शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

भईया हम तो तगड़ा गुंडा बनिहों!!!


हमेशा कम्पटीशन का ज़माना रहा है भाई | जहाँ देखो वहाँ कम्पटीशन | कम्पटीशन का सबसे बड़ा कारण,  “काबिल" लोगो की बहुतायत है |  कॉलेज में सीट कम है, पढाई करने वाले ज्यादा | हो गया कम्पटीशन | सबको पिटने से डर लगता है , पीटने वाले ज्यादा है, पिटाई में कम्पटीशन |

पहले लोग सभ्य हुआ करते थे, ज्यादातर लोग संत टाइप थे, संतई में कम्पटीशन था | कम्पटीशन में किसी ने कुआँ खुदवा दिया, बोले गरीबों को पानी पीने में आसानी होगी | गर्मियों में स्काउट रेलवे स्टेशन में खड़े होकर आने जाने वाली ट्रेन के यात्रियों को पानी पिलाते थे , एक को बुलाओ ४ आते थे , वहाँ भी कम्पटीशन था | कोई सराय खुलवाता, कोई अलाव जलवाता | कहते गरीबों को मदद होगी पर असल कारण “कम्पटीशन" था, महान बनने का “कम्पटीशन” |

फिर जमाना बदल गया, अब कुओं पर कब्ज़ा करने का कम्पटीशन आ गया |  धर्मशालाएं होटल बन गयी | होटल चलाने का कम्पटीशन आ गया | रेलवे स्टेशन पर पानी की टंकियों से साफ़ पानी और स्टेशन से स्काउट दोनों गायब हो गए | अब कम्पटीशन पानी बेचने का है | अलाव जलाने की लकड़ी चोरी करने का कम्पटीशन भी मार्केट में है|

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ये तो हुई सटायर लिखने की कोशिश, अब मुद्दे की बात करते हैं | पिछले दिनों अनूप जी ने गुंडा पहचानने के फायदे बताये और साथ ही गुंडों के शेयर मार्केट का आइडिया भी दे डाला | उन्ही से “चैटियाते” टाइम ये आइडिया भी आया कि अगर गुंडों का शेयर मार्केट बने तो उसका काम काज कैसे चलेगा | कई दिन से इसी पे रिसर्च किये , अब छाप रहे हैं , झेलिये …

 


ये गुंडा-गुंडा क्या है  ये गुंडा-गुंडा!!! 

गुंडा (GUNDA) शब्द का “मतबल” है Genuinely Unrated Nationality Development Activist, बोले तो “एक ऐसा तरक्की पसंद इंसान जिसे जान बूझकर बुरा बताया गया है पर वो पूरे देश के बारे में सोचता है, राष्ट्रीयता बढाता है " |

आपको क्या लगता है गुंडा बनना आसान है | आप लोगो का क्या झट से बोल दिया फलां आदमी बहुत बड़ा गुंडा है | पर गुंडा बनाने का दर्द उस माँ से पूंछो जिसका बेटा “स्ट्रगलिंग" गुंडा होता है | रोज कहीं से पिट-कुट के आता है , हल्दी-चूना मरहम-पट्टी सब करनी पड़ती है | कभी कभी तो २-४ लोग लेकर आते हैं, अकेले आ भी नहीं पाता | उनके लिए चाय बनाने का काम करने वाले उसके भाई-बहनों पे क्या बीतती होगी , कभी सोचा आपने | झट से कह दिया कि भई ये तो गुंडा है | इतना आसान नहीं है गुंडा बनना |

इसी सब “भाउक" बातों को सोचके हमें लगा कि गुंडों के लिए शेयर मार्केट का आइडिया अच्छा रहेगा  | जैसे शेयर मार्केट से इंडस्ट्री को भी फायदा है और लोगो को भी , उसी तरह से गुंडों की शेयर मार्केट से भी सबको फायदा होगा |


बेसिक कंसेप्ट

बेसिक कंसेप्ट वही है जो अनूप जी ने बताया, आप गुंडे पे अपने पैसे लगाओ कि इसको पकडे जाने की कीमत क्या लगेगी, फिर जब उसे बड़ी कीमत लग जाए तो उसे पकड़वा के सरकार के  हवाले करवा दो | सरकार से उतने पैसे लो जितना इनाम है , पकड़ने वाले को उतने दो जितनी आपने बोली लगाई थी, डिफरेन्स आपका | बस यही है बेसिक फार्मूला| 

अब देखिये बात ये है कि हर कोई तो कर नहीं सकता गुंडा-गर्दी, तो ऐसे ही काम चलेगा सबका ना |

पर अगर आप खुद ही एक गुंडे का जुगाड़ कर लीजिए तो सारा पैसा आपका | उसके जुगाड़ पे रिसर्च की गयी | उसका सार ऐसे है :

सबसे पहले एक गुंडा ढूंढिए

सबसे पहले तो आपको एक अदद ऐसा टुटपुंजिया गुंडा ढूँढना पड़ेगा जिसमे “स्कोप” हो और बाकी जनता की उसपे नज़र ना पड़ी हो | फिर उससे  कोई “कांड" करवा डालिए | पॉकेट मारना, चेन चुराना जैसे छोटे काम करने से मार्केट में उसका नाम खराब हो सकता है | फेसबुक जैसी चीज़ें आ जाने से लड़के लड़कियों के पीछे उनके मोहल्ले तक जाने का काम भी नहीं कर रहे हैं , मार-पीट का स्कोप भी कम हो गया है | महंगाई के चलते लोगो के घर में पैसा वैसे भी नहीं है तो चोरी-चकारी का मौका भी कम ही है | 

आपको कुछ नया ढूँढना होगा | जैसे धमकी दिलवाना , चौराहे पे बिना बात के हुल्लड़ कटवाना | हफ्ता वसूल करवाना | इसी टाइप  का कुछ |  ये भी सबके बस का नहीं  है | इन दैट केस, आपको अपने “गुंडे" की पब्लिसिटी “चौकस” करनी पड़ेगी, तभी बात बनेगी |  जैसे उसने अगर उसने किसी को थप्पड़ मारा तो आप हल्ला मचवा दो कि उसने किसी को मार मार के लहुलुहान कर दिया| सारा मामला “इमेज" का है |

नेक्स्ट स्टेप
 
नेक्स्ट स्टेप होगा कि आपके गुंडे को “मार्केट" में रजिस्टर करवाना पड़ेगा | आप यहाँ पे पुलिस की मदद ले सकते हैं | एक बार उसका नाम पुलिस रिकॉर्ड में आ गया तो समझ लो आपके “इन्वेस्टमेंट" ने पहली बाधा पार कर ली | अब थोड़े दिन तक मोहल्ले-मोहल्ले में हल्ला मचवा दीजिए कि “वो यहाँ देखा गया चाय पीते हुए , वो उस दुकान पे पान खा रहा था” | इससे उसकी “पब्लिक अवेयरनेस" बढ़ेगी |


दांव लगा ले , लगा ले , दांव लगा ले

गुंडई के शेयर मार्केट में गुंडे का दाम केवल एक बार लगेगा | सारे लोग दाम लगा पाएंगे | किसी गुंडे के दाम का ऊंचा होना उसके “जनता में टेरर" के समानुपाती होगा | फिर जो सबसे ज्यादा और “रीजनेबल" दाम लगायेगा | “गुंडा" उसको “अलाट" कर दिया जायेगा | अगर आपने कोई गुंडा अलाट करवा लिया तो आपकी जिम्मेदारी और बढ़ जायेगी | पहले तो आपको उसे खुला छोडना पड़ेगा | जिससे वो और नाम कमा सके | फिर उसे हेल्प करनी होगी की अब वो लोगो के नाक में दम करने के साथ साथ, सरकार का भी सुख चैन छीन ले | तब जाके कहीं आपके लगाये पैसों से कुछ रिटर्न की गारंटी दिखनी शुरू होगी |

टाइमिंग का मामला भी है

गुंडे को अलाट करवाने के बाद सरकार द्वारा उसके दाम लगाने तक , टाइमिंग का खयाल रखें | ज्यादा जल्दी ना दिखाएँ | उसको अपना काम करने दें, जिससे काफी लोग अपना काम ना कर पायें | सरकार स्टार्टिंग में ज्यादा इनाम नहीं रखेगी | २-४ बार इग्नोर करें | हाँ ये भी ध्यान रखें कि "गुंडा" पकड़ से बाहर ना हो जाए | ऐसा होने पे आपके पैसे डूबने की संभावना है | कोशिश करें कि “रेगुलर इंटरवल" पे उसके कारनामे मार्केट में आते रहे | इससे मार्केट में उसका “भौकाल” बढ़ेगा | प्राइस भी बढ़ेगा | इस मार्केट में “शोर्ट सेलिंग" से बचें | अधिक दिनों तक गुंडे को होल्ड करना आपको ज्यादा रिटर्न दे सकता है |


सरकार की भी कुछ जिम्मेदारी है

एज पर द रूल ऑफ “Regularity Authority of Gunda Share Market (RAGSM), सरकार किसी गुंडे पर उसके जनता द्वारा बोली लगाये गए पैसों से कम का इनाम नहीं रख सकती | सरकार ये भी इंश्योर करेगी कि जब कोई पकड़े गुंडे को तो उसे तय राशि (जितनी बोली लगाई गयी थी )  और जिसने बोली लगाई थी उसे इनाम का पैसा (जो सरकार ने डिसाइड किया था )पूरी तरह मिले, विध मिनिमम टैक्स|  इन केस आप ही गुंडा ढूंढते हैं , तो अपनी टैक्स लाइबिलिटी का ध्यान रखें |


खतरे का भी  ध्यान रखें

आपके इन्वेस्टमेंट को सबसे बड़ा खतरा तब हो सकता है जब कोई आपका “अलाटेड” गुंडा,  चुनाव में खड़ा हो जाए | क्यूंकि अगर वो चुनाव जीत जाता है तो उसपे कभी इनाम की राशि आएगी ही नहीं | पैसा डूब जायेगा आपका | इसलिए कोशिश करें उसे चुनाव की महक भी ना लगे | और अगर लग भी गयी तो थोड़ा पैसा और डालके उसके खिलाफ ज़हर उगलें, उसकी इमेज और  गिरवा दें , जिससे वो चुनाव ना जीत पाए | इससे आपका ज्यादा पैसा नहीं डूबेगा |

*****

ये सब तो कुछ मुख्य मुख्य बातें थी | बाकी आपको क्या बताएं , आप लोग होनहार हो | हाँ इसको पढने के बाद गुंडा बनने में भी “कम्पटीशन" आ सकता है | सोचो गुंडा भी आप,  बोली भी आप लगाओ, फिर खुद को पकड़वा दो | सारा पैसा आपका | बाहर आने में जो खर्चा पानी लगेगा वो देना पड़ेगा | वैसे भी “सरकार की योजनाओं से ज्यादा सुविधा तो जनता को  सुविधा शुल्क से हुई है”| काका हाथरसी ने भी कहा है “रिश्वत पकड़ी जाये, छूट जा रिश्वत देकर" |

खैर ये सब तो हुआ “गुंडई" पे ज्ञान | इसी को लिखते लिखते हमने एक और कालजयी कविता लिख मारी | कविता की ट्यून “सूरदास" जी से उधार ली है … गौर फरमाएं…


भईया हम तो तगड़ा गुंडा बनिहों,
लोग-बाग सब संत बड़े हैं ,अपनी अपनी जिद पे अड़े हैं |
भरी धूप है , छत भी गायब, पोथी लेकर पीछे पड़े हैं |
हम उनकी "घंटा" ना सुनिहों,
भईया हम तो तगड़ा गुंडा बनिहों |


भईया हम तो तगड़ा गुंडा बनिहों,
अपन को थोड़ी दारू पिला दे , सुन्दर सी साकी मिलवा दे |
व्हिस्की वोडका रम दिलवा दे  , थोड़ी सी तो लिफ्ट करा दे|
हम सीढ़ी एक ना चढिहों,
भईया हम तो तगड़ा गुंडा बनिहों |


ब्लड डोनेशन कैम्प में आने का बहुत बहुत शुक्रिया…
नमस्ते
--देवांशु

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

पोस्ट के बदले पोस्ट!!!


कुछ दिनों पहले प्रशांत बाबू, हाँ हाँ वही जिन्हें पीडी के नाम से भी जाना जाता है, उन्होंने हमसे मौज ले ली | केवल हमसे क्या, पंकज और रवि बाबू को भी नहीं छोड़ा | और हम तीनो से नहीं भर पाए तो हमारे घर को भी खींच लाये |  इन्हें लगा कि पंकज बाबू तो “वर्चुअल" दुनिया से गायब है, और हम लोगो का खून पीने में “बिजी" हैं तो ये बच जायेंगे | (रवि बाबू की शादी होने वाली है)

पर ना | हमारी बेज्जती तो अक्सर होती रहती है, उसकी हमें परवाह नहीं, पहले भी बताया है हमने | कोई पंकज की या रवि की  बेज्जती करे ये भी एक बार को हम “देख कर अनसुना” कर दें,  पर हमारे घर की बेज्जती, कत्तई बर्दाश्त नहीं, ना ना | (और ये चाय को भी लपेट ले गए Smile देखो तो)

इसलिए जनता की आँखें खोलने के लिए हम कई दिनों से सोच रहे थे इनको जवाब लिखने का | पर टाइम नहीं मिला (आलस काफ़ी टाइम खा जाता है) | एक बार हम इनको धमकाए भी कि बेट्टा तुमको इसका जवाब मिलेगा , पर ये एक स्माइली चिपका के चलते बने|

वैसे प्रशांत बाबू, हमारी तरह ही दूसरों की वाल पे कचरा करने के लिए भी जाने जाते हैं , अभिषेक बाबू तो इतने परेशान रहे कि एक पोस्ट लिख मारी उन्होंने |

खैर,  कोई नहीं अब हम सच बता डालते हैं :

सुनो कल मेरा एक दोस्त आने वाला है, ब्लॉगर है !!!!

हमारे घर में दो फ्लोर थे, बेसमेंट और ग्राउंड |  ग्राउंड फ्लोर खाने, पीने और टीवी देखने के लिए प्रयोग होता था | बेसमेंट फ्लोर में सोया जाता था, पार्टी करने के लिए भी जगह थी वहाँ |

अगले दिन हम एक इंटरव्यू देने की फिराक में थे, शाम की चाय पी रहे थे |P03-04-12_17.53[1] पंकज ने घर में घुसते-घुसते एलान किया “कल मेरा एक दोस्त आ रहा है, ब्लॉग लिखता है | ब्लॉगर है |”
उस टाइम तक हम केवल ब्लॉग पढ़ते थे, लिखने का चस्का नहीं लगा था | सारे ब्लॉगर सीरियस लगते थे | हम थोड़ा घबराए, थोड़ा डरे, हल्का सा सहम भी गए |

सुबह उठे और भाग लिए इंटरव्यू देने, इंटरव्यू ठीक हुआ | याद आया चाय तो पिए ही नहीं सुबह से | पंकज को फोनिआये | वो बोले “पराठे खाने सेक्टर ४० की मार्केट जा रहे हैं, वहीं आ जाओ डायरेक्ट, प्रशांत भी आ गया है” | हम कहे “कौन प्रशांत" तो बोले कि वही जो आने वाला था “मेरा ब्लॉगर दोस्त" |  मार्केट पहुंचे | वहाँ पर पी एंड पी (पंकज एंड प्रशांत) पी फॉर पराठे सूतने के बाद हाथ धो रहे थे | हमने कहा “यार चाय पीते हैं" |

हम (मैं और पंकज) जिस शहर के हैं, वहाँ हर कोई कविता ज़रूर लिखता है(अकेले में) और चाय ज़रूर पीता है | पंकज बाबू चाय के लिए मना नहीं करते | उन्होंने हाँ कर दी | प्रशांत बाबू सूखा मना कर गए |हम दोनों ने चाय खींची , थोड़ी बातचीत हुई इस दौरान | फिर पी एंड पी घूमने निकल गए और हम अपनी सुबह की बची नींद पूरी करने घर की ओर लपके | घर पहुंचे तो रवि बाबू के दर्शन हुए | वीकेंड में वो या तो सोते थे या एक्सरसाइज़ करते थे, नहीं तो मूवी देखते थे |

पहुंचे तो वो “जस्ट जागे" थे, ठण्ड का माहौल था हम तो रजाई ओढ़ के बैठ गए और रवि बाबू लग लिए एक्सरसाइज़ में | थोड़ी देर बाद “पी एंड पी” भी आ गए |

यहाँ गलती की सजा “मौज” है !!!

"छींकते ही नाक काटने" के सिद्धांत के माफिक हमारे घर का उसूल था कि “गलती की सजा मौज" | आप गलती किये नहीं कि आपसे मौज ले ली जायेगी | प्रशांत बाबू नए थे, जानते नहीं थे | एक्सरसाइज़ को लेकर दो चार बातें बोले , तुरंत उनकी मौज ली गयी | ( पहले वो जान भी नहीं पाए , जब जाने तो उन्होंने हम सबसे मौज ले ली)

थोड़ी देर में पवन साहब आ गए , पवन साहब हमारे साथ ही प्रोजेक्ट में रह चुके हैं और पंकज बाबू के कॉलेज फ्रेंड हैं | मेहमान का स्वागत चाय से किया जाना चाहिए | हम चाय के बारे में पूंछ बैठे, प्रशांत ने फिर हमें घूर के देखा |

कप का हैंडल नहीं टूटा था!!!

दरसल यहाँ पर प्रशांत की पोस्ट में “टेक्नीकल" मिश्टेक  है | हम आई-मिंट से ४ ठो कप का सेट मंगाए | बड़े लवली टाइप कप थे | सुबह शाम अपने हाथो से सफाई करते | एक दिन ज्यादा चमकाने के चक्कर में एक कप की तली टूट गयी | और अब चूंकि घर में तीन लोग थे तो चौथे को पीछे रख दिया , सुन्दर था तो फेंका नहीं | पंकज बाबू को आइडिया नहीं था, उन्होंने वही कप उठाया | चाय छानने लगे | कप ने समुन्दर का रूप ले लिया, कितनी भी चाय डालो भर ही नहीं रहा | बाद में समझ आया कि चाय की नदी बह गयी | (बताओ कभी दूध की  नदी बहती थी , अब चाय की नदी बहती है ) |पंकज ने गलती तो की थी, उनकी मौज भी ली गयी| अब तक प्रशांत बाबू भी एडजस्ट हो ही गए थे |

मुझे कल निकलना है !!!

ये कहते कहते, पीपीपी (अरे बाबा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी नहीं, पंकज, प्रशांत और पवन ) घूमने निकल गए | हम फिर सोने के लिए सटक लिए | देर रात घूम के आये तो प्रशांत बाबू लपक लिए सोने और पीडीपी (मतलब पंकज, देवांशु और प्रशांत, समझे) चल दिए सनीमा देखने “लैपटॉप" पे | “ना घर के ना घाट के"“ और “वन टू थ्री" दोनों मूवी देखी गयी| सुबह का ४ बज गया था |  सुबह ४ बजे चाय पीने का अपना अलग ही मजा है | वैसे भी मुझे सोने से पहले चाय पीने की आदत है | हमने चाय का ऑफर दिया जो २-१ से ध्वनि मत से पारित हो गया | रवि बाबू भी सो गए थे तो ध्वनि को कम रखा गया | मन में आया तो पंकज को बोल दिए “प्रशांत से भी पूंछ लो"| पवन को लगा मामला २-२ से टाई हो जायेगा,क्यूंकि प्रशांत तो ना बोलेगा | चाय नहीं पीनी पड़ेगी शायद | पर हम तब रवि को जगा लेते | रवि बाबू चाय ना बनाने की शर्त पर राजी हो ही जाते !!!! Winking smile

चाय क्यूँ पीनी चाहिए !!!!

अच्छा तो ये सब तो बात थी  उस वृतांत की ,जो पीडी ने अपने एंगल से बताया और  हमने अपने एंगल से | अब हम पीडी की पोस्ट का जवाब देंगे|

कहते हैं चाय की खोज एक सरफिरे ने की जिसे शाम को अक्सर नींद आती थी, एक शाम उसने कुछ पेड़ की पत्तियां चबा डाली, उसे नींद नहीं आयी | उसी दिन चाय की खोज हो गयी | (ये कहानी फर्जी भी हो सकती है ) | आवश्यकता ही आविष्कार की मम्मी है |

हाँ तो पीडी चाय नहीं पीते | चाय पीना बहुत ज़रूरी है | चाय पे ही अक्सर शादी की बातें हो जाती हैं | वो गाना तो याद ही होगा, “शायद मेरी शादी का खयाल….” | और वो गाना “एक गरम चाय की प्याली हो” | देखिये श्रंगार रस का इससे बेहतर और कर्णप्रिय उदाहरण कहीं और मिलेगा, नहीं मिलेगा | पर पीडी तो पीडी हैं, चाय नहीं पीते | वैसे काफी लोग चाय नहीं पीते,कॉफी पीते हैं | it’s too middle class you know Smile | चाय की दुकान होती है, कॉफी की शॉप होती है |

पीडी काफी देशभक्त है !!!!

भारत काफी ज्यादा चाय का निर्यात करता है | और पीडी जैसे लोग चाय ना पीके चाय उत्पादन को बढ़ाने में मदद कर रहे हैं | देशभक्ति का जज्बा हो तो ऐसा हो | पीडी तुम आगे बढ़ो , हम तुम्हारे साथ हैं !!!!वो बात अलग है हम चाय पीते हुए तुम्हारे साथ हैं Smile

पर घर के बारे में नहीं बोलना था ना !!!!

पर यार पीडी, तुमने हमारे घर की भी काफी बेज्जती कर दी |  माना की घर में इंटर करने के दरवाजे के ठीक बाद जीना है और अगर ध्यान से ना देखो तो गिर भी पड़ो | तो क्या हुआ वहाँ एक बल्ब भी तो लगवाया हुआ है , ये बात अलग है बल्ब का स्विच जीने की पहली सीढ़ी पर खड़े होने से ही मिलता है | पर है तो बल्ब, बस हुआ इतना है कि जब पिछली बार वो फ्यूज हुआ तो हमने नहीं बदलवाया | ये भी ठीक है क्यूंकि रात में वैसे भी गुडगाँव में बत्ती गुल रहती है |

और कोई मामूली घर तो है नहीं, दो दो ब्लॉगर, ध्यान दीजियेगा, दो-दो ब्लॉगर , वहाँ एक साथ रहते थे | ऐसा घर कोई मामूली घर नहीं हो सकता, बड़ी मेहनत का काम है घर के लिए भी, दो -दो ब्लागरों को झेलना  | और तीसरा रहने वाला अन्ना सपोर्टर | वो भी तगड़ा वाला | तुम्हें घर के बारे में नहीं बोलना चाहिए था  पीडी  |

और तुमने चोरों के साथ सिम्पैथी दिखा दी !!!!

जो बात मुझे ज्यादा खराब लगी वो ये कि तुमने बोला कि वहाँ अगर कोई चोर भी जाये और उसे चोट लगे तो  बाकी खर्चे के साथ मानसिक पीड़ा का हर्जाना भी मिले | 

पहली बात तो उस घर में चोर आ ही नहीं सकते | दरवाज़ा ऐसा है कि घर में रहने वाले मुश्किल से घुसे तो चोर कहाँ से आयेंगे | और फिर चोरी करने का टाइम भी तो होना चाहिए कुछ | ४ बजे तक पंकज नहीं सोते (थे), कभी ब्लोगियाते (थे), कभी गपियाते (थे), कभी माहौल में शांति देखकर पोड-कॉस्टियाते (थे) |  और मेरे कमरे में तो “डीके बोस" रात के २ बजे भी उतनी स्पीड में भागते रहते थे |  हाँ एक तीसरा था वो चैन से सोता था | पर रिस्क उसके साथ भी था, अन्ना सपोर्टर है रात में सपने में कोई ज्यादती देख ली , वहीं अनशन पर बैठा मिला | चोर गिरने से नहीं दिल के दौरे से मर जाए | चोर भी बिना बैक-ग्राउंड वेरिफिकेशन किये नहीं आते आजकल !!!!

तुमने हमारी आवाज़ भी रिकार्ड की थी !!!!

पीडी भाई दुबारा भी आये गुडगाँव, इस बार हमने शाम की महफ़िल जमाई, तब तक हम भी ब्लोगिंग में घुस गए थे | मिल बैठे तीनों पीडीपी , दुनिया-जहान की बातें हुई, बहुत कुछ जाना-समझा  गया | मौका देख के मौज ली जाती रही | पर पीडी तुमने अपने फोन का रिकार्डर ऑन कर दिया था | तब तुम बोले थे कि इसपे एक पोस्ट लिखोगे, कहीं तुम उसपे पोस्ट तो नहीं लिख मारोगे अब |  वैसे बोला पंकज ने भी था वो भी लिखेंगे , पर वो तो सन्यास ले लिए हैं आजकल!!!

देवांशु निगम “चाय वाले"

P02-04-12_22.17हम जब ब्लोगिंग कि दुनिया में कूदे तो अपना नाम रख लिया “आढ़ी टेढ़ी सी जिंदगी" | सोचा लोग बहुत भाव देंगे, लगेगा कोई चोटी का लेखक/कवि है | बुरी तरह से आइडिया फ्लॉप हुआ और औकात पे आ गये | नाम बदल लिए । पीडी की पोस्ट पढ़ने के बाद लगा क्यूँ ना अपने  नाम में “चाय वाले ” भी जोड़  लिया जाये | हमारे घर में कोई मसाला हो ना हो, चाय मसाला ज़रूर होता है |
हमें तो नाम बड़ा शानदार लगा भी है , आपको कैसा लगा??
--देवांशु निगम “चाय वाले"
(प्रशांत प्रियदर्शी एक बहुत अच्छे इंसान हैं )

सोमवार, 26 मार्च 2012

आलू कोई मसाला नहीं होता….

पिछले दिनों हम बीमार पड़े…अरे हाँ वाकई में बीमार पड़े, एक दम धाँसू टाइप बीमार | पूरा बदन भट्टी की तरह गरमा गया | खुद ही आइडिया लगा लिए कि १०४ से कम क्या होगा | वैसे १०४ का आंकड़ा है बड़ा “ज़बर”| सुनते ही लोगो की “खटिया खड़ी और बिस्तरा गुल हो जाता है” |

बचपन में बीमार पड़ना बड़ा सुकून भरा होता था | ना सुबह उठके कोई नहाने को कहता, ना स्कूल जाने का बवाल , ना पढ़ने का टेंशन | कोई लफड़ा-लोचा ही नहीं लाइफ में | मम्मी देखभाल भी एकदम बढ़िया करती, छोटे भाई-बहन से भी दवाई का बहाना बना के चाय-पानी मंगाते रहते!!!!पर अब ज़माना बदल गया है | मम्मी-पापा इंडिया में है| उनको तो बता भी नहीं सकते, बता दो तो माता श्री घबड़ा जाती हैं, उन्ही को बुखार आ जाये ऐसी हालत में तो  |

हाँ तो बीमार पड़े, किसी से कुछ ना बोले | चुप-चाप चादर ताने सोते रहे | २-४ दोस्तों का फोन-फान आया उन्हें भी बता दिए “थोड़ा वीक फील कर रहे हैं बाद में कालियाते हैं" |

रूम-मेट्स ताड़ गए कि हम बीमारी का  बहाना बनाकर  लंबा सोने के चक्कर में हैं, फटाफट धाँसू सा सूप बना के गटकवा दिया, हालत थोड़ी दुरुस्त हुई | नींद बढ़िया आयी | 2011-12-09 20.12.47शाम को “आशीष” अपनी  धर्म-पत्नी के साथ  आये| साथ में नीम्बू की शिकंजी भी एक नयी “बोतल" में बैठ के आ गयी | शिकंजी निपटा डाली | ताश भी खेला | “नयी बोतल" हमने बड़े “एहसान" के साथ अपने पास रख ली | तबियत हो गयी “टनाटन” |  और निष्कर्ष ये निकला “पहले ताश खेल लेते तो दिनभर बीमार रहने से तो बच जाते” |

खैर कोई नहीं | रात हुई | बीमारी से उठते ही  हम किचेन में जा धमके | रूम-मेट्स खाना बना रहे थे और मसाले के साथ आलू भून रहे थे | मन में एक आइडिया आया कि आलू कोई मसाला तो नहीं होता| फिर इसे काहे मसाले में मिक्स किया जाये |

हम किचेन से भाग के अपनी डायरी उठा लिए | इतनी धाँसू लाइन मिलते ही एक “कालजयी" कविता लिखने की शुरुआत कर दी | और जैसा कि आपको पता ही है कि हम सारी पोस्ट बेकार में लिखते हैं | एक मात्र उद्देश्य होता है कि लोगो का खून  पिया जाये, तो हम ये अपनी कविता भी आपको पढने पर मजबूर कर रहे हैं| कविता के बोल वही हैं, “मटर एक सब्जी होती है , आलू कोई मसाला नहीं होता" | (मटर हमारी पसंदीदा है , हर सब्जी में घुसेड़ देने का स्कोप देखते रहते हैं, कविता में भी मौका देख के घुसेड़ दे रहे हैं, आखिर स्वाद का मामला है) .. हाँ तो सुनिए “कालजयी" कविता… और कविता कि हर लाइन का एक उद्देश्य भी है वो भी बताये बिना हम नहीं मानेंगे…

सबसे पहले घोटाला-फ़ोटाला के लिए :
क्यूँ गरियाते हो अपनी “करेंट" “गवर्मेंट”को, किस सरकार में घोटाला नहीं होता |
मटर एक सब्जी होती है, आलू कोई मसाला नहीं होता |   (वाह वाह)


शोपिंग मॉल की शौपिंग से परेशान पति-देव की करुण आवाज़ में:
क्यूँ जाती हो लुटने शोपिंग मॉल में , पैसे बचाने में कोई गड़बड़-झाला नहीं होता|
मटर एक सब्जी होती है, आलू कोई मसाला नहीं होता | (फिर से वाह वाह)


और जो लोग कोई काम करने से पहले बहुत सोचते हैं, कि सही क्या है गलत क्या , उनके लिए:
फूंको कम, कदम रखो ज्यादा, छुपा हुआ हर कहीं गहरा नाला नहीं होता|
मटर एक सब्जी होती है, आलू कोई मसाला नहीं होता | (वाह वाह वाह वाह)



और जो लोग इस बात से खुश हैं कि मेरे यहाँ बिल ना भरने कि वजह से बत्ती गुल है |  बिजली की कटौती हुई तो हम सब बराबर होंगे, उनके लिए :
खुश मत हो कि मेरे यहाँ बत्ती गुल है,  बिन ढिबरी शाम तुम्हारे यहाँ भी उजाला नहीं होता|
मटर एक सब्जी होती है, आलू कोई मसाला नहीं होता | (केवल वाह वाह)


अब एक सटायर:
गरीब कभी कौर को “बाईट” नहीं कहते, अमीरों का कौर कभी “निवाला” नहीं होता|
मटर एक सब्जी होती है, आलू कोई मसाला नहीं होता |  (सटायर कन्फ्यूज है, नो वाह वाह)


सब बोलते हैं दीवाली में आजकल मजा नहीं आता, कारण यहाँ है :
होली जो मनाते खुशी के रंग से , तो दिवाली में किसी का दिवाला नहीं होता |
मटर एक सब्जी होती है, आलू कोई मसाला नहीं होता | (वाह वाह रिटर्न्स)


सारे कवि जो हैं चाँद को प्यार का सूचक मनाते हैं, सूरज को पूंछ ही नहीं रहा:
सूरज को चाहे बिलकुल ना पूंछो, चाँद में बिन उसके उजाला नहीं होता |
मटर एक सब्जी होती है, आलू कोई मसाला नहीं होता | (सुभान-अल्लाह)


और अपनी इसी “कालजयी" कविता के बारे में:
ये कविता पढ़ना माना एक जुर्म है, पर इस जुर्म में किसी का मुंह काला नहीं होता | (डोंट वरी)
मटर एक सब्जी होती है, आलू कोई मसाला नहीं होता | (हाय बस जान ही ले लो अब तो )


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हाँ तो ये तो थी हमारी “कालजयी” कविता | आप तो बोलोगे नहीं इसीलिए खुद ही वाह वाह कर लिए | कविता को कालजयी नाम देने का आइडिया हमें अपने पसंदीदा लेखक  अनूप शुक्ला जी की एक पोस्ट से आया |  कविता लिखने के बाद हमने अपने २-४ ब्लॉगर दोस्तों को ऑनलाइन पकड़ा और विडियो चैट में उन्हें इसका काव्यपाठ भी सुनाया, अपनी “मधुर" आवाज़ में | नाम ना बताने कि  शर्त  पे उन सबने इस कविता की बहुत तारीफ़ की, और हमें पोस्ट करने के लिए प्रेरित भी किया |

देखा जाये तो लाइन बड़ी मौजू टाइप है “आलू कोई मसाला नहीं होता” , आप भी मेरी तरह कोई एक शानदार कविता लिख सकते हो…हमें ज़रूर सुनाना |
मैंने इस कविता को राग-मल्हार में गाया, लोगों की आँखों से आंसुओं की बारिश हो गयी  | वैसे आप क्या कहते हो की किस राग में इसे गाना चाहिए!!!!
बोलो बोलो टेल टेल….
(फोटो में दिखाए गए पकोड़ो में आलू भी है, इसलिए उसे बे-फालतू ना समझा जाये )
--देवांशु

सोमवार, 12 मार्च 2012

हाँ!!!वही देश, जहाँ गंगा बहा करती थी…


बचपन में देखी थी ये फिल्म, “जिस देश में गंगा बहती है", तब इतना समझ नहीं आया था कुछ | ५-६ साल पहले एक बार और देखी | फिल्म की कहानी तब समझ आयी |

फिल्म का नायक “राजू" एक सीधा, सादा और सच्चा इंसान है| एक दिन डाकू उसे पुलिसवाला समझ के उठा ले गए हैं, पर जल्द ही उन्हें अपनी गलती का पता चलता है | इस बीच राजू अपने व्यवहार से पूरे गिरोह को प्रभावित करता है| और एक दिन बड़े उतार चढाव के बाद पूरा गिरोह आत्मसमर्पण कर देता है पुलिस के सामने|

१९६० में आयी ये फिल्म काफ़ी पसंद की गयी थी| राजकपूर ने अक्सर इस तरह के किरदार किये हैं जिसमे एक आम आदमी की छाप दिखाई देती है | imageफिल्म उनके अभिनय के लिए भी याद की जाती है और संगीत का पक्ष भी कॉफी मजबूत है |

और फिर आती है २०१२ की “पान सिंह तोमर" | जब “जिस देश में गंगा बहती है” प्रदर्शित हुई होगी उस वक्त "पान सिंह” राष्ट्रीय खेलों में प्रतिभाग कर रहा था और नेशनल रिकार्ड बना रहा था |पर उसकी ज़िंदगी भी उस फिल्म के किरदारों के बीच से होकर गुज़री , बस उसका अंत कुछ अलग हुआ | या ये कहें कि उसका अंत वही हुआ जो हो सकता था|

पान सिंह तोमर" फिल्म की पृष्ठभूमि लगभग वही है जो “जिस देश में गंगा बहती है” की है | पर नायकत्व में फर्क है, उसकी परिस्थितियों में फर्क है |  हालाँकि सोचने का तरीका बहुत अलग नहीं है, एक  सा ही है कमोबेश|

राजू सबसे शांति से रहने की बात करता है, पान सिंह वही कोशिश अपनी ज़िंदगी में करता है | पर लाख कोशिश करने के बाद भी  हार जाता है | जिस पुलिस के सामने राजू पूरे गिरोह के हथियार डलवाता है वही पुलिस “पान सिंह"  को हथियार उठाने पर मजबूर कर देती है |

राजू गैंग के सरगना की मदद करता है तो सरगना उसे अपने सर आँखों पर बिठाता है | वहीं दूसरी ओर देश के लिए खेलने वाले “पान सिंह", अपने बेटे पर हुए अत्याचार की रिपोर्ट भी नहीं लिखवा पाता | उसे पहले तो ये साबित करना पड़ता है कि वो खिलाड़ी है, देश के लिए खेला है | और फिर उसके मेडल बहार फेंक दिए जाते हैं|

पान सिंह के दिल में एक वक्त इस देश के लिए मर जाने का जज्बा था, पर एक दिन वो इसी देश के रक्षकों से अपनी रक्षा के लिए गिड़गिड़ाता दिखाई देता है | पर उसकी कोई नहीं सुनता | हार के वो बागी बन जाता है | अपना बदला लेता है| पर सब यहाँ खत्म नहीं हो पाता | कदम कदम पे धोखे मिलते हैं, अपने भी साथ छोड़ते हैं |

पान सिंह वक्त का मारा लगता तो है,  पर है नहीं | उसमे अगर सच्चाई है , सादगी है तो अपने ऊपर उठे हाथ को imageकाटने की ताकत भी | वो एक गाल पे पड़े चांटे का जवाब दूसरा गाल आगे करके देता है पर जब कोई उसके दूसरे गाल पे भी चांटा मारता है तो वो उसको जान से मार देने का माद्दा भी रखता है |

और शायद यही वो मोड़ है जब वो हमारे “सभ्य और सहिष्णु" समाज में बुरा बन जाता है | लोग ये नहीं पूछते कि क्यूँ उसने ५००० मीटर की रेस छोड़ी और क्यूँ बाधा दौड़ में दौड़ा | कितनी आसानी से बात मान ली थी उसने | पर जब एक बार वो बन्दूक उठा लेता है तो हर किसी से अपनी बात बोलने के बाद बोलता है “कहो हाँ"| डर के ही सही पर दुनिया मानती है उसकी बात |

ये दिल का कमल सबसे सुन्दर, मेहनत का फल सबसे मीठा” कहने वाला राजू सबको सदभाव का पाठ पढाता है | पान सिंह उसे समझता भी है शायद | पर उसकी ज़िंदगी “सिनेमा" से इतर हो जाती है| दोनों कथानक एक से होते हुए भी बहुत अलग हैं इसी वजह से |

मैं दोनों फिल्मों कि तुलना नहीं करना चाहता हूँ| राजकपूर या इरफ़ान खान दोनों मंझे हुए अभिनेता है और दोनों मेरे पसंदीदा भी | पर दोनों फिल्मों की अप्रोच मुझे सोचने पर मजबूर करती है | “जिस देश में गंगा बहती है” जहाँ से शुरू होती है , “पान सिंह तोमर" उससे पहले कहीं शुरू हो चुकी होती है| पर “पान सिंह तोमर"  का कोई अंत नहीं है | क्यूंकि वो कोई कहानी नहीं, एक आपबीती है | “पान सिंह" आजादी के बाद हर पल मरता आ रहा है | हाँ रूप रंग बदलता रहता है उसके खत्म होने का | कभी वो ज़हर खा लेता है, कभी उसकी लाश पेड़ से टंगी पायी जाती है , कभी मुठभेड़ में मारा जाता है | कभी कभी वो नहीं भी खत्म होता , पूरी ज़िंदगी अपना ही बोझ ढोता रहता है |

कहते हैं “जिस देश में गंगा बहती है” तत्कालीन प्रधानमत्री जी के आग्रह पे बनाई गयी थी | उस समय डकैतों का कॉफी दखल था आम ज़िंदगी में | ये भी सुना है कि काफ़ी गिरोहों ने हथियार भी डाले थे उस फिल्म को देखकर | पर वो फिल्म या तो हमारे हुकुमरानों ने  देखी नहीं या देख के भी नज़रंदाज़ कर दी | वरना “पान सिंह तोमर" शायद केवल एक अच्छे खिलाड़ी की तरह ही याद किया जाता|

जब तक हम ये नहीं जानेंगे कि हर शख्श हमारी तरह सांस लेता है, उसके सीने में भी दिल धड़कता है | उसे भी दर्द होता है , उसके भी कोई अपने हैं | वो भी सर उठा के जीना चाहता है | उसे भी उसी ऊपर वाले ने बनाया है जिसने हमें बनाया है |तब तक “पान सिंह तोमर" बनते रहेंगे और बार बार आकर वही सवाल खड़ा करते रहेंगे तो “पान सिंह तोमर ” ने किया |

नहीं जानता कि कौन ज्यादा  सही है “राजू" या “पान सिंह तोमर" | पर हाँ पान सिंह से शायद ज़ुल्म सहा नहीं गया | किसी को मारना गुनाह है, पर अपने ऊपर हुए अन्याय को झेलना और चुप रहना उससे भी बड़ा गुनाह | पान सिंह शायद इन्ही दो गुनाहों के बीच दब गया |

--देवांशु

शनिवार, 10 मार्च 2012

चित्रकारी

कलाकारी बहुत ज़रूरी चीज़ है | अब देखो जो कलाकार है वही “भाउक” हो सकता है| इन चलचित्रों पे गौर फरमाएं :

१. दिल चाहता है
२. तारे ज़मीन पर
३. जाने तू या जाने ना
४. धोबी घाट

इन सबमे कलाकारी , बोले तो “चित्रकारी" की महत्ता का विषद वर्णन किया गया है | एक में तीन खुराफाती दोस्तों में सबसे शांत धीर-गंभीर वो था जो पेंटिंग करता था| दूसरी के बारे में तो आप से क्या कहें, उसमे तो हर कोई पेंटिंग करता था| तीसरी में नायिका अपने भाई के बारे में तब तक नहीं जान पाती जब तक वो उसका पेंटिंग से भरा कमरा नहीं देख लेती |  यही हालत चौथी में भी है | मतलब कुल मिलाके पेंटिंग का बोल बाला है हर तरफ | और दीगर बात ये भी है की इन सबमे कहीं ना कहीं आमिर साहब इन्वोल्व्ड हैं|

वैसे उन्होंने चित्रकारी गजनी में भी की थी, पर वहाँ “चित्रकारी" की “कल्पना” अलग थी|  चित्रकार तो मिया मजनू भी थे फिल्म वेलकम में और साथ ही चित्रकार जिनेलिया भी थी फिल्म लाइफ पार्टनर में | वैसे लाइफ पार्टनर में जिनेलिया एक गायिका और लेखिका भी थी| पर यहाँ मुद्दा चित्रकारी का है तो उसी की बात करते हैं|
तो किसी भी टाइप की चित्रकारी करने से इंसान की वैलू बढ़ जाती है | तो हमने भी सोचा क्यूँ ना चित्रकारी पे अपने हाथ आज़माए जाएँ…और पिछले साल नवंबर के महीने में अपने आई टी इंडस्ट्री करियर के ५ साल पूरे होने की खुशी में, इन ५ सालों में हमारी दुःख-दुःख imageकी साथी काफ़ी के मग पे हमने अपनी चित्रकारी का नमूना बना डाला…गौर फरमाएं…

फिर ध्यान आया की ये चित्रकारी का शौक तो हमें बचपन से है| हम इतने होनहार रहे चित्रकारी में की पूंछो मत | मारे डर के चित्रकला की क्लास से भगे रहे | बोले की उद्यान विभाग में हैं, पेड़ों को पानी देना है (ये क्लास ४ या ५ की बात है) टीचर ये नहीं समझ पाए कि ऐसा कौन सा पौधा है जिसे शाम को ठीक तीन बजे पानी देना होता है ? और वो भी रोज, वो आज भी यही कहते होंगे कि लड़का पेड़ पौधों से लगाव रखता है|

चित्रकारी बड़ी फेमस है हमारी, हमारे घर में, हमको छोड़ के सब का हाथ ठीक ठाक है | पापा जी का और भाई का तो सुपर-डुपर एक दम | तो लताड़े भी बहुत गए हैं| ड्राइंग का पेपर हमें दुनिया के सबसे घृणित पेपर्स में से एक लगता था | उसकी एक दम कदर नहीं करते थे | एक दिन ऐसे ही पहुँच गए पेपर देने | सवाल आया “एक अमरुद का चित्र बनायें और उसे उचित रंगों से सजाएँ" | अब हम तो एक पेन्सिल ढंग से ना ले गए थे | बस ये पता था अमरुद गोल होता है और मेरे दोस्त का कड़ा भी गोल है | उससे पेन्सिल भी मांगे और कड़ा भी | बना दिए एक दम गोल गोल , ताज़ा-फ्रेश अमरुद | अब आयी बात उसे “उचित" रंगों से सजाने की तो ये काम हम कैसे कर सकते थे, रंग लाना तो हम ऐसे ही भूल गए थे | बगल में मेरा एक सीनियर बड़े मन से ड्राइंग बना रहा था | उसे हमने बोला कि हमें भी स्केच दे दो हम भूल गए हैं | उसने बोला दे तो देंगे पर वही देंगे जो खाली होगा सब नहीं दे पाएंगे | अंधा क्या चाहे दो आँखें | हमने हामी भर दी | बस सवाल थोड़ा सा बदल के समझना पड़ा “एक अमरुद का चित्र बनायें और उसे उपलब्ध रंगों से सजाएँ"| अब वो पेज तो मेरे पास नहीं है पर यही तो कलाकार की सबसे बड़ी खासियत है कि वो उसे दुबारा भी बना देता है | ये लीजिए हमने अपनी शानदार पेंटिंग फिर बना डाली एम एस पेंट पे…image

रूम से बहार निकल कर जब अपने बैग में संभाल के अपना पेपर रखने लगे तो दिखा मम्मी ने कलर का डिब्बा रख कर दिया था पर हमें इन चीज़ों से कहाँ वास्ता था | खैर घर आये किसी को कुछ नहीं बताये | कुछ दिनों बाद जब घर पे दिखाने के लिए कॉपी मिली तो बड़ा सा क्रोस बना हुआ था | नंबर मिले थे १० में से ० और लिखा था “क्या अमरुद इस रंग का होता है” | बहुत लताड़े गए |  भाई के ड्राइंग में फोड़ू नंबर आते थे | तो और लताड़े गए |

खैर इतना अपमान सहने के बाद बारी आयी पोस्टर बनाने की | विषय मिला “व्यायाम करो" | एक फोटो बनाये , एक लड़का वेट लिफ्टिंग के वेट्स उठाये ऊपर में तन के खड़ा है | बस खुपड़िया बनाने की जगह नहीं बची | हमने “एड्जस्टिंग नेचर” का परिचय देते हुए हलकी सी टेढ़ी बना दी, बाईं तरफ झुकी हुई| स्कूल में टीचर ने और घर में पापा ने फिर हड़काया | “ऐसे गर्दन बनती है?”| अब उन्हें कौन बताये जब वेट ज्यादा हो जाता है तो उसे ऊपर उठाने के लिए गर्दन टेढी करनी ही पड़ती है| खैर वो सब लोग तो नासमझ हैं, एक अकेला मैं ही समझदार हूँ |

ऐसा नहीं है कि मै अकेला इंसान हूँ इस टाइप का, मेरे सबसे जिगरी दोस्त, शुशांत भाई भी चित्रकारी के पारखी हैं | एक बार उनके ड्राइंग में अच्छे नंबर आ गए तो घर वाले दौड़ के गए ये देखने कि ड्राइंग में कैसे आ गए नंबर | हुआ यूँ कि सवाल आया था निम्न में से कोई एक चित्र बनाये | भाई ने उठाया राजहंस | उस ज़माने में पेन्सिल से शेड देने का चस्का सबको चढा हुआ था | उन्होंने भी दे डाला | पर जब कॉपी चेक हुई तो टीचर ने उन्हें पूरे नम्बर दे दिए क्यूंकि दूसरा ऑप्शन कौवा बनाने का था | आजतक वो ये सोच के खुश हैं कि उन्होंने लिखा नहीं था कि ये राजहंस है|

खैर कहानियाँ तो और भी हैं, एक बार हमने एक फूल का फोटो बनाया, उसे उचित रंगों से सजाया और जब वो अनुचित बन गया तो किसी बड़े आर्टिस्ट कि तरह उसपे अपने नाम की जगह अपनी सिस्टर का नाम डाल दिया |

अभी लेटेस्ट एक और चित्रकारी किये हैं, आप भी देखो …image
आपको क्या लगता है कि इस फोटो को मैं अगर कांटेस्ट के लिए भेजूं तो मुझे अर्थशास्त्र का ऑस्कर पुरस्कार मिल सकता है क्या??
(ये लास्ट लाइन का आइडिया हमें अभिषेक बाबू के लव लेटर से आया है )

नमस्ते  !!!!
--देवांशु