रविवार, 22 जुलाई 2018

प्राइम टाइम का लोचा !!!

९ बजता है , ५२५ देशी विदेशी वाद्ययंत्रों की जुगत भिड़ाकर बनी दिल दहला देने वाली ट्यून के साथ घोषणा होती है :
नमस्कार , देश दुनिया के तमाम लफड़े और लोचे और उनके ऊपर नयी नयी सोंचें लेकर, मैं आपका फ़लाना एंकर हाज़िर हूँ ।
८० के दशक में हीरो और विलेन के फ़ेस ओफ वाली सिचुएशन वाला म्यूज़िक : टे ड़े टे ड़े ( बिना पूछे की कौन है , भावनाओं को समझें ) । दर्शक और एंकर के बीच पहली बार आमना सामना । फिर से आवाज़ बुलंद होती है :

समाज कहाँ जा रहा है ? हमारी सोच को क्या हो गया है ? घर के बाहर , दिन के उजाले में भी अब लड़की सुरक्षित नहीं ? बाहर ही क्यूँ , घर के अंदर की ये पित्रसत्तात्मक व्यवस्था कब तक नारी का अपमान यूँ ही करती रहेगी ??? कब तक आख़िर कब तक ?? इस सब चर्चा करने के लिए हमारे साथ हैं जानी मानी महिला मोर्चा एक्सपर्ट : फलानी । भरपूर मेकअप , चमचमाते गहने के साथ एक्सपर्ट पर कैमरा जाता है , वो स्माइल देती हैं । 

“ आपका क्या कहना है “ एंकर हड़काते हुए पूछता है | मिमियाती पर सुरीली आवाज़ में जवाब : “इसका कारण पुरुष प्रधान समाज है, पुरुषों के लिए महिला सिर्फ़ एक खिलोना है और कुछ नहीं “

दिन भर आफिस में लोगों की क़चर पचर सुनकर आए दर्शक का हाँथ ये सुनकर काँपता है , म्यूट बटन के खोजकर्ता की खोज को वो सफल बनाता हैं , और सोफ़े पर टाँगें फैलाकर सपनों में खो जाता है ।

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१२ घंटे पहले का सीन , लोकेशन वही कमरा । सीन में नायक है और उसकी बीवी । सोफ़े की जगह फ़ोकस डायनिंग टेबल पर शिफ़्ट हो चुका है । नायक के बालों से पानी चू रहा है , पक्का नहाकर आया है । सभ्य कपड़े पहने हैं मतलब आफिस जा रहा है । मुखारविंद को बीवी की तरफ़ घुमता है :

“आज फिर ब्रेड, कभी पराँठे भी खिला दो”
“बीवी हूँ तुम्हारी नौकर नहीं , यही खाओ मुझे भी लेट हो रहा है , और ये कितनी देर बाथरूम में लगाते हो , फिर से फ़ोन लेकर गए थे क्या , कब सुधरोगे , सवा नौ हो रहा है , मैं कब तैयार होऊँ “

ये सोचते हुए की नौ बजकर ५ मिनट पर वो बाथरूम में दाख़िल हुआ , प्रातः करणीय सारे काम निपटाकर , नहाकर ( फ़ेसबुक पर दो चार पोस्ट पढ़कर , लाइक शेयर कर के ) वो बाहर आकर रेडी हुआ है , अब जिरह करने से बेहतर है की ब्रेड खा ले । 

वो घड़ी देख रहा है । पौने दस हो गए हैं , श्रीमती जी नहानकार्य निपटाकर रेडीनेस को टच उप दे रही हैं । उसने अपना बैग चेक कर लिया है , सब सामान है । घड़ी हाँथों में बाँधते हुए श्रीमती जी का प्रवेश :

“तुम्हारी वजह से फिर लेट”

नायक चेहरे पर ये सवाल उकेरता है कि मैंने क्या किया पर इमोशन छुपाता है क्यूँकि परसों ऑफ़िस से आकर टाई से लेकर जूते , टिफ़िन कवर से लेकर बॉक्स तक अपनी सही जगह से कुछ पौने तीन सेंटीमीटर दूर रखने की वजह से बंगाल की खाड़ी में उच्च दबाव बना था , उसकी वजह से आज लेट हुए हैं । पर कार में बैठकर कुछ और बोल जाता है ।

“आज शाम कुछ दोस्तों को खाने पर बुला लें , फ़्राइडे है अच्छा रहेगा”

उसके बाद शहर के ट्रैफ़िक का शोर ही सुनायी देता है ।

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सपनों की दुनिया टूटती है एक आवाज़ से , इस बार प्यार है आवाज़ में ।

“खाना बना दिया है , आकर सलाद काट लो , साथ में खाएँगे।”

आँख खुलने के साथ नज़र टी॰वी॰ पर जाती है । डिबेट में अब कुल ९ मेहमान दिख रहे हैं । शायद २-४ स्क्रीन स्क्रोल करने पर और दिख जाएँ । उसमें नायक को कोई इंट्रेस्ट नहीं । नायिका आकर सोफ़े पर बैठ गयी है । रिमोट हाथ से ले लिया है ये कहके की क्या देखते रहते हो पर चैनल चेंज से पहले फिर से म्यूट का बटन दबता है । कमरा मछली मंडी बन जाता है -

“तो आप मुझे बताएँगी मेरी हैसियत”
“आप अपने गिरेबान में झाँकिए”
“महिलाओं पर ज़ुल्म आपने किया है “
“मैंने ??”
“हाँ , आपके पूरे पुरुष समाज ने”

नायक ये सोच रहा है की नायिका ने चैनल बदला क्यूँ नहीं । वो वहीं बैठा रहता है !!!

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२५ साल पुरानी यादों में खो गया है नायक । डाँट वो तब भी बैग, कपड़े, जूते, मोज़े , किताब , कापी, टिफ़िन इन सब पर ही खाता था अपनी माँ से । हाल वही पिता जी का भी रहता । ऐसे ही कमरे में शाम को बैठते । साढ़े आठ का इंतज़ार रहता : शोभना जगदीश , जे वी रमण , शम्मी नारंग , गजला अमीन , सरला माहेश्वरी : समाचार पढ़ते । नायक को डाउट था कि पिताजी की फ़ेवरेट शायद शोभना जगदीश हैं क्यूँकि जिसदिन वो समाचार सुनातीं , वो हटते नहीं थे । पीछे से माँ डाँट कर थक जातीं , बाप बेटे दोनों नहीं सुधरते , फिर सब साथ में खाना खाते । नायक बरतन वापस आँगन में रखकर आता । पिताजी माँ का हाथ बँटाते उन्हें वापस धोकर रखने में । नायक कूड़ा बाहर डालके आता और सो जाता ।
टी॰वी॰ अब बंद हो चुका होता ।

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इस बार सपना टूटता है बीवी की आवाज़ से :
“तो ग़लत क्या कहा इसने “
“किसने” नायक पूछता है ।
“अरे , महिला मोर्चा वाली ने , पुरुष अन्याय तो करते रहे हैं”
“छोड़ो ना यार”
“कैसे छोड़ दूँ”
“मत छोड़ो, मैं खाना लगाता हूँ”

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नायक किचन में सलाद काट रहा है ।जब चाक़ू की धार खीरे और टमाटर को काटकर चापिंग बोर्ड पर कट कट कर रही है , बाहर कमरे में रखा टी॰वी॰ किट किट कर रहा है । आख़री सलाद का पीस काटकर फ़ाइनल कट की आवाज़ टी॰वी॰ पर चटाचट की आवाज़ में बदल रही है । नायिका भी आंदोलित है । छोड़िए छोड़िए , बैठ जाइए , मैं एंकर हूँ , मेरी बात सुनिए: जैसी आवाज़ें आ रही हैं ।

“यार चैनल बदल दो , वो कुमार का लगाओ , कुछ बताएगा “ नायक कहता है ।

“हाँ ठीक है “

चैनल बदलता है ।

“छठी बड़ी अर्थव्यवस्था के बाद ग़रीबी है , खाने को नहीं है , पहनने को नहीं , कहीं बारिश नहीं हो रही , कहीं ज़्यादा हो रही , खाने पर सवाल हैं , पहनने पर सवाल हैं , महिला भी सुरक्षित नहीं है “

कमरे से किचन तक हवा गिरेबान पकड़ कर आत्महत्या कर लो चिल्ला रही है !!!

नायक ये नहीं समझ पाता कि जब बचपन से आजतक घर में महिलाओं की चली है तो न्यूज़ में ना जाने किस पुरुष प्रधान समाज की बात हो रही है । चुटुर पुटुर झगड़ों के बाद रोज़ हँसी मज़ाक़ करके सोने के बाद अगले दिन फिर सुबह वैसे ही उठने के बाद समाज महिला पर ज़्यादती कब कर लेता है , और अगर कहीं करता भी है तो क्या टी॰वी॰ पर हंगामा काटकर ये ठीक हो जाएगा ? वैसे ही अभी दो घंटे पहले ऑफ़िस से निकला था , तब तक तो सब ठीक था , अचानक से इतनी बर्बाद कैसे हो गयी दुनिया ? जी॰डी॰पी॰ बढ़ना उसे सारे एकनोमिक्स के करियर में पहली बार इतना ख़राब किसी ने बताया है ।

आँखों के सामने २५ साल पहले के साढ़े आठ बजे के समाचार घूम जाते हैं और नायक चिल्लाता है : “ चैनल बदल दो या TV बंद कर दो “

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दोनों खाना खाते हुए मिस्टर बीन देखते हैं और सो जाते हैं । न्यूज़ चैनल पर प्राइम टाइम का प्रसारण फिर से हो रहा है , बस अब टी॰वी॰ बंद है ।

नोट : पारस्परिक रिश्तों में फ़ालतू की ख़बरों को लेकर कड़वाहट ना आने दें, ख़बरें झूठ भी निकल जाती हैं , रिश्ते दुबारा नहीं बनते ।

और हाँ एक और बात ,१९ में आएगा तो ...... 

समझ जाओ  :) :) :)




सोमवार, 2 अप्रैल 2018

आँगन का पीपल...

आँगन का पीपल , कहता बहुत कुछ है ,
वो दास्ताँ सुनाता है , बीते हुए उस कल की ,
जब एक अंधी दौड़ तोड़ रही थी विरासतों का ताना-बाना !!

विरासत सिर्फ़ जायदाद की नहीं होती ,
होती है तमाम उन कहानियों की ,
जो बच्चे पोंपले मुँह वाली दादियों - नानियों से सुनते थे ।
होती है दादाओं नानाओं के वो कंधे ,
जिनपर ना जाने कितने मेले ठेले गुज़र गए ।

विरासत होती है घुप्प अमावस की काली रात में ,
तारे गिनने और जोड़ के नाम लिखने की कारगुज़ारी ,
होती है चाँदनी रात में ,
सुइयों के नाके में धागे डालने की जुगत ।

होती है , बहनों की ठिठोलियाँ ,
भाइयों के झगड़े ,बड़ों के तजुरबे ।
विरासत होती है ,
आँगन में घंटों पकती रसदार सब्ज़ी की महक ,
चूल्हों पर सिंकती रोटियों की मिठास ।

होती है आँसू की वो लड़ियाँ ,
जो मीठे भी होते हैं , नमकीन भी और कड़वे भी ।



आँगन का पीपल उस विरासत की आख़िरी गवाही है ,
आख़िरी चश्मदीद,
जिसने देखा था लोटा और चादर लेकर घर से ,
बाहर जाते लड़के को , तब पेड़ सिर्फ़ बीज था ।

उसने देखा था उस लड़के की नयी नवेली दुल्हन को ,
दिवाली की छुट्टियों में घर आते ।
वो कोंपल ही था , नज़र नहीं आया ।

उसने देखा लड़के के बच्चों को बढ़ते हुए ,
पेड़ पौधा हो चुका था और नए बच्चे घर नहीं रुकते थे ,
घर गंदा जो ठहरा ।

उसने सुना उन बच्चों को नौकरी की तलाश में ,
किसी और शहर जाते हुए ।
तब पौधा बड़ा हो रहा था ।

फिर उनके बच्चे जो कभी नहीं आए ,
भी उसके ज़हन  में लाए गए ।

पेड़ ने आगन पर क़ब्ज़ा कर लिया था ,
दीवारें ढह रही थी ।
एक दिन घर गिर गया ।
उग आयी खर पतवार ।
अब ना जिसे कोई काटने वाला था ना साफ़ करने वाला ।

पेड़ भी बढ़ते बढ़ते घर की पहचान हो गया ।
अब लोग घर को पेड़ से जानते हैं ।
भूतों की कहानियाँ हैं इसके इर्द गिर्द ।
वो भूत नक़ली नहीं ,
उसी विरासत की भटकती आत्माएँ हैं ।

पेड़ गवाह है , चश्मदीद गवाह !!!
उस बीते हुए कल की ,
जब एक अंधी दौड़ तोड़ रही थी विरासतों का ताना-बाना !!

———

अपने घरों में पीपल उगने मत दीजिए ,
उसे आप काट भी नहीं सकते !!!!

                                                                  -- देवांशु

मंगलवार, 20 मार्च 2018

तो कहानी शुरू होती है.... ( इश्क वाली कहानी भाग -१ )

शहर बहुत आसान सा था । आमतौर पर शहर आसान ही होते हैं , मुश्किल तो रहने वाले लोग उसे बना देते हैं । पर इस शहर के लोग आसान से ही थे , तो शहर भी आसान सा हो पड़ा था । शहर में एक कॉलोनी थी , मोहल्ले जैसी नहीं । बेफ़िक्री थोड़ी कम थी लोगों में इसलिए मोहल्ला नहीं था । मोहल्ले में बेफ़िक्री कुछ ज़्यादा हो जाती है । यहाँ नहीं थी ।

कॉलोनी में घरों के डिज़ाइन एक जैसे ही थे , एक सिमिट्री थी । जैसे घरों के दरवाज़े आमने सामने , मिली हुई छतें । कमरे , उनकी खिड़कियाँ एक दूसरे को देखती हुईं । कालोनी ज़्यादा पुरानी नहीं तो लोग कम थे । टाइम भी कम ही हुआ था तो लोगों ने मॉडिफ़िकेशन कम कराए थे । काफ़ी सारे घर अभी भी ख़ाली पड़े थे । घरों में ताले थे , जो मकानमालिकों या किराएदारों के इंतज़ार में थे और इंतज़ार करने के विश्वकीर्तिमानों को ध्वस्त करने की फ़िराक़ में थे । 

ज़माना भी 90 के दशक का शुरुआती दौर था ,  तो इंटर्नेट पढ़ी जाने वाली मैगज़ीन में पाया जाता था । एफ़॰एम॰ का दौर भी अभी नहीं आया था । कुछ घरों में ही केबल कनेक्शन था और आम राय ये थी कि पढ़ने लिखने वाले बच्चों के घर में केबल टीवी नहीं होनी चाहिए ,  पढ़ाई ख़राब हो जाती है । ज़्यादातर घरों में सहारा सिर्फ़ दूरदर्शन का था । रेडियो पर मीडीयम वेव और शॉर्ट वेव का रुतबा था ।

हाँ , विडीओ गेम ने दस्तक दे दी थी । पर उसका असर गली में  क्रिकेट खेलने वालों पर कम हुआ था । कह सकते हैं वो सारा कुछ था जो उस बचपन की निशानी था , जो घर के अंदर और बाहर बराबर बीता करता था । रहने वाले परिवारों में हर उम्र के बच्चे थे , कुछ बचपन में थे , कुछ जवान , कुछ जवानी की दहलीज़ पर जो ना बच्चों में गिने जाते और ना बड़ों में । ऐसे ही तीन नमूने इस कहानी के मुख्य बालक / पुरुष पात्र हैं ।

पढ़ाई लिखाई वैसे तो अपने यहाँ काम मानी नहीं जाती बल्कि उसे ज़िंदगी जीने के बाद दूसरे नम्बर का धर्म माना जाता है ।इन तीनों का भी मुख्य काम यही  था , ऐसा विचार उनके पैरेंट्स का तो था ही कम से कम ।बाक़ी कॉलोनी वालों के विचार इतर  थे जो बेवजह नहीं थे । कारणों की चर्चा आएगी बाद में । फ़िलहाल पात्रों  पर आते हैं । तीनों में ऐसा कुछ नहीं की नोटिस किया जाए पर हरकतें ऐसी की इग्नोर भी नहीं कर सकते । चेहरे से अगर नूर नहीं बरसता तो हैवानियत भी नहीं टपकती थी । दोस्त तीनों इतने गहरे की काफ़ी का दाग़ उतना गहरा ना हो ।

बंद घरों में भूत होने की कहानियाँ बनाने-सुनाने की उम्र पार हो गयी थी । फ़िल्मी गानों को सुनकर तीनों को लगता था कि कन्या नामक एंटिटी का जीवन में प्रवेश ज़रूरी है पर ऐसा कुछ हो नहीं पा रहा था । अव्वल तीनों ब्वायज़ स्कूल में पढ़ते , दूसरा कॉलोनी  के अवेलेबल संसाधन इन्हें घर की मुर्ग़ी दाल बराबर लगते थे, तीसरा इन उपलब्ध पॉसिबल प्रॉस्पेक्ट में से काफ़ी ने इन्हें राखी के बंधन में बाँध लिया था । साथ ही दूसरे मोहल्ले और कॉलोनी के लड़कों से इनकी सुरक्षा का अनकहा ज़िम्मा भी इनके मज़बूत कंधों पर दे दिया गया था या इन्होंने ले रखा था । अब चूँकि इस तरह के ज़िम्मेदार अन्य मोहल्ले और कॉलोनी में भी  थे इसलिए और कहीं जहाँ भी इन्होंने दाल का कुकर चढ़ाया कोई ना  कोई सीटी निकाल भागा । 

दिल दुखता पर टूटता नहीं । किसी रोज़ विविध भारती पर गुलज़ार का गाना सुन लिया था , बस उस दिन से तीनो छत पर शाम को अक्सर यही गुनगुनाते पाए जाते :



सारी उम्मीद उन लटकते तालों पर थी अब ....


( दास्ताँ शुरू होना बाक़ी है ... )

— देवांशु 

बुधवार, 31 जनवरी 2018

जौहर बनाम सती !!!

जो जौहर पर घड़ा भर रो रहे हैं उनके लिए ख़ास !!!

अपने यहाँ डिस्कशन के नाम पर अपनी अल्पबुद्धि और अधूरे ज्ञान को दूसरे पर थोपने का काम वामपंथी और बुद्धिजीवी करते हैं , उसका दूसरा सानी मिलना पूरी दुनिया में मुश्किल है !!!

आजकल के माहौल में पद्मावत और जौहर को लेकर जो बवाल खड़ा हुआ उसमें कुछ नारीवादी सती प्रथा को घुसेड़ लाए और रोने पीटने लगे ।

जौहर और सती प्रथा में अंतर है । अगर ना पता हो तो राजा राम मोहन राय की जीवनी मात्र पढ़ लीजिए तो सती प्रथा पता चल जाएगी और रानी पद्मावती और अन्य राजपूत रानियों की कहानियाँ पढ़ लीजिए तो जौहर का अंदाज़ा लग जाएगा !!!

अब आते हैं की क्या सती प्रथा सही थी : मुझे नहीं लगता कोई भी २१ वीं सदी में हाँ कहेगा । पर क्या जौहर ( प्रथा नहीं मजबूरी कहिए साहब , कम से कम पद्मावती के संदर्भ में तो ) ग़लत था ?

पहले भी कई बार उदाहरण दिया है , फिर दे रहा हूँ , यजिदि महिलाओं का !! उनकी ज़िंदगी मौत से बदतर नहीं बना दी गयी ? जिस तरह के विडीओ बाहर आए हैं , मवेशियों से बदतर तरीक़े से उनकी बोली लग रही है बाज़ारों में !! ये क्या है ? अगर उसमें से कोई आत्महत्या ( जो सती के बजाय जौहर के ज़्यादा क़रीब का शब्द है ) कर ले , तो क्या भविष्य में लिखा जाने वाला इतिहास उसे कायरता कहेगा ? यजिदि आम तौर पर एक शांतिप्रिय समुदाय माने गए हैं , पर फिर भी उनके पुरुषों ने संघर्ष तो किया ही और मार दिए गए , तो क्या उन्हें इतिहास कायर कहेगा ?

कैमरे का ऐंगल शिफ़्ट करें और दूसरी तरफ़ से देखें तो इसी यजिदि प्रकरण में जो अनैतिकता कर रहे हैं , ज़्यादा कटघरे में उन्हें नहीं खड़ा करना चाहिए ? क्या उसी इतिहास को इन्हें दरिंदा नहीं दिखाना चाहिए ?

मोटा मोटा सवाल ये है की ख़ुद को जानवरों से बदतर ज़िंदगी से बचाने के लिए अगर कोई आत्मदाह करे क्यूँकि और कोई रास्ता नहीं दिखता तो सवाल उस पर ज़्यादा होने चाहिए या फिर उस पर  जो इसके लिए मजबूर कर दे !!!

नैरेटिव दोनों हो सकते थे : पर चूँकि सरोकार ( और साफ़ साफ़ कहें तो जैसी फ़ंडिंग ) जैसे थे वैसी सोच बनायी और थोपी गयी ।

और अंत में रहा सवाल इतिहास का : तो जनाब इतिहास ना साहित्य है की सब लिखा मिलेगा और ना ही क़ानून की किताब की जो है वो सीधा सीधा !!! इतिहास एक विज्ञान है जो आपकी समझ के लिए बहुत ज़रूरी है और इस विज्ञान की प्रयोगशाला किसी कमरे में रखे कुछ उपकरण नहीं होते । आपको जगह जगह घूमना पड़ेगा , लोगों से मिलना पड़ेगा , भवन - महल - खंडहर - झुग्गी - झोपड़ी घूमनी पड़ेगी । इस सब को साथ रखकर सोचना पड़ेगा । टाइम लाइन बनेगी । तत्कालिक परिस्थितियाँ जब समझ में आएँगी तब कहीं जाकर समझ में आएगा की भूत में लिया गया कोई क़दम आज कितना भी सही या ग़लत लगे , उस समय क्यूँ लिया गया था ।

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पान की दुकान पर खड़े होकर ये बताना बहुत आसान है की सचिन को पूरी ज़िम्मेदारी के साथ पाकिस्तान के ख़िलाफ़ चेन्नई टेस्ट में आख़िर तक खेलना चाहिए था और हार के लिए वही ज़िम्मेदार है । जब असलियत में १४० किमी प्रति घंटे की स्पीड से नाक के क़रीब से गुज़रती है तब पता चलता है की उसकी स्मेल पूछने वाला आपको स्लेज कर रहा है !!!!

जाके पैर ना फटी बेवाई : वो नारीवादी , मानवतावादी , बुद्धिजीवी सब बन सकता है पर एक तार्किक सोच रखने वाला इंसान नहीं !!!

नोट : ना पद्मावत देखी है ना देखने की कोई इच्छा है । और दिक़्क़त किसी और से नहीं भंसाली से है : मुझे शादी के विडीओ देखना कुछ ख़ास पसंद जो नहीं है !!!!