी विश्वविद्यालयों के वेबसाइट पर निशुल्क पढ़ी जा सकती है | तबतक आप ये  बताओ आपको क्या लगता है , आप पीने वाले हो?, “पियक्कड़" हो या आपके लिए पीना एक सामाजिक बुराई है?
धन्यवाद….
--देवांशु

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

आप आ रहे हो ना?

ज़माना जो है वो है फोन टैपिंग का…आजकल बाहर सारे नेताओं-अभिनेत्रियों के फोन जो हैं, टैप हो रहे हैं|  इसी माहौल को देखते हुए एक और टैपिंग हुई,  ये बतकही हुई महेशवा की लडकी रूपा और गाँव के “सो काल्ड उजड्ड" बिरेंदर के बीच, वो भी एस एम् एस पर  |  अरे वही जिनके बारे में पिछली बार बताये रहे हम..

तो हुआ यूं कि बिरेंदर जो है वो गिल्ली डंडा का मैच जिताए दिया  गाँव को,  सारे बाल-गोपाल अपने कंधे पे बैठाय के जुलुस निकाल दिए,  पूरे गाँव में | जुलुस जो है वो खतम हुआ कल्लू के हाते में, मुखिया जी खुद आये बिरेंदर को ५१ रुपये का इनाम देने और साथ में रोज ताजा दूध पहुँचवाने का वादा भी किये|

सारा वाकया, जो कल्लू के हाते में हुआ, महेशवा के घर से दिख रहा था, महेशवा की “दुक्लौती" पर छोटी लड़की, रूपा, फ़िदा हो गयी बिरेंदर पे| बिरेंदर भी “ज़माने" से फ़िदा रहे रूपा पे|

पिछले प्रधानी के चुनाव में महेश , करेंट प्रधान जी के  “स्टार"  प्रचारक रहे |  धाक जमाने के लिए अपना “मोबाइल" नंबर भी बता दिए सबको|  जबसे प्रधान जी चुनाव जीते, महेश लग लिए प्रधान जी की जी-हजूरी में, और फोन आ धमका रूपा के हत्थे…

फिर एक दिन जब सुत्तन की शादी के महिला संगीत में महेश का फोन, रूपा के हाथ में देखा तो बिरेंदर “सन्देश"  भेज दिए… “कैसी हो रूपा…बिरेंदर"

जवाब भी आ गया “हम ठीक हैं, तुम अपनी कहो"

बिरेंदर को तुरंत “बैलेंस" का खयाल आ गया “अरे तुम्हरे फोन में करेंसी तो है?”
 (भाई लोगो आजकल  करेंसी का मतलब मोबाईल का बैलेंस होता है)

इसका भी जवाब “निशा खातिर रहो, ३० रुपये का टाप-अप डलवाए हैं..१५०० एसमेस फ्री हैं"

इसके बाद तो बिरेंदर के पर लग गए..रोज रात एस एम् एस करने लगा…

अब बात उस दिन की जिस दिन टैपिंग हुई…. (इसके बाद जहाँ नाम दिखे समझो वो एस एम् एस कर रहा है)

बिरेंदर :  “कल सनीमा चलोगी???”

रूपा : “कौन सा?”

बिरेंदर : “गजनी”

रूपा : “धत्त, चंडाल लग रहा है अमिरवा, कोई रोमांटिक दिखाओ”

बिरेंदर : “रोमांटिक ही मानो, हम तुमको प्यार से “कल्पना" ही बुलाते हैं”

रूपा : “धत्त, रूपा अच्छा है”

बिरेंदर : अच्छा सुनो , अगर सनीमा नही जा सकती तो कल गेंदामल की दुकान पे मिलो| जलेबी खाओगी?

रूपा : “चुप करो, गेंदा चाचा रोज घर आते जाते रहते हैं”

बिरेंदर: “हम सब इन्तेजाम कर लेंगे, तुम आ जाना….कुछ बात करनी है तुमसे"

(इसके आगे कि कहानी आमने सामने की है,  “नो एस एम् एस” )

बिरेंदर सब सेट कर लिए, गेंदामल की दुकान पे पप्पू काम करता है, बिरेंदर का जिगरी दोस्त, उसको खोपचे में लिया गया…“सुनो पप्पू, कल दुई ठो मेज़ खाली रखना ३ से ४ के पास-पास"

पप्पू : “दो काहे?”

बिरेंदर : “अबे तोहार भाभी आ रही है, अब आमने सामने नहिए ना बैठ सकते हैं"

पप्पू : “ठीक है पर कमीशन लगेगा…पूरे ५ रूपये”

बिरेंदर : “ले लेना साले…एक बार बस मिलने का जुगाड़ कराओ”

अगले दिन ठीक ३ बजे रूपा अपनी तीन सहेलियों निम्मो, सीमा और सुधा के साथ गेंदामल के यहाँ पहुँच गयी| थोड़ी देर में बिरेंदर भी पहुंचा, साइकल की घंटी टनटनाते | और जा के बैठ गया ठीक रूपा के पीछे वाली मेज़ पे| दोनों की पीठ एक दूसरे की ओर थी…खुसफुसा के ही बातें हो रही थीं…

बिरेंदर :  “करीना लग रही हो एक दम!!!”

रूपा :  “तुम भी एक दम शाहरुख!!!!”

फिर दोनों हंस दिए| बिरेंदर ने चिल्ला के कहा “पप्पू , एक पलेट जलेबी लाओ"

पप्पू को कमीशन पहुँच चुका था, प्लेट सीधे रूपा की मेज में पहुँची…

बिरेंदर : “लो जलेबी खाओ”

रूपा ने एक जलेबी खाई, मिठास उसकी आवाज़ में उतर गयी “एक दम ताजी हैं"

बिरेंदर : “एक दम, पप्पू अपना आदमी है, बासी थोड़े देगा….समोसे खाओगी….बहुत नाम है यहाँ के  समोसों का”

रूपा :  “देखो ये बताओ बुलाए काहे हो, अम्मा से झूठ बोल के आये हैं कि सीमा के घर जा रहे हैं, जल्दी जाना होगा”

बिरेंदर : “अरे पहले खा तो लो , भूखे पेट कोई बात होती है भला”

रूपा : “सुबह से दो बारी खाना खा चुके हैं…अब काहे की भूख, जो कहना है जल्दी कहो”

बिरेंदर : “अच्छा ठीक है , अपनी सहेलियों को बोलो दूसरी तरफ देखे पहले”

रूपा : “बोलो, वो नहीं सुन रही, हम घर से मना करके लाये हैं कि केवल आँखे खुली रखना कान नहीं, अब बोलोगे कि हम जाएँ”

बिरेंदर : “अरे बिदकती काहे हो, बोलते हैं ना”

रूपा: “तो बोलो”

बिरेंदर : “अच्छा सुनो , हमें तोहरे पिताजी से बहुत डर लगता है”

रूपा : “हमको भी लगता है, ये बताने के लिए बुलाए थे ?”

बिरेंदर : “अरे नहीं, कल तुम्हारी अम्मा मिली थी सब्जी मंडी में , वो बहुत अच्छी हैं, और तुम्हारी दीदी की शादी में पानी का पंडाल हमहि देखे थे”

रूपा : “हमें पता है, तो ये बता रहे थे?”

बिरेंदर : “नहीं हम ये कह रहे हैं कि पप्पू कह रहा था कि तुम्हरी शादी के खाने और मिठाई का काम उसे मिल जाता तो ठीक रहता…”

पप्पू ने घूर के बिरेंदर कि तरफ देखा |  रेडियो कमेंट्री तो वो भी सुन रहा था|

रूपा : “काहे???”

बिरेंदर : “अब शादी हमारी होगी तो और कोई खाना कैसे बना सकता है…”

रूपा : “धत्त!!!!”

और वो उठ के वहाँ से चली गयी…
*****
आज गाँव में पंचायत बुलाई गयी है | हुआ यूँ है कि जब रूपा गेंदामल के यहाँ से उठ के गयी ठीक उसी समय पप्पू के घर से उसका आ गया बुलावा|  रूपा के शर्माने में पड़के बिरेंदर ने छंगा, जो पप्पू के साथ ही काम करता था, को समोसा-जलेबी के पैसे दे दिए और चलते बने | ये बात गेंदामल ने देख ली, बात महेशवा तक पहुंची, प्रधान जी से कह के पंचायत बुला ली उसने…

बिरेंदर पहुंचे अपने जिगरी दोस्त पप्पू और बंसी के साथ, दोनों का मोरल सपोर्ट लिए हुए| रूपा के साथ उसकी अम्मा थीं, सहेलियां पीछे भीड़ में थी, महेश एक तरफ पंचों के हुक्का-पानी का इन्तेजाम कर रहे थे..
पंचों ने सारी बात सुनी और अपना फैसला प्रधान जी को बता दिया….प्रधान जी ने बिरेंदर से कड़क के कहा…
“तुम होनहार हो बालक, पर इसका मतलब नहीं कि गाँव का माहौल बिगाड़ो”

बिरेंदर : “लड़ाई करने से माहौल बिगड़त है प्रधान जी, प्यार से नाही”

प्रधान जी : “सनीमा देख के आये हो का??”

बिरेंदर :  “नहीं, खुद से बोल रहे हैं|”

प्रधान जी : “तो रूपा से प्यार करते हो?”

बिरेंदर : “हाँ , हम मानते हैं कि हम रूपा से प्यार करते हैं|”

प्रधान जी रूपा की तरफ घूमे, लाज से वो खुद के अंदर समाई जा रही थी..प्रधान जी की आवाज़ में उतनी ही गुर्राहट थी..“तो तुम भी बिरेंदर को चाहती हो?”

रूपा कुछ नहीं बोली…प्रधान जी फिर बोले “बोलो हाँ या ना"

इस बार रूपा ने दिल कड़ा कर हामी में सर हिला दिया…अचानक से गाँव वालों में बातें शुरू हो गयी…प्रधान जी ने भी थोड़ा समय लिया, पंचों से राय सलाह की.. फिर खुद थोड़ी देर सोच के बोले …

“देखो बिरेंदर!!! काम तो तुमने वो किया है जिसको पूरा गाँव गलत माने,  पर हम जानते हैं कि तुमने जो भी किया है नेक इरादे से किया है,  जब तुम पूरे गाँव के सामने रूपा का हाथ थामने को तैयार हो और रूपा भी इसके लिए तैयार है तो हम फैसला तुम्हारे हक में देते हैं| और गाँव वालों से अपील करते हैं, कि ये हमारे गाँव की  पहली प्रेम कहानी है, सिनेमा देखने से अगर मार-पीट, लड़ाई-झगडा भी सीखे हो तो प्यार करना भी सीखो| नए जोड़े को अपना आशीर्वाद दो | पर देखो बिरेंदर, अगर कभी पता चला कि तुमने रूपा को कोई कष्ट दिया है तो सारे गाँव में मुह काला कर गधे पे बैठा के घुमाएंगे तुम्हे…अगर शरत मंजूर है तो सामने आके हाँ बोलो…

बिरेंदर ने देर ना लगाई…..

प्रधान जी फिर बोले “महेश तुम्हे कोई आपत्ति??”

महेश “माई बाप आप जो निर्णय किये हैं सही किये हैं"

प्रधान जी : “तो जाओ मंदिर से पंडित को बुलाओ आज यहीं पे शादी का महूरत भी निकलवा लेते हैं|”

पलक झपकते बिरेंदर के दोस्त पंडित जी को मंदिर से बिना चप्पल उठा लाये..पंडित जी ने बताया अगले महीने कि १२ तारीख को महूरत शुभ है| प्रधान जी ने शादी की घोषणा कर दी!!!!

पूरे गाँव को बुलाया गया है शादी में |  आपको भी आमंत्रण है | आप आ रहे हो ना ????

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

पढाई-लिखाई

        दुनिया में एक तो कन्फ्यूजन वैसे ही कम नहीं था | धरती गोल है या सपाट | एक कोई महानुभाव आये बोले “गोल है”..सबने  मान लिया | फिर आया कन्फ्यूजन कि चलता कौन है..सूरज या पृथ्वी…सब बोले पृथ्वी चलती है (हर किसी को लगता है कि वो चल रहा है बाकी दुनिया जड़ है)  सूरज रुका हुआ है…एक बार दुनिया ने फिर हामी भर दी | फिर एक और आये साइंटिस्ट, बोले कि देखो दोनों चलते हैं…सूरज और पृथ्वी…दुनिया बोली “ना !!! हम ना मानेंगे" …तो वैज्ञानिक बोले “आओ बैठो बांचते हैं तुम्हे ज्ञान | थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी |” जनता बोली समझने से बढ़िया हाँ बोल दो | काम खतम पैसा हजम |

        कुछ लोगो के पास केवल एक ही काम होता है, वो हर चीज़ को रिकार्ड करते रहते हैं,  घटना, सुघटना, दुर्घटना, खेल, खिलाडी,  अनाड़ी, कबाड़ी | जहाँ जिसके बारे में कुछ मिला रिकार्ड कर लिया | ऐसे लोग समाज के दुश्मन होते हैं| कुछ ऐसे ही लोगो की वजह से ऊपर दिए गए सारे कन्फ्यूजन रिकार्ड हो गये….जिसको ये सब समझ में आता है वो सब विज्ञान बोलते हैं और बाकी सब नौटंकी…

       और ऐसे ही समाज के द्रोहियों के लफड़े में पड़कर कुछ लोगो ने “पढाई-लिखाई" जैसी काली करतूत को जनम दिया…सोचो अगर पढ़ना लिखना बुरी बात डिक्लेयर की गयी होती तो? किताबे बेचना कानून के खिलाफ (कानून  की भी कोई किताब नहीं, जिसका जो मन आया वो क़ानून, पर किताब रखना सबके लिए गैर कानूनी) |

       
       पता चला कोई नया सिनेमा आता, हीरो बागी है, माँ-बाप की नहीं सुनता, किताबें पढता है, हिरोइनी भी बागिन (अब बागी का स्त्रीलिंग तो बागिन ही समझ में आया अपनी) , वो लिखती है!!! |  मुंबई की कहानी है, बड़ा शहर है, पढ़ना लिखना खुले आम होता है, दोनों भाग के शादी करते हैं, जीवन सुख से बीतने लगता है, कहानी खतम होती है, पिक्चर का नाम है “जब दोनों लिखे-पढ़े"|


       पहले तो पिक्चर की शूटिंग नहीं हो पाती….गंगा किनारे का सीन है कि हीरो हिरोइनी को छुप के किताब देने आया है |  शुरू ही हुई शूटिंग, कि आ गए कुछ लोग | “गंगा के किनारे इतना अपवित्र काम, पढाई???? ई बरस फिर सूखा पढ़ेगा, कल्मुहे और करमजली , गंगा किनारे किताब, घोर कलजुग"  | दो चार लोग सेट तोड़ देते, कुछ डायरेक्टर को रपटा लेते, कोई प्रोडूसर को पीट देता | एक तरफ कोने में म्यूजिक डायरेक्टर बज रहे हैं| गीतकार के कपड़े फाड़ दिए गए हैं, झोला फाड़ के काफिया मिलाया जा रहा है|
     
       मान लो छुप छुपा के किसी तरह पिक्चर पूरी हो गयी | रिलीज़ से पहले सेंसर बोर्ड आ जाता| देखो वो जहाँ जहाँ किताब दिखी है उसे धुंधला कर दो, जहाँ जहाँ पढाई लिखाई बोला गया हैं वहाँ “टूऊँ” डालो, और ये जो एक सीन है ना जहाँ पुस्तकालय दिखाया है, इसे तो भाई काटना पड़ेगा, नहीं तो पिक्चर पास नहीं होगी | और वो जो एक सीन है जिसमे नदी किनारे हीरो हिरोइनी को किताब देता है , इसकी वजह से पिक्चर एडल्ट घोषित की जाती है|

       पिक्चर रिलीज़ होते ही कोहराम, जगह जगह पिक्चर के प्रिंट जलाये जाते, पिक्चर के पोस्टर जिन गलियों में लगते वहाँ बच्चे  माँ बाप से नज़रें छुपा के जाते….”सोनू अरे ऊ समोसे की दुकान के no padhaiपीछे वाली गली के आखिर में वो जो बंसी की किराने की दुकान के सामने जो पोस्टर लगा है उ देखा? जे मोटी मोटी किताब दिखाई है” “अबे चुप हरामखोर धीरे बोल, पिता जी सुन लिए तो पोस्टर बाद में फटेगा, टांग पहले तोड़ दी जाई”|

      ऐसी फिल्मे छुप छुप के चलती | कल्लू के हाते में रात को सनीमा चलेगा १२ से ३ के बीच में, दीवाली के बहाने निकल लेना, बोलना होलिका दहन करने जा रहे हैं, कोई जान नहीं पायेगा|

     तब कुछ पढाकू लोग वैसे पढते जैसे आज छोटे शहरों के लडके छुप छुप के दारू-सुट्टा पीते हैं| “सुनो रेल की  पटरी के पास वो जो खंडहर है, आज शाम वहाँ १५-२० किताबे लाई जाएँगी,  सब इकठ्ठा हो जाना, २-४ सुना है कविताओं की भी किताबें हैं, सब पढेंगे | और देखो एक झटके में पढ़ना, जादा देर चहलकदमी हुई तो पकडे जाओगे,  और भाई पढ़ते पकड़े गए तो सुनीता-अनीता सब गयी हाथ से, शहर छोड़ना पड़ेगा|”

      तब किताबों के छोटे छोटे हिस्से किये जाते| सब आपस में बाटते और “चियर्स" बोलके जल्दी जल्दी पढते| लौटते वक्त सब अपनी ऑंखें धो लेते “कुछ शब्द आँखों में छप जो जाते हैं"| पकडे जाने का खतरा रहता|
    
      छोटा भाई, बड़े भाई की शिकायत करता पिताजी से “पापा मिंटू दादा किताब पढ़ रहे हैं" पिताजी छोटू को तो दो टाफी देते, मिंटू कूट दिए जाते…
    
      सुबह उठे तो स्कूल की बजाय जंगल चल दिए,  शाम को होमवर्क नहीं है, मस्ती से बैठे, आग जला रहे हैं |  होनहार होने कि कसौटियां बदल जातीं, महेशवा की लड़की कितनी होनहार है, चीते जैसी भागती है, और ऊ बिरेंदर गिल्ली डंडा का हीरो बन गया है, शादी हो जायेगी अब दोनों  की |
     
     वहीँ किसी के घर में तार आता “माँ मैं पढाई करने शहर भाग आया हूँ, परेशान मत होना” | और घर में कोहराम मच जाता…..
-- देवांशु