मंगलवार, 20 मार्च 2018

तो कहानी शुरू होती है.... ( इश्क वाली कहानी भाग -१ )

शहर बहुत आसान सा था । आमतौर पर शहर आसान ही होते हैं , मुश्किल तो रहने वाले लोग उसे बना देते हैं । पर इस शहर के लोग आसान से ही थे , तो शहर भी आसान सा हो पड़ा था । शहर में एक कॉलोनी थी , मोहल्ले जैसी नहीं । बेफ़िक्री थोड़ी कम थी लोगों में इसलिए मोहल्ला नहीं था । मोहल्ले में बेफ़िक्री कुछ ज़्यादा हो जाती है । यहाँ नहीं थी ।

कॉलोनी में घरों के डिज़ाइन एक जैसे ही थे , एक सिमिट्री थी । जैसे घरों के दरवाज़े आमने सामने , मिली हुई छतें । कमरे , उनकी खिड़कियाँ एक दूसरे को देखती हुईं । कालोनी ज़्यादा पुरानी नहीं तो लोग कम थे । टाइम भी कम ही हुआ था तो लोगों ने मॉडिफ़िकेशन कम कराए थे । काफ़ी सारे घर अभी भी ख़ाली पड़े थे । घरों में ताले थे , जो मकानमालिकों या किराएदारों के इंतज़ार में थे और इंतज़ार करने के विश्वकीर्तिमानों को ध्वस्त करने की फ़िराक़ में थे । 

ज़माना भी 90 के दशक का शुरुआती दौर था ,  तो इंटर्नेट पढ़ी जाने वाली मैगज़ीन में पाया जाता था । एफ़॰एम॰ का दौर भी अभी नहीं आया था । कुछ घरों में ही केबल कनेक्शन था और आम राय ये थी कि पढ़ने लिखने वाले बच्चों के घर में केबल टीवी नहीं होनी चाहिए ,  पढ़ाई ख़राब हो जाती है । ज़्यादातर घरों में सहारा सिर्फ़ दूरदर्शन का था । रेडियो पर मीडीयम वेव और शॉर्ट वेव का रुतबा था ।

हाँ , विडीओ गेम ने दस्तक दे दी थी । पर उसका असर गली में  क्रिकेट खेलने वालों पर कम हुआ था । कह सकते हैं वो सारा कुछ था जो उस बचपन की निशानी था , जो घर के अंदर और बाहर बराबर बीता करता था । रहने वाले परिवारों में हर उम्र के बच्चे थे , कुछ बचपन में थे , कुछ जवान , कुछ जवानी की दहलीज़ पर जो ना बच्चों में गिने जाते और ना बड़ों में । ऐसे ही तीन नमूने इस कहानी के मुख्य बालक / पुरुष पात्र हैं ।

पढ़ाई लिखाई वैसे तो अपने यहाँ काम मानी नहीं जाती बल्कि उसे ज़िंदगी जीने के बाद दूसरे नम्बर का धर्म माना जाता है ।इन तीनों का भी मुख्य काम यही  था , ऐसा विचार उनके पैरेंट्स का तो था ही कम से कम ।बाक़ी कॉलोनी वालों के विचार इतर  थे जो बेवजह नहीं थे । कारणों की चर्चा आएगी बाद में । फ़िलहाल पात्रों  पर आते हैं । तीनों में ऐसा कुछ नहीं की नोटिस किया जाए पर हरकतें ऐसी की इग्नोर भी नहीं कर सकते । चेहरे से अगर नूर नहीं बरसता तो हैवानियत भी नहीं टपकती थी । दोस्त तीनों इतने गहरे की काफ़ी का दाग़ उतना गहरा ना हो ।

बंद घरों में भूत होने की कहानियाँ बनाने-सुनाने की उम्र पार हो गयी थी । फ़िल्मी गानों को सुनकर तीनों को लगता था कि कन्या नामक एंटिटी का जीवन में प्रवेश ज़रूरी है पर ऐसा कुछ हो नहीं पा रहा था । अव्वल तीनों ब्वायज़ स्कूल में पढ़ते , दूसरा कॉलोनी  के अवेलेबल संसाधन इन्हें घर की मुर्ग़ी दाल बराबर लगते थे, तीसरा इन उपलब्ध पॉसिबल प्रॉस्पेक्ट में से काफ़ी ने इन्हें राखी के बंधन में बाँध लिया था । साथ ही दूसरे मोहल्ले और कॉलोनी के लड़कों से इनकी सुरक्षा का अनकहा ज़िम्मा भी इनके मज़बूत कंधों पर दे दिया गया था या इन्होंने ले रखा था । अब चूँकि इस तरह के ज़िम्मेदार अन्य मोहल्ले और कॉलोनी में भी  थे इसलिए और कहीं जहाँ भी इन्होंने दाल का कुकर चढ़ाया कोई ना  कोई सीटी निकाल भागा । 

दिल दुखता पर टूटता नहीं । किसी रोज़ विविध भारती पर गुलज़ार का गाना सुन लिया था , बस उस दिन से तीनो छत पर शाम को अक्सर यही गुनगुनाते पाए जाते :



सारी उम्मीद उन लटकते तालों पर थी अब ....


( दास्ताँ शुरू होना बाक़ी है ... )

— देवांशु 

बुधवार, 31 जनवरी 2018

जौहर बनाम सती !!!

जो जौहर पर घड़ा भर रो रहे हैं उनके लिए ख़ास !!!

अपने यहाँ डिस्कशन के नाम पर अपनी अल्पबुद्धि और अधूरे ज्ञान को दूसरे पर थोपने का काम वामपंथी और बुद्धिजीवी करते हैं , उसका दूसरा सानी मिलना पूरी दुनिया में मुश्किल है !!!

आजकल के माहौल में पद्मावत और जौहर को लेकर जो बवाल खड़ा हुआ उसमें कुछ नारीवादी सती प्रथा को घुसेड़ लाए और रोने पीटने लगे ।

जौहर और सती प्रथा में अंतर है । अगर ना पता हो तो राजा राम मोहन राय की जीवनी मात्र पढ़ लीजिए तो सती प्रथा पता चल जाएगी और रानी पद्मावती और अन्य राजपूत रानियों की कहानियाँ पढ़ लीजिए तो जौहर का अंदाज़ा लग जाएगा !!!

अब आते हैं की क्या सती प्रथा सही थी : मुझे नहीं लगता कोई भी २१ वीं सदी में हाँ कहेगा । पर क्या जौहर ( प्रथा नहीं मजबूरी कहिए साहब , कम से कम पद्मावती के संदर्भ में तो ) ग़लत था ?

पहले भी कई बार उदाहरण दिया है , फिर दे रहा हूँ , यजिदि महिलाओं का !! उनकी ज़िंदगी मौत से बदतर नहीं बना दी गयी ? जिस तरह के विडीओ बाहर आए हैं , मवेशियों से बदतर तरीक़े से उनकी बोली लग रही है बाज़ारों में !! ये क्या है ? अगर उसमें से कोई आत्महत्या ( जो सती के बजाय जौहर के ज़्यादा क़रीब का शब्द है ) कर ले , तो क्या भविष्य में लिखा जाने वाला इतिहास उसे कायरता कहेगा ? यजिदि आम तौर पर एक शांतिप्रिय समुदाय माने गए हैं , पर फिर भी उनके पुरुषों ने संघर्ष तो किया ही और मार दिए गए , तो क्या उन्हें इतिहास कायर कहेगा ?

कैमरे का ऐंगल शिफ़्ट करें और दूसरी तरफ़ से देखें तो इसी यजिदि प्रकरण में जो अनैतिकता कर रहे हैं , ज़्यादा कटघरे में उन्हें नहीं खड़ा करना चाहिए ? क्या उसी इतिहास को इन्हें दरिंदा नहीं दिखाना चाहिए ?

मोटा मोटा सवाल ये है की ख़ुद को जानवरों से बदतर ज़िंदगी से बचाने के लिए अगर कोई आत्मदाह करे क्यूँकि और कोई रास्ता नहीं दिखता तो सवाल उस पर ज़्यादा होने चाहिए या फिर उस पर  जो इसके लिए मजबूर कर दे !!!

नैरेटिव दोनों हो सकते थे : पर चूँकि सरोकार ( और साफ़ साफ़ कहें तो जैसी फ़ंडिंग ) जैसे थे वैसी सोच बनायी और थोपी गयी ।

और अंत में रहा सवाल इतिहास का : तो जनाब इतिहास ना साहित्य है की सब लिखा मिलेगा और ना ही क़ानून की किताब की जो है वो सीधा सीधा !!! इतिहास एक विज्ञान है जो आपकी समझ के लिए बहुत ज़रूरी है और इस विज्ञान की प्रयोगशाला किसी कमरे में रखे कुछ उपकरण नहीं होते । आपको जगह जगह घूमना पड़ेगा , लोगों से मिलना पड़ेगा , भवन - महल - खंडहर - झुग्गी - झोपड़ी घूमनी पड़ेगी । इस सब को साथ रखकर सोचना पड़ेगा । टाइम लाइन बनेगी । तत्कालिक परिस्थितियाँ जब समझ में आएँगी तब कहीं जाकर समझ में आएगा की भूत में लिया गया कोई क़दम आज कितना भी सही या ग़लत लगे , उस समय क्यूँ लिया गया था ।

*****

पान की दुकान पर खड़े होकर ये बताना बहुत आसान है की सचिन को पूरी ज़िम्मेदारी के साथ पाकिस्तान के ख़िलाफ़ चेन्नई टेस्ट में आख़िर तक खेलना चाहिए था और हार के लिए वही ज़िम्मेदार है । जब असलियत में १४० किमी प्रति घंटे की स्पीड से नाक के क़रीब से गुज़रती है तब पता चलता है की उसकी स्मेल पूछने वाला आपको स्लेज कर रहा है !!!!

जाके पैर ना फटी बेवाई : वो नारीवादी , मानवतावादी , बुद्धिजीवी सब बन सकता है पर एक तार्किक सोच रखने वाला इंसान नहीं !!!

नोट : ना पद्मावत देखी है ना देखने की कोई इच्छा है । और दिक़्क़त किसी और से नहीं भंसाली से है : मुझे शादी के विडीओ देखना कुछ ख़ास पसंद जो नहीं है !!!!

शुक्रवार, 5 मई 2017

पड़ोसी .. एक जासूसी कहानी !!!

मैं अपने पड़ोसी का पड़ोसी हूँ | अपने बगल वाले पड़ोसी के बगल में , सामने वाले के सामने और पीछे वाले के आगे रहता हूँ |

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चर्चा ये आम है आजकल मोहल्ले में पड़ोसी के दूसरे पड़ोसी , शर्मा जी : आजकल रात में ग़ज़ल तो सुनते ही हैं , साथ में २-४ लगा लेते हैं | अब दो  या चार , ये पता नहीं क्यूंकि आजतक मुझको किसीको इन्वाइट नहीं किया , तो कन्फर्म नहीं कह सकते | पर  पिछले सन्डे रात जब वो घर आ रहे थे , इस बार "सुना" बाहर से ही कहीं लगाने के बाद , तो सोसाइटी के बाहर "सुना" उनको काफी सारे कंटाप रसीद कर दिए चौकीदार ने |


आपने गौर किया होगा "सुना" कई बार उपयोग किया गया ऊपर | दरसल पड़ोसी की पहली खूबी यही होनी चाहिए की उसे सुनने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए | एक सफल पड़ोसी  की सुनने की क्षमता ऐसी होती है की वो केवल सुन सुन के अमरचित्र कथा अपने दिमाग में बना सकता है | वो बात अलग है इस चक्कर में उसे बहुत कुछ सुनना पड़ सकता है |

पड़ोस के ही मेहता जी , ज़रा ऊंचा सुनते हैं | काफी पड़ोसियों ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन इस वजह से किया है की वो गाने बड़ी ऊँची आवाज़ में बजाते हैं | वैसे इस बात का पुष्ट प्रमाण नहीं है और ना ही इसे लेकर सारे पड़ोसी एकमत हैं | कुछ का कहना है की मिसेस मेहता  , मेहता जी को दिनभर क्या क्या "कहती" रहती हैं , ये कोई सुन ना ले , इससे बचने के लिए वो गाने सुनते हैं | आप साहबान ये "कहने " वाली क्रिया पर भी गौर फ़रमाया होगा | ये सफल पड़ोसी होने का दूसरा गुण  है | इस दावे के साथ की हमारा मुंह मत खुलवाओ , पड़ोसी अक्सर बहुत कुछ "कह"  जाते हैं | 

मुंह अक्सर ना दिखाने लायक रहने के ही  काम आता है | घर में घटित होने वाली किसी भी घटना की वीभत्सता इस बात के समानुपाती होती है की इस बात के  घर से बाहर  पता चलने पर मुंह किस हद तक छुपाना पड़ेगा | नाते रिश्तेदारी में मुंह दिखाने लायक बनाये रखने की कवायद में तीन चौथाई इंडिया धराशायी पड़ा है | 

वैसे रिश्तेदार और पड़ोसी में मुख्य अंतर दूरी का होता है | लोगों के दूर के रिश्तेदार होते हैं | दूर के रिश्ते में पड़ोसी कोई नहीं होता | 

अब दूर से ये भी याद आया की बगल में रहने वाले मिश्रा जी की दूर की नज़र कमज़ोर है , पास का साफ़ साफ़ नज़र आता है | उनके बगल वाले तिवारी जी की पास की नज़र कमज़ोर है , दूर का साफ़ साफ़ दिखाए देता है | रिश्ते में दोनों एक दूसरे के दूर के साढ़ू  हैं | रिश्तेदार का पड़ोसी हो जाना "बापू" से भी  ज्यादा सेहत के लिए हानिकारक हो जाता है , इस बात का जीता जागता प्रमाण मिश्रा जी के "लौंडे" हैं | उनकी कम्बल कुटाई  में मिश्रा जी की पास और तिवारी जी की दूर की नज़रों का तेज़ होना मुख्य समस्या है | 

हानिकारक तो वैसे ये भी है की अगर आपके आस पड़ोस कोई ऐसा चेहरा रहता हो जिसको बस आप देखते रहना चाहें | बस दिक्कत दोहरी होती है : वो देख ले तो डर रहता है की कहीं चोरी तो नहीं पकड़ी गयी और ना देखे तो  लगता है की ऐसा क्या हो गया की  देखती भी नहीं | आप गर शादीशुदा हैं तो ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है | अक्सर इसीलिए पड़ोस का धार्मिक प्रवृत्ति का होना "नितांत" आवश्यक है | 

मिश्रा जी का बीच वाला लौंडा , छोटे वाले को नितांत तब बुलाता था , जब वो तुतलाता था |  अभी निशांत बोलता है |  निशांत उसे सुशांत दद्दा | दोनों अपने सबसे बड़े भाई को भाई साहब बुलाते हैं , प्रशांत नहीं बुलाते | बड़े अदब के लौंडे हैं | 

पड़ोसियों की एक और खास बात होती है , इनके छज्जे अक्सर टकरा जाते हैं | इन छज्जों पर बचपन में पतंग का और जवानी में अक्सर नयनों का टांका भिड़ जाता है | 

ऐसा ही टांका भिड़ा था प्रशांत का , मेहता जी की बेटी की कजिन सिस्टर के साथ जो अक्सर शाम को छत पर अपनी कजिन मतलब मेहता जी की बेटी के साथ बतियाने आती थी | 

दिन सर्दी का एक सन्डे था | प्रशांत को छत पर रजाई सुखाने का वीकली टास्क मिला हुआ था | मेहता जी के छज्जे  पर हालाँकि लाल इमली कानपुर वाला रोंएदार कम्बल सूख रहा था , पर उस पर  टेक लगाकर कोई शोभायमान थीं तो वो थी प्रशांत बाबू की एकतरफा माशूक़ | एकतरफा इसलिए की इज़हार-ऐ -इश्क़ अभी हो नहीं पाया था | वैसे दोनों घरों की दूरी "छुड़ैया " भर की थी | छुड़ैया  कार में धक्का मार के स्टार्ट करने का , पतंगबाज़ी वर्ज़न है जिसमें एक खुदा का नेक बन्दा पतंग को कोनों से पकड़कर पहले तो मेन पतंगबाज़ से थोड़ा दूर जाता है और फिर पैरों की उछाल और हाथ से पतंग को ऊपर छोड़ने के तालमेल का मुजायरा करते हुए पतंग को हवा में लहरा देता है | डोर मेन पतंगबाज़ के हाथ में होती है और जल्दी ही पतंग हवा में हिलोरे लेने लगती है | 

हाँ तो , एक तरफ छत पर रज़ाई सूख रही थी | दूसरी तरफ छज्जे पर कम्बल सूख रहा था , कानपुर लाल इमली का रोएंदार | नज़रें बार बार छिप छिप के ही सही, पर मिल ज़रूर  रहीं थी | "इधर चिलमन से हम झांके उधर चिलमन से वो झांके" टाइप माहौल था | माहौल में गंभीरता घोल रहा था मेहता जी के यहाँ बजता गाना :

"ये लड़की मेरे सामने , मेरा दिल लिए जाये जाये जाये , हाय हुकु हाय हुकु हाय  हाय "

मिश्रा जी के बाकी दोनों लौंडे भी छत पर ही थे जो निम्नवत काम कर  रहे थे :

एक  पतंग में कन्ने बांधने के पास उसे दूसरी तरफ से अपने सर पर रख के दोनों कोने  नींचे खींच के मुढ्ढे ठीक कर रहे थे | दूसरे राजकुमार चरखी पर सद्दी चढाने के बाद बरेली ब्रांड का कांच मिला मांझा चढ़ा रहे थे | 

मतलब माहौल पतंगबाज़ी का फुलटू था | बड़े भैया इश्क़ का माहौल सेट कर रहे थे | निशांत का माहौल देखकर सुझाव ये था की लव लेटर , पतंग में रखकर भेजा जाए | और चूंकि शुशांत हिंदी के सेकंड पेपर में निबंध में पूरे नंबर ले आये थे , इसलिए लव लेटर भी वही लिखेंगे , एक्चुअली अंदेशा था की मैडम मैडम आ सकती हैं , इसलिए लेटर पहले से तैयार ही था | 

बस पतंग में पत्र फंसा के प्रशांत को निशांत ने छुड़ैया  दी | पतंग छज्जे से टकराई | साथ में नायक नायिका की आँखें भी टकराईं | गाना चेंज हुआ :

"हम दो प्रेमी छत के ऊपर , गली गली में शोर शोर शोर शोर | 
आ रा रा रा अहा ओ  रे , आ रा रा रा अहा ओ  रे , आ रा रा रा अहा ओ  रे, आ रा रा रा अहा ओ  रे |"

प्रशांत ने इशारे से चिट्ठी उठाने का इशारा किया | जो एक बार इग्नोर किया गया | पर अगली बार मान लिया गया | पतंग छज्जे में टकराने के बाद डोर से थोड़ी हवा में लटक गयी थी | एक छोटे डंडे से उसे सावधानी से ऊपर लाने की जुगत की जाने लगी | इस  बीच गाना फिर चेंज हो गया :

"इस प्यार से मेरी तरफ ना देखो , प्यार हो जायेगा"| 

दोनों जोड़ी  नज़रें कभी कभी एक दूसरे की तरफ देख रही थीं | 

बस यहीं एक गलती हो गयी | डंडे का एक प्रहार उस मासूम पत्र पर ऐसा हुआ की , पतंग फट गयी और चिट्ठी सीधा मेहता जी के पड़ोसी , वही शर्मा जी , के घर पहुँच गयी | 

मोहल्ले में  छत पर होने वाले क्रिकेट के कतई अफरीदी थे उस ज़माने में निशांत | छक्के मारने पर "जो मारेगा वो गेंद लेकर भी आएगा" रूल के चलते , छत भी जबर फांद लेते थे | और इसी कारण  वो ये भी पता लगा पाए थे की शर्मा जी सन्डे को दिन में दारू पीने का डे मानते थे | इस खोज के चलते शर्मा जी उनके जाती दुश्मन बन गए थे | 

शर्मा जी की छत से पत्र उठाने की ज़िम्मेदारी निशांत पर आयी | शर्मा जी ताक में बैठे थे | निशांत जैसे ही कूदे , पकड़े गए | पकड़े क्या गए जनाब ये कहिये कूट दिए गए | नज़रों के अपने अपने दोषों के चलते मिश्रा जी ने ये नज़ारा पास से और तिवारी जी ने दूर से, साफ़ साफ़ देखा | इसलिए आये खोपचे में प्रशांत भी | पर हैंडराइटिंग मिली शुशांत की | सूते वो जबर गए | 

गाना फिर चेंज हुआ :

"प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया , के दिल करे हाय "

और इसके बाद हाय तीनों की एक साथ निकली | इस घनघोर सुताई में कैटेलिस्ट का काम कर रहे थे मेहता जी क्यूंकि  उनका कहना था की वो रिश्तेदारी में मुंह दिखाने के लायक नहीं बचे | कुल ५-७  मिनट के सामूहिक कुटाई अभियान से तीनों किसी तरह बचे | 

उस दिन वो शर्मा जी पर ख़ास गुस्सा थे | 

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अभी लेटेस्ट पड़ोस में ये चर्चा आम है की उस रात शर्मा जी जब घर लौट रहे थे तो दअसल चौकीदार उन्हें बचाने आया था ,  मारने नहीं | और अँधेरे का फायदा उठाकर शर्मा जी को कूटने वाले कोई चार लोग थे | 

कुछ आईडिया है चौथा कौन रहा होगा ???

-- देवांशु 

रविवार, 26 फ़रवरी 2017

आदि शिव

कल शिवरात्री थी । ये शिव से जुड़ा हुआ त्यौहार है । शिव के आगे "आदि" जुड़ा हुआ है । आदि मतलब जिसकी शुरआत कहाँ से हुई , ये पता ही ना हो ।  अंत का भी पता नहीं । ब्रह्मा जी ने ऐसा पता लगा लेने का दावा किया था जो गलत था और उन्हें पूजे ना जाने का श्राप मिला ।

आज बात शिव के नाम के आगे आदि जुड़े होने से । शिव को न केवल सबसे बड़ी शक्ति अपितु अल्टीमेट लवर और डांसर भी समझा जाता है । "नटराज"  उन्हीं का एक रूप है ।  उसी नटराज की एक बात आज याद आयी ।

दिसम्बर में इंडिया ट्रिप के दौरान भीम बेटीका , जो भोपाल के पास स्थित है , जाने का मौका मिला । जहाँ की ये फोटो है । फोटो में एक डांसर को बनाया गया है , जिसकी भंगिमा नटराज से मिलती जुलती है । आप खुद ही देख लीजिये ।

अब इस फोटो के बारे में कुछ : पहली बात ये ओरिजिनल है खुद खींची है दूसरा ये यूनेस्को द्वारा वर्ल्ड हेरिटेज का दर्ज़ा पाए भीमबेटीका की है । और इस फोटो को "फोटो ऑफ़ अर्ली मैन" की श्रेणी में रखा गया है । और इसका काल्यखंड मेसोलिथिक बताया गया है , जो करीबन १०,०० ० से ५००० बीसी तक जाता है , जो औसतन अब से साढ़े सात हज़ार साल पुराना वक़्त है । कुछ लोग इसे २०,००० से साढ़े नौ हज़ार पुराना वक़्त बताते हैं ।

मतलब इतने पुराने वक़्त में एक अल्टीमेट डांसर "नटराज" की परिकल्पना थी । और शिव के आगे भी आदि लगा  हुआ है ।

बस पता नहीं क्यों ये हमारे यहाँ किताबों में कभी पढ़ाया क्यों नहीं गया । एक विश्वविद्यालय विशेष के लोग जिन्होंने खासकर इतिहास लिखने, पढ़ने और बताने का ठेका सन ४७ से लिया हुआ है , वो पता नहीं कभी यहां गए भी हैं या नहीं । हाँ , शिवरात्री को एक मानव शरीर के अंग विशेष से जोड़कर , दर छिछोरी बातें करने में नहीं हिचकिचाते । अपनी अपनी सोच है ।

भीमबेटिका जाने के बाद ,  शिव के आदि होने का मेरा विश्वास और दृढ हो गया । आप को भी जाना चाहिए ।

भगवान् शिव सबके जीवन को मंगलमय करें !!!

तो बोलो हर हर हर !!!!

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

ऑन डिमांड , रोमांटिक बात !!!

आने वाली २६ जनवरी को अपनी शादी के दो साल हो जायेंगे । इसलिए ये दुशाला पोस्ट । डिमांड मैडम की है । उन्होंने अपनी शादी के बारे में २ पोस्टें लिखीं ( १ , २ ) जो अंग्रेजी में थीं इसलिए  समझ नहीं आईं अपने  । पर  मैडम का कहना है की कुछ ज्यादा नहीं तो कमसकम उनका जवाब ही लिख दो , मेरे बारे में कुछ ना भी लिखो तो भी । तो बस इसीलिए पेश-ए -खिदमत है , ऑन डिमांड रोमांटिक बातों से भरी पोस्ट । 
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दीवाली अच्छा त्यौहार है । धूमधाम से मनाया जाता है । सब लोग एक दूसरे के घर जाते हैं , मेवे और मिठाई देते हैं । पर कभी कभी किसी को मिठाई देना कितना महंगा पड़ जाता है ये कोई इस अदना से इंसान से पूछे । २०१३ की दीवाली पर पापा के एक बहुत पुराने दोस्त के घर गए । "मिठाई वाला" के यहाँ से मिठाई लेकर । मिठाई और जेस्चर दोनों आंटी को पसंद आ गए,  कुछ ज्यादा ही  । और उसके बाद सब हिस्ट्री है । फैक्ट  ये है  की आंटी मैडम की मौसी हैं । तो मजमून ये हुआ  हज़रात "मिठाई बाँटें पर ज़रा संभल कर।" 

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मेरा अमरीका आने का टिकेट हो चुका था । शुक्रवार की रात निकलना था । उसके ठीक पहले वाले संडे को मैडम से मिलने का फरमान हुआ । गए । बातें हुईं । वापस आ गए और निकल भी लिए अमरीका । और फिर डेढ़ साल में गिनती के १०-१२ मेसेज की अदलाबदली हुई वो भी शुरआती १० दोनों में । उसके बाद लंबी ख़ामोशी । ये तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी थी । हम भी लग गए दुनिया भर के कामों में । 

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फिर गज़ब बोरियत का शिकार होकर २०१४ के आखिर में एक फ्रेंड से मिलने कोलम्बस गए । वहीँ एक दिन माता श्री ने फ़ोन पर बताया की हमें बांधे जाने की सुगबुगाहट चल रही है । इस बार इंडिया जाने का टिकेट हो रखा था । चले गए । उसके बाद भी सबकुछ हिस्ट्री ही है । 

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मैडम ने अपना सायरी वाला ब्लॉग देखा । यहीं पर एक्सपेकटेशन गलत सेट हो गयीं । बोली मेरे लिए भी सायरी लिखो । उन्हें आईडिया नहीं था की वो तो अपना नकली चेहरा है ।असली तो यहाँ है । लेकिन आप हज़रात की शादी अगर हो रखी है तो आपको मुआलूम तो होगा ही की पत्नी को सीधे ना नहीं कहना चाहिए । इसलिए कुछ रोमांटिक टाइप बातें कह डालीं हमने बीते दो सालों में । जैसे :

एक बार उन्होंने पूछा की कभी मैं तुम्हारे सपनों में आती हूँ ? हमने जवाब दिया तुमने कभी मुझे आधी रात में बदहवास सा घूमते देखा है ?
पता जाने मैडम क्यों नाराज़ हो गयीं । जबकि मेरे कहने का मल्लब था की सपनों में तुम ही आती हो और मैं सुकून की नींद सोता हूँ । 

खैर, एक मर्तबा मैडम ने पूछा की क्या तुम मेरे बिना रह सकते हो ? मैंने कहा ना बिलकुल नहीं , जब भगवान् मुझे स्वर्ग देगा तो मैं उसे छोड़ के तुम्हारे पास आ जाऊंगा । वो बोलीं क्यों ? मैंने कहा मैं अकेला वहां क्या करूंगा ।

फिर नाराज़गी !!!

उनके रोज़ रोज़ के एक सवाल पर मैं कालजयी कविता लिखने के फ़िराक़ में हूँ , मुखड़ा है :

"बड़ा बुरा ज़माना है , पहले ये बताओ खाने में क्या खाना है ?"

आप अंतरा सुझाओ तो आगे लिखा जाए ।

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बीते साल मैडम को सरप्राइज देने का प्लान बनाया २६ जनवरी को । परम मित्र आशीष की धर्म पत्नी प्रोफेशनल केक मेकर हैं । वो इंडिया में थीं उस वक़्त । अगर उन्हें डॉक्टर माना जाए तो आशीष भाई की हैसियत कम्पाउण्डर से कम नहीं थी । रिश्ता हमारा भी मरीज़ का था । अपने यहाँ ५ दिन डॉक्टर के पास बैठने वाला भी खुद को डॉक्टर समझता फिर आशीष भाई तो पूरे कंपाउंडर थे । २५ तारीख को ऑफिस से हम ३ बजे ही निकलकर डिस्पेंसरी ( आशीष भाई के घर ) पहुँच गए । केक बनाने के विडियो ढूंढें गए । फाइनली कैरेट केक पर बात पक्की हुई । २ बार तो विडियो चलाकर केक बनाने की एक्टिंग सीखी गयी । फिर असलहा जुगाड़ा गया , और केक बनाना शुरू किया गया ।

५ बजे मैडम का पहला SMS आया "कहाँ हो ?" । हमने रिप्लाई किया "काम से आशीष के यहाँ हैं " ।

६ बजे फिर : "कब तक आओगे ?" । हमने रिप्लाई किया "आधे घण्टे में पहुँचते हैं ।

७ बजे : "खाना बना दिया है , बाहर मेज पर रखा है । खा लेना ।" इसके बारे में आशीष भाई की एक्सपर्ट एडवाइस थी "डरो नहीं, इसकी आदत डाल लो" । हमने जवाब नहीं दिया ।

७:३० बजे : "कार में सोने का मन ना हो तो जल्दी आ जाओ" । मैंने आशीष भाई को बोला देखो ऐसा है गुरु तुम एक्सपर्ट हो भले ही , अपनी तो पहली "गिरहसाल" है । सरप्राइज के चक्कर में कहीं सर ही ना रिस्क में आ जाए इसलिए  मैं निकलता हूँ । आइसिंग का काम तुम संभाल लेना । और अपन कट लिए ।

घर पहुंचे तो घर कोपभवन बना हुआ था । खाना वादानुसार मेज पर था । मैडम सोने चली गयीं थीं । ठण्ड तगड़ी  थी और कम्युनिटी में कंस्ट्रक्शन चल रहा था इसलिए पार्किंग की काफी दिक्कत थी । सरप्राइज पार्टी के लिए जिन दोस्तों को बुलाया था उनके लिए पार्किंग रोकनी थी । जुगाड़ किया गया ।

१२ बजे सब आये । मैडम जो भयंकर गुस्से में थीं , उठ गयीं । काफी सरप्राइज हुईं । मामला सुलट गया । आशीष भाई मंद मंद मुस्किया रहे थे देख देखकर ।

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पर ऐसा नहीं हैं की केवल हम ही सरप्राइज करते रहे । श्रीमती जी ने भी हमारी बर्थडे पर हमको गिफ्ट देकर सरप्राइज किया । वो बात अलग है  उन्होंने गिफ्ट हमारे कार्ड से ही खरीदा था जिसका अलर्ट हमें आ गया था । और सब कुछ जानते हुए ३ दिन तक कुछ ना जानने और फिर सरप्राइज होने की एक्टिंग करनी पड़ी । 

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वैसे शादी के बाद बहुत कुछ बदल जाता है । रोमांटिक वाली बात है कि ज़िन्दगी में रंगों की रेंज बढ़ जाती है । जैसे कुंवारों के  जीवन में रंग होते हैं , शादी के बाद शेड्स भी जुड़ जाते हैं । लाल से : डार्क लाल , ऑफ बीट लाल , ब्रिक लाल , गाजरी लाल , सिंदूरी लाल आदि आदि । मसलन मैंने एक दिन पूछा "मैडम , मेरा नीला वाला बैग कहाँ है " । जवाब मिला "वो नीला नहीं , बैंगनी है "।

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बाकी ऐसे ही चलती हैं जिंदगी । बहुत लोग अपने पार्टनर के बारे में बहुत कुछ लिखते हैं , मैडम ने भी हमारे बारे में लिखा है । हमें लगता है जब कोई आपके बीते हुए कल , आज और आने वाले कल : तीनों को अपना समझे तो लाइफ बड़ी कलरफुल हो जाती है , सारे शेड्स के साथ । 

अउर है का ज़िन्दगी में !!!!

(नीचे की फोटो कोलाज है जो दीवार पर मैडम ने हमारी घूमी हुई जगहों का बनाया है , मल्लब घुम्मक्कड़ी काफी हुई है )

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सोमवार, 16 जनवरी 2017

बाकी बहुत कुछ रहता है !!!

बस का सफर मुझे पसंद नहीं था , और रात का तो बिलकुल भी पसंद नहीं । पर नौकरी वाले शहर पहुँचने को अक्सर वही एक ज़रिया बचता । खासकर त्योहारों पर क्योंकि आखिरी वक़्त तक मालूम ना होता की कब जाना है और कब आना है । जब कभी स्लीपर बस मिल जाती तो देर रात तक कुछ पढता रहता और फिर सो जाता , सुबह ८ बजे बस ठहरती आखिरी मंजिल पर , बस वही अपनी मंजिल भी होती ।

उस रोज़ भी बस का वेट कर रहा था । साथ हमेशा की तरह केवल बैग-पैक था । दीवाली के बाद की हलकी ठण्ड थी । बस ठीक वक़्त पर आयी थी और मैं चढ़ कर सीट पर बैग रख दरवाज़े तक वापस आया था पानी लेने । सामने एक कार आकर रुकी  , कार से अपनी बाहों में एक छोटे से बच्चे को लिए एक औरत को उतरते देखा जो बस की तरफ ही आ गयी थी । 

उस चेहरे से पहचान पुरानी थी । मैं नीचे उतर गया और बच्चे को अपने हाथ  लेकर उसे बस पर चढ़ने में मदद की  । मैं उसके लिए भी पानी लेकर वापस आया  । मेरे सामने वाली बर्थ उसी की थी । बच्चा ,जो पहले से सो रहा था उसने उसे लिटा दिया था । मैंने पानी दिया तो बोली :

"थैंक्स , अच्छा हुआ तुम मिल गए , ये इस बार नहीं आ पाए और मुझे वापस भी अकेले जाना पड़ रहा है"

मैंने मुस्कुरा के जवाब दिया "कोई ज़रुरत हो तो बोल देना मैं सामने की  बर्थ पर ही हूँ" ।  मैं कुछ और बोलना चाहता भी नहीं था । अपनी बर्थ पर लेट गया । बस अभी चली नहीं थी । 

"आज चाय नहीं पिलाओगे क्या ?" उसने नीचे से खड़े खड़े ही पूछा । वो सामान लगा रही थी बर्थ पर । 

"तुम्हे पीनी हो तो ला देता हूँ ?"

"तुम नहीं पियोगे क्या ?"

"नहीं , मैं चाय नहीं पीता"

"कबसे " उसने पूछा । मैंने जवाब नहीं दिया और जाकर उसके लिए चाय ले आया । नीचे की बैठने वाली सीटों पर अभी  कोई आया नहीं था । दोनों वहीँ बैठ गए । बात उसी ने फिर से शुरू की । 

"सोचा नहीं था तुमसे यूँ मिलना होगा कभी "

"मैंने भी नहीं"

"इतना फॉर्मल होकर बात करनी है तो रहने दो"वो बोली । 

मैं लगातार बाहर देखे जा रहा था । 

"इनफॉर्मल ज्यादा कुछ है नहीं बात करने को" मैंने जवाब दिया । 

"हम्म , पुरानी बातों को इतना भी क्या दिल से लगाना , तुम भी जानते हो जो होना था वो चुका " 

"कुछ बातों को नहीं भूला जा सकता चाहे वो कितनी भी पुरानी  क्यों ना हो जाएँ । खासकर वो जब आपको पता हो की आप बहुत कुछ होने से रोक सकते थे " मैं इसबार अंदर देख रहा था , पर उसकी ओर  नहीं । 

"कुछ चीज़ें हो जाती हैं क्योंकि उन्हें होना होता है , बाद में उनके बारे में सोचने का कोई फायदा नहीं , भूल जाओ सब"

"सब भूल सकता हूँ पर अपनी वो गलती नहीं भूल सकता , शायद उस वक़्त मुझे इतना कमज़ोर नहीं पड़ना था" पहली बार उसकी ओर देखा । उसकी आँखों में नमी ज़रूर थी । 

"छोड़ो , जाने भी दो ये सब । ताली एक हाँथ से बजती नहीं, यही मान लो । शायद थोड़ा रिलैक्स फील करो । १५ मिनट हुए हैं और एक पल के लिए भी तुम वो नहीं दिख रहे जो हुआ करते थे । " वो बोली । 

"मैं , शायद अब वैसा कभी नहीं बन सकता" । 

"बन जाओगे , वक़्त सब ठीक कर देता है " । चाय का कुल्हड़ उसने मुझे बाहर फेंकने को दिया और बोली "चलो अब मैं सो जाती हूँ , तुम भी सो जाओ "

"सुनो" मैंने कहा । 

"हाँ , बोलो " । 

"विल यू एवर बी एबल टू फॉरगिव मी " मैंने पूछा ।

"तुमसे नाराज़ रहने की भी ज्यादा कोई वजह भी तो नहीं रहती , एक चाय के तो हम कर्ज़दार भी हो गए " । कहकर वो बात जान बूझकर अधूरी छोड़ सोने चली गयी । 

मुझे पूरी रात नींद नहीं आयी । सवेरे जब बस रुकी तो उसके हस्बैंड ने उन्हें आकर रिसीव किया । उसने हमारी पहचान भी कराई , एक पुराना दोस्त बताकर । बच्चा जाग गया था और अपने पेरेंट्स के साथ खुश था । इनफैक्ट तीनों बहुत खुश थे । 

वो थोड़ी देर रुके और "कभी घर आना" कहके चले गए । 


****

हमेशा सोचता था की कभी ज़िन्दगी की किताब दुबारा पलटी तो उसके नाम से सराबोर पन्ने पर आकर रुकुंगा । मेरा सबसे चहेता पन्ना होगा वो । गुज़रे एक बहुत बड़े वक़्त तक वो पन्ना टीस ही देता रहा । पर उस रोज़ उसे अपनी  ज़िन्दगी में यूँ खुश देखकर ना जाने क्या हुआ । मैं उस पन्ने पर फिर से रुकने लगा था क्योंकि किसी के ज़िन्दगी में ना होने के गम से कई गुना बड़ी ख़ुशी वो एक लम्हा रखता है जो उसके साथ गुज़रा होता है । 

बड़ा सेंटिमेंटल लगेगा पर वाकई में मैंने चाय पीनी फिर शुरू कर दी थी । 

****

( एक दोस्त ने करीबन दो साल पहले अपनी ये आपबीती सुनाई थी , मुझे कुछ समझाते हुए । सोच रहा हूँ की हर चीज को डिटेल में पूछने की आदत होने के बावज़ूद मैंने ये नहीं पूछा था कि आप दोनों मिल क्यों नहीं पाए । वजह शायद ज़रूरी नहीं रहती हमेशा । प्यार की दास्ताँ भी तो बस दो लफ़्ज़ों की होती है "मिल गए" या "नहीं मिले" । इसके इतर कुछ नहीं, इसके अलावा भी कुछ नहीं । )

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

क्या हम कुछ कर सकते हैं कि आज़ादी के महानायक सुभाष की मौत का रहस्य सुलझे ?

मुझे समझ नहीं आ रहा कि इस बात की शुरुआत कैसे करूँ । बचपन के कुछ किस्सों से करता हूँ । यकीन मानिए मुझे नहीं याद मेरा वो कौन सा दोस्त था पर उसने कुछ ऐसी बातें बताई थीं जो पिछले कुछ दिनों से खासी परेशान कर रही हैं । बातें नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से सम्बंधित थीं । मसलन कि नेता जी जिंदा हैं और वो तीसरे विश्वयुद्ध के वक़्त आयेंगे या मेरे दोस्त के दादाजी ने कुछ सालों पहले नेपाल सीमा पर स्थित किसी गाँव में उन्हें देखा था । नेताजी उन्हीं के यहाँ एक रात रुके थे । या नेताजी किसी साधू के भेष में रह रहे हैं । 

ये तो नहीं कह सकता कि ये सब सही रहा होगा पर बीते कुछ दिनों में जिस तरह नेताजी से सम्बंधित फाइलों को अवर्गीकृत किया जा रहा है जिससे पहले की सारी सरकारें बचती आयीं थी , ना जाने क्यूँ ऊपर उस बताई दोस्तकी  बातें रोमांचित कर रही हैं । 

१९४५ में बोस के मारे जाने की बात हम सबने किताबों में बचपन से पढ़ी थी । और बहुत हद तक मुझे इसपर यकीन सा था । बाकी उनके लौट के आने की उम्मीद मुझे हर हिन्दुस्तानी की वही उम्मीद लगती थी जो हर अन्याय को ये कहकर सह लेता है कि उसका मसीहा आएगा उसे बचाने , कभी तो अन्धेरा छटेगा । इसी उम्मीद में अक्सर वो खुद कुछ नहीं करता । 

पर मुख़र्जी कमीशन की रिपोर्ट , जिसे सरकार ने खारिज कर दिया था , उसके बाद से लगा था कि कुछ तो ऐसा है जो सबसे छुपा है वरना सुप्रीम कोर्ट का कोई एक्स चीफ जस्टिस ऐसा अपनी रिपोर्ट में ये नहीं लिखेगा कि सुभाष की मौत के कोई साक्ष्य हिन्दुस्तान की सरकार के पास नहीं हैं ।  पर सही बताऊँ इसके आगे नहीं सोचा कभी । 

पिछले साल से फाइलों के अवर्गीकरण को लेकर बने माहौल ने इस बारे में जानने और समझने के लिए विवश किया । फिर बीते दिनों जब न्यूयॉर्क में  देव कुमार भाई से मुलाक़ात हुई तो अनुज धर के बारे में पता चला । फ़ीनिक्स वापस आकर एक दिन श्रीमती जी ने अनुज के कई जगह दिए गए व्याखानों को दिखाया । अनुज की ही किताब "व्हाट हैपेंड टू नेताजी" पढ़ी । अनुज ने काफी सारी घटनाओं , लोगों और उनके बयानों को लेकर संभावित बातों का एक ताना बाना बुना है जो एक बार हो सकता है आपको काल्पनिक लगे , पर कुछ ऐसे साक्ष्य वो सामने रख देते हैं कि अगर आप उनकी कही बातों पर एक बार यकीन ना भी करें पर पढाये गए इतिहास पर भरोसा नहीं रहता । कुछ वाकये हैं :

१. अवर्गीकृत की गयी फाइलों में कहा गया है कि सुभाष की मौत के कोई सीधे सबूत नहीं थे । पारस्थितिक सबूतों को देखते हुए उनकी मौत हो गयी होगी ऐसा मान लिया गया । यही हमारी किताबों में भी पढ़ाया गया । जबकि खुद गाँधी जी का बयान सामने आया जो बोस को ज़िंदा मानते थे । 

२. सुभाष के तीन रेडियो सन्देश की बात भी स्वीकार की गयी है फाइलों में जो उनकी तथाकथित मौत  के बाद के हैं । 

३. १९७१ , यानी की दूसरे विश्व युद्ध के ख़त्म होने के २६ साल बाद भी भारत संयुक्त राष्ट्र के उस प्रस्ताव का समर्थन करता है जिसमे इतना वक़्त गुजरने के बाद भी अगर कोई युद्ध का आरोपी मिलता है तो उसपर मुकदमा चलाने की बात स्वीकार कर ली गयी है । जबकि देखा जाए तो "आजाद हिन्द फौज" के अलावा ये बात किसी और पर लागू नहीं होती और उसके भी सुभाष के अलावा लगभग सारे सदस्यों पर मुकदमा चल चुका था । 
४. सरकारें आज़ादी के  लम्बे समय बाद तक सुभाष बाबु के घर वालों की जासूसी कराती रही । 

५. इंदिरा सरकार ने  नेताजी की मौत से जुडी फाइलों को ना केवल अवर्गीकृत करने से मना किया बल्कि काफी फाइलों को नष्ट भी किया । पूर्ववर्ती नेहरु सरकार के समय आज़ाद हिन्द फौज के खजाने के गायब होने की बात भी है । 

ऐसे और ना जाने कितने साक्ष्य हैं जो ये कहते हैं कि कहीं ना कहीं भारत की सरकारों को ये पता था या है कि सुभाष के साथ क्या हुआ इसके साथ कि वो १९४५ में नहीं मरे । 

इन्सी साक्ष्यों में फैजाबाद में रहने वाले गुमनामी बाबा के सुभाष होने के कुछ ऐसे ठोस साक्ष्य अनुज ने रखे हैं कि विश्वास होने लगता है । फिर जो सामान उनके पास से मिला है वो भी अपनी कहानी कहता है । 

और इस सबके इतर ना जाने कितने लोगों के बयान हैं  जिसमे एक भीमराव आंबेडकर भी हैं , जो १९४७ में अंग्रेजों के भारत छोड़ने में सबसे बड़ा कारण सुभाष को मानते हैं ना कि महात्मा गांधी को  । मन मानने को तैयार नहीं होता कि सुभाष  १९४५ में मरे थे । पहले प्रधानमंत्री नेहरु को लेकर सवाल उठते हैं  वो अलग । 

इसके अलावा  भी ऐसा बहुत कुछ कि लगता है हम अपनी आज़ादी के बहुत बड़े हीरो से अनभिज्ञ रहे हैं , साथ ही शायद जो एक आइडेंटिटी क्राइसिस हम सबमे घर कर गया है , उसका भी कारण नेताजी कि फाइलों में दफन है ।  

पर ऐसा नहीं है कि अनुज ये कहते हैं कि अंतिम सत्य वही है जो वो कह रहे हैं । मांग सिर्फ इतनी है कि जांच होनी चाहिए वो भी निष्पक्ष । सारी फाइलें अवर्गीकृत होनी चाहिए । जिससे सच क्या है , सामने आ सके । 

लोग इसे कांग्रेस और भाजपा की लड़ाई भी बता रहे हैं । मुझे ये अपने देश के महानायक को न्याय दिलाने की लड़ाई लगती है । इसलिए भी कि अगर वो १९४५ में नहीं मरे तो वो कहाँ गए और उनके साथ क्या हुआ या १९४५  में अगर वो मर गए तो ऐसा लोगों का कौन सा फायदा है जिसके लिए उन्हें तथाकथित तौर पर ज़िंदा होना बताया गया । बीती कांग्रेस सरकारों का रोल संदिग्ध लगता है पर उतनी ही जिम्मेदार नॉन-कांग्रेसी सरकारे भी रही हैं । अभी की केंद्र की भाजपा और बंगाल कि तृणमूल कांग्रेस ने फाइलें अवर्गीकृत की हैं जिससे उम्मीद बंधी है । 

दलगत राजनीति से हटकर भी इस गुत्थी को सुलझाना ही होगा ताकि या तो अगर वो ज़िंदा रहे फिर भी बाहर नहीं आये , उसके क्या कारण रहे और कौन दोषी है । और अगर वो मर गए तो उनके ज़िंदा होने की बातों पर पूर्ण विराम लगे । 

जो भी हो , कुछ होना ज़रूर चाहिए । हम बहुत सी बातों पर सड़कों पर उतर आते हैं , सरकार से डिमांड करते हैं । इस मामले में हम ऐसा कुछ नहीं कर रहे । मुझे ये तो नहीं लगता सड़क पर उतर जाने का यही समय है पर हाँ इतना ज़रूर है कि हमारी ये डिमांड ज़रूर होनी चाहिए और किसी भी माध्यम से सम्बंधित लोगों तक ये आवाज़ पहुंचानी ही होगी । एक बार फिर , मांग सिर्फ इतनी है कि जांच होनी चाहिए वो भी निष्पक्ष । सारी फाइलें अवर्गीकृत होनी चाहिए । 

पर ये भी ज़रूरी नहीं कि आप सिर्फ मेरे कहने पर कुछ करें । आपके रिफरेन्स के लिए कुछ लिंक दे रहा हूँ :

१. नेता जी से सम्बंधित अवर्गीकृत फाइलें भारत सरकार की नेशनल आर्काइव की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं : http://netajipapers.gov.in/

२. गुमनामी बाबा से सम्बंधित बहुत सारी रिपोर्ट्स कई मुख्य समाचार पत्रों में बीते कई दिनों में छपे हैं । 

३. अनुज धर की किताबों "India's Biggest Cover Up" और "What happened to Netaji" में भी एक पक्ष मिलेगा । अनुज धर और missionnetaji.org के बाकी लोग भी इससे सम्बंधित जानकारी ट्विटर पर साझा करते रहते हैं । 

एक बार फिर, आप अपनी कोई भी सोच बनाने के से पहले इन सबको ज़रूर पढ़ें । ये कोई राजनीतिक लड़ाई नहीं है । कांग्रेस :  सुभाष, नेहरू  या गांधी जी से भी बहुत पुरानी है । भाजपा के अपने सरोकार  हैं । इसलिए सोच हमारी  अपनी ही होनी चाहिए । 

पर हाँ अगर आपको लगे कि इस मुहिम  से जुड़ना चाहिए तो ज़रूर जुड़िये । आप से जुड़े लोगों में इसके लिए जागरूकता लाइये । सोशल नेटवर्क्स पर इसकी चर्चा कीजिये । जिससे लोगों को हौंसला मिले और सरकार तक इसकी आवाज़ भी पहुंचे । 

इस उम्मीद के साथ कि  हम सबकी मेहनत रंग लाएगी और जो भी नेताजी का सच है जल्दी ही हमारे सामने होगा , इस बात की समाप्ति यहीं पर । 

- जय हिन्द !!!! 

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

लाइक - कमेंट - शेयर का घमासान !!!!

ज़माना जब से सोशल मीडिया का हुआ है , वर्चुअल वर्ल्ड पर इंसानी हरकतें एक नए दौर में पहुँच गयी हैं । हस्ती का सबूत आपकी पोस्ट को मिलने वाले कमेंट और उस पर मचने वाली भसड़ से मापा जाने लगा है । आपकी प्रोफाइल पिक पर सैकड़ों लाइक  और दर्ज़नों कमेंट ना आएं तो खुद पर शक हो जाना लाज़मी है । कुछ लोग तो ऐसा ना होने पर हिंदी डेली सोप की तरह अपने चेहरे को प्लास्टिक सर्जरी से दुरुस्त कराने की बात सोचने लगते हैं हांलाकि प्लास्टिक सर्जरी से वाकई शकल क्या इतनी बदल जाती है इसपर दुनिया को रिसर्च करने की ज़रुरत है । 

मेरा एक बचपन  का दोस्त आज से करीब २० साल पहले पासपोर्ट साइज की फोटो बनाने वाले से इसलिए भिड़ गया की उसकी शक्ल ख़राब और टेढ़ी आयी थी । फोटोग्राफर पहले भी उससे भड़का हुआ था क्यूंकि हरबार यही कहकर वो अपनी एक्स्ट्रा फोटो बनवाता था , बोल उठा की जैसी शकल है वैसी आएगी । बन्दे ने ऐसी तोड़फोड़ मचाई की फोटो स्टूडियो हफ्ते भर बंद रहा । 

खैर , वापस आते हैं । सोशल मीडिया के ज़माने में । 

बीते कुछ दिनों में सोशल मीडिया ना केवल बहुत ज़िम्मेदार हुआ है अपितु जनसेवा के कार्यों में किसी भी चुनावी बरसात में जागने वाले नेता रुपी मेढक से भी आगे निकल रहा है । 

जिस तरह कविता के आदिकाल और भक्तिकाल के बीच में एक गहरे असंतोष का पाया जाना हमारे साहित्यिक इतिहासकार बताते हैं , उसी तरह सोशल मीडिया के जागरूक होने के ठीक पहले का काल भी ऐसे ही नैराश्य से भरा पड़ा था । ज़िन्दगी कष्ट में बीत रही थी लोगों की । सोशल मीडिया ने सबसे पहले अच्छी खबरें देने का जिम्मा उठाया । 

किसी देवी , देवता, पशु पक्षियों की फोटो शॉप की गयी फोटो, मंदिर , मस्जिद, गुरूद्वारे, चर्च : कोई भी तस्वीर को शेयर करने से आपको गॉरंटी के साथ आजकल अच्छी खबरें मिलने लगी हैं । "इस देशभक्त " या "इस माँ" को कितने लाइक टाइप की फोटुएं धड़ाधड़ शेयर हो रही हैं । जनता का दिल कितना बड़ा है इसी से समझ आ जाता है जब वो किसी मासूम बच्चे की फोटो शेयर करके बोलते हैं की फेसबुक हर शेयर का कुछ रुपया इसके इलाज़ में खर्च करेगा । और ऐसी फोटो को जिस तरह की ज़बरदस्त कामयाबी मिलती है उससे लगता है की दुनिया में मानवता अभी बाकी है । वैसे जेब से एक फूटी कौड़ी ना खर्च करने की कंडीशन हो तो ज़माना आज भी नहीं बिगड़ा है अदरवाइज़ पूरे एक ज़माने से ज़माना बिगड़ा पड़ा है । ऐसे मासूमों का इलाज़ पता नहीं हो भी पाता है या नहीं , पर कुछ फोटो तो हर दूसरे तीसरे साल वापस शेयर हो जाती हैं । 

एक और ट्रेंड है । फलाना नंबर फोटो पर लिखें और जादू देखें । ये बहुत बढ़िया है । मैंने देखा एक किसी अत्यंत खूबसूरत बाला ,  जिसने आवश्यकता से कुछ ही ज्यादा कपड़े पहने हुए थे , की फोटो पर धधड़ ततड़ कमेंट हो रहे थे । मौजू था कमेंट में ५ लिखें और जादू देखें । कमेंट करने वाले ना जाने कितने युवाजन , जिन्हे ५ तक की गिनती भी सुनाने में १० डस्टर की मार पड़ती थी , इस उम्मीद में की अभी ये फोटो हैरी पॉटर के चलायमान फोटो में परिवर्तित होगी और कुछ ऐसा देखने को मिलेगा जिससे उनके आदि काल से पिपासु नैन तृप्त हो जाएंगे , ५ फिर ५ और उसके बाद एक और ५ लिखे जा रहे थे । कुछ सदाचार का ठेका ले चुके लोग भी थे , उनका मानना था की ५ लिखते ही ये लड़की किसी भरपूर कपड़े पहने हुए  सुन्दर बालिका में तब्दील हो जायेगी , और वो ये कह कह के लोगों को शेयर कर सकेंगे कि देखो ये होती है सुंदरता । और ये भी ठोक देंगे की अगर कपड़े उतारना ही आधुनिकता होती तो "फलाना" आजकल सबसे आधुनिक होते । 

खैर , ५ लिखने वालों को क्या मिलता है वो तो वही जाने । हाँ किसी और फोटो में वे ७ या ९ लिखते फिर दिख जाते हैं । या तो ५ से कुछ हुआ नहीं या उनको पूरी उम्मीद है जब ५ से इतना हुआ तो ७ और ९ से और क्या क्या हो सकता है । 

इस बीच लोगों ने ऐसा आरोप भी लगाया है कि सोशल मीडिया देश के लिए कुछ नहीं कर रहा । सोशल मीडिया के कर्णधारों से ये नहीं सहा गया । उन लोगों ने अगले चुनावों से लेकर बड़े से बड़े आतंकवादी का फैसला चुटकी बजाते कर दिया । आप इनको अगली बार प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं । हाँ के लिए लाइक और ना के लिए कमेंट करें । और सहमत हों तो शेयर करें । ऐसी फोटो पर भी लाखों कमेंट और लाइक  । हज़ारों शेयर भी । और एक भारत का चुनाव आयोग है , इत्ते पैसे खर्च करता है । 

ऐसे ही एक आतंकवादी की फोटो पर एडिट करके जूता बना दिया और , और बोला लाइक  = ५ जूते , कमेंट = १० जूते और शेयर = १५ जूते । टोटल ३२. ४ हज़ार लाइक , १६ हज़ार कमेंट और ९ हज़ार शेयर , कुल मिलाकर : 26835000 ( पढ़ के बताओ तो जाने ) जूते जनाब को बैठे ठाले पड़ गए । इतने जूते पड़ने के बाद इंसान का जो भी हश्र हो , मुझे अपनी सरकार पर बड़ा तरस आया कि फालतू में पड़ोसी मुल्क की सरकार को सबूत पर सबूत दिए जा रही है । मामला यूं निपटाना था ना  ।

इसी तरह के ना जाने कितनी समस्याएं कमेंट-लाइक-शेयर के फलदायी तूफ़ान ने यों ( चुटकी बजाते हुए ) बोले तो यों ( फिर से चुटकी बजाते हुए ) हासिल की हैं । भविष्य में युद्ध इसी टाइप से लड़े जा सकते हैं । जो एक साइड का समर्थन करते हैं वो लाइक करें और जो दूसरी साइड को वो कमेंट करें । और जो केवल मजा लेना चाहते हैं वो शेयर करें । पता चलता सबसे ज्यादा शेयर उत्तर प्रदेश से आ रहे हैं । यहाँ के लोगों का तो काम ही मजा लेना है । ऐसे घमासानों  में ना जाने कितने घायल होकर पोस्ट करना बंद कर देते हैं । कई लापता की भांति गायब हो जाते हैं या उनकी प्रोफाइल फेसबुक ब्लॉक कर देता है छिछोरी हरकतों के चलते । 

The world has confused itself so much that for the simplest solution which is at hand, it's going for a longer route. बोले तो बगल में छोरा और शहर में हालाडोला । 

बाकी यही सब चल रहा है आजकल , आगे भी चलता रहेगा ।  सर्दी है ही वो बात अलग है  । वैसे आपका क्या मानना है ? ये जो बकवास मैंने ऊपर लिखी है वो कैसी है : अपनी राय देने के लिए कमेंट ( सहमत) , लाइक ( पूर्णतया सहमत)  और शेयर ( माइंड ब्लोइंग टाइप ) कर सकते हैं । 

फिर मिलेंगे !!!

आप सबको क्रिसमस की बधाई ।

नमस्ते !!!

शनिवार, 19 दिसंबर 2015

निर्भया तुम मरने लायक ही हो !!!

तुम्हारा नाम ज्योति था , पर हमारे यहाँ तुम निर्भया ही हो । वही रहोगी । तुम्हे ज़बरदस्ती शहीद बनाकर पूजनीय बनाकर अपना पल्ला झाड़ लिया गया है  । ये चलता है अपने यहाँ । देखती हो ना उस बिना बाल के चश्मा लगाए ईमानदारी की प्रतिमूर्ति को , हर ऑफिस की दीवारों से लेकर नोट पर उसकी फोटो है और उन्ही फोटो के नीचे उन्ही नोटों के साथ हम ईमानदारी की मैय्यत निकाल देते हैं । हम सुधरने वाले नहीं है । तुम दिल्ली में मारी गयी , हल्ला हो भी गया । ना जाने कितनी और कहाँ मारी जाती होंगी , किसी के कान में जूं ना रेंगती होगी ।

तुम्हारे नाम को लेकर १५ तो सुझाव दिए गए । तुम्हारे माता-पिता में वो साहस है कि उन्होंने तुम्हारा नाम बता दिया । तुमको मारने वाले का नाम हम आजतक गेस करते हैं  , हम उस हद तक कायर हैं ।

तुम्हारी मौत पर सबने खूब रोटियां सेंकी थी । इंडिया गेट पर जम के बवाल कटा था । जनता, पत्रकार , नेता सब । जो धरने पर बैठ गए थे वो एक बेसिरपैर की बहस लेकर दूसरे से जवाब मांग रहे हैं । दूसरे जिनपर कानून बनाने का ज़िम्मा है , पहले के सवालों को खारिज कर रहे हैं । तुर्रा ये कि लोकसभा में तो हमने पास कर दिया राज्यसभा में बहुमत नहीं है । किसानों की ज़मीने लेने के लिए आर्डिनेंस ला सकते हैं । तुम्हारे लिए नहीं । सरकार कहीं स्वच्छंद ना हो जाए इसलिए राजयसभा में उसे अल्पमत में रहना लोकतंत्र के लिए अच्छा बताने वाले लोग ही मोमबत्ती लिए जुलूस निकाल रहे थे ।

और उस हंगामे की कवरेज करने वाला मीडिया जो घड़ों आंसू बहाये पड़ा था , किन किन बकवास पर घंटे घंटे डिबेट चला रहा है , तुम्हारे लिए १५ मिनट का बस एक स्लॉट है । उसी में खुश रहो । कल तक  थर्मामीटर लिए जगह जगह सहिष्णुता - असहिष्णुता नापने वाला यही मीडिया , पुरस्कार लौटाने वाले बुद्धिजीवी , उनका विरोध करने वाले देशभक्त सबके सरोकार आज बदले हैं । आज देशभक्ति सिर्फ किसी फिल्म का विरोध करने पर निकल रही है । बुद्धिजीविता सरकार को कोसने में । तुम्हारे लिए सबके मुंह पर ताले हैं । तुम अब TRP नहीं रहीं ना । तुम्हारे ऊपर बनी एक डॉक्यूमेंट्री को तुम्हारी खबर से ज्यादा तवज्जो दी जाती रहेगी ।

और हम "दबी-कुचली" होने का सुख लेने वाली जनता जो ये कहकर हर बात पर मट्ठा दाल देते हैं कि हम कर ही क्या सकते हैं , आज ५-७ मिनट आह ओह करेंगे । और लग जायेंगे तेरे नेता की शर्ट मुझसे ज्यादा काली है करने । और तुम बस बैठी देखना ।

कल १९ है । तीसरी जमात वाले कल कोर्ट जाने वाले हैं । सुबह होते ही तुम भुला दी जाओगी । देख लेना ।

तुम मरने लायक ही हो । 

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

पनीर मेथी मसाला

डिस्क्लेमर : ये पहली रेसिपी लिखने की कोशिश है । खाकर बेहोश होने या स्वाद अच्छा ना आने पर दी गयी गाली को मैं एक्सेप्ट नहीं करूंगा । :) :)

और रेसिपी केवल दो लोगों के लिए है । इसे पानी मिलाकर , ५-७ लोगों के लिए भी किया जा सकता है । थोड़ा नमक - मिर्च मिलाना पड़ेगा । खाने - खिलाने की ज़िम्मेदारी फिर भी आप की ही होगी ।

सामग्री : 

१. १०० ग्राम पनीर ।
२. २५० ग्राम हरी मेथी ।
३. २ मझले साइज के प्याज़ ।
४. ४ मझले साइज के टमाटर ।
५. ५ ग्राम अदरख ।
६. ३-४ फांक लहसुन ।
७. आधा कप क्रीम ।
८. गरम मसाला ।
९ . नमक टेस्टानुसार ।
१० . पिसी लाल मिर्च औकातानुसार ।
११. कुकिंग आयल ।
१२. २ चम्मच जीरा ।


बनाने की विधि : 

आसान ही है । बैचलर्स के लिए इसे थोड़ा बहुत ट्वीक करके भी बताये जाने की कोशिश रहेगी ।

सबसे पहले करी बनाने का जुगाड़ करते हैं ।

इसके २ तरीके हैं ।

एक : मिक्सी में प्याज़, टमाटर, लहसुन और अदरख को पीस लो । पाने जितना काम डालना पड़े उतना बढ़िया । बैचलर्स के लिए बेस्ट रहता है ये तरीका ।

दूसरा  : प्याज़ , टमाटर , लहसुन और अदरख को बारीक काटकर रख लें । एक पैन में आयल डालें । चूल्हा जलाना कतई ना भूलें । जब तेल गर्म हो जाए , तो एक चम्मच जीरा डालकर उसे चटकने दें । फिर इसमें बारीक कटा हुआ लहसुन और अदरख  डालें और लहसुन के हल्का  हल्का भूरा होने पर  प्याज़ डालकर ढक दें ताकि प्याज़ गलने लगे । थोड़ा नमक भी डाल सकते हैं इससे प्याज़ जल्दी गलेगा , ऐसा कुछ विद्वानों का मानना है । जब प्याज़ हलकी सी गलने लगे तो टमाटर डालकर मिश्रण को ढक दें । मिश्रण को धीमी आंच पर पकने दें  । इस काम को फटाफट करने के लिए मिश्रण को प्रेशर कुकर में भी पकाया जा सकता है । १-२ सीटी से काम चल जायेगा । सारा मिश्रण घुल मिल जाना चाहिए ।

अब मेथी का मोर्चा सँभालते हैं ।

मेथी पत्त्यिों को अच्छी तरह धोकर काट लें । पैन में हल्का तेल डालकर गर्म करें । फिर हल्का जीरा डालकर चटकाएं और मेथी पत्तियां डाल दें । किचन में हल्का धुंआ खुशबू  भरने दें इससे माहौल बनता है हाँ | अगर घर में स्मोक डिटेक्टर है तो ध्यान रखें , वर्ना लेने के देने पड़ जायेंगे और माहौल फायर ब्रिगेड बनाएगी ।

थोड़ी देर में  पत्तियां पानी छोड़ने लगेंगी और डाली गयी क्वांटिटी का लगभग एक चौथाई दिखेंगी । अब इसमें ऊपर तैयार की गयी करी डालें । नमक , मिर्च और स्वादानुसार गरम मसाला मिलाएं । मिश्रण को हल्की आंच पर चलाते रहें । थोड़ी देर में मिश्रण से तेल अलग होता सा दिखेगा ।  आधा से एक कप पानी मिला लें । ताकि ग्रेवी बन जाए ।

अब इसमें क्रीम मिला दें (अगर क्रीम नहीं है तो एक कप दूध को पैन में गाढ़ा कर के हाफ कप बना लें और ठंडा करके काम चलाया जा सकता है ) । थोड़ा सा और पकाएं मिश्रण को ।

पनीर-मेथी-मसाले की मसालेदार फोटो !!!
अब इसमें पनीर के आड़े टेढ़े जैसे भी पीस काट पाएं,काटकर डाल  दें । पनीर को हल्का भूना भी जा सकता है डालने से पहले ।


५ मिनट ढक  कर पकने दें ।

और जैसा तमाम रेसिपी बुक में लिखा होता है "गरमागरम परोसें" ।  :) :) :)

ऊपर का डिस्क्लेमर ज़रूर पढ़ लें , बनानें से पहले :) :) :)

नमस्ते !!!


-- देवांशु 




गुरुवार, 30 जुलाई 2015

भारतीय ....

आज सुबह से ही मन बहुत विचलित है ....कभी बहुत प्रसन्न और कभी अत्यंत पीड़ा हो रही है |

एक ओर डॉक्टर कलाम के निधन से मन दुखी है तो दूसरी ओर उनकी आत्मीयता, खुले विचारों से भरपूर व्यक्तित्व और उपलब्धियों के बारे में पढ़ कर अपने इस गौरवशाली पूर्व राष्ट्रपति
को अंतिम बार देखने आई भीड़ को देख भारत की एकता पर गर्व होता है |

आत्मीयता और प्रेम कोई बंधन,भेद नहीं देखते .......ये एक ऐसा तथ्य है जो हर हृदय स्वीकारता है .....कोई तर्क-वितर्क नहीं रह जाता |

मन दुखी एक और विचार से हो रहा है ......याकूब की फांसी पर जो नाटक टीवी पर चल रहा है.
यह जान कर बहुत संतुष्टि हुई की मैं उस देश से हूँ जहां ऐसा व्यक्ति जो स्वयं कई लोगों की मृत्यु के लिए उत्तरदायी और बंदी है उसे भी समान रूप से अपनी बात रखने और लड़ाई लड़ने का अधिकार है |

पर इस विषय पर जो समाचारों का सिलसिला चल रहा है उससे बहुत पीड़ा हुई है |

मेरा मन भी यही कहता है की फांसी किसी को भी न हो, हर व्यक्ति में सुधार और बदलाव की उम्मीद होती है ऐसा मेरा मानना है , इसे किसी समर्थन की आवश्यकता से ज्यादा आत्मीयता से देखने आवश्यकता है...पर यह नहीं समझ पायी की एक जागरूक देशवासी होने के नाते हमें यह बात धर्म के सहारे लपेट कर क्यों कहनी पड़ गयी ...और वो भी तब ही क्यों याद आती है जब किसी को ये सज़ा सुना दी गयी हो |

कानून में बदलाव लाना अगर आवश्यक है तो हम इस बात को अलग तरह से प्रस्तुत क्यों नहीं करते .....सिर्फ एक भारतीय हो कर इस बात को कहना भी बदलाव लाने के लिए बहुत होगा | अगर आप देश की क़ानून व्यवस्था पर भरोसा रखते हैं तो यह लड़ाई भी उसी भरोसे से लड़िये ...इसे लोगों में अलगाव बढाने के लिए इस्तेमाल करना निंदनीय है |

हमारे देश का संविधान हमे इसका पूरा अधिकार देता है | 

यह लिख कर किसी का समर्थन करने का मेरा ध्येय नहीं है ...परन्तु एक फांसी की सज़ा को हम कितना मनोरंजक बना सकते हैं यह देख कर मन बहुत दुखी है |
-- तनु