बुधवार, 20 मई 2015

First meeting, Nov 2013



Winter evening @ Select city walk....a mall near by my place in South Delhi....the girl that's me is ready to meet another guy my parents arranged for me (with a probability I will marry him) Usual with India and our parents ...I saw him entering the mall in coat, formal shirt and jeans from one of the sides of that huge entrance plaza of the mall.... Ohhps ...I missed it you must be thinking how I recognized him? Well we saw each others pictures before and chatted over phone a bit to coordinate our "the meeting" at "the mall”. Up till than I never knew I am going to share the next half of my life with him as my "better half" ....I was a difficult one on that context up till than.... More than difficult I was unsure was I be good for any one or not :). We doubt our capabilities sometimes... And marriage thing for Hindustanis’.... Believe me not that easy one!
We met at coffee cum ice cream cafe on ground floor. I could sense little bit of nervousness in him (though don't blame him for this I used to go bit unreachable for first meetings sometimes)when we entered the cafe until we sat down and ordered coffee ....the conversation which is usual for people meeting for arrange marriages started than ....what do you like? What do you don't like? Your expectations? What not!
 Meeting lasted for about half an hour than .I felt the set hopes I had made for my marriage fulfilling ....still was disconnected ....we do behave sometimes like that....for reasons unexplainable...
I said let's leave we have talked enough and let our parents know about our decision after thinking a bit over it.
But that was not the end he said let's eat something at the food court upstairs as I am feeling hungry...probably that was a trick to make the meeting a little longer (at least what I could sense that time) still I agreed. We went upstairs food court full as usual! We ended up with pizza at Italian restaurant near food court there.....again the conversation started about his hometown.....peculiar Lakhimpur (name of his hometown) lifestyle and people there....! His passion for literature and his liking about small unknown hill stations ....far reachable...with each one having small mysterious story to it (that’s how hill stations in our country are). I didn't had anything much more to share here with my restricted mindset of "first meetings". Well this part of knowing each other ended after another hour, we left ...I mean I left for my place by auto, he left for his place by metro. I told my parents about him after reaching home...had nothing much in mind to tell them except he is a simple, sober guy with not much on demand list with him. Couldn't say completely yes by than ...dad said take your time....
His mom called dad after a day of our meeting and told him that he has said “yes” and is OK for marriage if I am also in “yes” with him…but I was not completely by than….
And guess what this take your time thing
took another year almost …actually a little more than that for me!
 In Continuation....

बुधवार, 1 अप्रैल 2015

अब का लिखें ??

 
आज बड़े दिनों बाद की-बोर्ड पर खटर - पटर  करने का मौका हाथ लग गया । 

मौका तो लगा,  पर लिखें का ? समझ नहीं आ रहा था |  सोचा अपने ड्राफ्ट में झांकते हैं , कोई पोस्ट-वोस्ट धाँसू टाइप मिल जाए तो ठेल दी जाए |  अपनी पोस्टें खुदइ के पल्ले नहीं पड़ी | तब समझ में आया जनता पर काफी अत्याचार फैला रखा है अपन ने |

फिर सोचा जरा सबके हाल चाल लिए जाएँ | जनता कहाँ है , कैसी है , किन किन हालात से गुज़र रही है | जरा ये सब पता किया जाए , मौका-ए-वारदात का जायजा लिया जाए ।पर जनता घणी बिजी | लोग-बाग़ अपने अपने में लगे हुए हैं | कोई किरकेट में बिजी की इंडिया काहे हार गयी , कोई पोलिटिक्स में “आप" की छीछालेदर पर ज्ञान बाज़ी कर रहा है | कुछ इसी में बिजी की दीपिका पादुकोण का नया विडियो आ गया है |

इसके अलावा भी बहुत से काम में जनता बिजी है | ऊ सब पता लगाके अपन आप को इन्फॉर्म करेंगे |

पर मुद्दा अभी भी यही रहा की का लिखा जाए |  लिख तो अपन अपने बारे में भी सकते हैं की अपन कितने महान टाइप हैं | फिर लगा की ये मौका तो आने वाले वक़्त में बहुत लोग उठाना चाहेंगे , तो यहाँ भी लिखने के बारे में नहीं सोचे |

जब बहुत देर तक सोच लिए और कुछ समझ ना आया की का लिखें , तो अनूप जी याद आ गए | काहे की वो हमसे एक बार कहे रहे की “जब तक अच्छा लिखने के बारे में सोचोगे तो कभी नहीं लिख पाओगे , जो मन में आये लिख डालो” | तो लिखने से पहले उन्हैये को फोनिया दिए |

फ़ोन उठाते ही उन्होंने पूछा “और क्या चल रहा है ?” हमने भी कह दिया “काम में लगे हुए हैं” | वो बोले “ अप्रैल फूल मत बनाओ, अगर काम में ही लगना था तो अमरीका जाने का का फायदा , यहीं कर लेते” |  ये बात उन्होंने फेसबुक पर भी सटा दी | जनता दनादन लाइक कर गयी |  काफी जनता लाइक करने में भी बिजी है |

अनूप जी को भी अपनी दुविधा बताये की बहुत जोर लिखास चढ़ी है , पर लिख नहीं पा रहे | उन्होंने कहा लिख मारो , जो होगा देखा जाएगा | हौंसला थोड़ा और बढ़ा |  फिर वो ये कहके फ़ोन रख दिए की चलो जरा देखा जाए कहीं कोई हमसे बड़ी बेवकूफी का काम ना कर जाए

११ महीने पहले जब पोस्ट ठेले थे , तबसे अब तक बहुत सारी घटनाएँ हो गयीं | देश में अच्छे दिन आ गए | दिल्ली में तो और भी अच्छे दिन आ गए |  जब दिल्ली में और अच्छे दिन की जुगत बोले तो चुनाव चल रहे थे , तब अपन दिल्ली में ही भटक रहे थे |  चुनावी माहौल में बहुत चीज़ें देखने लायक थीं | सोचा था इसके बारे में वापस जाकर लिखेंगे पर लिखने से पहले मजा किरकिरा हो गया |  खैर का कहें, बस लिखने का स्कोप एक बार फिर हाथ से निकल गया |

बीते दिनों  अपन की लाइफ में दो घटनाएँ और और हो गयीं : पहली तो अपन की शादी तय हो गयी , और दूसरी बात की अपन की शादी हो भी गयी |  अपन के यहाँ अपन को “हम" कहते हैं | मैडम ( श्रीमती जी ) के यहाँ अपन कहते हैं | अपन की भी अपन कहने की आदत पड़ गयी है | और इससे हमारे पिताजी का कथन भी सही साबित हुआ की खरबूजे को नहीं बल्कि खरबूजी को देखकर खरबूजा रंग बदलता है

खैर , अब और का बताएं | अनूप जी भी बोले की तुम्हारे फेसबुक स्टेटस से लगता है की तुम बड़े जल्दी टिपिकल पति बन गए हो,  दुविधा खुल के फेसबुक पर लिख रहे हो , कहाँ से सीखा ? अपन ने भी कह दिया की सब विद्वजनों की संगत का असर है |

शादी को दो महीने से ज्यादा टाइम हो गया है |  अपनी लगभग सारी पोस्टें मैडम को पढ़ा झेला चुके हैं |  हर पोस्ट सुनने के बाद , दूसरी तरफ चेहरा करके मैडम कहती हैं “अच्छा लिखते हो” | दर्द छुपा ले जाती हैं |  उन्होंने भी वादा किया है की जल्द ही वो भी कुछ लिखेंगी | शायद हमारे शादी-काण्ड के बारे में,  काहे की कुछ मजेदार घटनाएँ वहां भी हुई हैं | खैर अब ये उनके ऊपर है |

फिलहाल बिना कुछ सोचे-समझे  अपन इतना ठेल दिए बोले तो   लिख-मारे | अब लिख दिए तो लिख दिए | आप मारना - वारना नहीं अपन को |

बाकी तो ये पबलिक है , सबइ कुछ जानती है |  बाद में मिलते हैं , तब तक टाटा !!!

-- देवांशु

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

मौजकाल का भौकाल !!!

ये भारतीय राजनीति का "मौजकाल" है | हर कोई एक दूसरे से मौज ले रहा है |

एक साहब हैं, कहते हैं ५६ इंच का सीना चाहिए देश चलाने के लिए | राजू श्रीवास्तव ज्यादा याद आते हैं , उनके मुताबिक "टाइटेनिक" के हीरो कोई हीरो नहीं हैं काहे की हीरो जो होता तो चौड़े सीने पे बाम्बू रख के टाइटेनिक को बचा लेता |  तो चौड़े सीने वाले हीरो हैं | मगरमच्छ को पकड़ के क्लास में ले जा चुके हैं | शूरवीर हैं | फिलहाल तो अच्छे दिन आने वाले हैं देखते हैं क्या होता है | ये बाकी लोगों से बहुत मौज ले रहे हैं आजकल  |

दूसरे जनाब हैं "कांट डांस" वाले | ये ज़माने भर को मौज दे रहे हैं | किसी ने कहा की युवाओं का ज़माना है | ये दिल से लगा गए | अपनी उमर से कम उमर की बात करने लगे | बस गाड़ी थोड़ी ज्यादा पीछे ले गए | टॉफी, गुब्बारे की बात करने लगे | गिनती भूल गए | "भिन्न" और "अनुपात" भूल गए | गणित गड़बड़ है इनकी | जब मुंह खोलते हैं , मौज दे बैठते हैं | जनता भी लगता है चाहती हैं की ये मुंह खोलते रहें |  इनको जिस बात पर लग रहा होता है की ये मौज ले रहे हैं दूसरे से, मिनट भर बाद पता चलता है की इनसे ही ज्यादा मौज ले ली गयी |  मुझे लगता है इनका भाषण लिखने वाला इनसे सबसे ज्यादा मौज ले रहा है |

तीसरे हैं "सीरियस जोक" महानुभाव | इनके हिसाब से हर वो इंसान भ्रष्ट और बिका हुआ है जो इनके खिलाफ बोलता है ( भले ही उस इंसान की आदत हर किसी के खिलाफ बोलने की हो) | इसलिए इनसे मौज लेने वाला फंस जाता है | सबसे बड़ी मौज इनकी ये है की ये सबको कैरेक्टर सर्टिफिकेट देते रहते हैं | जों इनके साथ है वो अगर गालियाँ भी दे तो ये महाशय ये कहके निकल लेते हैं की भड़ास निकाल रहा था बस गलत शब्द बोल गया , अब भड़ास निकालना भी गलत है क्या | ये बिना जनता से पूछे कुच्छो नहीं करते | ईमानदार हैं | पर उससे बड़े स्टंट मैन हैं | इनसे जितनी मौज ली जा सकती है उससे कम ली जा रही है |

और भी बहुत सारे हैं | एक हैं जो खुद बोलने में इतनी गलतियाँ करते हैं पर कहते हैं "युवाओं" से गलतियाँ हो जाती हैं | इनको भी किसी ने समझा दिया है युवाओं का ज़माना है , उनके फेवर में बोलो | इनकी हर काम में टांग अड़ा देने की आदत है और यू टर्न तो ये संकरी गली में भी ले लेते हैं | इन्होने राष्ट्रपति चुनाव में बहुत मौज दी | पहले बोले की एक को समर्थन करेंगे , फिर दूसरे को कर दिया | जब वोट देने की बात आयी तो पहले, पहले को वोट दिया फिर काट के दूसरे को वोट दिया | वैसे इनको वोट देकर आप बाकी किसी और से नहीं खुद से ही मौज ले सकते हैं |

एक मोहतरमा भी हैं | उनके हिसाब से सारी समस्याओं का हल है की राष्ट्रपति शासन लगा दो अगर वो मुख्यमंत्री ना हों तो |

और भी बहुत हैं , कहाँ तक बताएं | जाने दीजिये ना |

हमें पता है ये सब कचरा पढ़ने के बाद आप हमसे बहुत मौज लेने वाले हैं | लीजिये , सब मौज ले रहे हैं , आप भी लीजिए | अब मौज लेने पर कोई टैक्स थोड़े ना लगता है |

है की नहीं ???

-- देवांशु

( पहली लाइन अनूप जी की एक पोस्ट से प्रेरित बोले तो चुराई हुई Smile )

रविवार, 13 अप्रैल 2014

बधाई हो गुलज़ार साहब !!!


पूरी-पूरी रात तन्हाईयाँ काटते हुए जब मन बोझिल सा हो जाता है तो एक आवाज़ आती है की "रात भर सर्द हवा चलती रही रात भर हमने अलाव तापा" | लगता है जैसे कोई अपनी बात बहुत करीब से कह रहा है |

की जब बरसते पानी में बैठ चाय की चुस्कियों के साथ सुनते हैं "देर तक बैठे हुए दोनों ने बारिश देखी" |

या रहीमदास जी के कहे दोहे से इतर सोचते हुए एक जुलाहे से रिश्ते बचाने की कवायद कोई सुझाता है "जब कोई  तागा ख़त्म हुआ या टूट गया" |

या है कोई जो खुदा से कह सकता है की "पूरे का पूरे आकाश घुमाकर अब तुम देखो बाज़ी"|


जो "मौत को नज़्म" कहता है | मरने के बाद "रोशन खामोशी के वाले कमरे" में जाना चाहता है क्यूंकि "मकां की दूसरी मंजिल पर अब कोई नहीं रहता" |

या फिर जब सिनेमा की बात आती है तो उसने पीढियां देख डाली हैं | अनेक किस्से हैं , "कल तुम टाइम्स ऑफ़ इंडिया की कटिंग ले आओगे तो क्या मैं उस पर भी धुन बनाऊंगा" सुनने के बाद एक कालजयी गीत बनता है "मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है" | या सिर्फ एक लाइन "चप्पा-चप्पा चरखा चले" पर पूरी फिल्म का संगीत बन जाता है | मेरे जैसे ना जाने कितने लोगो का बचपन “चड्ढी पहन के फूल खिला है”  देख-सुन के बीता है | जो आइटम नंबर भी लिखता है तो उसमे "किवाम की खुशबू" डाल देता है | "जय हो” पर पूरी दुनिया झूम उठती है | और जो चुटकी लेने पर भी नहीं चूकता "बाद मुद्दत के मिली हो तुम, ये जो थोड़ा सा भर गयी हो तुम , ये वज़न तुम पर अच्छा लगता है "

कुछ ऐसा ही है वो शख्श , ना जाने कितनी पीढियां , हर पीढी के ना जाने कितने शायर , ढेरों पढ़ने-लिखने और सुनने वाले , उससे  इंस्पायर हुए हैं | एक "कैफियत" हुआ करती थी | अब "गुल्ज़ारियत" भी होती है | "त्रिवेणी" लेकर वो ही आये हैं "कल का अखबार था, पढ़ भी लिया रख भी दिया" |

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हमेशा इंसान ही सम्मानित नहीं होते पुरस्कार पाकर, कुछ पुरस्कार इस बात से भी सम्मानित हो जाते हैं की वो किसे दिए जा रहे हैं |

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गुलज़ार साहब, आपको दादा साहब फाल्के पुरस्कार की बहुत बहुत बधाई !!!!

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

फितूर !!!


आज बड़े दिनों बाद कुछ लिखने बैठा हूँ | ऐसा नहीं है की लिखना कोई हमेशा की आदत रही है या हुनरमंद हूँ लिखने में | बस मन करता था तो की बोर्ड पर खिटिर पिटिर कर डालता था | मन के फितूर को लफ़्ज़ों का जामा पहना देता और खुश हो लेता की वाह भाई जी क्या लिख डाला |

और ऐसा भी नहीं की लिखने की आदत कोई नयी थी | शायद नौवीं में था जब पहली बार कुछ लिखा था अपनी डायरी में | तब से बात बे बात, खयाल उस डायरी के सुपुर्द करता गया | आज जहाँ भी जाता हूँ वो डायरी हमेशा साथ रहती है | 

जब भी उसे पढता हूँ तो पाता हूँ की तभी कुछ लिखा जब उदास हुआ | मानो डायरी न हुई मेरा पंचिंग बैग हुआ | जैसे “आज आई आई टी के प्री में एक बार फिर फेल हो गया” , “आज रिजल्ट आया एक नंबर से सेकंड आ गया” या “पेपर में बैक आ गयी , कॉलेज में टॉपर हूँ फिर भी , अब ओनर्स नहीं मिलेगी" | ऐसा ही हमेशा कुछ | कुछ कतरे इश्क के भी हैं, पर खासे पर्सनल तो यहाँ लिखे नहीं जा सकते, पर हैं उदासी के ही | एक भी ख़ुशी के लम्हे को वहां से निकालना मुश्किल है | मानों ज़िन्दगी में ख़ुशी देखी ही ना हो | पर ऐसा है तो नहीं |

फिर इस ब्लॉग पर खुद के लिखे को पढ़ता हूँ, ये पिछले कई दिनों से कर रहा हूँ जो की एक कवायद है खुद को वापस पाने की | तो पाता हूँ की सिवाय खुराफात और ज़हर के शायद ही कुछ लिखा है | तो क्या ये एक मुखौटा भर है मेरा या एक चादर जो खुद को उढ़ा दी है | दुनिया को दिखाने के लिए | क्यूंकि आदत तो हमेशा दुःख देखने की है , ख़ुशी की बात अपने मुंह से अच्छी नहीं लगती खुद को ही |

मुझे लगता है जिन्दगी के कई हिस्से होते हैं , और उनमे से कई एक ही वक़्त पर पैरेलल चल रहे होते हैं | ये आप पर है किसे आप ऊपर रखते हैं | हम सब की जिंदगी इन हिस्सों के पाटों के बीच कहीं फंसी होती है | अगर हम इनके साथ घुमते हैं , जिन्हें कभी कभी समझौता भी कहते हैं , तो अपनी जिंदगी को चलता हुआ पाते हैं , और जो रुक के खड़े होते हैं तो इन पाटों के ही बीच फंस जाते हैं , पिस जाते हैं | अक्सर हम इसका दोष दूसरों पर मढ़ देते हैं और संतोष कर लेते हैं | पर ये सच्चाई नहीं | ये हमारी खुद की ज़िंदगी होती है जो वक़्त के साथ, हमें लाही के दानों की तरह पीसती रहती है | पर अपने को दोष कौन दे ?

पिछले कुछ वक़्त में ऐसा ही कुछ बीतता रहा ज़िंदगी में , ये शायद जिद थी मेरी या मेरा अहंकार की मैं झुकने को तैयार नहीं था | हिस्सों की अपनी रफ़्तार थी | जिन्दगी पिसती गयी | पर खुद को खुद पर भी दया नहीं आयी | जहाँ था वहां अड़ के खड़ा हो गया | भूल गया की “झुकते वो हैं जिनमे जान होती है अकड़पन  तो सिर्फ मुर्दे की पहचान होती है” | खुद को एक ज़िंदा लाश की तरह पाने लगा  इसीलिए |  

फिर अमेरिका आने की सोची , शायद ये एक समझौता ही था | खुद की आँखें बंद करके खुद को छुपा हुआ समझने की कोशिश | पर इसमे भी नाकाम रहा | खुद को एक कमरे में बंद कर लिया है बस | यहाँ मैं हूँ | मेरी तन्हाई को बांटने के लिए दो लैपटॉप जिनमे से एक मेरे ऑफिस का जो २४ घंटे चलता है | एक गिटार है जिससे कोई धुन अब नहीं निकलती | एक कॉफ़ी मग है और कुछ पुरानी यादों के धुंए का साथ  |  एक फोन है जो कभी कभी ही बजता है | बस और कुछ नहीं | 

और इसी सब के बीच याद आया की मैं तो लिख भी लेता हूँ | तो बस ये सब लिख डाला | ऐसी कोई ख़ास अहमियत भी नहीं है अपनी की लोग पूछेंगे की भाई जी आजकल क्यूँ नहीं लिख रहे या कहाँ गायब हो गए |  दुःख लिखना अखरेगा यहाँ और फिर वैसा बनने में ना जाने कितना वक़्त लगे |  

तब तक के लिए : अगड़म बगड़म,  स्वाहा !!!!

( ये सब मन का फितूर है , इग्नोर कर दीजियेगा किसी को दुखी करने का कोई इरादा नहीं है |  आप सभी को आने वाले २०१४  और आगे के सभी सालों की ढेरों शुभकामनायें  )

रविवार, 20 अक्टूबर 2013

एक सपने का लोचा लफड़ा…

आजकल माहौल बना हुआ है | एक बाबा जी ने सपना देखा है कि टनों सोना एक महल के नीचे दबा हुआ है |और जिसका सोना है उसने सपने में आकार कहा है कि निकाल लो सारा सोना और देश की अर्थव्यवस्था को बचा लेओ |

बाबा के पक्के भक्त जो हैं वो सरकार में मंत्री हैं | वो अर्जी लेकर बड़े बड़े लोगो के पास गये | और पी डब्लू डी और दूरसंचार विभाग से खुदाई करने के मामले में बाप साबित हुए एएसआई को खुदाई करने का जिम्मा सौंप दिया गया |

३ दिन पहले खुदाई शुरू भई | अभी तक रत्ती भर सोना नहीं मिला है | पर उम्मीद का जो दिया होता है, वो लगातार जले जा रहा है , उसका तेल खतम नहीं हो रहा | और जल्दी और गहरा गड्ढा खोदने की कवायद जारी है |

बाबा के भक्तों और सरकार ने पिछले कुछ दिनों से छाये निराशावादी काले बादलों को छांटते हुए आशावादी होने की जो मिसाल गढ़ दी है, उससे पूरे देश के हौंसले बुलंद हैं |  इसी घनघोर आशावाद के चक्कर में कल धोनी ने इशांत बाबू से गेंदबाजी करा दी | हार गए पर कोई बात नहीं , जीत भी जायेंगे | जैसे सोना अभी तक नहीं मिला , आगे मिल भी सकता है |

पर सोने को निकालने के चक्कर में बहुत मेहनत लग रही है | सरकार के लोग तो लगे ही हैं | मीडिया वाले भी पल पल की खबरें दे रहे हैं | सारे चैनलों ने अपने सिपेसलार भेज रखे हैं कि जाओ देखे रहो - ब्रेकिंग न्यूज़ सबसे पहले हमें ही देनी है |  पर जिस तरह से अभी कुछ हाथ लगा नहीं है उससे तो यही दुआ निकलती हैं कि “भगवान् जी खुदाई में इतना सोना ज़रूर निकाल देना की खोदने गए लोगो के चाय-पानी का जुगाड़ हो जाए !!!!”

पर ऊपर वाला पता नहीं क्या लिखे बैठा है ये तो उसके ऊपर वाला ही बता सकता है , पर फिलहाल खुदाई का काम चल रहा है , जोर-शोर से |

बाबा जी, जिनको सपना आया , उनका कहना है कि अगर इतना सोना निकल आये तो देश में विकास की नदी बहा देंगे | जनता विकास की बाढ़ में बह जायेगी | पूरे देश की मौज हो जायेगी  | और इतना सोना खर्च होने में भी मात्र कुछ घंटे ही लगेंगे , पर विकास फुल-फुल हो जायेगा |

बाबा जी के अलावा आजकल दो लोगो की और चर्चा है , एक हैं राहुल गाँधी और एक हैं नरेन्द्र मोदी | दोनों को भावी प्रधानमंत्री बताया जा रहा है | दोनों के धुआंधार समर्थक हैं | और उन सबकी माने तो अगले चुनाव के बाद इस देश में दो प्रधानमंत्री होंगे | एक लच्छे दार बातें करते हैं , एक बातों में गच्चा खा जाते हैं , पिछले दिनों वैज्ञानिक बने घूम रहे थे | पर दोनों के जो समर्थक हैं मानने को तैयार ही नहीं हैं | सोचो अगर बाबा जी को सपने में सोने की बजाय राहुल गांधी प्रधानमंत्री बने दिख जाते और वो ये सपना वो सबको बता देते तो ??? मोदी वाले भड़क जाते , धर्म के तो वो सब वैसे ही ठेकेदार हैं | बाबा को बे-धरम कर दिया जाता | राहुल वाले बाबा की जय-जयकार कर देते |मजा तब भी आता अगर बाबा को सपने में मोदी प्रधानमंत्री बनते दिख जाते | सरकार खुदाई की टीम भेजती बाबा की कुटिया उखाड़ फेंकने के लिए |  और मोदी वाले तो आश्रम बना डालते बाबा का, सुबह शाम जय बाबा , जय बाबा होता |

पर इस सबके बीच बाबा और सरकार की बड़ी छीछालेदर हो गयी | जनता ने मजे ले लिए | कि बाबा पूरे देश से मौज ले रहे हैं और सरकार भी पगला गयी है | सरकार ने तो पल्ला झाड़ लिया ये कहके कि बकायदा रिपोर्ट ली गयी है कि वहाँ कोई मेटल है जो लोहे के अलावा कुछ और है तभी खुदाई हो रही है , भले चाहे बाद में ताम्बे के बर्तन निकालें | पर बाबा जी और उनके चेले नहीं मान रहे | वो कह रहे हैं पक्का , २४ कैरेट सोना निकलेगा वो भी १००० टन |  लोगो का तो ये भी कहना है कि बाबा अपनी पब्लिसिटी के लिए ऐसा कर रहे हैं | पर हमें ऐसा नहीं लगता | पब्लिसिटी करनी होती तो बाबा किलो दो किलो की बात करते और खुद से रखवा के खुदाई करवा के निकलवा देते , वाह वाही हो जाती | १००० टन बड़ी बात है | बाबा ये रिस्क नहीं लेंगे |

आश्चर्य इस बात पर भी है कि अमरीका से इस बारे में कोई खबर नहीं आयी | हो सकता है कि वो लोग इस बार दूसरी स्ट्रेटेजी लगा रहे हों | दूसरी तरफ से जल्दी जल्दी खोदें और हमसे पहले सोने तक पहुँच जाएँ | दुनिया गोल जो ठहरी | सरकार को खुदाई तेज़ी से करवानी होगी , ढिलाई से काम नहीं चलेगा |  हो सकता है खोदते खोदते दोनों तरफ के मजदूर पृथ्वी के गर्भ में कहीं मिल जाएँ तो चाय पानी का जुगाड़ भी रखना चाहिए , दोनों एक दूसरे के मेहमान होंगे |

एक पुरानी कहावत है कि गाँव बसा नहीं लुटेरे आ गए | इसी कहावत के चलते के लोगो ने सोने पर मालिकाना हक जाता दिया है | राजा के सारे नाती-पोते निकल आये हैं | सब दावा कर रहे हैं | गाँव की बाकी जनता भी अपना हिस्सा मांग रही है | अगर सोना मिल गया तो बाँटने की कार्यवाही भी मौजदार रहेगी | न्यूज़ चैनलों को तैयार रहना चाहिए |

पर अगर सोना नहीं मिला तो ? सबकी बड़ी किरकिरी हो जायेगी | सरकार तो जांच आयोग बना के निकल लेगी | बाबा को जवाब देना पड़ेगा | वैसे एक आईडिया है , बाबा कह दें कि मिट्टी भी तो सोना है , टनों निकली है ले जाओ सब लोग थोड़ी थोड़ी | बाकी विधि विधान वाला फोर्मुला तो है ही , कुछ लफड़ा लोचा हो गया टाइप | या ये बता दें कि एक और सपना आया और जिस तरह से देह के लोगो ने बाबा का मजाक बनाया है उससे राजा क्रोधित हो गए और अपना सोना किसी और महल में शिफ्ट कर दिया है | सिर्फ बाबा को ही इसका पता है | और बाबा का मूड नहीं है बताने का | या थोड़ा फुटेज लेकर बताएँगे |

और खुदाई करते करते मान लो एक नया शहर मिल गया | सैकड़ों - हजारों साल पुराना शहर | शायद किसी उल्का पिंड या ज्वालामुखी के गिरने से नष्ट हुआ था | जो जहाँ जिस हालत में था वैसे ही खत्म हो गया | रह गयीं तो सिर्फ लाशें | सोती हुई लाशें | हजारों टन लाशें | यही हो हजारों टन "सोने" का राज़ | ये भी हो सकता है |

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, ये जो राजा थे इनकी सल्तनत बहुत बड़ी नहीं थी इसलिए इतना सोना होना लोजिकल तो नहीं लगता | पर हो सकता है राजा की रानी किसी बड़े देश कि हों दहेज में मिला हो | दहेज की चीज़ों को सरकार और इनकम टैक्स वालों की नज़रों से बचाकर पूरे जग में शान से दिखाने की कला में तो हम हिन्दुस्तानी पुराने एक्सपर्ट हैं | क्या पता ये माजरा हो |

पर चाहे कुछ भी हो , १००० टन सोने को छुपाने के लिए जितना बड़ा गड्ढा खोदना पड़ा होगा वो भी जब अँगरेज़ सेना ने आक्रमण कर रखा था, बड़े माद्दे की बात है | वो भी तब जब औजार भी फावड़ा कुदाल रहे होंगे | १००० टन सोना मिलने पर उन खोदने वालों के घर वालों को ढूंढ कर मोटा इनाम दिया जाना चाहिए |

अब सोना मिलता है या नहीं ये तो वक्त बताएगा | फिलहाल माहौल बना हुआ है | दावों और मौज के दौर चल रहे हैं | मजा आ रहा | आप भी मजे लेते रहिये | हम भी चलते हैं , रात के खाने का प्रबंध करने में माता श्री की सहयता करने की कोशिश की जाए | फिर रात होने वाली है, फिर कोई सपना देखेगा, फिर बवाल कटेगा | हम आपसे फिर मिलेंगे |

तब तक के लिए सोना मत, सोने पर नज़र रखना |

-- देवांशु

P.S. : पिछले दिनों हमारा जन्मदिन बीता |  बी टेक के पासिंग मार्क्स बोले तो ३० नंबर ( साल ) जुगाड़ लिए |  मजा आया |  आप सब की “हैप्पी-बड्डे-टू-यू" ने माहौल बना दिया | आप सबका खूब सारा थैंक यू |

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

The “Talented” Culprit Since 1992

Someone has well said “People always want to see not the rise of great man but actually the fall”. Agree. Write something against the greatest (most popular) possible person in your book and your book will become a best-seller. So I thought why not fly the kite in the blowing wind.

The sweetest target I found from current affairs is none other than Mr. Sachin Ramesh Tendulkar (My MS word was saying that there were spelling mistakes in the last two word which I have written, don’t worry MS, I have added them in to dictionary). According to me, he is a real culprit. Let me prove that ( Believe me I am very good at that ).

OK, let’s start with Mr. Abdul Qadir, one of the greatest spinners which Pakistan has ever produced. He was the first person to see the demon in the hardly 5ft tall little kid. Curly hair, height little longer than the stump, power in mind and the same name “Power “on the bat, this kid at that time hit 4 sixes in a single over in one of the exhibition match between the two teams. And as the wheel of time rotated, world saw many more victims likes of Mr. Shane Warne, for whom this little kid became the nightmare. We are lucky enough to be born as an Indian otherwise we couldn’t have watched and enjoyed him at the same time.

imageAnother set of people belongs, for whom he is a culprit, are from his home country and more importantly from his own team. Everyone knows about the one time record partnership between two batsmen at the school level. My Mr. Culprit along with his “Jai-Veeru” partner Mr. Vinod G. Kambali, kept on batting even their Guru Mr. Acharekar, a Dronacharya Awardee, kept on asking them to declare the inning. And these two guys never looked at him. The victim is not Mr. Acharekar but Mr. Amol Mazumdar ( the highest run getter in the Ranji Trophy ) was on the bench with pads on. He never became a international player though he made 260* on his debut in first class. Not only Mr. Mazumdar, many more to count. He is a dangerous culprit. Isn’t he??

As per my analysis, the next bunch of victims again the bowlers who indirectly got one of the worst possible hammering from the batsmen likes of Viru Sehwag and UV Singh. These two  claims that they are the biggest fan of the son of Marathi Novelist Mr. Ramesh Tendulkar. Neither me nor Mr. Stuart Broad can forget the evening in “Safari” when he was hit for 6 sixes in a single over of UV. Sachin, who once wanted to be a fast bowler and joined the MRF Pace foundation as well, became the culprit for so many bowlers not only directly but indirectly also in such cases.

My allegation finds next set of evidence from the home country players of this master blaster. There are two ways in which he has harmed. Firstly, because of his status, sometime he praises the bowler from the opponent side and that bowler becomes headache for rest of the Indian team. One such incident I remember when India was playing against Sri Lanka in Australia, after taking a single on the yorker length delivery from “Slinga” Mallinga, when Sachin reached at non-striker end, he praises the bowler for such a nice delivery and next ball, Gauti was bowled out. What a culprit is he? Second way, which is again due to his status, in which he has destroyed the players likes of Rohit Sharma. Some players got the appreciation from Mr. Tendulakar, in the beginning and couldn’t carry out the expectation in future. Hope they will understand how this person has groomed up in the career. I am writing this to prove my point that he is a culprit as I am also a fan Gauti and Rohit…

And finally the victims of this Master act is a complete generation whom people like me and you belong. We have “Utilized” so much of our time in watching Cricket and the reason for that always been HE. If he is playing then to watch him otherwise to watch how India will perform in absence of him. My mom always says, If I wouldn’t have wasted so much time in watching cricket ( As I used to watch complete match, then the news to see how Doordarshan is going to praise him and then again the highlights which used to be broadcasted during late night hours ),I would have become IITian Smile. But whatever I am today, I am lucky enough to be alive in an arena when this master blaster has brutally and ruthlessly has tore the bowling attack of opponents, apart.

Anyway, whatever “Saakshya” (the Sanskrit word for evidence) I have given here to prove him a culprit, I , as  many other cricket followers, worship him. I can stop all my important work to watch him completing 200* against Proteas and can jump over it when Ravi Shastri declares “First man on the planet to reach there and he is superman from India..take a bow master”..

Just because of this “Talented” gem of India, I am dedicatedly watching and following this magical game of cricket since 1992, and he remains a “Culprit “ since then…and if there is any sin related for him being the culprit …. I am ready to take that on my name……

--Devanshu

( Since yesterday I am having a strange feeling, the test cricket, the format which I enjoyed the most how will it be when Sachin will not be there. )

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

ट्युज॒डेज विध मोरी : ए बुक टू चेरिश !!!


“Have I ever told you about the tension of opposite” he says.
The tension of opposite ?
“life is a series of pulls back and forth. You want to do one thing, but you are bound to do something else. Something hurts you, yet you know it shouldn’t. You take certain thing for granted, even when you know you should never take anything for granted.
“A tension of opposite like a pull on a rubber band. And most of us lives somewhere in the middle.”
Sounds like a wrestling match, I say.
“A wrestling match” He laughs. “Yes, you could describe life that way.”
So which side wins, I ask?
“Which side wins?”
He smiles at me, the crinkled eyes, the crooked teeth.
“Love wins, Love always wins.”

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हम सब जानते हैं कि हमें एक दिन मरना है पर ज़िंदगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा हम हर आने वाले कल के उत्साह में बिताते जाते हैं | फिर जब एक दिन पता चलता है कि अब बस मौत नज़दीक है , ज्यादातर लोग उदास हो जाते हैं , रिग्रेट करते हैं | जिस दिन कल का उत्साह खत्म हो जाता है, हम मौत की तरफ बढ़ते नहीं, क्राल करते हैं |
पर “प्रोफ़ेसर मोरी" ऐसा नहीं था | एक भयंकर बीमारी के बाद जब उसे पता चलता है कि ज़िंदगी बस खत्म होने वाली है , वो दुगुना जीने लगता है | लोगों से मिलने लगता है, टीवी पर उसके शो आने लगते हैं , वो अपने जिंदगी जीने के जज्बे के चलते लोगों के बीच में एक अलग जगह बना लेता है |
There are some mornings when I cry and cry and  mourn for myself. Some mornings, I’m so angry and bitter. But it doesn't last too long, Then I get up and say ‘I want to live…’
उसी के बाद उसका एक पुराना स्टूडेंट, मिच एल्बम , किताब का लेखक, उससे मिलने आता है | मिच , मोरी का फेवरेट स्टूडेंट रहा था |  वो उसे अपने बचे हुए दिनों में मिलते रहने के लिए कहता है | उसे ज़िंदगी का अपना नजरिया बताता है | इत्तेफाकन वो हर ट्युज॒डेज को मिलते हैं , ऐसा वो कॉलेज में भी करते थे | उसी नजरिया को मिच डोक्युमेंट करता है |
और बस यही है, ट्युज॒डेज विध मोरी…
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किताब में ऐसा कुछ नहीं है जिसके बारे में आपने देखा, सुना या समझा ना हो | पर हर ऐसी चीज़ जिससे हम वाकिफ होते हैं, उसके बारे में हम वही नजरिया अपनाते हैं जो हमको सूट करता है | शायद यहीं आकर ये किताब नया पहलू देती है हर उस बात को | आपको हर पन्ने पर सोचने पर मजबूर करती है | दुखी नहीं करती | कभी कभी आपको जिंदगी के ऐसे पन्नों के बारे में सोचने को मजबूर करती है , जिसको हम अक्सर या तो भूल चुके होते हैं या जान बूझकर अनजान बने रह जाते हैं | किताब आपको पास्ट को भूलने को नहीं कहती :
Accept the past as past, without denying it or discarding it
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मोरी और मिच , जिंदगी के बहुत से पहलुओं पर बात करते हैं  जैसे डेथ, रिग्रेट, फैमिली, लव, इमोशन, एजिंग, मनी,  मैरिज , कल्चर आदि | सबके बारे में उस सख्श के बयान जिसके सर पर मौत खड़ी है , पर उसने मौत के सामने हार नहीं मानी |
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बाकी इससे ज्यादा और कुछ नहीं लिखा जा सकता इस किताब के बारे में मेरे हिसाब से | बाकी आप खुद पढ़िए और समझिए | शायद कोई नया नजरिया आपका इंतज़ार कर रहा हो |
Love is the only rational act

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--देवांशु
(शुक्रिया अनु जी का जिन्होंने  इस किताब को रेकमेंड किया)

सोमवार, 19 अगस्त 2013

१५ अगस्त का तोड़ू-फोड़ू दिन !!!

 
सबेरे उठे तो सालाना आदत के चलते माताश्री १५ अगस्त के शुभ-अवसर पर प्रधानमंत्री का भाषण सुन रही रहीं | सबसे पहले जो डायलोग कानों में गया वो ये रहा (शब्द थोड़े अलग हैं):

“गरीबी को नापना एक मुश्किल काम है , लोगो के अलग अलग ख़याल हैं, पर कोई भी परिभाषा अपनाएं २००४ के बाद से गरीबी बहुत कम हुई है”

हमें लगा इससे ज्यादा ना सुन पाएंगे भाई , अभी एक और  साहब का भी सुनना है स्पीच , वो पहिले ही दावा कर दिए हैं की प्रधानमंत्री से अच्छा भाषण देंगे | सोचे शाम को दोनों का एक-एक करके सुनेंगे | फिर से सो गए |

देशभक्ति तो आज के दिन ऐसे तोड़ू तरीके से जगती है की पूछो मत |  नीचे की फ्लोर पर रहने वाले लड़कों ने तो एक दिन पहले से मनाना शुरू कर दिया | काफी रात तक नाच गाना चलता रहा | आजादी का नशा कोई मामूली नशा नहीं होता है | हम भी बोले की हम आज़ाद हैं और रात १२  बजे से पूरे चार घंटे का गिटार प्रोग्राम चलाएंगे तो जवाब में सिस्टर जी ( अब बहन जी तो नहीं बोल सकते ना ) ने कहा हम भी आज़ाद हैं , गिटार संभाल लेना फिर |  हमने अपने अरमानों का गला घोंट दिया |

आज़ादी का दिन था  तो हम वैसे ही देर से उठे  |  बचपन में १५ अगस्त एक दम पूजा टाइप लुक देता था | कथा टाइप भाषण होते और बाद में परसाद में बूंदी के लड्डू मिलते |  फिर वक़्त बदला , आजादी का मतलब भी बदल गया |

सबसे पहले घूमने निकले की देखा जाए की कहाँ कैसे आज़ादी मनाई जा रही है | सामने के सेक्टर में भाषण-बाजी चल रही थी | थोड़ी देर सुने फिर आगे बढ़ गए | ऐसा लगभग ३-४ पार्कों में हो रहा था | आगे मंदिर पहुँच गए | वहां भी बराबर भीड़ थी | मुझे लगा की भगवान् की पूजा तो आज भी होनी चाहिए | उन्ही के भरोसे तो ये देश चल रहा है |  वरना डुबाने वाले तो कबसे उतारू बैठे हैं | भगवान् जी से मुलाकात करके आगे बढे | हलवाई के यहाँ से घेवर खरीदा, माताश्री को बहुत पसंद है |

घर वापसी पर मकान-मालकिन को किराया बढ़ाये जाने को लेकर वार्षिक बहस हुई, जो हमने १००० के मुकाबले १०० रुपयों से जीती  |

तभी  सोनल का फ़ोन आ गया “आज तो आज़ाद होगे ??”
हमने कहा “नहीं जी , बड़ी गुलामी में जी रहे हैं”
उधर से आवाज़ आयी “तो फिर सही समय पर ठिकाने पर पहुच जाना” |

दरअसल सोनल के घर पर एक गप्प-गोष्ठी का आयोजन किया गया था |  कई अतिथि आ रहे थे, और सारे मुख्य-अतिथि  |  शिखा जी , अनु जी , आराधना जी , अभिषेक बाबू | हम भी इन-वाईटेड थे |

सोनल जिस कम्युनिटी में रहती हैं उसके गेट पर खड़े  गार्ड ने हमें सबसे पहले रोका | बोला टिकस लै लेयो | हमें लगा की उसे आइडिया लग गया है की बड़े बड़े लोग आ रहे हैं, तभी इंट्रीटिकस लगा दिया है ( अब तो भाषण सुनने के भी रुपये लगते हैं )  | हमने कहा एक टिकस दै देयो |  पर वो बोले पहले उनसे बात कराओ जिनके पास जाना है | सोनल से बात कराई गयी | तब जाकर टिकस मिला | फोन पर ही पता चला की अभिषेक बाबू भी आ गए होंगे, देख लो  | देखा तो वो गेट में घुस ही रहे थे, हमने कहा टिकस पर +१ कर दो |

कम्युनिटी बहुत शानदार रही |  हमने अभिषेक से कहा यार बड़े महंगे घर हैं, अपनी औकात से बाहर | उन्होंने भी हामी भर दी | फिर हमने कहा “एक घर तो ना ले पाएंगे , पूरी कम्युनिटी कितने में बिकेगी ये पता लगाओ" | उन्होंने हमें घूर के देखा |

अन्दर दूसरे गार्ड से बिल्डिंग की लोकेशन पूछी , बोले है तो यही पर. टिकस है ? हमने दन्न से टिकस दिखाया | तब अन्दर जाने को मिला | बड़ा ताम-झाम वाला काम रहा यहाँ तक |

DSC01458शिखा जी पहले पहुँच चुकी थीं | हम लोग भी पहुँच गए | पता चला बाकी लोग नहीं आयेंगे इस लिए गप्प-वार्ता-आलाप शुरू किये गए | दुनिया जहान की बातें |  इसे ब्लॉगर-मीट कहना उतना ही सही रहेगा जैसे हिन्दुस्तान को लोकतंत्र कहना (सटायर) |

गप्प की रेंज एटम बम की रेंज से ज्यादा होती है |  शुरुआत हुई खस के शरबत से जिसमे सोडा मिला हुआ था |  पहले सब लोग सभ्यता के साथ हँसते रहते , बाद में सभ्यता की डोरी टूट गयी और चिग्घाड़-चिग्घाड़ के हंसाई प्रोग्राम चालू हो गया |

सोनल ने दोपहर का डिनर बहुत फोड़ू टाइप बनाया था | स्पेशली मिक्स-वेज | ठूंस-ठूंस के खाए |  मिठाई भी बहुत बढ़िया थी |
DSC01465
गप्प-गोष्ठी पार्ट-२ शुरू हुआ | बीच बीच में फोटो खीच के सोनल फेसबुक पर डालती रहीं | ऐसे ही टाइप की एक मीटिंग लास्ट इयर भी भई रही | हम पहले ही बोले थे सोनल को की किसी और को भी बुला लेना वरना लगेगा की लास्ट इयर की डाल दिहिन हैं फोटो | पर अनु जी ने ना आकर हमें बचा लिया | लेकिन परशांत बाबू यही कमेन्ट कर दिए  ( इंगेजमेंट के बाद इंसान काफी प्रेडिक्टेबल हो जाता है ) | उनसे भी निपटा गया |


सही बताएं तो भूल गए हैं की कौन कौन सी बात पर और कित्ता हँसे | पर हँसे बहुत | फिर ये हुआ की कॉफ़ी पी जाए | हमने कहा हम बना देते हैं | काफ़ी बनाई तो शर्त ये रखी गयी की पियेंगे तब , जब तुम ट्रे में सजा के लाओगे |  हम बहुत सीधे वाले बच्चे हैं , फटाफट मान गए | पर शिखा जी ने तुरंत फोटो खींच ली | और सोनल ने फेसबुक पर डाल दी |  जनता भी ना !!!!

DSC01478फोटो पर अनूप जी ने पहले तो कहा की पल्लू भी डाल लो हीरो बेटा , फिर अगले कमेन्ट में कह दिए की कोर्ट में जाकर केस कर दो, निजता का उल्लंघन हुआ है तुम्हारी |  बात तो गौर करने वाली है वैसे, देखते हैं किसी टाइम |
 
थोड़ी देर के लिए ब्लॉग के बारे में बात हुई | ज्यादातर ब्लोगरों को हम जानते ही नहीं थे तो इस हिस्से में हम सन्नाटे में रहे , सुनते रहे | पर ये चर्चा ज्यादा देर चल नहीं पायी | सब वापस औकात पर गए | सबकी बारी बारी से टांग खिचाई हुई |

शिखाजी ने अपनी नयी किताब “मन के प्रतिबिम्ब" हम लोगो को गिफ्ट की | अभी पढ़ नहीं पाए हैं , उसके बारे में फिर कभी  | आजकल “ट्यूसडेज विध मोरी” पढने में टाइम निकला जा रहा है | ये किताब पिछली मुलाकात में अनु जी ने सजेस्ट की थी | पहली बार कोई किताब पढ़ रहे हैं जो हर पन्ने पर अपना समय मांग रही है  | बहुत बढ़िया किताब है   |

शाम हो गयी थी तो अब वापस जाने का समय हो गया | सोनल ने अपनी ड्राइविंग कौशल का परिचर दिया , हम सब को सकुशल पंहुचा दिया | सबसे मिलना एक बार फिर बहुत बढ़िया लगा |

घर  आकार परधानमंत्री और सो-काल्ड भावी परधानमंत्री दोनों का भाषण सुने फिर से | सही बताएं तो दोनों बेकार लगे | एक ने कहा “हमने ये ये किया इसलिए अगली बार हमको वोट दो” | दूसरे ने कहा “देखो उन्होंने ये ये किया इसलिए अब हमको वोट दो” |

रात में अनूप जी का फ़ोन आया , उन्होंने कहा की पोस्ट लिखी जाए इस मीटिंग पर | हमने चिट्ठा चर्चा की डिमांड कर दी | उन्होंने कहा तुम लिखो पोस्ट, हम चर्चा शुरू कर देंगे | उन्होंने अपना वादा पूरा कर दिया पर हम पोस्ट ठेल नहीं पाए | वीकेंड भी भागा-दौड़ी में निकल भागा | अनूप जी ने फिर से चेताया की बेटा ये बड़े ब्लोगरों के लक्षण हैं जो कहने पर भी पोस्ट नहीं लिखते | अब इस आरोप से बचना बहुत ज़रूरी था तो बस ठेल दी ये पोस्ट, बाकी इसमे हमरी और कोनू गलती नहीं है |

फिलहाल आज़ादी के दिन की बिलेटेड शुभकामनायें !!!!

मनस्ते !!!!
-- देवांशु

सोमवार, 5 अगस्त 2013

लिफाफे में सादा कागज़ निकलने से हड़कंप

नई दिल्ली | प्रधानमंत्री कार्यालय को मिले एक पत्र के लिफाफे में सादा कागज़ निकलने से हडकंप मच गया है | सारे नौकर और अफसर शाह आदतानुसार बगले झांकने लगे है |

दरसल ये घटना सत्ता धारी गठबंधन की अध्यक्षा द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे पत्र से खड़ी हो गयी | पिछले दिनों झुमरीतल्लैया  ( जिसको असली में कोडरमा के नाम से जाना जाता है ) से कुछ लोग माननीया से मिलने आये थे | उनका कहना था की विविध भारती पर प्रकाशित होने वाले कार्यक्रम “आप की फरमाइश" में पिछले करीब १५ सालों से उनके परिवार के कुत्ते का नाम बार-बार लिया जा रहा है | १५ साल पहले जब उन्होंने रक्षाबंधन के त्यौहार पर “बहना ने भाई की कलाई पर प्यार बाँधा है” वाला गान सुनने के लिए चिट्ठी लिखी थी तो उन्होंने अपने कुत्ते का नाम “शेरू" भी लिख दिया था | पर वो ये लिखना भूल गए थे की ये उनके कुत्ते का नाम है |

शेरू की मौत करीब १० साल पहले हो चुकी है |  पर हर साल रक्षाबंधन पर विविध भारती वाले उसका नाम ले लेते हैं उसी चिट्ठी का हवाला देकर, जिससे परिवार आहत हो जाता है |  फिर वैसे भी अब कुत्ते का मरना राष्ट्रीय आपदा है | उन्होंने इस आशय के कई पत्र विविध भारती और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को लिखे पर कोई कार्यवाही नहीं हुई | इस लिए अब वो सीधे माननीया के पास अर्जी लेकर आये हैं | अर्जी लेकर आये लोगो में मोनू , सोनू, बंटी , राजू और उनके सभी दोस्त शामिल थे |

मुलाकात के बाद जब शाम को प्रधानमंत्री ने अपनी रेगुलर परमिशन कॉल की माननीया को, तो उन्होंने इस घटना का संज्ञान लेते हुए कहा की वो इसके बारे में कल एक पत्र भेजेंगी जिसके बाद प्रधानमंत्री इस पर कोई त्वरित एक्शन लेने का एलान करेंगे | प्रधानमंत्री ने अपना पसंदीदा डायलोग दाग दिया "ठीक है" |

प्रधानमंत्री ने इस घटना के बारे में तुरंत एक्शन की घोषणा सुबह सुबह कर दी |  इसे माननीया के द्वारा भेजे गए पत्र के लिए  उठाया  गया कदम बताया और शाम को इसके बारे में विस्तृत जानकारी देने के लिए प्रेस-कांफ्रेंस बुला ली |  पर दोपहर में प्रधानमंत्री कार्यालय से खबर आ गयी की पत्र के लिए जो लिफाफा भेजा गया उसमे सिर्फ सादा कागज था | ये बात प्रधानमंत्री तक नहीं पहुँच पायी और वो सीधे प्रेस-कोंफ्रेंस में पहुच गए |

उन्होंने  उठाये गए क़दमों को पहले तो  युवराज की पहल और माननीया की देश के प्रति चिंता बताया फिर पहले से निर्धारित प्रश्नों के जवाब दिए | तभी एक खुराफाती पत्रकार ने ये सवाल दाग दिया की सादे कागज पर ही एक्शन कैसे ले लिए तो प्रधानमंत्री के पीए  असमंजस में आ गए | किसी को कुछ समझ नही आया की क्या कहें और क्या करें |  कुछ लोगो ने इसे हल्की सी गलती बताया जिसपे भारी हंगामा हो गया | कांफ्रेंस संसद भवन में तब्दील हो गयी | कुछ पत्रकार पक्ष में आ गए कुछ विपक्ष में | शब्द बाण चलने लगे |

माहौल बिगड़ता देख प्रधानमंत्री ने अपनी शायरी के ज्ञान के चलते एक लाइन में बात निपटाई :
“हम वो हैं जो लिफाफे का रंग देख ख़त का मज़मून जान लेते हैं” |
तब जाकर मामला शांत हुआ |

इस बीच नाम ना लिए जाने की शर्त पर प्रधानमन्त्री कार्यालय के एक उच्चपदासीन अधिकारी ने बताया है की दरसल वो सादा कागज़ प्रधानमंत्री कार्यालय को पिछले बयान के चलते दी गयी क्लीन चिट थी जो गलती से गलत लिफाफे में चली गयी | इस घटना के बाद से प्रधानमंत्री के द्वारा  आने वाले स्वतंत्रता दिवस के लिए बोली जाने स्पीच के लिफाफे की ट्रेकिंग पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है |

अभी तक पीड़ित परिवार से कोई संपर्क नहीं हो पाया है |
--देवांशु
(फोटू के लिए गूगल बाबा की जय हो )